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Iran vs Israel War | Does Iran REALLY Have Nukes? | Dhruv Rathee

Dhruv Rathee

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[0:00]Section 1

पहले इंडिया पाकिस्तान की वॉर रुकवाई, अब ईरान-इजराइल की वॉर रुकवाई. लाओ, मुझे नोबेल प्राइज़ दो. मजाक नहीं कर रहा. एक्चुअली में ट्रंप ने पोस...

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इस पूरे मामले में अजीब चीज़ ये थी कि ईरान की तरफ से कोई प्रोवोकेशन नहीं किया गया था. हां, ये बात सच ज़रूर है कि इन दोनों देशों के बीच रिश्त...

[6:47]Section 3

क्योंकि ये वाली न्यूक्लियर साइट फोर्डो से भी ज़्यादा ज़मीन के अंदर थी और बस्टर बॉम्बस भी यहां पर इसे नुकसान नहीं पहुंचा सकते थे. इस हमले के...

[14:25]Section 4

लेकिन फिर फोन पर बात करके नेतनयाहू के साथ वो फिर से ऐलान करते हैं कि इजराइली जेट्स ईरान की तरफ फ्रेंडली वेव करके लौट आएंगे और इसके बाद से...

[17:26]Section 5

जिस रिपोर्ट की बात मैंने वीडियो के शुरू में की थी जिसके आधार पर इजराइल ने हमला बोला था ईरान के ऊपर, उसमें कुछ भी ऐसा नहीं लिखा था जो पहले...

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[0:00]युद्ध लड़ने वाले तीनों देशों के लीडर्स ने वॉर खत्म होने के बाद खुद को विजेता घोषित कर दिया है.
[0:00]ईरान पर हमला करने से ठीक 10 दिन पहले इजराइली प्रधानमंत्री नेतनयाहू के करप्शन ट्रायल्स का क्रॉस एग्जामिनेशन शुरू हुआ था.
[0:00]एक फॉरमर आईडीएफ के जनरल ने नेतनयाहू पर सीधा आरोप लगाया है कि वह जान-बूझकर गाज़ा की वॉर को कंटिन्यू रख रहे हैं ताकि वो खुद को जेल जाने से बचा सकें.
[0:47]सुबह के करीब 3:00 बजे 200 से ज़्यादा इजराइली फाइटर जेट्स ईरान के एयरस्पेस में एंटर करते हैं.
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[0:00]पहले इंडिया पाकिस्तान की वॉर रुकवाई, अब ईरान-इजराइल की वॉर रुकवाई. लाओ, मुझे नोबेल प्राइज़ दो. मजाक नहीं कर रहा. एक्चुअली में ट्रंप ने पोस्ट करके नोबेल प्राइज़ का छह बार ज़िक्र किया. ईरान-इजराइल के बीच 12 दिन लंबी चली ये वॉर शायद सबसे अजीब वॉर थी. युद्ध लड़ने वाले तीनों देशों के लीडर्स ने वॉर खत्म होने के बाद खुद को विजेता घोषित कर दिया है. ईरान पर हमला करने से ठीक 10 दिन पहले इजराइली प्रधानमंत्री नेतनयाहू के करप्शन ट्रायल्स का क्रॉस एग्जामिनेशन शुरू हुआ था. कोर्ट में लिटरली 1,778 बार उन्होंने कहा, I don’t remember. एक फॉरमर आईडीएफ के जनरल ने नेतनयाहू पर सीधा आरोप लगाया है कि वह जान-बूझकर गाज़ा की वॉर को कंटिन्यू रख रहे हैं ताकि वो खुद को जेल जाने से बचा सकें.

[0:47]नमस्कार दोस्तों, 13 जून 2025. सुबह के करीब 3:00 बजे 200 से ज़्यादा इजराइली फाइटर जेट्स ईरान के एयरस्पेस में एंटर करते हैं.

[1:00]इनके निशाने पर थे 100 से भी ज़्यादा न्यूक्लियर, मिलिट्री और इंफ्रास्ट्रक्चर टारगेट्स जिन पर ये एक कोऑर्डिनेटेड तरीके से हमला करते हैं.

