[0:00]कभी आपने अपने पालतू कुत्ते को देखा है या गली में घूमते किसी जानवर को? उसकी जिंदगी बहुत सिंपल है। उसे भूख लगती है, वह खाना ढूंढता है। उसे नींद आती है, वह सो जाता है। उसे खतरा महसूस होता है, वह भाग जाता है। उसका पूरा दिन, पूरी जिंदगी बस इन्हीं तीन-चार चीजों में निकल जाती है: खाना, सोना, बच्चे पैदा करना और जिंदा रहना। वह कभी रात को बैठकर यह नहीं सोचता, यार मैं कुत्ता क्यों हूं? मैं बिल्ली क्यों नहीं हूं? मेरी जीने का मकसद क्या है? वह कभी डिप्रेशन में नहीं जाता कि दुनिया में इतना पाप क्यों है? वह बस 'जीता' है। लेकिन हम, हम इंसान, हमारे पास पेट भरने के लिए खाना हो, सोने के लिए अच्छा बिस्तर हो, सर पर छत हो, फिर भी सब कुछ होने के बाद भी रात को 2:00 बजे हमारी नींद उड़ जाती है। क्यों? क्योंकि हमारे दिमाग में एक 'कीड़ा' है। एक ऐसा कीड़ा जो हमें चैन से सिर्फ 'जीने' नहीं देता। वह हमसे सवाल पूछता है, 'क्या जिंदगी बस इतनी ही है?' यही वह सवाल है जो हमें जानवरों से अलग करता है। सुबह उठो, काम पे जाओ, वापस आओ, सो जाओ, और एक दिन मर जाओ। इज दिस इट? दोस्तों, आज का हमारा टॉपिक यही है। हम यह समझेंगे कि इंसान ने सोचना शुरू ही क्यों किया? फिलॉसफी किसी ने ऊपर से फेंकी नहीं थी। यह हमारी जरूरत क्यों बन गई? मैं हूं सिद्धार्थ सिंह और ऑफिशियल फिलॉसफी में आपका स्वागत है। आज हम टाइम मशीन में बैठकर हजारों साल पीछे जाएंगे, उस पल को खोजने जब पहले इंसान ने आसमान की तरफ देखकर पहला सवाल पूछा था। चलिए थोड़ा साइंस और फिलॉसफी मिक्स करते हैं। बायोलॉजी कहती है कि इंसान भी एक जानवर है, सोशल एनिमल। लेकिन हमारे पास एक ऐसी चीज है जो बाकी जानवरों के पास नहीं है। उसे कहते हैं सेल्फ कॉन्शियसनेस, आत्म-चेतना। जानवर को पता है कि सामने शिकार है, पर उसे यह नहीं पता कि मैं एक दिन नहीं रहूंगा। इंसान अपनी मौत के बारे में पहले से जानता है। यही ज्ञान हमारा सबसे बड़ा बोझा है। यही वह डर था जिसने फिलॉसफी को जन्म दिया। जब आदिमानव ने अपने साथी को मरते हुए देखा होगा, एक पल पहले वह चल रहा था, बोल रहा था और अगले पल वह पत्थर जैसा हो गया। उस आदिमानव का दिमाग हिल गया होगा। उसने सोचा होगा, यह कहां गया? जो कल तक मेरे साथ शिकार कर रहा था, अब वह बोल क्यों नहीं रहा? और क्या कल मैं भी ऐसा ही हो जाऊंगा?
