Thumbnail for सदियों से इन्सान का अपने आपको छलना जारी है... #rajeshreddy #poetry #gazal #shortsvideo #shairyi by Ravi Mishra

सदियों से इन्सान का अपने आपको छलना जारी है... #rajeshreddy #poetry #gazal #shortsvideo #shairyi

Ravi Mishra

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[0:00]रोज सवेरे दिन का निकलना शाम में ढलना जारी है। जाने कब से रूहों का यह जिस्म बदलना जारी है।
[0:08]तपती रेत पे दौड़ रहा है दरिया की उम्मीद लिए, सदियों से इंसान का अपने आप को छलना जारी है।
[0:16]जाने कितनी बार यह टूटा, जाने कितनी बार लुटा, फिर भी सीने में इस पागल दिल का मचलना जारी है।
[0:23]बरसों से जिस बात का होना बिल्कुल तय सा लगता था, एक ना एक बहाने से उस बात का टलना जारी है।
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[0:00]रोज सवेरे दिन का निकलना शाम में ढलना जारी है। जाने कब से रूहों का यह जिस्म बदलना जारी है।

[0:08]तपती रेत पे दौड़ रहा है दरिया की उम्मीद लिए, सदियों से इंसान का अपने आप को छलना जारी है।

[0:16]जाने कितनी बार यह टूटा, जाने कितनी बार लुटा, फिर भी सीने में इस पागल दिल का मचलना जारी है।

[0:23]बरसों से जिस बात का होना बिल्कुल तय सा लगता था, एक ना एक बहाने से उस बात का टलना जारी है।

[0:32]तरस रहे हैं एक शहर को जाने कितनी सदियों से, वैसे तो हर रोज यहां सूरज का निकलना जारी है।

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