[1:13]इस सब में करीब 80 लोग मारे जाते हैं, 320 इंजर्ड होते हैं जिनमें से ज़्यादातर आम बेगुनाह सिविलियन थे. लेकिन इन्हीं में ही कुछ हाई-प्रोफाइल लोग भी थे जिनका एसेसिनेशन किया गया. आर्म्ड फोर्सेस के चीफ ऑफ स्टाफ मोहम्मद बघेरी. आईआरजीसी के कमांडर इन चीफ हुसैन सलामी. ईरान के न्यूक्लियर प्रोग्राम से जुड़े लोगों को खासतौर पर टारगेट किया गया. न्यूक्लियर साइंटिस्ट मोहम्मद मेहदी तेहरानची. और फरेदून अब्बासी समेत छह साइंटिस्ट को भी मार दिया जाता है. इजराइल इस पूरे ऑपरेशन को नाम देता है, ऑपरेशन राइज़िंग लॉयन.

[1:50]इस पूरे मामले में अजीब चीज़ ये थी कि ईरान की तरफ से कोई प्रोवोकेशन नहीं किया गया था. हां, ये बात सच ज़रूर है कि इन दोनों देशों के बीच रिश्ते काफी लंबे समय से खराब रहे हैं. पिछले साल इन दोनों देशों के बीच में लड़ाई भी देखने को मिली थी. लेकिन इस स्पेसिफिक केस में, ईरान ने कोई हमला नहीं किया था. बस अचानक से इजराइल एक दिन उठकर आया और बम बरसाने शुरू कर दिए. जब इजराइल से पूछा जाता है कि ऐसा क्यों किया तो इजराइल के प्रधानमंत्री जवाब में कहते हैं सेल्फ-डिफेंस के लिए किया. ये कैसा सेल्फ-डिफेंस जिसमें पहले खुद जाकर दूसरे पे हमला करो? वो कहते हैं कि उन्हें शक था कि ईरान न्यूक्लियर हथियार बनाने के बड़े करीब था. असल में बात ये है कि 31 मई 2025 को यूनाइटेड नेशंस के न्यूक्लियर वॉचडॉग इंटरनेशनल एटॉमिक एनर्जी एजेंसी की एक कॉन्फिडेंशियल रिपोर्ट लीक हुई थी. इसमें लिखा था कि ईरान के पास लगभग 400 किलो 60% एनरिचड़ यूरेनियम है जिसका इस्तेमाल 10 न्यूक्लियर वेपन्स बनाने के लिए किया जा सकता है. यानी कि न्यूक्लियर हथियार अभी तक बना नहीं है लेकिन बन सकता है और इसी कारण से अमेरिका और इजराइल ईरान के पीछे पड़े हैं. यहां पर दो बड़े इंटरेस्टिंग चीज़ें हैं. पहला, डोनाल्ड ट्रंप का खुद ईरान के साथ पुरानी न्यूक्लियर डील को कैंसिल करना. और दूसरा, इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतनयाहू का अपने देश में चल रहा करप्शन ट्रायल. इन दोनों की आगे बात करते हैं लेकिन पहले समझते हैं इस 12 दिन लंबी चली इस वॉर में एक्जेक्टली क्या हुआ और फिर इसके बाद सीज़फायर कैसे देखने को मिला.

[3:32]13 जून की ही रात को ईरान रेस्पॉन्ड करता है इजराइल के ऊपर दर्जनों मिसाइल्स और ड्रोन से हमला करके. ज्यादातर इन स्ट्राइक्स को इंटरसेप्ट कर लिया जाता है लेकिन तेल अवीफ और जेरोसेलम की कुछ जगहों पर धमाके देखने को मिलते हैं. इसके बाद अगले कुछ दिन तक ईरान और इजराइल एक दूसरे पर हमला करते रहते हैं. दोनों तरफ तबाही देखने को मिलती है, दोनों तरफ बेगुनाह लोगों की जान जाती है. इसी बीच डोनाल्ड ट्रंप ईरान से अनकंडीशनल सरेंडर की मांग करते हैं और कहते हैं कि ईरान को न्यूक्लियर वेपन बनाने नहीं दिया जा सकता. ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामिनी को धमकी भी दी जाती है. कहते हैं कि अमेरिका को पता है कि वो कहां छिपे हैं लेकिन अभी उन्हें मारेंगे नहीं. दूसरी तरफ जवाब में खामिनी कहते हैं कि ईरान किसी भी हालत में किसी के सामने सरेंडर नहीं करेगा. ईरान और इजराइल के बीच का युद्ध जारी रहता है. अभी तक अमेरिका इस वॉर में डायरेक्टली शामिल नहीं हुआ था. लेकिन 19 जून को डोनाल्ड ट्रंप की तरफ से एक और धमकी दी जाती है. ट्रंप कहते हैं कि वो ईरान को दो हफ्ते का समय दे रहे हैं न्यूक्लियर डील करने के लिए. अगर वो नहीं माना तो अमेरिका खुद अपनी मिलिट्री स्ट्राइक्स करने लग जाएगा. दो हफ्ते तो बहुत दूर की बात थी दोस्तों क्योंकि दो ही दिन बाद, 21 जून की रात को अमेरिका के लगभग 125 प्लेंस ईरान की एयरस्पेस में एंटर करते हैं.

