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दुनिया के सबसे बड़े देश से कैसे टूट कर बने 15 नए देश? सोवियत संघ का विघटन? | Collapse Of Soviet Union

History Connect

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[0:00]रूस के राष्ट्रपति पुतिन आज भी दुनिया भर में जाने-पहचाने नेता हैं, लेकिन क्या वह अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप जितने ताकतवर हैं या पुतिन अब कमजोर हैं? कभी अमेरिका को हर मामले में चुनौती देने वाला रूस एक ऐसा देश है जो पिछले काफी समय से दुनिया के कई देशों से अलग-थलग पड़ा है, खासकर वेस्टर्न देशों से इसके संबंध बहुत कम रह गए हैं। ना कोई ट्रेड और ना ही कोई डिप्लोमेटिक रिलेशन। पड़ोसी देश यूक्रेन के साथ इसकी लड़ाई चल रही है, वही यूक्रेन जो कभी इसका एक हिस्सा था। बस अंतर यह था कि तब यह रूस नहीं, सोवियत संघ यानी USSR कहा जाता था। यूक्रेन ही नहीं ऐसे 15 और देश हैं जो कि कभी इसी सोवियत संघ का हिस्सा थे। तो ऐसा क्या हुआ कि इतने देश रूस से निकल गए और यह हुआ कैसे, आज यही कहानी सुनते हैं। 25 दिसंबर 1991 की रात थी, मॉस्को का आसमान बर्फ से ढका था, सड़कों पर सन्नाटा था लेकिन क्रेमलिन की छत पर कुछ खास हो रहा था। वहां सोवियत संघ का लाल झंडा धीरे-धीरे नीचे उतारा जा रहा था, ठीक उसी समय उसकी जगह पर रूस का तिरंगे जैसा एक नया झंडा फहराया गया। टीवी पर मिखाइल गोर्बाचेव ने राष्ट्र को संबोधित करते हुए कहा, मैं सोवियत संघ के राष्ट्रपति पद से इस्तीफा दे रहा हूं। इस दिन का यह पल इतिहास में दर्ज हो गया, 70 साल पुरानी एक वर्ल्ड पावर यानी USSR अचानक खत्म हो गया। यह वह देश था जिसने अमेरिका को टक्कर दी, स्पेस रेस को जीता, दुनिया भर में सोशलिज्म का परचम लहराया, लेकिन खुद यह देश अंदर ही अंदर टूट रहा था और 1991 में वह 15 टुकड़ों में बंट गया। पर क्या एक रात को एक झंडा नीचे उतर जाने से कोई देश खत्म हो जाता है? जवाब है नहीं, असली कहानी बहुत गहरी है, दरारें धीरे-धीरे पड़ी थी, सड़न भीतर से शुरू हुई थी और अंत में जो हुआ, वह सिर्फ बस एक औपचारिक घोषणा थी। आज भी यह सवाल सबके मन में आता है कि इतना ताकतवर देश आखिर टूटा कैसे? क्या इसमें बाहरी ताकतों का हाथ था या फिर कुछ ऐसा हो रहा था सोवियत संघ के अंदर जिसे कोई वक्त रहते समझ नहीं पाया? आज की कहानी में हम इसी इतिहास को जानेंगे, कैसे बना था सोवियत संघ, कैसे उसके अंदर दरारें आई और कैसे वह एक इतिहास बनकर रह गया। तो वीडियो को एंड तक जरूर देखिएगा, क्योंकि अपना इतिहास नहीं जानोगे तो खुद को कैसे पहचानोगे? यह कहानी शुरू होती है साल 1917 से जब विश्व युद्ध के बीच में एक देश में क्रांति हो गई। इस क्रांति को बोल्शेविक क्रांति या रूसी क्रांति कहा गया। 