[0:00]नाहरगढ़ के बीचोंबीच एक पुराना सा घर था। यह घर था हरिनाथ शर्मा का, जो गरीब तो नहीं थे लेकिन अमीर भी नहीं थे। और इसी घर से शुरू होती है इन दो बहनों की कहानी। एक थी सीता संस्कारों की मूरत तो दूसरी थी गीता घमंड की दुकान। शुरुआत में दोनों बहनें साथ-साथ पली थी। एक ही थाली में खाना, एक साथ सोना, लेकिन जैसे-जैसे उम्र बढ़ी गीता के मन में एक अजीब सी जलन नहर करने लगी। गांव में लोग सीता की तारीफ करते थे। सीता तो देवी जैसी है। एकदम माता सीता जैसी, शांत और दयालु। हां सही कहा ऐसी बहू मिले तो घर स्वर्ग बन जाए। यह बातें गीता के कानों में जहर बनकर उतरने लगी थी। मैं सुंदर हूं, तेज हूं, फिर सब सीता की ही तारीफ क्यों करते हैं? उसके पास तो ना शक्ल है ना अकल। उसके बावजूद सब उसी को मक्खन लगाते फिरते हैं। सीता को यह सब पता था, लेकिन वो चुप रहती क्योंकि उसे लगता था गीता मेरी छोटी बहन है, समय के साथ समझ जाएगी। एक दिन हरिनाथ शर्मा ने दोनों को पास बुलाया। बेटा, अब तुम दोनों की शादी का समय आ गया है। सीता ने सिर झुका लिया, जबकि गीता की आंखों में चमक आ गई। पहले सीता के लिए राम का रिश्ता आया। राम गरीब था और खेत में काम करता था। लेकिन दिल से साफ और नेक दिल था। गीता ने जब यह सुना तो वो हंस पड़ी। वाह बड़ी बहन को तो खेतीहर किसान मिल गया। अब तो जिंदगी मजे में कटेगी। वैसे भी इसे तो बंधुआ मजदूरी करना अच्छा लगता है। गीता की बात पर सीता ने कुछ नहीं कहा, जबकि हरिनाथ ने कहा, हां, वह गरीब है लेकिन मेहनती और ईमानदार है और साथ ही नेक दिल भी। सीता उसके साथ बहुत खुश रहेगी। जी बाबूजी जैसा आप ठीक समझी। वहीं दूसरी तरफ गीता के लिए मोहन का रिश्ता आया, जो एक जानामाना व्यापारी था। पक्का मकान, नौकर-चाकर सब कुछ था उसके पास। यह सुनते ही गीता का घमंड आसमान छूने लगा। देखा बाबूजी किस्मत भी समझती है कि कौन किस लायक है। हरिनाथ ने गीता को जवाब नहीं दिया, क्योंकि वह उसकी रग-रग से वाकिफ थे। खैर शादी तय हो गई और जल्द ही दोनों बहनों की शादी भी हो गई। सीता शादी करके राम के साथ उसके घर आ गई। राम का घर छोटा था। छप्पर की छत, एक टूटी सी रसोई और कुछ-कुछ बोरियों में रखा अनाज। सीता, मेरे पास ज्यादा कुछ तो नहीं है, लेकिन कोशिश करूंगा कि तुम्हें कभी किसी चीज की कमी ना हो। मुझे कुछ नहीं चाहिए राम, बस आपका साथ काफी है मेरे लिए। उधर जब गीता अपने ससुराल पहुंची तो आलीशान घर और चमचमाती गाड़ियां। वाह इतनी दौलत, शोहरत सब मेरा। अब तो मेरे ऐश ही ऐश हैं। अब तो सीता मुझसे नजर तक नहीं मिला पाएगी। इस तरह दौलत-शोहरत के गुरुर ने गीता का घमंड दुगना कर दिया था। ओए कमला इधर आ। ये मेरा कमरा ठीक से साफ क्यों नहीं किया? लेकिन मैंने तो सुबह ही