[2:25]यह मौत का डर ही वह पहली चिंगारी थी जिसने इंसान को फिलॉसफर बना दिया। उसने जवाब खोजने शुरू किए। क्या कोई आत्मा है? क्या कोई दूसरी दुनिया है? अगर इंसान अमर होता, तो शायद कभी फिलॉसफी पैदा ही नहीं होती। हम मजे से जीते, कभी 'क्यों' नहीं पूछते। मौत ने हमें 'Meaning' (अर्थ) खोजने पर मजबूर कर दिया। इसको थोड़ा और आसान करते हैं। इंसान की जरूरतें एक पिरामिड की तरह है। सबसे नीचे है सर्वाइवल (Survival)। भूखे पेट दर्शन नहीं सूझता। जब तक पेट खाली है, जीवन का मकसद सिर्फ खाना। रोटी, पानी, हवा। लेकिन जैसे ही पेट भरता है, इंसान दूसरे लेवल पर आता है, सिक्योरिटी एंड सोसाइटी। घर चाहिए, परिवार चाहिए, इज्जत चाहिए। ज्यादातर लोग यहीं अटक जाते हैं। पूरी जिंदगी पैसा कमाने और घर बनाने में निकाल देते हैं। लेकिन फिलॉसफी उन लोगों के लिए है जो इसके भी ऊपर जाते हैं, तीसरे लेवल पर। वह है इंटेलेक्चुअल हंगर। जब आपका पेट भरा हो और आप सुरक्षित हों, तब आपका दिमाग खाली होता है। और खाली दिमाग शैतान का घर नहीं, फिलॉसफर का घर होता है। तब आप पूछते हैं कि मैं यह सब कर क्यों रहा हूं? Why am I doing this? इतिहास गवाह है, फिलॉसफी का विकास (Development) हमेशा उन जगहों पर हुआ जहां लोग अमीर थे या सुखी थे। ग्रीस में लोग व्यापार से अमीर हो गए थे, उनके पास खाली वक्त था। भारत में ऋषि मुनि जंगलों में कंद-मूल खाकर पेट भर लेते थे। उन्हें नौकरी की चिंता नहीं थी। इसलिए उन्होंने सोचना शुरू किया।
[3:56]तो इंसान फिलॉसफी इसलिए करता है क्योंकि उसका दिमाग सिर्फ सर्वाइवल के लिए डिजाइन नहीं हुआ है। हमारे दिमाग में एक एक्स्ट्रा सॉफ्टवेयर है जो हमेशा 'वाई' (क्यों) पूछता रहता है। पर सवाल यह है कि यह सोचना शुरू कैसे हुआ? इतिहास में वह कौन सा दौर था जब पूरी दुनिया अचानक फिलॉसफर बन गई? अब मैं आपको एक बहुत ही अजीब इत्तेफाक के बारे में बताता हूं। इतिहासकार आज भी इस बात से हैरान हैं कि यह हुआ कैसे? अपनी टाइम मशीन को सेट कीजिए आज से लगभग ढाई हजार से 2600 साल पीछे यानी 600 BC से 400 BC के बीच। अगर आप उस वक्त दुनिया के नक्शे को ऊपर से देखते तो आपको तीन अलग-अलग कोनों में तीन अलग-अलग आग जलती हुई दिखती। यूनान में सुकरात, प्लेटो और पाइथागोरस जैसे लोग पुराने देवताओं पर सवाल उठा रहे थे। चीन में कंफ्यूशियस और लाओ ज़ू समाज और जीवन का सही रास्ता खोज रहे थे। भारत में, यह सबसे बड़ा केंद्र था। यहां महावीर स्वामी, गौतम बुद्ध और उपनिषदों के ऋषि जंगलों में बैठकर जीवन और मृत्यु का रहस्य सुलझा रहे थे। सोचिए ना तब इंटरनेट था ना फोन ना फ्लाइट्स, ग्रीस के आदमी को नहीं पता था कि भारत में क्या हो रहा है और भारत वाले को चीन का नहीं पता था। फिर भी सब एक साथ एक ही समय पर एक जैसी बातें क्यों सोचने लगे? जर्मन फिलॉसफर कार्ल जस्पर्स ने इस दौर को The Axial Age यानी धुरी युग कहा है। धुरी मतलब वह पॉइंट जिस पर पहिया घूमता है। उन्होंने कहा कि यह वह समय था जब मानवता ने करवट ली। इससे पहले हम सिर्फ कबीलों में रहते थे और डरे हुए थे। लेकिन इस दौर में इंसान पहली बार इंसान बना। उसने पहली बार अपनी आत्मा को खोजा। सवाल यह है आखिर उसी समय क्यों? 