[4:56]इनका टारगेट था ईरान की तीन मेन न्यूक्लियर फैसिलिटीज़. नक्शे पर देखिए फोर्डो, नटांज़ और इस्फ़हान. इनको टारगेट करना. लेकिन इन्हें डिस्ट्रॉय करना इतना आसान नहीं था क्योंकि ये ज़मीन के बहुत नीचे सिचुएटेड हैं. सैकड़ों मीटर्स गहरे पहाड़ों में फोर्डो में यूरेनियम एनरिचमेंट साइट है. इसी तरह ईरान की सबसे बड़ी एनरिचमेंट फैसिलिटी, नटांज़ का कुछ हिस्सा भी अंडरग्राउंड है. ट्रेडिशनल बॉम्बस और मिसाइल्स से इन्हें नुकसान पहुंचाना मुमकिन नहीं था. इसलिए इन्हें बंकर बस्टर बॉम्ब से टारगेट किया गया. अमेरिका का बंकर बस्टर बॉम्ब, जिसका ऑफिशियल नाम है जीबियू-57 मैसिव ऑर्डनेन्स पेनिट्रेटर. ये 13,000 किलो से ज़्यादा भारी और 6 मीटर से ज़्यादा लंबा एक बॉम्ब है. जब ये कहीं पर फोड़ा जाता है तो ज़मीन के 60 मीटर से ज़्यादा अंदर तक घुस सकता है. इन्हें डिप्लॉय करने के लिए अमेरिका ने इस्तेमाल किया इस बी-2 स्टेल्थ बॉम्बर हवाई जहाज का. ये हवाई जहाज़ दिखने में बिल्कुल किसी साइंस फिक्शन मूवी का प्लेन लगता है.

[5:54]लेकिन इसके ज़रिए कई सारे बंकर बस्टर बॉम्बस ड्रॉप किए जा सकते हैं. एक स्पेसिफिक जगह को टारगेट करके इनका लक्ष्य होता है उसी जगह पर दोबारा से बॉम्ब गिराना ताकि और ज़मीन के अंदर तक पहुंचा जा सके. अमेरिका ने 21 जून के इस हमले में 14 से ज़्यादा जीबियू-57 बॉम्बस ईरान के ऊपर दागे. ये जो स्पेसिफिक टाइप है जीबियू-57 मैसिव ऑर्डनेन्स पेनिट्रेटर, ये सबसे पावरफुल बंकर बस्टर बॉम्ब माना जाता है. अमेरिका ने इस टाइप के बॉम्ब का इससे पहले किसी भी कॉन्फ्लिक्ट में इस्तेमाल नहीं किया था. ये बी-2 बॉम्बर हवाई जहाज़ अमेरिका के मिसौरी एयरपोर्ट से टेक-ऑफ किए थे. धरती का आधा चक्कर लगाकर नॉन-स्टॉप 37 घंटे तक ये उड़े इस मिशन को कंप्लीट करने के लिए. दूसरी तरफ ईरान की इस्फ़हान न्यूक्लियर साइट को एक सबमरीन से लॉन्च की गई टॉमहॉक मिसाइल से टारगेट किया गया.

