[0:00]बहुत समय पहले की बात है, एक छोटे से नगर में एक बहुत ही धनी सेठ रहा करता था। उस धनी सेठ के पास कहने को सब कुछ था। किसी चीज की कोई कमी नहीं थी। उसने अपने जीवन में बहुत बड़े-बड़े मुकाम हासिल किए थे। उसने अपने जीवन में बहुत सारी सफलताएं प्राप्त की थी। वह जिस नगर में भी व्यापार करने जाता। वहां पर भी उसे सफलता मिलना निश्चित था। वह अपने जीवन में कभी भी हारा नहीं था। उसका व्यापार भी खूब जोरो-शोरो से चल रहा था। उसके पिताजी ने उसे ऐसी चार बातें बता रखी थी। जिनका वह नियमित पालन किया करता था और उन्हीं बातों का अनुसरण करता था। उन्हीं बातों की वजह से उसका जीवन बड़ा ही सुखमय था। वह जीवन के हर क्षेत्र में सफल था। ऐसे ही काफी समय बीत गया और अब वह धनवान सेठ काफी बूढ़ा हो चुका था। अब उसे लगने लगा था कि उसकी मृत्यु बहुत नजदीक है। उसकी मृत्यु कभी भी हो सकती है। और वह जानता था कि उसका बेटा बहुत भोला है, बहुत नादान है। उसे अभी दुनियादारी की समझ नहीं है। इसीलिए उसने अपने बेटे को अपने पास बुलाया और अपने बेटे से कहा, बेटा। मैंने अपने पिताजी से चार बातें सीखी थी और उन्हीं बातों को मैंने अपने जीवन में उतारा। उन्हीं के अनुसरण की वजह से आज मैं अपने जीवन में इतना सफल हूं। अपना जीवन सुखमय पूर्वक बिता रहा हूं। उन्हीं बातों की वजह से आज मैं इतना सुखी हूं। संतुष्ट हूं और इतना धनवान हूं। ना ही कभी मुझे कोई बीमारी हुई और ना ही मुझे कभी धन की कमी हुई। तुम देख ही पा रहे हो कि मैं इस नगर का सर्वश्रेष्ठ धनवान हूं। लेकिन आज मेरे पास जो कुछ भी है। मैं उससे संतुष्ट हूं। मैं खुश हूं। लेकिन मैं चाहता हूं कि तुम मुझसे भी आगे बढ़ो। तुम और नाम कमाओ। तुम और धन कमाओ। लोग तुम्हारे बारे में जाने। तुम्हें पहचाने क्योंकि हमारा समय कुछ और था और तुम्हारा आने वाला समय कुछ और ही है। उस धनवान सेठ ने अपने बेटे को अपने और करीब बुलाया और उससे कहने लगा। बेटा आज मैं तुमको दुनिया की ऐसी चार महत्वपूर्ण बातें बताने जा रहा हूं जो मुझे मेरे पिताजी ने बताई थी। और इसी के कारण आज मैं इतना सफल हूं। यदि तुमने इन सभी बातों को अपने जीवन में उतार लिया। इनका नियमित तौर पर पालन किया। इनका अनुसरण किया तो तुम भी अपने जीवन में बहुत धनवान बन जाओगे। अपने जीवन को बहुत सुखमय तौर पर बिताओगे। इन बातों के अनुसरण से ना तो तुम्हारे घर परिवार में कोई दुख आएगा और ना ही तुम्हारे व्यापार में कभी कोई परेशानी उत्पन्न होगी। इतना कहकर वह धनवान सेठ अपने बेटे को चार बातें बताने लगा। वह कहता है, बेटा। सबसे पहली बात है काम पर छांव में जाना और छांव में आना दूसरी बात अपने घर के चारों तरफ चमड़े की बाड़ रखना तीसरी बात हमेशा खाने को मीठा करके खाना और चौथी बात अपनी पत्नी को हमेशा बांध कर रखना। इतना कहकर वह धनवान सेठ अब निश्चिंत हो चुका था। वह यह जानता था कि उसका बेटा बहुत भोला है। वह अपने पिता की बात अवश्य मानेगा और इन सभी चारों बातों को अपने जीवन में उतारेगा और इनका अनुसरण भी करेगा। देखते ही देखते कुछ महीने बीत गए और फिर एक दिन धनवान सेठ मृत्यु को