1000 साल पहले क्यों नहीं या बाद में क्यों नहीं? इसका जवाब है दुख और उथल-पुथल। उस समय दुनिया में बहुत मार-काट मची थी। बड़े-बड़े शहर बन रहे थे। लोहे के हथियार आ गए थे। राजा एक दूसरे को मार रहे थे। आम आदमी की जिंदगी बहुत सस्ती हो गई थी। जब बाहर बहुत शोर होता है, तब इंसान सुकून खोजने के लिए अंदर यानी इनवर्ड भागता है। भारत में लोग वैदिक कर्मकांडों और पशुबलि से थक चुके थे। उन्हें लगा कि इतनी हिंसा करके शांति कैसे मिलेगी? तब बुद्ध और महावीर जैसे लोग उठे और उन्होंने कहा कि शांति बाहर यज्ञ करने से नहीं, अंदर के दिए को जलाने से मिलेगी। उधर ग्रीस में लोग पुराने अंधविश्वासों से तंग आ गए थे। उन्हें लगा कि बाढ़ और भूकंप देवताओं का गुस्सा नहीं, बल्कि नेचर का नियम है। तो फिलॉसफी का जन्म शांति के समय नहीं, बल्कि संकट यानी क्राइसिस के समय हुआ। जब इंसान के पुराने जवाब यानी रिलीजन या ट्रेडिशन काम करना बंद कर देते हैं, तब उसे नए जवाब खोजने पड़ते हैं। और उन्हीं नए जवाबों की खोज का नाम फिलॉसफी था। इस इतिहास को हम एक लाइन में समझ सकते हैं। इंसान का सफर 'हाउ' से 'वाई' की तरफ। लाखों सालों तक आदि मानव का सवाल था- 'हाउ?' आग कैसे जलाएं? जानवर को कैसे मारें? बारिश से कैसे बचें? यह सब टेक्नोलॉजी और सर्वाइवल था। लेकिन एक्सियन एज यानी 600 BC में सवाल बदल गया। अब सवाल बन गया 'वाई'। हम जी ही क्यों रहे हैं? यह दुनिया बनी ही क्यों है? दुख क्यों हैं? जब बच्चे छोटे होते हैं तो वह पूछते हैं, यह कैसे चलता है? खिलौना। लेकिन जब वह थोड़े बड़े होते हैं तो पूछते हैं, पापा आसमान नीला क्यों है? हम मरते क्यों हैं? बस यही समझ लीजिए उस दौर में मानवता यानी ह्यूमैनिटी बड़ी हो गई थी। उसका बचपन खत्म हो गया था। जिस समाज ने 'क्यों' पूछना बंद कर दिया, वह खत्म हो गया। विज्ञान हमें 'कैसे' बताता है, लेकिन दर्शन हमें 'क्यों' बताता है। यह सवाल ही हमें जिंदा रखता है। तो हमने यह तो देख लिया कि कब और कैसे शुरुआत हुई। लेकिन एक आम इंसान, आप और मैं, हमारे निजी जीवन में फिलॉसफी कब शुरू होती है? क्या हमें बुद्ध बनने की जरूरत है या हम अपने बेडरूम में बैठे-बैठे भी फिलॉसफी कर रहे हैं? हमने इतिहास देख लिया, 2500 साल पहले की बात कर ली, लेकिन अब एक बहुत ही पर्सनल सवाल पूछता हूं। क्या आप 'सोचना' (Thinking) बंद कर सकते हैं? एक मिनट के लिए अपनी आंखें बंद करें। कोशिश करें कि दिमाग बिल्कुल खाली हो जाए। क्या आप कर पाए? नहीं, मुमकिन ही नहीं है।