साफ किया था छोटी मालकिन। तो क्या मैं झूठ बोल रही हूं? नौकर हो नौकर बनकर रहो। जाओ जल्दी से यहां पहुंचा लगाओ। और हां किसी नौकर को मेरे लिए नारियल पानी लाने को बोलो। जी छोटी मालकिन मैं अभी कर देती हूं। इसी तरह कुछ महीने गुजर गए और तीज का त्यौहार आ गया और दोनों बहनें मायके पहुंची। सीता ने साधारण साड़ी पहनी थी तो गीता ने रेशमी लहंगा पहना हुआ था। उसके हाथों में रंग-बिरंगी चूड़ियां और एक बड़ा सा ब्रांडेड बैग लटका हुआ था। गांव की कुछ औरतें तीज का टोटका करने आई हुई थी, तभी गीता ने अपनी बहन का मजाक बनाते हुए कहा, और बताओ सीता कैसा चल रहा है सब? राम जीजू खाना भी देते हैं कि नहीं? मैं तो भूल ही गई खुद खाने के लाले पड़े हुए हैं तुझे कहां से खिलाएंगे? गीता की कड़वी बातें सुनकर सीता का दिल टूट गया, लेकिन अपनी बहन को नीचा दिखाकर गीता को बड़ा मजा आया। दिन ढलने पर दोनों बहनें अपने-अपने घर लौट गई। दिन गुजरने लगे। सीता की जिंदगी आसान नहीं थी। सुबह सूरज निकलने से पहले उठना, चूल्हा जलाना, खाना बनाना, पति राम के साथ खेत जाना और दिन भर कड़ी मेहनत करना। शाम होते-होते सीता थक कर चूर हो जाती थी, लेकिन उसने कभी शिकायत नहीं की। सुनो सीता क्या तुम मुझसे नाराज हो क्योंकि मैं तुम्हें वह आराम की जिंदगी नहीं दे पा रहा जिसके बारे में तुमने सोचा होगा। अरे नहीं नहीं आप ऐसी बातें क्यों कर रहे हैं? आप जैसा इतना प्यार करने वाला पति मुझे मिला और मुझे क्या चाहिए? हम दोनों साथ हैं तो यह मुश्किल वक्त भी गुजर जाएगा। अच्छा चलो आज का खाना मैं बनाता हूं, तुम बैठकर आराम करो। अरे नहीं नहीं मैं बना दूंगी आप कैसे बनाएंगे? क्यों मैं क्यों नहीं बना सकता? आज मैं अपनी प्यारी सी पत्नी को अपने हाथ से बनाकर खाना खिलाऊंगा। तुम बस बैठो और आराम करो। इस तरह राम ने चूल्हा जलाया, खाना बनाया और उसके बाद अपने हाथों से सीता को खाना भी खिलाया। एक तरफ जहां राम अपनी पत्नी सीता से बहुत प्यार करता था तो वहीं दूसरी तरफ गीता को पूरा ऐशो-आराम मिल रहा था, लेकिन एक चीज की कमी उसे खलने लगी थी और वह था पति का प्यार और इज्जत। एक रोज जब गीता नहाकर बाहर आई तो सिर पर पल्लू रखना भूल गई। तभी उसकी सास ममता ने उसे देख लिया। अरे मोही मायके से कुछ सीखा नहीं क्या? घर में बहू कैसे रहती हैं उसके तौर-ठिकाने पता है कि नहीं? अरे तो अब छोरी नहीं रही इस घर की बहू बन चुकी है। कम से कम इसकी मर्यादा का ख्याल तो रख। माफ कीजिए मम्मी जी गलती हो गई। आगे से ध्यान रखूंगी। अरे क्या खाक ध्यान रखेगी। पता नहीं उन्होंने क्या देखकर तुझ जैसी दो कौड़ी की लड़की से मेरे फूल से बच्चे की शादी कर दी। गरीब गवार कहीं की। अपनी सास की बात सुनकर गीता का दिल टूट गया। उसने