प्राप्त हो गया। अपने पिता की मृत्यु के बाद उस धनवान सेठ के बेटे ने उन सभी चार बातों को एक कागज पर लिख लिया ताकि वह उन्हें भूल ना जाए और उन्हीं बातों को वह अपने जीवन में उतारने लगा। उन चार बातों का अनुसरण करने लगा। सबसे पहली बात जो उसके पिता ने उससे कही थी छांव में जाना और छांव में आना। तो उसने अपने घर से लेकर अपनी दुकान तक पूरे रास्ते पर एक टेंट लगवा दिया क्योंकि उसके पास पैसा तो बहुत था। और उसे कोई रोकने वाला भी नहीं था। जब भी कोई उससे पूछता कि आखिर तुमने ऐसा क्यों किया तो वह उसके जवाब में बस इतना ही कहता। मेरे पिताजी ने मुझसे ऐसा ही करने को कहा है। इसके बाद उसने अपने पिता की अगली बात का अनुसरण किया। उसने अपने घर के दोनों तरफ चमड़े की एक दीवार खड़ी करवा दी। इसे देखकर आसपास के लोग बहुत क्रोधित हो गए। वे लोग उससे झगड़ा करने पर भी उतर आए। कई लोगों ने तो यह तक कह डाला कि आखिर तुमने ऐसा क्यों किया। चमड़े की बाढ़ तुमने क्यों खड़ी करवा दी। चमड़े से बहुत बदबू आती है। और इससे हमें तकलीफ होती है। इसे आज ही निकलवा दो। लेकिन कोई उसका कुछ भी ना बिगाड़ सका क्योंकि उसके पास बहुत पैसा था। इसलिए कोई भी व्यक्ति उसका ज्यादा समय तक विरोध ना कर सका। और उसने भी मन बना लिया था कि वह अपने पिता की सभी बातों को पूरे दिल से मानेगा। उसके पिता ने उसे तीसरी बात कही थी खाने को मीठा करके खाना। जिस कारण वह अपनी पत्नी से हर रोज खाने में कुछ मीठा ही बनवाता था। कभी सेवियां, कभी हलवा तो कभी मिठाइयां हमेशा यही सब खाता रहता और उसके पिता ने उसे चौथी बात कही थी। अपनी पत्नी को हमेशा बांध कर रखना जिसकी वजह से उसकी पत्नी उससे नाराज हो गई और वह घर छोड़कर अपने मायके लौट गई। उसने अपनी पत्नी को मनाने की कोशिश की। तरह-तरह के उपाय किए। लेकिन उसकी पत्नी नहीं मानी और वैसे भी कोई भी स्त्री ऐसे मर्द के साथ क्यों रहना चाहेगी। जो उसे बेवजह ही बांध कर रखता हो। देखते-देखते अब वह सेठ के बेटे का पूरा जीवन बर्बाद हो चुका था। ना तो अब उसके पास व्यापार बचा था ना ही धन ना ही उसकी पत्नी और ना ही वह रिश्तेदार जो पैसों के लिए उसके आसपास घुमा करते थे। और तो और अब उसका स्वास्थ्य भी ठीक नहीं रहता था। जिस कारण वह बहुत चिंतित रहने लगा था। बहुत परेशान रहने लगा था। उसे यह सब समझ ही नहीं आ रहा था कि क्या हो रहा है और क्यों हो रहा है। इन सभी बातों को लेकर वह बहुत परेशान रहता और वह मन ही मन अपने पिताजी को कोसा करता और कहता। पिताजी आपने तो मेरा पूरा जीवन बर्बाद कर दिया। आपकी उन चार बातों के कारण आज मुझसे मेरा सब कुछ छिन चुका है। ना तो मेरे पास व्यापार रहा ना ही धन दौलत ना ही वह रिश्तेदार ना ही मेरी पत्नी। और यहां तक कि मेरे स्वास्थ्य ने भी मेरा साथ छोड़ दिया है। आप ही के कारण आज मेरा पूरा जीवन बर्बाद हो चुका है। यदि मैंने आपकी वह चार बातें ना मानी होती। यदि मैंने उन्हें अपने जीवन में ना उतारा होता। तो आज मैं एक सुखमय जीवन जी रहा होता। आपकी इन चार बातों पर चलकर मुझे क्या मिला। मैंने एक आज्ञाकारी बेटे की तरह आपकी सारी बातें