20वीं सदी की शुरुआत से ही रूस में बड़े पैमाने पर गरीबी फैली थी। यहां पर जार निकोलस सेकंड का राज था और देश गरीबी की मार झेल रहा था। ऊपर से 1905 में जापान जैसे एक छोटे से देश ने रूस को बुरी तरह से जंग में हराया था। मतलब ना तो रूस के पास कोई आत्मसम्मान बचा था और ना लोगों के पास खाने-पीने और रहने की अच्छी कंडीशन थी। वहीं दूसरी ओर जार निकोलस और उनके अमीर दोस्त ऐशो आराम की जिंदगी जीते थे। ऐसे में 1917 में प्रथम विश्व युद्ध के बीच में एक जोरदार क्रांति हुई। इस क्रांति की अगुवाई कर रहे थे व्लादिमीर लेनिन, रूस पहला देश बना जहां पर कम्युनिस्ट क्रांति हुई थी। लेनिन ने साफ कर दिया था कि देश में अब सत्ता अमीरों के हाथों में नहीं, बल्कि मजदूरों और किसानों के हाथों में होगी। कम्युनिज्म की इस विचारधारा में कोई भी गरीब या अमीर नहीं था, सब बराबर थे। इस क्रांति के बाद जार का शासन हो गया खत्म और साल 1918 में सोवियत रूस की नींव रखते हैं लेनिन। इसके बाद साल 1922 में रूस, यूक्रेन, बेलारूस, जॉर्जिया और आर्मेनिया जैसे देशों को मिलाकर लेनिन ने एक सोवियत संघ बनाया। लेनिन का सपना था एक ऐसा कम्युनिस्ट देश बनाने का जहां हर नागरिक को शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार मिले। इनके शुरुआती कुछ सालों में सुधार भी हुए, लेकिन वह आगे कुछ कर पाते सोवियत संघ के लिए, उससे पहले ही 1924 में लेनिन की अचानक मृत्यु हो गई। लेनिन की मृत्यु ने यूएसएसआर की दिशा को हमेशा के लिए बदल दिया। हुआ यह कि लेनिन के बाद सत्ता में आया जोसेफ स्टालिन। स्टालिन लेनिन के साथ थे, लेकिन असल में उनका तरीका लेनिन से बहुत अलग था। लेनिन जहां विचारों से क्रांति लाना चाहते थे, वहीं स्टालिन को विचारों से ज्यादा ताकत को अपने हाथों में रखने की पड़ी थी। जल्दी ही स्टालिन भी एक तानाशाह बन गया। स्टालिन का मानना था कि अगर देश को तेजी से आगे लेकर जाना है तो जनता को मजबूरी में भी उसके साथ चलना पड़ेगा। उसने सोवियत संघ में फाइव ईयर प्लान शुरू किया, जहां खेतों और कारखानों को सरकार के हाथों में ले लिया गया। किसानों को जबरदस्ती अपनी जमीन छोड़नी पड़ी, लाखों लोगों को शहरों में काम पर लगाया गया। उसके दौर में जो उसका विरोध करता था, उसे देशद्रोही करके जेल में डाल दिया जाता या उसे गोली मार दी जाती। उसने एक सिंगल पार्टी सिस्टम शुरू किया जिससे देश में सिर्फ और सिर्फ कम्युनिस्ट पार्टी ही रह गई थी। बाकी किसी भी तरीके के पॉलिटिकल विचारों का सिस्टम नहीं रह गया था, मतलब यह कि अब स्टालिन का विरोध करने वाला कोई नहीं था। अब अगर आपको लगता है कि सिर्फ हिटलर और मुसोलिनी ही बड़े तानाशाह थे तो शायद स्टालिन के बारे में आपको नहीं पता है पूरी तरह से। 