[6:47]क्योंकि ये वाली न्यूक्लियर साइट फोर्डो से भी ज़्यादा ज़मीन के अंदर थी और बस्टर बॉम्बस भी यहां पर इसे नुकसान नहीं पहुंचा सकते थे. इस हमले के बाद डोनाल्ड ट्रंप ने अपने टेलीवाइज़ड एड्रेस में इस मिशन को कंप्लीट सक्सेस बताया. उन्होंने दावा किया कि ईरान की न्यूक्लियर एनरिचमेंट फैसिलिटीज़ को पूरी तरीके से नष्ट किया जा चुका है. इस पॉइंट तक अब सबको लग रहा था कि ये लड़ाई शायद लंबी चलने वाली है. ये वॉर शायद तब तक ना रुके जब तक ईरान में सत्ता पलट ना हो जाए. 23 जून को ईरान की तरफ से जवाबी हमला देखने को मिलता है. कतर में मौजूद अमेरिका के अल उदयद एयरबेस को टारगेट किया जाता है. पूरे मिडिल ईस्ट में ये अमेरिका का सबसे बड़ा मिलिट्री बेस है जो यूएस सेंट्रल कमांड के फॉरवर्ड हेडक्वार्टर्स के तौर पर काम करता है. यही वो मिलिट्री बेस है जिसने इराक, सीरिया और अफगानिस्तान में अमेरिका के ऑपरेशन्स में सेंट्रल रोल निभाया था. 23 जून के इस हमले में इस बेस पर ईरान की तरफ से 19 मिसाइल्स फायर की जाती हैं लेकिन एक ही इस एयरबेस को हिट करती है. लेकिन इस एक मिसाइल से भी ज़्यादा कोई नुकसान नहीं पहुंचता. मगर इसकी वजह से होता ये है कि पूरे मिडिल ईस्ट के ऊपर सारे फ्लाइट ऑपरेशन्स रुक जाते हैं. कमर्शियल एयरस्पेस पूरी तरीके से बंद हो जाती है करीब 8 से 10 घंटे के लिए कुवैत, बहरीन, कतर और यूएई के ऊपर से. हालात बड़े एक्सट्रीम हो गए थे. कई लोगों को लगा था कि कहीं ये वर्ल्ड वॉर थ्री की शुरुआत तो नहीं. लेकिन फिर अगले दिन, अचानक से ये वॉर खत्म हो जाती है. डोनाल्ड ट्रंप ऐलान करते हैं ईरान और इजराइल के बीच कंप्लीट एंड टोटल सीज़फायर का. सबके मन में सवाल एक ही है कि ये हुआ क्या यहां पर? अचानक से ये वॉर हुई और फिर अचानक से सीज़फायर हो गया वॉर खत्म भी हो गई. कई सारे सवाल हैं जो यहां पर उठते हैं लेकिन सीज़फायर का एक इंडिकेशन 23 जून के ईरान के रिटेलिएशन में ही देखने को मिल गया था. असल में अमेरिका के एयरबेस पर हमला करने से पहले ईरान ने ऑलरेडी एक एडवांस्ड वार्निंग दे दी थी कतर और अमेरिका को. उसी एडवांस्ड वार्निंग की वजह से अमेरिका ने अपने ज़्यादातर एरोप्लेंस उस एयरबेस से हटा दिए थे जिसकी वजह से कोई भी नुकसान नहीं हुआ 23 जून के इस अटैक में. जियोपॉलिटिकल एक्सपर्ट्स का मानना है कि ईरान एक्चुअली में यहां पर लड़ाई चाहता नहीं था लेकिन क्योंकि इजराइल ने पहले हमला किया ईरान के ऊपर तो ईरान ये ज़रूर दिखाना चाहता था अपनी जनता को कि हमने रिटेलिएट किया. हमने उन्हें मुंह-तोड़ जवाब दे दिया. हालांकि कोई इंपैक्ट नहीं हुआ उस हमले का लेकिन अपनी नेशनल पब्लिक को कन्विंस करने के लिए काफी है इतना. क्योंकि ईरान के अंदर ईरान के सुप्रीम लीडर का कहना है कि ये वॉर उन्होंने जीत ली है. उनकी न्यूक्लियर साइट्स पर ना के बराबर नुकसान पहुंचा है और अगर दोबारा से उनके देश पर हमला करने की कोशिश की तो हमेशा एक मुंह-तोड़ जवाब मिलेगा. दूसरी तरफ ट्रंप ने भी यहां अपने आप को हीरो बनवा दिया. कहा कि देखो मैंने कैसे वॉर रुकवा दी. देखो मैं कितना बड़ा एक्सपर्ट हूं वॉर रुकवाने में माहिर हूं.

[10:04]पहले इंडिया पाकिस्तान की वॉर रुकवाई, अब ईरान-इजराइल की वॉर रुकवाई. लाओ, मुझे नोबेल प्राइज़ दो. मजाक नहीं कर रहा. एक्चुअली में ट्रंप ने पोस्ट करके नोबेल प्राइज़ का छह बार ज़िक्र किया. सरकैस्टिकली लिखते हुए कहा कि इसके बाद भी मुझे नोबेल प्राइज़ नहीं दिया जाएगा.