भली-भांति मानी उन पर यकीन किया उनका अनुसरण किया लेकिन मैं ही मूर्ख था। जो मैंने आपकी उन बातों पर आंख बंद करके यकीन कर लिया। इतना कहकर वह फूट-फूट कर रोने लगा। तभी उसे एक दिन पता चला कि उसके पास के नगर में एक साधु आए हुए हैं। और वह साधु सभी की समस्याओं का हल बताते हैं। चाहे कैसी भी समस्या हो। वह उसका निवारण अवश्य करते हैं। यह सुनकर उसने सोचा कि चलो एक बार मिलकर देखता हूं। हो सकता है कि मेरी भी समस्या का समाधान मुझे मिल जाए।
[9:24]इस आशा के साथ वह उन साधु के पास पहुंचा। वहां पहुंचकर सीधा उनके चरणों में जा गिरा और जोर-जोर से रोने लगा। वह कहने लगा हे गुरुवर अब आप ही मुझे बचा सकते हैं। मेरे पिताजी ने तो मेरा पूरा जीवन बर्बाद करके रख दिया। आज मेरी जो भी स्थिति है। वह सब मेरे पिताजी के कारण ही है। मेरे पिताजी ने मुझे जैसा कहा। मैंने वैसा ही किया। हमेशा एक अच्छे बेटे की तरह उनकी सारी बातें मानी। अपने सारे फर्ज निभाए और देखिए मेरे पिताजी ने मेरे साथ क्या किया। मरते-मरते भी वह मुझे गलत बात सिखा गए और उसका खामियाजा मुझे आज भुगतना पड़ रहा है। क्योंकि मैंने उनकी सभी बातों को अपने जीवन में उतारा उनका अनुसरण किया और देखिए आज मेरे साथ क्या हो गया। मेरा तो पूरा जीवन ही बर्बाद हो गया। मैं अब तक यह नहीं समझ पाया कि मेरे पिताजी ने मेरे साथ ऐसा क्यों किया। क्या मैंने उनके साथ कुछ गलत किया था। इतना कहकर वह उन साधु के सामने और भी जोर-जोर से रोने लगा। तभी वह साधु महाराज उससे कहते हैं, बेटा चुप हो जाओ। पहले मुझे अपनी सारी बात तो बताओ। आखिर तुम्हारे साथ क्या हुआ है। तुम इस तरह से क्यों रो रहे हो। तुम्हारी इस परेशानी का क्या कारण है। उन साधु के इतना कहने पर सेठ के बेटे ने वह पर्ची साधु के हाथ में रख दी। जो उसने अपने पिता की मृत्यु के बाद लिख रखी थी जिसमें उसने अपने पिता की चारों बातें लिखी थी। साधु ने पर्ची ली और उसे पढ़ने लगे। जैसे ही उन्होंने उसे पढ़ा। वे जोर-जोर से हंसने लगे। फिर वे सेठ के बेटे से कहते हैं, तुम कितने बड़े मूर्ख हो। तुम्हारे पिता ने तो तुम्हें दुनिया का सारा ज्ञान दे दिया। लेकिन तुम उसे समझ नहीं पाए। तुम उसका सही तरह से पालन नहीं कर पाए और कहते हो कि तुम्हारे पिता ने तुम्हें गलत राह दिखाई है। तुम्हें गलत संदेश दिया है। तुम्हारे पिताजी तो तुम्हारी परीक्षा ले रहे थे। कि तुम उनकी बातों को समझ पाते हो या नहीं। तुम उनकी बातों का सही मतलब निकाल पाते हो या नहीं। यदि वे चाहते तो इसका मतलब तुम्हें अच्छी तरह से बता सकते थे। लेकिन वे चाहते थे कि तुम इन बातों का मतलब खुद से जानो। खुद से समझो कि इन बातों का क्या अर्थ है। लेकिन अब तो ऐसा प्रतीत होता है कि तुम्हारी बुद्धि बिल्कुल भ्रष्ट हो चुकी है। तुमसे बड़ा मूर्ख मैंने आज तक नहीं देखा। जिसके पास दुनिया का इतना बड़ा ज्ञान हो वह भला इतनी बड़ी मूर्खता कैसे कर सकता है। तुम्हारे पास कोई ज्ञान नहीं है। तुमने कोई भी ज्ञान अर्जित ही नहीं किया। अगर तुम इन बातों का सही मतलब समझ चुके होते तो तुम भी अपने जीवन में अपने पिता की तरह ही