[8:10]ग्रीक फिलॉसफर अरस्तु ने इंसान की सबसे सटीक परिभाषा दी थी। उन्होंने कहा था, “मनुष्य एक तार्किक प्राणी है।” जानवर सिर्फ महसूस करते हैं, उन्हें दर्द होता है, खुशी होती है, लेकिन इंसान? इंसान 'तर्क' करता है। हमारा दिमाग एक मशीन की तरह चालू रहता है। यह मशीन 24 घंटे जवाब तलाशती है। यह 'अर्थ' (Meaning) मांगता है। जब आपके साथ कुछ बुरा होता है, मान लीजिए आपका एक्सीडेंट हो गया या नौकरी चली गई, तो आपका पहला सवाल यह नहीं होता कि यह कैसे हुआ। आपका पहला सवाल यह होता है कि मेरे साथ ही क्यों? Why me? यह जो 'वाई' है ना, यही इंसान होने की सजा भी है और मजा भी। एक शेर कभी हिरण को मारकर गिल्ट में नहीं जाता कि मैंने पाप किया। लेकिन इंसान अगर इंसान किसी को थप्पड़ भी मार दे तो रात भर सो नहीं पाता। उसका दिमाग उसे कुरेदता है कि क्यों मारा? क्या यह सही था? क्या मैं बुरा इंसान हूं? तो दोस्तों, इंसान फिलॉसफी शौक के लिए नहीं करता। इंसान फिलॉसफी इसीलिए करता है क्योंकि वह सोचना बंद नहीं कर सकता। यह हमारी मजबूरी है। यह हमारे डीएनए में है। सोचना हमारी नसों में दौड़ता है। जैसे मछली तैरने के लिए बनी है, इंसान 'कारण ढूंढने' के लिए बना है। हम सोचने के लिए अभिशप्त हैं। इसको और गहराई से समझते हैं। क्या आपने कभी किसी चार-पांच साल के बच्चे को देखा है? वह दुनिया का सबसे बड़ा फिलॉसफर होता है। वह अपनी मां से पूछता है, मां, सूरज कहां जाता है? मां, हम मरते क्यों हैं? भगवान कहां रहते हैं? कुत्ता बोलता क्यों नहीं? गौर कीजिए, उसके सवाल खाने-पीने के बारे में नहीं है। उसके सवाल 'एग्जिस्टेंस' (Existence) के बारे में होते हैं। हर बच्चा पैदाइशी दार्शनिक होता है। उसे दुनिया अजीब लगती है। उसे हर चीज के पीछे का कारण जानना है। लेकिन फिर क्या होता है? हम बड़े होते हैं, स्कूल जाते हैं, कॉलेज जाते हैं। समाज हमें रटना सिखा देता है। चुप रहो, ज्यादा सवाल मत पूछो। जो किताब में लिखा है, वह रट लो। और धीरे-धीरे वह बच्चा चुप हो जाता है। वह सवाल पूछना बंद कर देता है।
[10:08]लेकिन वह सवाल अंदर मरते नहीं। वह बस दब जाते हैं, इंतजार करते हुए। जब जिंदगी में कोई बड़ा भूचाल आता है, कोई अपना मर जाता है या दिल टूटता है, तो वह अंदर का बच्चा फिर जाग उठता है और पूछता है कि यह सब क्या ड्रामा है? इसका मतलब क्या है? तो फिलॉसफी कोई नई चीज नहीं सीखना है। फिलॉसफी का मतलब है अपने अंदर के उस बच्चे को फिर से जिंदा करना, जो निडर होकर सवाल पूछता था। अब एक और वजह सुनिए कि हम फिलॉसफी क्यों करते हैं। इसे मनोविज्ञान में कहते हैं 'Need for Coherence' यानी सुसंगति की जरूरत। हमारा दिमाग 'अराजकता' (Chaos) बर्दाश्त नहीं कर सकता। हमें हर चीज में एक पैटर्न चाहिए। अगर मैं आपसे कहूं कि राम अच्छा इंसान था, लेकिन उसे बहुत दर्दनाक मौत मिली और रावण बहुत बुरा था, लेकिन वह मजे से जिया। आपका दिमाग इसे एक्सेप्ट नहीं करेगा। आपको गुस्सा आएगा। आप कहेंगे नहीं, ऐसा नहीं हो सकता। जरूर राम को स्वर्ग मिलेगा और रावण को अगले जन्म में सजा मिलेगी। क्यों? क्योंकि आपको दुनिया में न्याय चाहिए। हकीकत में दुनिया बहुत रैंडम है। यहां अच्छे लोगों के साथ बुरा होता है और बुरे मजे करते हैं। लेकिन इंसान