1930 के दशक में हिटलर के कंसंट्रेशन कैंप की तरह स्टालिन ने भी द ग्रेट पैरेज नाम से एक योजना चलानी शुरू की थी। ग्रेट पैरेज में लोगों को जबरदस्ती पकड़ कर बंद कर दिया जाता, इसमें ज्यादातर लोग वह थे जो स्टालिन का विरोध करते थे। उसकी इस मुहिम में 20 लाख से ज्यादा लोग या तो मार दिए गए या फिर उन्हें जेलों में सड़ने पर मजबूर कर दिया गया था। शोषण के मामले में स्टालिन सबके साथ एक जैसा बर्ताव करता था, चाहे वह कोई राइटर हो, कोई आर्टिस्ट हो या साइंटिस्ट। जो भी स्टालिन की बात से अलग सोचता था, उसका अंजाम बहुत बुरा होता था। इस तरह स्टालिन के दौर में दुनिया के लोगों के सामने सोवियत संघ बहुत ताकतवर देश तो था, लेकिन अंदर ही अंदर संघ में लोगों की जिंदगी खोखली होती जा रही थी। फिर 1939 में दूसरे विश्व युद्ध में जर्मनी ने जब रूस पर हमला किया तो सोवियत ने उसे पीछे छोड़ दिया। सोवियत ने जर्मनी के बर्लिन तक पर कब्जा कर लिया। इस जीत से यूएसएसआर एक वर्ल्ड पावर के रूप में एस्टेब्लिश हुआ, वह वर्ल्ड पावर जो कम्युनिस्ट यानी कि साम्यवादी विचारों को मानती थी। वहीं दुनिया में एक और देश था अमेरिका जो कि एक पूंजीवादी यानी कैपिटलिस्ट देश था। जाहिर है कि दो अलग-अलग विचारधाराओं वाली महाशक्तियों के बीच टकराव होना तय था। दुनिया इन दो महाशक्तियों के बीच बट रही थी, यही बंटवारा आगे चलकर कोल्ड वॉर यानी शीत युद्ध की नींव बना। कोल्ड वॉर का मतलब था बिना सीधा युद्ध किए, हथियारों की होड़ करना, जासूसी, स्पेस रेस और दुनिया के छोटे-छोटे देशों को अपनी-अपनी विचारधारा में खींचना।

[7:00]इस दौरान बड़े पैमाने पर हथियारों की होड़ शुरू हुई, सोवियत ने इस दौरान स्पेस रेस में बाजी मारनी शुरू की। उसने सबसे पहले स्पेस में इंसान को भेजा, यूरी गागरिन पहले ऐसे व्यक्ति थे जो स्पेस गए। इसी तरह से सोवियत ने इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल बनाई जो कि किसी एक महाद्वीप से दूसरे किसी महाद्वीप पर हमला कर सकती थी। इसी स्पेस वॉर में सोवियत ने अमेरिका को कड़ी टक्कर दी। लेकिन यह सब कुछ हो रहा था लोगों की जरूरतों को नजरअंदाज करके। बाहर से देखने पर सोवियत संघ बहुत ताकतवर नजर आता था, लेकिन उसकी इकॉनमी गिरती जा रही थी। आप अगर इस ग्राफ को देखेंगे तो आप समझ पाएंगे कि 1990 तक यूएसएसआर की इकॉनमी लगातार गिरती जा रही थी। लोगों को उनके खिलाफ बोलने की आजादी नहीं थी, चुनाव हो नहीं सकते थे, कुल मिलाकर लोग अपने ही घरों में कैद थे और स्टालिन की दी हुई शर्तों पर जीने को मजबूर थे। तानाशाही ने लेनिन के सपने के देश को एक दमन और भय का गढ़ बना दिया था। हालांकि जोसेफ स्टालिन ने देश को इंडस्ट्रियल ताकत बनाया था, लेकिन स्टालिन ने हर एक चीज पर गवर्नमेंट का कंट्रोल रखा था। चाहे वह एग्रीकल्चर हो, एजुकेशन