सफल होते खुश होते और तुम्हारा जीवन सुखमय तरह से बीत रहा होता। लेकिन तुम इतने बड़े मूर्ख हो कि तुमने अपने पिता की बातों का गलत मतलब निकाल लिया। उन बातों के मतलब के बारे में तुमने सोचा तक नहीं। उन्होंने जैसा कहा। तुमने वैसा करना शुरू कर दिया। यदि तुम्हें उन बातों का अर्थ नहीं पता चल रहा था तो तुम किसी ज्ञानी से मिल सकते थे। उस बात का मतलब निकाल लेते। लेकिन जैसा तुमने अपने पिता की इन बातों को समझा है। इसका मतलब वैसा नहीं है। यह सुनकर सेठ का बेटा कहता है। हे गुरुवर आप क्या कहना चाहते हैं। क्या मैं अपने पिता की बातों को सही नहीं समझ रहा और वैसे भी इसमें समझने लायक है क्या। उन्होंने तो सब कुछ साफ-साफ ही बताया था और मैंने उन्हें अपने जीवन में उसी तरह से उतार लिया। तो फिर मैंने गलत क्या किया है। इस पर गुरुवर एक बार फिर मुस्कुराने लगे और उससे कहते हैं, बेटा। यह जो बातें लिखी गई हैं। इन बातों के पीछे एक गहरा अर्थ है जिसे तुम समझ नहीं पाए। इसी कारणवश तुमने यह मूर्खता कर दी और इसी वजह से तुमने अपना पूरा जीवन बर्बाद कर लिया। लेकिन अब भी कुछ नहीं बिगड़ा। अब भी तुम्हारे पास बहुत समय है। यदि तुम चाहो तो अब से मेहनत करके भी तुम अपने जीवन में एक बार फिर से वह खुशहाली और समृद्धि सब कुछ हासिल कर सकते हो। यह सुनकर सेठ का बेटा कहता है। ठीक है कृपया करके मुझे उन चारों बातों का मतलब समझाइए। आखिर उन चार बातों का क्या अर्थ है। इस पर साधु सेठ के बेटे से कहते हैं। तुम्हारे पिताजी ने तुमसे कहा था। काम पर छांव में जाना और छांव में आना। इसका मतलब यह है कि सूर्य निकलने से पहले ही तुम दुकान पर पहुंच जाना और सूर्यास्त होने के बाद ही तुम वापस घर आना। जिससे तुम्हें दुकान पर अधिक से अधिक समय मिल पाए। तुम उस काम को अच्छी तरह समझ पाओगे। उस काम को अच्छी तरह से कर पाओगे। उस काम को बढ़ाने में अपना दिमाग लगा पाओगे और तुम अपने काम में तरक्की कर पाओगे। लेकिन तुमने तो इसका गलत ही मतलब निकाल लिया। तुमने तो अपने घर से लेकर दुकान तक एक ऐसा टेंट लगवा दिया जिससे तुम छांव में आ सको और छांव में जा सको। अब तुम ही बताओ क्या तुमने अपने पिता की इन बातों का सही मतलब समझा था। यह सुनकर सेठ का बेटा जोर-जोर से रोने लगा और कहने लगा। हे गुरुवर मेरी ही गलती थी। मैंने अपने पिता की इन बातों का गलत मतलब निकाला और इसी कारणवश आज मैं पूरी तरह से बर्बाद हो चुका हूं। मैं ही सबसे बड़ा मूर्ख था। मेरे पिताजी ने तो मुझे इतना महत्वपूर्ण ज्ञान दिया, लेकिन मैं उस हीरे को पत्थर समझ बैठा। आगे सेठ का बेटा गुरुवर से कहता है, गुरुवर दूसरी बात क्या है। उसका अर्थ क्या है। गुरुवर दूसरी बात का अर्थ समझाते हुए कहते हैं, चमड़े की बांड करवाना। इसका अर्थ यह है कि तुम अपने घर में कुत्ता या बिल्ली पालना। जब तुम अपने घर में कुत्ता बिल्ली पाल लोगे तो यह तुम्हारे घर की चारों ओर से रक्षा करेगा। जिससे तुम्हारी धन दौलत पूरी तरह से सुरक्षित रहेगी और तुम बेफिक्र होकर दुकान पर मन लगा सकोगे। बेफिक्र होकर दुकान के कामों को समझ सकोगे और तरक्की कर पाओगे। और