[10:28]और तीसरी तरफ इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतनयाहू की भी यही कहानी है. उन्होंने भी अपने आप को हीरो बना दिया. इजराइल में अपनी जनता के सामने जाकर कहा कि देखो हम वॉर जीत गए, हमारा जो मिशन था वो सक्सेसफुल हो गया. हमने सारी न्यूक्लियर साइट्स को वहां डिस्ट्रॉय कर दिया. एक ऐसा देश जो हमें खत्म करना चाहता था हमने उन्हें मुंह-तोड़ जवाब दे दिया. इजराइल डेमोक्रेसी इंस्टीट्यूट के एक सर्वे के अनुसार, 70% इजराइली लोग सपोर्ट में थे ईरान को अटैक करने के. और इंटरेस्टिंग चीज़ ये है कि बेंजामिन नेतनयाहू के ऊपर इजराइल में तीन अलग-अलग करप्शन केसेस के ट्रायल्स चल रहे हैं. लेकिन बार-बार ये ट्रायल्स डिले होते रहे क्योंकि कभी गाज़ा में वॉर हो जाती है तो कभी लेबनान में वॉर हो जाती है इजराइल में. ईरान के ऊपर हमला करने से ठीक 10 दिन पहले 3 जून को नेतनयाहू की क्रॉस एग्जामिनेशन शुरू हुई थी इन करप्शन ट्रायल्स में. कोर्ट ने उनसे ढेरों सवाल पूछे करप्शन एलीगेशंस को लेकर, ज़्यादातर में उनका जवाब था, I don’t remember, मुझे याद नहीं. लिटरली 1,778 बार उन्होंने कोर्ट में I don’t remember फ्रेज़ का इस्तेमाल किया. मतलब सोचकर देखो कितना कमाल का जवाब है ये कि कोई आपसे कोर्ट में पूछे क्या आपने उस डील को करते वक्त रिश्वत ली थी और आप कहो, "हां, मुझे तो याद नहीं." क्या आपके डिपार्टमेंट में करप्शन हुई थी? "मुझे याद नहीं."

[11:49]और इसी तरीके से आप 1,800 बार मुझे याद नहीं कहते जाओ. नेतनयाहू का सपोर्ट इजराइल पब्लिक में बहुत तेज़ी से नीचे घट रहा था. पिछले महीने किया गया इजराइल के चैनल 12 न्यूज़ के द्वारा एक सर्वे के अनुसार, करीब 55% इजराइली लोगों का मानना है कि नेतनयाहू गाज़ा में वॉर को सिर्फ इसलिए कंटिन्यू कर रहे हैं क्योंकि वो सत्ता में बने रहना चाहते हैं. बाकी और सर्वेज़ ने भी यही बताया है कि 60% से ज़्यादा इजराइली लोग गाज़ा में वॉर को खत्म करने के फेवर में हैं अगर हॉस्टेजेज़ को रिलीज़ करने की डील हो जाती है तो. 3 जून को द टाइम्स ऑफ इजराइल में लिखे गए इस ओपिनियन आर्टिकल को देखिए. टाइटल में लिखा है नेतनयाहूज़ कैलकुलेशन: द वॉर मस्ट गो ऑन. दिसंबर 2024 में इजराइल के पार्लियामेंट में एक बिल पास हुआ था जिसके अनुसार पार्लियामेंट के किसी भी मेंबर को नियर टोटल क्रिमिनल इम्युनिटी है ऐज़ लॉन्ग ऐज़ वो ऑफिस में बने रहते हैं. फॉरमर आईडीएफ के जनरल इजराइल ज़िव ने भी नेतनयाहू पर आरोप लगाया कि वो जान-बूझकर गाज़ा में वॉर को कंटिन्यू रख रहे हैं ताकि वो खुद जेल जाने से बच सकें. ऐसे में ज़ाहिर सी बात है सवाल यही उठता है कि क्या ईरान पर भी इसलिए हमला किया गया ताकि प्रधानमंत्री खुद को जेल जाने से बचा सकें? खुद के ऊपर चल रहे इस करप्शन ट्रायल को डिले कर सकें. इस चीज़ का अगर आपको और सबूत चाहिए तो 26 जून की इस खबर को देखिए. डोनाल्ड ट्रंप इजराइल को कहते हैं कि नेतनयाहू के ऊपर चल रहे करप्शन ट्रायल को खारिज कर दिया जाए. उनके अनुसार नेतनयाहू के खिलाफ विच हंट चल रही है. और जवाब में नेतनयाहू ट्रंप को थैंक यू भी कहते हैं कि थैंक यू सर, आपने मेरे खिलाफ चल रहे करप्शन ट्रायल को खत्म करने की बात कर दी, मुझे बचाने की बात कर दी. तो इससे पता चलता है दोस्तों, ऐट लीस्ट दो देश जो इस 12 दिन की वॉर में इंवॉल्वड थे, उनको कोई इंटरेस्ट था नहीं इस वॉर को कंटिन्यू रखने में. ट्रंप की यहां नंबर वन प्रायोरिटी थी खुद को हीरो बनाकर अपने आप को नोबेल प्राइज़ दिलवाना, इसलिए ट्रंप ने सबसे पहले नेतनयाहू से बात करी और इजराइल को सीज़फायर के लिए तैयार किया. ईरान को एग्री कराने के लिए कतरी प्राइम मिनिस्टर की मदद ली गई और ईरान ने कतर के ज़रिए अमेरिका को मैसेज भेजा कि अब वो यूएस पर और कोई हमला नहीं करेगा. जवाब में अमेरिका ने भी किसी बेस पर ना हमला करने की बात कही जिसके बाद ईरान भी सीज़फायर के लिए तैयार हो गया. हालांकि वो अलग बात है कि सीज़फायर डिक्लेयर होने के कुछ घंटे बाद भी दोनों तरफ से फायरिंग देखी गई ताकि दोनों देश अपनी पब्लिक को दिखा सकें कि आखिरी जवाब उन्होंने ही दिया था. ईरान ने इजराइल के ऊपर दो बैलिस्टिक मिसाइल्स छोड़ी. जवाब में इजराइल ने ईरान पर स्ट्राइक्स करके तेहरान के पास एक रेडार स्टेशन को डिस्ट्रॉय कर दिया. इसके बाद ट्रंप थोड़ा नाराज़ ज़रूर हुए, उन्होंने अपना गुस्सा ज़ाहिर किया इजराइल के खिलाफ.

