[0:00]रोज सवेरे दिन का निकलना शाम में ढलना जारी है। जाने कब से रूहों का यह जिस्म बदलना जारी है।
[0:08]तपती रेत पे दौड़ रहा है दरिया की उम्मीद लिए, सदियों से इंसान का अपने आप को छलना जारी है।
[0:16]जाने कितनी बार यह टूटा, जाने कितनी बार लुटा, फिर भी सीने में इस पागल दिल का मचलना जारी है।
[0:23]बरसों से जिस बात का होना बिल्कुल तय सा लगता था, एक ना एक बहाने से उस बात का टलना जारी है।
[0:32]तरस रहे हैं एक शहर को जाने कितनी सदियों से, वैसे तो हर रोज यहां सूरज का निकलना जारी है।