तो और तुम्हारे मन में कभी यह डर नहीं होगा कि कहीं कोई चोर आकर मेरी संपत्ति ना चुरा ले। चमड़े की बांड करवाने का असली मतलब यह है। लेकिन तुमने तो चमड़े की बांड करवाने का मतलब कुछ और ही निकाल दिया। तुमने तो अपने घर की दीवारों को ही चमड़े से पूरी तरह से भरवा दिया। जिस कारण आसपास गंदी बदबू फैल गई। तुम्हारे आसपास के पड़ोसी भी अपना घर छोड़कर कहीं और चले गए। यहां तक कि तुम्हारे मित्र तुम्हारे सगे संबंधी भी उस बदबू के कारण तुम्हारे घर पर आने से कतराने लगे। और अब हालत यह हो चुके है कि ना तो तुम्हारे घर पर कोई आता है और ना ही कोई जाता है। और इसी कारणवश लोग तुम्हें ना पसंद करने लगे और तुम्हारी बर्बादी का यह भी कारण है। आगे सेठ का बेटा कहता है। हे गुरुवर यह सब तो ठीक है। लेकिन यह खाने को मीठा करके खाना। इसका क्या मैंने इसका भी अर्थ गलत निकाला है क्या मैंने तो अपने पिता की बातों के कहे अनुसार ही हर रोज मीठा खाया और आज देखिए मेरा शरीर कितना वजनदार हो चुका है। जिस कारण मुझे अनेक प्रकार की बीमारियों ने घेर रखा है। क्या मैं इस बात को भी गलत समझ रहा था। इस पर साधु उस सेठ के बेटे से कहते हैं। हां तुमने इस बात का भी गलत मतलब ही निकाला। मीठा करके खाने का अर्थ यह है कि जब भी तुम्हें भूख तेजी से लगे तभी तुम्हें भोजन करना है। ना उसके पहले और ना उसके बाद अन्यथा यदि तुम्हें भूख ना लगी होगी और तुम्हें भोजन मिल जाए तो तुम उस भोजन की कभी कदर नहीं करोगे। वह रोटी तुम्हें कभी मीठी नहीं लगेगी। फिर चाहे वह भोजन कितना भी स्वादिष्ट क्यों ना हो। चाहे भोजन कितना भी लाजवाब क्यों ना हो। तुम उसकी कदर कभी नहीं कर पाओगे। तुम उसका सम्मान कभी नहीं कर पाओगे। किंतु जब एक व्यक्ति को जोरों की भूख लगी होती है तो उसके सामने यदि तुम सूखी रोटी भी रख दो तो भी वह उसके लिए किसी पंचामृत से कम नहीं है। वह उसे प्रेम पूर्वक खाता है। उसका आदर करता है। उसका सम्मान करता है और वह रोटी उसे मीठी लगती है। इसी कारण तुम्हारे पिताजी ने यह कहा था कि भोजन मीठा करके खाना। जिससे तुम्हारा स्वास्थ्य भी अच्छा रहेगा। क्योंकि जब एक व्यक्ति को भूख लगी होती है और उस समय पर जब वह भोजन करता है तो वह उसके लिए अमृत समान होता है। वहीं जब किसी व्यक्ति को भूख ना लगी हो और ऐसे समय पर वह भोजन करता है तो वह उसके लिए विष समान है। यह उसे बहुत नुकसान पहुंचा सकता है। लेकिन तुमने तो इसका भी गलत मतलब निकाला। तुम हर रोज मीठा खाने लगे। जिस कारण तुम्हारा वजन बढ़ने लगा। इसी वजह से तुम्हारे शरीर में अनेक रोग ने अपना घर बना लिया और यह तुम्हें मृत्यु के करीब ले जा रहा था। इसलिए आज से जब भी तुम्हें जोर की भूख लगे तभी भोजन करना तुम्हारे लिए अत्यधिक फायदेमंद होगा और तुम्हारे शरीर को हमेशा निरोगी बनाने में मदद करेगा। जब तुम्हें भूख ना लगी हो ऐसे समय पर कभी भोजन मत करना। यह तुम्हारे लिए बहुत नुकसानदायक साबित होगा। यही तुम्हारी तीसरी गलती थी। जिसके कारण तुम्हारा पूरा जीवन बर्बाद हो रहा था। आगे सेठ का बेटा कहता है चौथी बात तो बिल्कुल साफ लिखी गई है। अपनी