जो ऐशो आराम सोचा था, वह तो उसे मिला था, लेकिन उसके बदले में उसके हक का प्यार और इज्जत उसे छिन गई थी। शुरुआत में गीता की जिंदगी किसी रानी से कम नहीं थी। रेशमी साड़ियां, गहने, कपड़े, नौकर-चाकर, लेकिन धीरे-धीरे उसे एहसास होने लगा कि पति के प्यार बना यह सब चीजें अधूरी हैं। मोहन दिन भर दुकान में रहता। शाम को घर आता थका हुआ और सीधे ही खाना खाकर सो जाता। इससे परेशान होकर एक दिन गीता ने कहा, तुम मेरे लिए समय क्यों नहीं निकालते? मोहन ने गीता की बात सुनकर बड़े ही सख्त लहजे में जवाब दिया। औरत हो औरत बनकर रहो। ज्यादा सवाल जवाब मत किया करो। तुम्हें सारा ऐशो आराम मिल रहा है यही बहुत है। गीता जिसे अपने हुस्न पर गुरुर था वो मोहन की बात सुनकर चकनाचूर हो गया। खैर कुछ और दिन ऐसे ही गुजर गए और एक दिन खबर आई कि मोहन का एक बड़ा सौदा डूब गया है। कारोबार में बड़ा भारी नुकसान हो गया था। मां दुकान में बहुत बड़ा नुकसान हो गया है। जो बड़ा ऑर्डर आया हुआ था वह अचानक से क्लाइंट ने मना कर दिया। उस पर हमने कर्ज लेकर भारी इन्वेस्टमेंट कर दी थी। अब हम बुरी तरह कर्ज में डूब चुके हैं। बेटा तू चिंता मत कर। जल्द ही सब ठीक हो जाएगा। बिजनेस में तो ऊंच-नीच होती रहती है। ऐसे ही कुछ दिन गुजरे और मोहन की दुकान पर कर्ज बढ़ने लगा। लोगों ने उधार समय पर वापस नहीं किया। मोहन का बहुत पैसा फंस गया और सास ममता का लहजा भी गीता के लिए बदल गया। बहू अब सात श्रृंगार कम करो। हालात को समझो। इन गहने-जेवरात को मुझे दे दो जरूरत में काम आएंगे। इस तरह गीता ने अपने सारे गहने-जेवरात उतार कर अपनी सास को दे दिए। जो गीता एक रानी की तरह रहती थी। इसके हालात अचानक से एक नौकरानी जैसे हो गए थे। उधर राम ने एक नया भैस ला लिया। उसने कहा, सीता अब हम सिर्फ फसल पर नहीं जी सकते। हमें कुछ और भी करना होगा। सीता ने भी राम की हिम्मत बढ़ाई। जी जैसा आप सही समझे मैं आपके हर फैसले में आपके साथ हूं। तो फिर ठीक है सीता मैं शहर में एक छोटी सी दुकान किराए पर ले लेता हूं। हम खेत में ताजा फल सब्जियां उगाकर वहां बेचा करेंगे। इससे हमें मंडी से 10 गुना मुनाफा होगा। बहुत अच्छा विचार है जी मैं आपके साथ हूं। हम बहुत मेहनत करेंगे। इस तरह दोनों ने मिलकर सब्जियां उगाना शुरू किया और राम उन्हें मंडी में बेचने की जगह शहर के बाजार में ले जाकर बेचने लगा। एक शाम जब राम सब्जियां बेचकर वापस घर आया, अरे सुनो सीता बाहर तो आओ जरा। राम की आवाज सुनकर सीता घर से बाहर आई तो उसने देखा कि राम के हाथ में कुछ बैग लटके हुए थे। अजी क्या हुआ आप बहुत खुश लग रहे हो। अरे सीता खुशी की तो बात ही है। तुम्हें पता है आज आज मैं 10000 की सब्जियां बिक गई। अगर ऐसे ही रहा तो जल्द ही हम