हो, मीडिया हो या फिर लोगों की पर्सनल लाइफ क्यों ना हो। जिसने भी विरोध किया उसे जेल में डाला गया या मार दिया गया। खैर 1953 में जोसेफ स्टालिन की मौत हुई, उनकी मौत ने सोवियत संघ में एक बहुत बड़ी राहत की तरह काम किया। एक ऐसा शासक जो जनता पर जुल्म कर रहा था जिसे अपने ही साए से डर लगता था और जिसने लाखों लोगों को जेल में मरने पर मजबूर कर दिया था, उसके जाने के बाद लोगों में कुछ उम्मीदें जगी। लेकिन समस्या यह थी कि इतनी बड़ी तानाशाही के बाद अब सत्ता संभालेगा कौन? स्टालिन के बाद दो बड़े नेता उभरे, एक तो थे निकिता ख्रुश्चेव जो 1955 में देश के असली नेता बनकर उभरे। उन्होंने स्टालिन को क्रिटिसाइज किया, ग्रेट परज में फंसे लोगों को निकाला लेकिन वह यूएसएसआर के गिरती इकोनमी को और लोगों की कंडीशन को बहुत ज्यादा सुधार नहीं पाए। इसी दौरान अमेरिका और सोवियत के बीच में कोल्ड वॉर और भी तेज हो गया। 1962 में क्यूबा मिसाइल संकट के दौरान ख्रुश्चेव ने अमेरिका के बहुत नजदीक क्यूबा में परमाणु मिसाइलें तैनात कर दी। दुनिया एक बार फिर जंग की कगार पर थी लेकिन बाद में समझौता हो गया। इस एक एक्शन से निकिता ख्रुश्चेव को बहुत ज्यादा क्रिटिसिजम झेलना पड़ा और उन्हें हटा दिया गया। उनके बाद लियोनिद ब्रेजनेव को सत्ता दी गई। ब्रेजनेव का दौर 1964 से 82 तक चला, दावा किया गया कि यह दौर स्थिरता का दौर था, लेकिन असलियत यह थी कि इस दौरान सोवियत और उससे जुड़े जो देश थे, वह अंदर ही अंदर सड़ने लगे थे। ब्रेजनेव ने भी लोगों की समस्या और उन 15 देशों को भी इग्नोर किया जो दूसरे वर्ल्ड वॉर के टाइम से जुड़े हुए थे सोवियत से। ब्रेजनेव ने वही पुरानी पॉलिसीस चालू रखी, हेवी इंडस्ट्रीज पर जोर देना, आर्मी पर बेशुमार खर्च करना और मीडिया पर सेंसरशिप। यानी कि स्टेबिलिटी के दौर में लोगों की हालत फिर भी वैसी ही बनी रही उसमें कोई सुधार नहीं हुआ। ब्रेजनेव के दौर में कम्युनिस्ट पार्टी में भ्रष्टाचार भी खूब बढ़ा। ब्रेजनेव कोई बड़ा सुधार करने पर ध्यान नहीं दे रहे थे, इसका रिजल्ट यह हुआ कि नेताओं के साथ-साथ ब्यूरोक्रेसी भी भ्रष्ट हो गई। 1980 का दशक आते-आते सोवियत संघ की ताकत सिर्फ दिखावे की ताकत रह गई थी। रही सही कसर पूरी हो जाती है 1979 में जब रूस ने अफगानिस्तान पर हमला कर दिया। अफगानिस्तान में सोवियत सेना को मुजाहिदीन लड़ाकों से जबरदस्त टक्कर मिली। इन लड़ाकों को यूएस और पाकिस्तान से सपोर्ट मिल रहा था, यह युद्ध सोवियत संघ के लिए दूसरा वियतनाम युद्ध बन गया। इस दौरान रूस 1917 की हालत में दोबारा पहुंच गया, जंग के बीच में फंसा हुआ और जनता बेहाल थी। यही वजह है कि जनता में गुस्सा बढ़ता चला गया। कभी वर्ल्ड पावर रहे सोवियत संघ की हालत अब एक ऐसे जहाज की तरह हो चुकी थी जो भरे समंदर