पत्नी को हमेशा बांध कर रखना तो इसका अर्थ भी कुछ और है क्या मैंने इसका भी गलत मतलब निकाला है। इस पर साधु कहते हैं। हां बेटा अपनी पत्नी को बांध कर रखने का अर्थ यह नहीं है कि तुम उसे रोज रस्सी से बांध कर रखो। इसका अर्थ तो यह है कि जब भी तुम दोनों के बीच कोई आपसी मतभेद हो जाए, कुछ नोक-झोंक हो जाए तो तुम अपनी पत्नी पर हाथ मत उठाना। जब तक एक स्त्री का पति उसके साथ रिश्ते में बंधा होता है तब तक वह स्त्री भी उस रिश्ते में बंधी रहती है और उसे निभाने का हर मुमकिन प्रयास करती है। ऐसे समय पर यदि तुम्हारे बीच कुछ नोक-झोंक हो जाए, कुछ गलतियां हो जाए और तुम उस स्त्री का हाथ नहीं छोड़ते तो वह तुम्हें कभी नहीं छोड़ेगी। लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं है कि तुम अपनी पत्नी पर अत्याचार करो। तुम्हारे पिताजी यहां यह कहना चाहते थे। कि जो भी व्यक्ति तुम्हारे साथ किसी रिश्ते में जुड़ा हुआ है, उसे अपने रिश्ते में इस तरह से बांध लो कि वह तुम्हारे साथ झगड़े और नोक-झोंक के बाद भी तुम्हें नुकसान ना पहुंचा सके। वह तुम्हारे साथ कुछ गलत ना कर सके और तुम्हारा फायदा ना उठा सके। हमेशा एक अच्छा और स्वस्थ भोजन करना। जब तुम्हें भूख लगी हो तभी भोजन का सेवन करना ताकि जो भी सांसें मिली हैं, उन्हें खुशी-खुशी जी सको। अपने रिश्तों को हमेशा बांध कर रखना उन्हें खुला मत छोड़ना। अन्यथा वे तुम्हारे हाथ से फिसल जाएंगे। अपने घर में अवश्य ही कुत्ते या बिल्ली को पालना ताकि तुम्हारा धन हमेशा सुरक्षित रहे। इन सभी बातों का अपने जीवन में अनुसरण करने के बाद तुम अपने जीवन में सब कुछ फिर से पा सकते हो। जो तुमने आज तक खोया है, उससे अधिक भी उन्नति कर सकते हो। इससे अधिक समृद्धि पा सकते हो और अपने जीवन को खुशहाल और सुखमय बना सकते हो। इतना कहकर वह साधु शांत हो गए। सेठ का बेटा भी अपनी सभी गलतियों को समझ चुका था। उसने गुरु को प्रणाम किया और वापस अपने घर लौट गया। उसने उन सभी चारों बातों को अपने जीवन में उतारा और उनका सही-सही अनुसरण किया। इसके बाद उसके जीवन में सकारात्मक प्रभाव दिखने लगे। वह एक बार फिर से अपने व्यापार को खड़ा करने में सफल रहा। वह अपनी पत्नी को घर लाने में भी सफल रहा। देखते ही देखते उसका जीवन सुखमय और आनंदमय हो गया। दोस्तों यह कहानी हमें एक गहरा संदेश देती है कि चुनौतियों का सामना करने से ही असली जीत मिलती है। सफलता केवल मंजिल तक पहुंचने का नाम नहीं है बल्कि उस रास्ते को ईमानदारी समर्पण और प्रेम के साथ तय करने का नाम है। हर कठिनाई एक शिक्षक है जो हमें मजबूती और साहस का पाठ पढ़ाती है। अंततः जीवन का असली अर्थ यह नहीं है कि आपने क्या पाया बल्कि यह है कि आपने अपने आसपास कितने लोगों का जीवन रोशन किया तो दोस्तों। उम्मीद करता हूं कि आपको कहानी पसंद आई होगी और आपने जरूर इस कहानी से कुछ ना कुछ सीखा होगा। आपको कहानी कैसी लगी नीचे कमेंट में लिखकर जरूर बताना और जाते-जाते चैनल को सब्सक्राइब करके कमेंट में नमो बुद्धाय लिख देना तो आपसे फिर एक नई कहानी के साथ मिलता हूं। राधे-राधे नमो बुद्धाय।