का दिमाग इस रैंडमनेस को झेल नहीं सकता। यह हमें पागल कर देगा। इसलिए हम कर्म का सिद्धांत बनाते हैं। इसलिए हम Heaven and Hell का कॉन्सेप्ट बनाते हैं। यह सब क्या है? यह सब फिलॉसफी है। हम फिलॉसफी इसीलिए करते हैं ताकि हम इस पागल दुनिया को एक सेंस दे सकें। ताकि हम खुद को समझा सकें कि सब ठीक है, इसके पीछे कोई बड़ा प्लान है। अगर फिलॉसफी ना हो तो दुनिया हमें एक डरावना जंगल लगेगी, जहां कोई नियम नहीं है। फिलॉसफी वह दीवार है जो हमें पागल होने से बचाती है। यह हमारे दिमाग का डिफेंस मैकेनिज्म है। आखिरी और कड़वा सच। इंसान भूखा रह सकता है। इंसान गरीब रह सकता है। लेकिन इंसान मीनिंगलेस जिंदगी नहीं जी सकता। जर्मन फिलॉसफर नीत्शे ने कहा था, “He who has a why to live for can bear almost any how.” सोचिए, एक कैदी के बारे में सोचिए। उसे काल कोठरी में बंद कर दिया गया। खाने को सड़ा हुआ खाना मिलता है। अंधेरा है। वह जिंदा कैसे रहेगा? अगर उसके पास कोई फिलॉसफी है, जैसे मैं जिंदा रहूंगा ताकि बाहर जाकर अपने देश को आजाद करा सकूं या मैं जिंदा रहूंगा क्योंकि मेरा भगवान मेरी परीक्षा ले रहा है, तो वह सब कुछ सह लेगा। लेकिन अगर उसे लगे कि मेरे जीने का कोई मतलब नहीं है, मैं बस सड़ रहा हूं, तो वह खुद को खत्म कर लेगा। सुसाइड अक्सर शरीर की तकलीफ से नहीं, बल्कि मतलब खो जाने से होता है। तो इंसान फिलॉसफी इसीलिए करता है क्योंकि उसे अपनी पीड़ा को सहने के लिए एक वजह चाहिए। हम कहानियां गढ़ते हैं, हम सिद्धांत बनाते हैं, हम धर्म बनाते हैं, सिर्फ इसलिए ताकि हम सुबह उठकर खुद से कह सकें कि हां, मेरी जिंदगी का कोई ना कोई मकसद जरूर है। आज हम 21वीं सदी में जी रहे हैं। हमारे पास सुपर कंप्यूटर है। हम मंगल ग्रह पर जाने की तैयारी कर रहे हैं। तो एक सवाल उठता है, कि जब साइंस इतना आगे बढ़ गया है, तो हमें अब फिलॉसफी की क्या जरूरत है? क्या पुराने जमाने की बातें अब बेकार नहीं हो गई हैं? बहुत से लोग सोचते हैं कि साइंस ने फिलॉसफी को मार दिया है। लेकिन रुकिए, हकीकत ठीक उल्टी है। साइंस हमें 'शक्ति' (Power) देता है, फिलॉसफी हमें 'दिशा' (Direction) देती है। सोचिए साइंस ने हमें परमाणु बम दिया। यह फिजिक्स की ताकत है। लेकिन उस बम को गिराना है या नहीं, यह फैसला फिजिक्स नहीं कर सकती। अगर आप फिजिक्स की किताब से पूछेंगे कि क्या हिरोशिमा पर बम गिराना सही था? तो किताब चुप रहेगी क्योंकि साइंस के पास सही और गलत का कोई चैप्टर नहीं है। यह जवाब सिर्फ फिलॉसफी दे सकती है। साइंस आपको बता सकती है कि इंसान को क्लोन कैसे करें। लेकिन फिलॉसफी पूछेगी क्या इंसान को भगवान बनने का हक है? तो दोस्तों, हम फिलॉसफी इसलिए नहीं करते क्योंकि हमारे पास साइंस नहीं है। हम फिलॉसफी इसलिए करते हैं क्योंकि साइंस अंधी है। उसे नहीं पता कि वह कहां जा रही है। उसे रास्ता दिखाने के लिए दर्शन की आंखें चाहिए। जैसे-जैसे साइंस बढ़ेगा, फिलॉसफी की जरूरत और ज्यादा बढ़ेगी ताकि हम