में तैर रहा था और उसकी पेंदी में छेद हो गया था। इस बीच 1985 में सोवियत की ताकत हाथ आती है मिखाइल गोर्बाचेव के हाथों में। मिखाइल 40 सालों की लड़ाई में पहले ऐसे नेता बनकर उभरे जिन्होंने लेनिन की तरह जनता पर ध्यान देना शुरू किया। गोर्बाचेव ने आते ही मान लिया कि अगर अब भी बदलाव नहीं हुए तो यह देश अपने बोझ से खुद ही गिर जाएगा। गोर्बाचेव ने दो बड़े कदम उठाए, ग्लासनोस्ट, ग्लासनोस्ट का मतलब था खुलापन। अब लोग सरकार की आलोचना कर सकते थे, अखबार में सच छप सकता था और जनता को बोलने की आजादी मिलने लगी। इसी तरह दूसरा कदम था पेरेस्त्रोइका, इसका मतलब था आर्थिक और राजनीतिक ढांचे को फिर से खड़ा करना। सरकार अब नीकी कंपनियों को कुछ हद तक काम करने की छूट देने लगी, इसे बाजार को थोड़ी आजादी मिली। इन दोनों सुधारों का एक मकसद था, मकसद था सोवियत संघ को नई लाइफ देना, लेकिन हुआ इसका बिल्कुल उल्टा और इस बात का अंदेशा कई लोगों को हो गया था। 1988 में एक सोवियत सुपरवाइजर सर्गेई डोजिन ने लिखा और चेतावनी दी कि वैश्विक विचारों और सूचनाओं का मुक्त प्रवाह बौद्धिक वातावरण को दूषित करेगा और सांस्कृतिक और राजनीतिक संप्रभुता को खतरा पैदा करेगा। कहने का मतलब था कि लोगों को अगर दुनिया के विचारों से जोड़ोगे तो लोग इस देश के खिलाफ हो जाएंगे। जैसे ही ग्लासनोस्ट के जरिए लोगों को बोलने की आजादी मिली उन्होंने सालों से दबा गुस्सा बाहर निकालना शुरू कर दिया। अखबारों में छपने लगा कि कैसे स्टालिन ने लाखों लोगों को मार डाला, सरकार कैसे झूठ बोलती रही, कैसे अफगान युद्ध में हजारों सैनिक मारे गए और सरकार ने सब कुछ छिपाया। लोगों को लगा कि अब तक जो कुछ उन्हें सिखाया गया था, वह सब एक झूठ था, यह भरोसे का टूटना था और यहीं पर देश की नींव हिल गई। गोर्बाचेव के पेरेस्त्रोइका से भी लोगों को उम्मीद थी कि बाजार सुधरेगा, चीजें मिलेंगी, महंगाई घटेगी। लेकिन सुधार आधे अधूरे थे, सरकारी कंट्रोल पूरी तरह से हटा नहीं और प्राइवेटाइजेशन पूरी तरह से आया नहीं। इसका नतीजा यह हुआ कि बाजार में चीजें गायब होने लगी, महंगाई बढ़ गई और जनता परेशान हो गई पहले से भी ज्यादा। गोर्बाचेव को सुधारों से एक और पुराना जख्म ताजा हो गया। यह जख्म था पहचान के सवाल का जख्म, सोवियत संघ सिर्फ रूस नहीं था। इसमें 14 और देश मिलाए गए थे जैसे यूक्रेन, एस्टोनिया, लिथुआनिया, लैट्विया, जॉर्जिया, कजाकिस्तान वगैरह-वगैरह। सालों से इन देशों की भाषाएं, कल्चर, धर्म और आजादी दबाई गई थी। अब जब बोलने की आजादी मिली तो यह आवाजें विद्रोह में बदलने लगी। यह सिलसिला शुरू होता है कजाकिस्तान से, दिसंबर 1986 में गोर्बाचेव ने एक रूसी अधिकारी को कजाकिस्तान का प्रमुख बना दिया। जबकि वहां के लोगों को लगा था कि अब उनका कोई अपना चुना जाएगा। हजारों स्टूडेंट्स ने अलमाटी की सड़कों पर उतर कर विरोध किया, सरकार ने तुरंत टैंक भेज दिए, प्रदर्शनकारियों पर लाठी चार्ज हुआ, सैकड़ों लोगों को जेल में डाल दिया गया। लेकिन सोवियत के लिए यह पहली घटना थी। आगे ऐसी और कई घटनाएं इंतजार कर रही थी। 