Thumbnail for Shiv Tandav Stotram | शिव तांडव स्तोत्रम | Lord Shiva Song | Uma Mohan by Times Music Spiritual

Shiv Tandav Stotram | शिव तांडव स्तोत्रम | Lord Shiva Song | Uma Mohan

Times Music Spiritual

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[0:30]जटाटवी गलज्जल प्रवाह पावितस्थले गलेवलम्ब्य लम्बितां भुजङ्ग तुङ्ग मालिकाम्

[0:37]डमड्डम डमड्डमन्निनाद वड्डमर्वयं चकार चण्डताण्डवं तनोतु नः शिवः शिवम्

[0:49]जटाकटा हसंभ्रम भ्रमन्निलिंप निर्झरी विलोलवी चिवल्लरी विराजमान मूर्धनि धगद् धगद् धगज्ज्वल ल्ललाट पट्ट पावके किशोर चन्द्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम

[1:14]धराधरेन्द्र नन्दिनी विलासबन्धु बन्धुर स्फुरद् दिगन्त सन्तति प्रमोदम मानमानसे कृपाकटाक्ष धोरणी निरुद्धदुर्धरापदि क्वचिद् दिगम्बरे मनोविनोदमेतु वस्तुनि

[1:34]जटाभुजङ्ग पिङ्गल स्फुरत्फणा मणिप्रभा कदम्बकुङ्कुम द्रव प्रलिप्त दिग्वधूमुखे मदान्ध सिन्धुर स्फुरत्त्वगुत्तरी यमेदुरे मनोविनोदमद्भुतं बिभर्तु भूतभर्तरि

[2:26]सहस्रलोचन प्रभृत्यशेष लेखशेखर प्रसून धूलिधोरणी विधूस राङ्घ्रि पीठभूः भुजङ्गराज मालया निबद्धजाटजूटकः श्रियै चिराय जायतां चकोरबन्धुशेखरः

[2:43]ललाट चत्वर ज्वलद्धनञ्जय स्फुलिङ्गभा निपीत पञ्च सायकं नमन्नि लिंपनायकम् सुधामयूख लेखया विराजमानशेखरं महाकपालि संपदे शिरोजटालमस्तु नः

[3:04]कराल भाल पट्टिका धगद् धगद् धगज्ज्वलद्धनञ्ज याहुती कृत प्रचण्डपञ्चसायके धराधरेंद्र नन्दिनी कुचाग्रचित्र पत्रक प्रकल्पनैक शिल्पिनी त्रिलोचने रतिर्मम नवीनमेघमण्डली निरुद्धदुर्धरस्फुरत् कुहूनिशीथिनीतमः प्रबन्धबद्धकन्धरः निलिंप निर्झरी धरस्तनोतु कृति सिन्धुर कलानिधान बन्धुरः श्रियं जगद् धुरंधरः

[3:45]प्रफुल्लनीलपङ्कज प्रपञ्च कालिमप्रभा वलम्बि कण्ठकन्दली रुचि प्रबद्धकन्धरम् स्मरच्छिदं पुरच्छिदं भवच्छिदं मखच्छिदं गजच्छिदान्धकच्छिदं तमन्तकच्छिदं भजे

[4:13]अखर्वसर्वमङ्गला कला कदम्बमञ्जरी रसप्रवाह माधुरी विजृम्भणा मधुव्रतम्

[4:27]स्मरा तकं पुरान्तकं भवान्तकं मखान्तकं गजान्त कान्धकान्तकं तमन्त कान्त कं भजे

[4:54]जयत्वदभ्रविभ्रम भ्रमद्भुजङ्ग मश्वसद्विनिर्गमत् क्रमस्फुरत्कराल भाल हव्यवाट् धिमिद्धिमि धिमिद्ध्वनन्मृदङ्ग तुङ्गमङ्गल ध्वनिक्रमप्रवर्तित प्रचण्डताण्डवः शिवः दृषद् विचित्र तल्पयोर् भुजङ्ग मौक्तिकस्रजोर् गरिष्ठरत्नलोष्ठयोः सुहृद्विपक्ष पक्षयोः तृणारविन्द चक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोः समप्रवृत्तिकः कदा सदाशिवं भजाम्यहम्

[5:40]कदानिलिंप निर्झरीनिकुञ्ज कोटर एव सन् विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरःस्थमञ्जलिं वहन् विलो ललोललोचनो ललाम भाल लग्नकः शिवेति मन्त्रमुच्चरन्कदा सुखी भवाम्यहम्

[6:06]इदं हि नित्यमेवमुक्तमुत्तमोत्तमं स्तवं पठन्स्मरन् ब्रुवन्नरो विशुद्धिमेति सन्ततम् हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नान्यथा गतिं विमोहनं हि देहिनां सुशङ्करस्य चिन्तनम् विमोहनं हि देहिनां सुशङ्करस्य चिन्तनम्

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