अपनी ही टेक्नोलॉजी से खुद को खत्म ना कर लें। हमने टॉपिक की शुरुआत में बात की थी कि जानवर सिर्फ जीते हैं। आज हम इंसान भी रोबोट बनाते हैं, AI आ गया है। रोबोट हमसे तेज गणना कर सकता है, वह हमसे बेहतर शतरंज खेल सकता है। लेकिन एक चीज है जो रोबोट कभी नहीं कर सकता। वह कभी रात को बैठकर यह नहीं सोचेगा कि मैं उदास क्यों हूं? यही वह चीज है जो हमें मशीन बनने से बचाती है। इंसान फिलॉसफी इसलिए करता है क्योंकि हमारे अंदर एक आत्मा है- Soul, Consciousness जो भूखी है। पेट की भूख रोटी से मिट जाती है। दिमाग की भूख साइंस से मिट जाती है। लेकिन वजूद की भूख सिर्फ सार्थकता से मिटती है, साइंस से नहीं। आजकल लोग डिप्रेशन में क्यों हैं? उनके पास सब कुछ है, AC, गाड़ी, पैसा, फिर भी लोग खुश नहीं हैं। क्यों? क्योंकि हमने 'हाउ टू लिव' (कैसे जिएं) साइंस, पैसा तो सीख लिया, लेकिन 'वाई टू लिव' (क्यों जिएं) फिलॉसफी, हम भूल गए। जब तक इंसान के सीने में दिल धड़केगा, जब तक उसे प्यार और दर्द महसूस होगा, तब तक वह फिलॉसफी करेगा। आप इसे रोक नहीं सकते। अब एक मजे की बात बताता हूं। कुछ लोग कहते हैं, अरे हटाओ यार, फिलॉसफी बकवास है, टाइम वेस्ट है, इसका कोई मतलब नहीं है। मुबारक हो! आपने अभी-अभी एक फिलोसॉफिकल स्टेटमेंट दिया है। जब आप कहते हैं कि फिलॉसफी का कोई मतलब नहीं है तो आप असल में 'नाहिलिज्म' (शून्यवाद) नाम की एक फिलॉसफी का ही प्रचार कर रहे हैं। आप फिलॉसफी से भाग नहीं सकते। अगर आप भगवान को मानते हैं तो यह Theism है, आस्तिकवाद। अगर आप भगवान को नहीं मानते तो यह Atheism है, नास्तिकवाद। अगर आप कहते हैं खाओ-पियो ऐश करो, तो यह Hedonism है, सुखवाद। अगर आप कहते हैं, सब मोह-माया है, तो यह Cynicism है, विराग। हर इंसान, चाहे वह रिक्शेवाला हो या मुकेश अंबानी, किसी न किसी फिलॉसफी को जी रहा है। फर्क बस इतना है कि कुछ लोग इसे होश में चुनते हैं और बाकी लोग बेहोशी में भेड़चाल चलते हैं। यह कोर्स आपको वही होश देने के लिए है ताकि आप अपनी फिलॉसफी खुद चुनें, ना कि दुनिया आप पर थोपे। तो दोस्तों, यह था हमारा आज का सफर। हमने देखा कि कैसे एक डर यानी मौत का डर हमें सोचने पर मजबूर किया। कैसे इतिहास के अक्षीय युग में पूरी दुनिया जागी और कैसे हमारे दिमाग का कीड़ा यानी रीजन हमें कभी शांत नहीं बैठने देता। इंसान फिलॉसफी इसलिए करता है क्योंकि वह इंसान है। जिस दिन हमने सोचना बंद कर दिया, उस दिन हम वापस जानवर बन जाएंगे। तो अगली बार जब रात को नींद ना आए और मन में सवाल उठें तो घबराना मत। मुस्कुराना और सोचना कि आपका अंदर का इंसान अभी जिंदा है। मैं हूं सिद्धार्थ सिंह और आप सुन रहे थे ऑफिशियल फिलॉसफी। अगले एपिसोड में हम एक बहुत बड़े भ्रम को तोड़ेंगे। हम बात करेंगे कि मिथ, मिथक, रिलीजन, धर्म और फिलॉसफी, दर्शन में असली अंतर क्या है? क्या धर्म ही दर्शन है या दोनों दुश्मन हैं? जुड़े रहिए क्योंकि अभी तो बस पर्दा उठा है, असली खेल बाकी है। जय हिंद।