1988 में बाल्टिक देशों में बगावत की शुरुआत हुई, एस्टोनिया, लाटविया और लिथुआनिया जिन्हें बाल्टिक स्टेट्स कहा जाता है। यह तीनों देश दूसरे वर्ल्ड वॉर के बाद जबरदस्ती यूएसएसआर में शामिल हुए थे। अब इन देशों ने भी खुलकर कहना शुरू कर दिया कि हम जबरदस्ती यूएसएसआर में शामिल हुए थे, हम वापस अपनी आजादी चाहते हैं। 1988 में लिथुआनिया में पहली बार सजुडिस नाम का एक फ्रीडम मूवमेंट शुरू हुआ। यहां पर स्टूडेंट्स, वकील और आम लोगों ने मॉस्को का विरोध करना शुरू कर दिया। इस बीच 23 अगस्त 1989 को एक ऐतिहासिक घटना हुई। 20 लाख लोग लिथुआनिया, लाटविया, एस्टोनिया, इन सब जगहों पर सड़कों पर निकले और एक दूसरे का हाथ पकड़ कर लगभग 600 किलोमीटर लंबी ह्यूमन चेन बना दी। यह प्रदर्शन पूरी दुनिया ने देखा क्योंकि गोर्बाचेव ने मीडिया को अब पूरी आजादी दे रखी थी। फिर इसी साल 1989 में जर्मनी के बर्लिन की दीवार भी गिरा दी गई। यह दीवार ईस्टर्न जर्मनी और वेस्टर्न जर्मनी के बीच थी और इसका गिरना सिर्फ जर्मनी का गिरना नहीं बल्कि सोवियत खेमे के पतन की शुरुआत थी। जैसे ही यह दीवार टूटी पूरे यूरोप में एक क्रांति सी फैल गई। पोलैंड, हंगरी, चेकोस्लोवाकिया जैसे देश जो अब तक सोवियत संघ के दबाव में थे वह एक-एक करके कम्युनिज्म को छोड़ने लगे यानी कि वह अमेरिका की तरफ जाने लगे। अब दोस्तों यह तो सिर्फ ग्लासनोस्ट का रिजल्ट था, पेरेस्त्रोइका की नीति की वजह से सरकारी कंपनीज का कंट्रोल तो कम हुआ। लेकिन प्राइवेट कंपनियां सही से काम नहीं कर पाई, इससे अचानक ही दुकानों में दूध, ब्रेड, मांस जैसी चीजें गायब होने लगी। लोग घंटों लाइनों में खड़े रहते और महंगाई आसमान पर पहुंच गई। इस वजह से लोगों को लगने लगा कि पहले भले ही आजादी नहीं थी लेकिन कम से कम पेट तो भरता था, अब पेट भी खाली है और जेब भी खाली है। इस बीच लिथुआनिया ने मार्च 1990 में खुद को पूरी तरह से आजाद घोषित कर दिया। लाटविया और एस्टोनिया ने भी कहा कि हम सोवियत संघ का हिस्सा नहीं है। यूक्रेन, बेलारूस, जॉर्जिया और अजरबैजान जैसे देशों में भी राष्ट्रीय झंडे लहराने लगे। इस कंडीशन से निपटने के लिए 1991 में गोर्बाचेव ने एक नया समझौता तैयार किया। इससे सोवियत संघ को थोड़ा और ज्यादा फ्लेक्सिबल बनाया जा सकता था। यानी कि संघ में शामिल देशों को ज्यादा आजादी देने की बात थी, लेकिन उनकी अपनी ही पार्टी के नेताओं ने उनके सुधारों की वजह से उनके खिलाफ तख्ता पलट करने की कोशिश की। अगस्त 