अमीर हो जाएंगे। अजी ये तो सच में बहुत खुशी की बात है। अगर रोज ऐसे ही कमाई होने लगी तो हम हर महीने ₹300000 तक कमा लेंगे। हां सीता यह सब तुम्हारी वजह से ही हो पाया है। अगर तुम मेरे साथ ना होती तो शायद ही यह कभी मुमकिन हो पाता। अजी यह भी कोई कहने की बात है। आपकी पत्नी हूं और आपके हर फैसले में आपके साथ हूं। अच्छा यह सब छोड़िए यह बताइए आपके हाथों में यह क्या है? पहले अंदर तो चलो सब बताता हूं। इस तरह दोनों घर के अंदर आ जाते हैं और राम वो बैग सीता के हाथ में देते हुए कहता है। सीता यह मेरी तरफ से तुम्हारे लिए पहला उपहार है। जब सीता ने बैग खोल कर देखा तो उसमें दो सुंदर-सुंदर साड़ियां रखी हुई थी। अजी ये तो बहुत सुंदर साड़ियां हैं क्या मेरे लिए हैं? नहीं पड़ोस वाली के लिए है। यह सुनकर सीता के चेहरे पर हल्का सा गुस्सा झलक आया। ठीक है फिर उसे ही जाकर दे दो मुझसे बात मत करो। मेरी फूलमती मजाक कर रहा हूं। यह सब तुम्हारे लिए है। हमारी नजरें आपके अलावा किसी को देख सकती हैं क्या हां? यह सुनकर सीता मुस्कुरा देती है। इस तरह राम की धीरे-धीरे अच्छी कमाई होने लगी। सीता ने पैसों का हिसाब रखना शुरू कर दिया। उसने एक-एक रुपया बचाया। गरीबी अभी भी थी लेकिन किसी चीज का डर नहीं था क्योंकि अब उनकी कमाई उनकी दैनिक जरूरतों से काफी ज्यादा होने लगी थी। कुछ दिन बाद जब दोनों बहनों की मां की बरसी थी तो दोनों बहनें अपने पिता के घर आई। इस बार दोनों ने ही सादा सी साड़ियां पहनी हुई थी। अरे बेटा कैसी हो तुम दोनों? मैं एकदम ठीक हूं बाबा मुझे क्या होगा लेकिन सीता का पता नहीं। सारे दिन मजदूरी करके तो इसका बुरा हाल हो जाता होगा। नहीं नहीं छोटी बहन ऐसी कोई बात नहीं है। राम ने नया बिजनेस शुरू किया है और भगवान की दया से सब बहुत अच्छा चल रहा है। जल्द ही हम नया घर भी लेने वाले हैं। यह सुनकर गीता की जलन और भी बढ़ गई। खैर कुछ ही दिन बाद मोहन की आर्थिक हालत और बिगड़ गई। घर के गहने-जेवरात बिकने लगे। नौकर हटा दिए गए। सास का गुस्सा गीता पर टूटने लगा। वह दिन-रात गीता को ताने मारने लगी। अरे कलम ही तेरे मायके से कुछ मदद क्यों नहीं मांग लेती? अपने बाप से बोल के अपने दामाद की थोड़ी मदद कर दे ताकि तेरे पति की परेशानी थोड़ी कम हो जाए। लेकिन मां जी मेरे बाबा तो एक साधारण से किसान हैं। उनके पास कोई धन-दौलत नहीं है। और जो थोड़े बहुत पैसे थे वह भी उन्होंने हमारी शादी में लगा दिए। वो कहां से हमारी मदद कर पाएंगे? हमने तुझसे मोहन की शादी करके ही बहुत बड़ी गलती कर दी। अगर किसी अच्छे खानदान में की होती तो आज कम से कम वो मोहन की मदद तो करते। यह सुनकर गीता को बहुत बड़ा धक्का लगा। उसे महसूस हुआ कि जिस दौलत-शोहरत को देखकर उसे