[14:25]लेकिन फिर फोन पर बात करके नेतनयाहू के साथ वो फिर से ऐलान करते हैं कि इजराइली जेट्स ईरान की तरफ फ्रेंडली वेव करके लौट आएंगे और इसके बाद से थैंकफुली सीज़फायर जारी रहा. अब सवाल यहां पर ये भी है कि ईरान के न्यूक्लियर प्रोग्राम को आखिर कितना नुकसान पहुंचा जो एक्चुअल रीज़न दिया गया था वॉर पर जाने के लिए. ट्रंप का कहना है कि ईरान का न्यूक्लियर प्रोग्राम पूरी तरीके से डिस्ट्रॉय हो गया है.

[15:06]असल में ये सारे बॉम्बस और मिसाइल्स जो गिराए गए वो सेंट्रीफ्यूज़ और हाइली एनरिच यूरेनियम को पूरी तरीके से डिस्ट्रॉय नहीं कर पाए हैं. थ्री सोर्सेस टेल सीएनएन दैट अकॉर्डिंग टू एन अर्ली यूएस इंटेलिजेंस असेसमेंट, द यूएस मिलिट्री स्ट्राइक्स ऑन थ्री ऑफ ईरान्स न्यूक्लियर फैसिलिटीज़ लास्ट वीकेंड डिड नॉट डिस्ट्रॉय द कोर कंपोनेंट्स ऑफ द कंट्रीज़ न्यूक्लियर प्रोग्राम. इस एजेंसी के मुताबिक अमेरिका के हमलों से पहले ही एनरिच यूरेनियम कोई न्यूक्लियर साइट से हटा दिया गया था. और इस पूरी 12 दिन लंबी चली वॉर से ईरान के न्यूक्लियर प्रोग्राम को सिर्फ कुछ महीने का ही डिले हुआ है. अब सवाल यहां पर ये भी है कि अगर ईरान यहां सही में एक न्यूक्लियर हथियार बना रहा था तो इस 12 डे वॉर के बाद क्या वो अब अपने न्यूक्लियर हथियार बनाने बंद कर देगा या फिर और जोरो से कोशिश करेगा न्यूक्लियर हथियार बनाने की?