1991 में गोर्बाचेव को उनके ही घर में नजरबंद कर दिया गया। गोर्बाचेव जो करना चाहते थे उस काम को रोकने की खूब कोशिश हुई लेकिन अब तक सोवियत पूरी तरह से बदल गया था। उनके नजरबंद होते ही एक नया चेहरा लोगों के सामने आया, इनका नाम था बोरिस येल्तसिन। इन्होंने कम्युनिस्ट पार्टी को छोड़ दिया और लोगों से अपील की विरोध करने के लिए। उनकी अपील पर लाखों लोग सड़कों पर उतर आए, आखिरकार तख्ता पलट नाकाम हो गया और गोर्बाचेव वापस लौट आए। लेकिन दोस्तों इस समय तक संघ में दरार इतनी गहरी हो गई थी कि कभी भी यह संघ बिखर सकता था। ऊपर से तख्ता पलट की नाकाम कोशिश से यह भी साबित हो गया था कि संघ का यह सिस्टम बहुत दिनों तक नहीं चलेगा। यही वजह है कि 25 दिसंबर 1991 को मिखाइल गोर्बाचेव ने राष्ट्रपति पद से इस्तीफा दे दिया और सोवियत संघ को औपचारिक रूप से खत्म करने की घोषणा कर दी। इंटरेस्टिंग बात यह भी है कि एक दिन पहले ही यानी 24 दिसंबर को रूस ने खुद को संयुक्त राष्ट्र में यूएसएसआर का उत्तराधिकारी घोषित कर दिया था। लेकिन एक दिन बाद ही सोवियत संघ का अंत हो गया। सोवियत संघ के टूटने के बाद रूस एक स्वतंत्र देश बना लेकिन उसकी ताकत पहले जैसी नहीं रही। बाकी देश जैसे यूक्रेन, बेलारूस, कजाकिस्तान, लाटविया, एस्टोनिया इन सभी ने अपनी-अपनी सरकारें बनाई और ये सभी पूंजीवाद की ओर बढ़ने लगे। अब अमेरिका एकमात्र सुपरपावर बनकर उभरा और कोल्ड वॉर का अंत हो गया। तो दोस्तों, यह थी सोवियत संघ के पतन की कहानी, जाहिर है कि यह पतन एक दिन में नहीं हुआ। यह एक लंबा प्रोसेस था जो दशकों तक चलता रहा, चाहे वह गवर्नमेंट का अत्याचार हो, चाहे वह आर्थिक नाकामी हो, आजादी की कमी हो और सत्ता में बैठे लोगों की ताकत को ना छोड़ने की हठधर्मिता हो। इन सब ने मिलकर इस महाशक्ति को गिरा दिया। जहां एक ओर सोवियत संघ दुनिया को समाजवाद का मॉडल देना चाहता था, वहीं उसकी अपनी नींव खोखली होती जा रही थी और आखिर में वह विशाल साम्राज्य जो एक समय अमेरिका को टक्कर देता था अपने ही अंदर की दरारों से टूट गया। दोस्तों रूस कितना बड़ा देश था इसका अंदाजा आप अभी भी लगा सकते हैं कि आज भी रूस 15 देशों के टूटने के बाद भी दुनिया का सबसे बड़ा देश है। हालांकि उसकी ताकत अमेरिका जितनी नहीं रह गई है। तो दोस्तों यह थी कहानी सोवियत संघ की जिसके बारे में आपने कई बार कमेंट किया और कहा कि सोवियत संघ की कहानी सुनाइए। तो यह है कहानी कि कैसे यह बना और कैसे टूटा, अब अगर आपको यह वीडियो पसंद आया है तो इसे लाइक और शेयर जरूर कीजिएगा और ऐसे ही तमाम इंटरेस्टिंग कहानियों के लिए हिस्ट्री कनेक्ट से जुड़े रहने के लिए हमारे चैनल को सब्सक्राइब जरूर कीजिएगा। बहुत-बहुत धन्यवाद।

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