[15:52]क्योंकि ईरान के पर्सपेक्टिव से उन्हें देखने को यहां पर यही मिला है कि कोई भी देश हमारे देश के ऊपर हमला कर सकता है अगर वो सस्पेक्ट करते हैं कि हम न्यूक्लियर हथियार बना रहे हैं. लेकिन अगर एक्चुअली में हमारे पास न्यूक्लियर हथियार है तो कोई हिम्मत नहीं करेगा हमला करने की. इसका सबसे अच्छा उदाहरण है नॉर्थ कोरिया जिसके पास खुद का अपना एक न्यूक्लियर बॉम्ब है. और माना जाता है कि वही कारण है कि अमेरिका ने अभी तक नॉर्थ कोरिया पर कोई हमला नहीं किया. वॉशिंगटन के आर्म्स कंट्रोल एसोसिएशन के मुताबिक मिलिट्री स्ट्राइक से ईरान का न्यूक्लियर बॉम्ब बनाने का रिज़ॉल्व और मजबूत होने का खतरा है. हालांकि ईरान का अभी तक ऑफिशियली कहना यही है कि उनका न्यूक्लियर प्रोग्राम सिविलियन और पीसफुल पर्पस के लिए है. इनके सुप्रीम लीडर खामिनी ने 2003 में फतवा जारी किया था कि न्यूक्लियर वेपन्स प्रोग्राम को सस्पेंड कर दिया जाए और ऑफिशियली अभी तक ये सस्पेंशन हटाया नहीं गया है. मार्च 2025 में देखिए अमेरिका की डायरेक्टर ऑफ नेशनल इंटेलिजेंस तुलसी गैबर्ड ने यूएस कांग्रेस में अपनी टेस्टिमनी में कहा था कि ईरान न्यूक्लियर वेपन्स नहीं बना रहा है.

[16:58]लेकिन जैसे ही इजराइल ने हमला किया ईरान के ऊपर, ये एक बहुत बड़ा यू-टर्न लेती हैं और कहती हैं कि एक्चुअली में ईरान बना रहा है न्यूक्लियर वेपन और कुछ ही हफ्तों के अंदर उनका न्यूक्लियर वेपन बन सकता है. आईएईए के डायरेक्टर जनरल राफेल ग्रोसी ने भी इन दावों को गलत बताया है कि ईरान न्यूक्लियर वेपन्स बनाने के बहुत नजदीक है.

[17:26]जिस रिपोर्ट की बात मैंने वीडियो के शुरू में की थी जिसके आधार पर इजराइल ने हमला बोला था ईरान के ऊपर, उसमें कुछ भी ऐसा नहीं लिखा था जो पहले से पता ना हो. 2003 में भी दोस्तों ऐसा ही कुछ हुआ था जब अमेरिका ने इराक को इन्वेड कर लिया था. अमेरिका के और उनके एलाइज़ ने कहा था कि इराक के पास वेपन्स ऑफ मास डिस्ट्रक्शन है, वो एक न्यूक्लियर बॉम्ब बना रहे हैं. अमेरिकन अखबारों ने और इंटेलिजेंस कम्युनिटी ने उन दावों को सही बताया था और इसी के आधार पर इराक पर हमला किया गया. लेकिन बहुत ढूंढने के बाद भी इराक में कभी कोई सबूत नहीं मिला किसी भी तरह के न्यूक्लियर हथियारों का. इस पूरी सिचुएशन का दोस्तों एक बहुत ही सिंपल सोल्यूशन है. अगर ईरान को न्यूक्लियर हथियार बनाने से रोकना है तो अमेरिका ईरान के साथ जाकर एक न्यूक्लियर डील कर सकता है. ये मैं अपने मन से बनाकर नहीं बोल रहा हूं जब ओबामा प्रेसिडेंट थे अमेरिका के 2015 में एग्जेक्टली उन्होंने यही चीज़ करी थी ईरान के साथ एक न्यूक्लियर डील.

[18:24]इस फ्रेमवर्क के तहत ईरान के पास न्यूक्लियर हथियार बनाने के हर रास्ते को बंद कर दिया जाएगा. इस डील के अनुसार शर्त ये थी कि ईरान यूरेनियम को 3.67% से ज़्यादा एनरिच नहीं करेगा. ऐसा करने से न्यूक्लियर हथियार बनाना कभी पॉसिबल नहीं हो पाएगा. प्लस चेक करने के लिए इंटरनेशनल एटॉमिक एनर्जी एजेंसी को ईरान के अंदर जाकर उनकी न्यूक्लियर फैसिलिटीज़ को इंस्पेक्ट करना अलाउड होगा. और बदले में ईरान को क्या मिला था? जो सैंक्शंस अमेरिका, यूरोपियन यूनियन और यूनाइटेड नेशंस ने लगाए हुए थे ईरान के ऊपर उन्हें हटा लिया जाएगा और ईरान के साथ नॉर्मल ट्रेड कंटिन्यू रखी जाएगी. बहुत ही अच्छी डील थी, दोनों तरफ को यहां पर फायदा मिल रहा था. ईरान से कोई खतरा भी नहीं था. ईरान इस डील को फॉलो भी कर रहा था अच्छे से 2018 तक. लेकिन फिर 2018 में क्या होता है? डोनाल्ड ट्रंप ऑलरेडी प्रेसिडेंट बन चुके थे अमेरिका के. ट्रंप जाकर इस न्यूक्लियर डील को कैंसिल कर देते हैं.

[19:22]क्यों कैंसिल किया? यहां पर ट्रंप की तरफ से कोई प्रॉपर रीज़निंग नहीं दी जाती. बस वही घिसी-पिटी बातें कहते हैं कि ये बेकार डील थी मैं कैंसिल कर रहा हूं. बीबीसी के आर्टिकल पे देखो पहला कारण क्या लिखा जाता है कैंसिल करने के पीछे. श्रेडिंग द ओबामा लेगेसी. यानी ट्रंप ओबामा से जलते थे और जो काम ओबामा ने किए थे बस उसका उल्टा करना चाहते थे. सिर्फ इसलिए ये डील कैंसिल कर दी. और कैंसिल करने का नतीजा क्या होता है? ईरान के ऊपर सैंक्शंस वापस आ जाती हैं, जो इंटरनेशनल एटॉमिक एनर्जी एजेंसी को परमिशन मिली थी ईरान की न्यूक्लियर फैसिलिटीज़ को विज़िट करने की वो अब उनके पास नहीं रहती और ईरान अपने एनरिच यूरेनियम को वापस कंसंट्रेट करने लग जाता है. कुछ सालों बाद धीरे-धीरे करके ईरान दुनिया की इकलौती नॉन-न्यूक्लियर कंट्री बन जाता है जिसके पास 60% एनरिच यूरेनियम इकट्ठा है. और फिर ईरान पर हमला करने के लिए इसी एनरिच यूरेनियम को ऐज़ एन एक्सक्यूज़ इस्तेमाल किया जाता है. यानी कि एक्चुअली में डोनाल्ड ट्रंप की ये खुद की गलती थी जिसकी वजह से ये वॉर शुरू हुई और फिर सीज़फायर कराने का क्रेडिट भी खुद ही लेते हैं ये.

[20:20]इस प्रॉब्लम का ये सिंपल सोल्यूशन अभी भी एग्जिस्ट करता है. आज के दिन भी अमेरिका ईरान के साथ एक नई न्यूक्लियर डील कर सकता है सिमिलर कंडीशंस के साथ. लेकिन सवाल ये कि क्या ट्रंप यहां पर ऐसा करेंगे? इस तरीके का डिप्लोमेटिक सोल्यूशन निकालना एक्चुअली ट्रंप के फेवर में ही रहेगा. क्योंकि ट्रंप के खुद के सपोर्टर्स इस बात से नाराज़ हैं कि उन्होंने ईरान की वॉर में अपने बॉम्बर्स भेजे. अपनी पूरी इलेक्शन कैंपेनिंग के दौरान ट्रंप का स्लोगन रहा था अमेरिका फर्स्ट, किसी भी वॉर में इंवॉल्व नहीं करना अमेरिका को. लेकिन ट्रंप ने ऐसा करके अपने खुद के सपोर्टर्स को नाराज़ कर दिया था. ट्रंप के कट्टर समर्थक फॉक्स न्यूज़ के फॉरमर जर्नलिस्ट टकर कार्लसन ने भी कहा है कि ट्रंप किसी नए वॉर में ना फंसने का अपना वादा तोड़ रहे हैं. अब यहां पर अगर आप बेंजामिन नेतनयाहू की असलियत और गहराई से जानना चाहते हैं तो ये वाला वीडियो मैं रेकमेंड करना चाहूंगा. 2 साल पहले जब इजराइल में देश के सबसे बड़े प्रोटेस्ट देखने को मिले थे. ये प्रोटेस्ट जो सत्ता पलट कर सकते थे, नेतनयाहू को जेल भिजवा सकते थे. लेकिन इसके बाद नेतनयाहू ने गाज़ा में वॉर शुरू कर दी. यहां क्लिक करके देख सकते हैं. बहुत-बहुत धन्यवाद.

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