घमंड हो रहा था वो उसे सिर्फ एक कुत्ते की हैसियत से मिल रहा था। दोनों बहनों की जिंदगी एक नया मोड़ ले रही थी। एक तरह जहां सीता की जिंदगी खुशहाली की तरफ बढ़ रही थी तो वहीं दूसरी तरफ गीता की जिंदगी धीरे-धीरे तबाही की ओर बढ़ती जा रही थी। एक रात जोरों से बारिश हो रही थी। गीता रसोई के कोने में बैठी थी। रो-रो कर आंखें सूजी हुई थी। पीछे से सास की आवाज उसके कानों में गूंज रही थी। अरे कर्म जली तू डूब क्यों नहीं मरती? मेरे बेटे का सुकून खा गई तू। हमारे घर को बर्बाद करके रख दिया तूने। ना मायके से पैसा लाई ना किस्मत लाई। कुलक्षणी है तो कुलटा। यह सब सुनकर भी मोहन चुप था। उसकी चुप्पी गीता के लिए सबसे बड़ा तमाचा थी। गीता को लगा जैसे कि उसका पूरा अस्तित्व ही मिट्टी में मिल रहा हो। अगली सुबह मोहन की दुकान पूरी तरह बंद हो गई। कर्जदार दरवाजे पर खड़े थे। घर पर भी बिकने की नौबत आ गई थी। सास ने बेरुखी आवाज में कहा, तू अपने मायके चली जा कुलटा। यहां अब तेरा कोई काम नहीं है। हमारे पास तुझे पड़े-पड़े खिलाने के पैसे नहीं है। गीता का घमंड पूरी तरह टूट चुका था। वह बिना कुछ बोले एक छोटी सी गठरी लेकर रोते हुए मायके की तरफ निकल पड़ी। जब गीता अपने मायके पहुंची तो हरिनाथ शर्मा उसे देखकर चौंक गए। बेटा गीता क्या हुआ? तू अकेली क्यों है और तेरी आंखों में आंसू? क्या हुआ मेरी बच्ची?
[13:14]बाबूजी मैं हार गई। उन्होंने मुझे घर से निकाल दिया। उनके लिए मैं एक नौकरानी से ज्यादा कुछ नहीं थी। मैं बेघर हो गई बाबा मैं कहीं की नहीं रही। कोई बात नहीं मेरी बच्ची तू रो मत। तेरा बाप अभी जिंदा है। चल अंदर चल। हरिनाथ गीता को घर के अंदर ले गए, लेकिन गीता लगातार रो रही थी। इसलिए हरिनाथ ने अपनी बड़ी बेटी सीता को फोन किया। हेलो बेटी सीता कैसी है तू? मैं ठीक हूं बाबा आप कैसे हैं आपकी आवाज मुझे ठीक नहीं लग रही बताइए क्या हुआ? बेटी सीता वह गीता को उसके ससुराल वालों ने घर से निकाल दिया है। इस तरह हरिनाथ शर्मा ने पूरी बात बता दी। आप चिंता मत कीजिए बाबा मैं घर आती हूं। जब सीता अपने मायके आई तो लगभग रात ढल चुकी थी। वो सीधा गीता के कमरे में गई। गीता दीवार का सहारा लेकर रो रही थी। ओह तो अब हमारी ताड़का इतनी कमजोर हो गई कि हार मानकर रोने लगी। यह सुनकर गीता ने सीता की तरफ देखा। उसकी आंखों में लाचारी और पश्चाताप दोनों झलक रहा था। अचानक गीता उठी और सीता के पैरों में गिर पड़ी। बहन मुझे माफ कर दे। मैंने तेरे साथ बहुत बुरा बर्ताव किया है। शायद भगवान ने मुझे इसी की सजा दी है।
[14:44]मेरे साथ जो भी हुआ वह सब मेरे कर्मों का फल है जो मैं भुगत रही हूं। सीता ने ढांढस बंधाते हुए गीता को उठाया। अरे पागल बहनें माफी नहीं मांगती। एक दूसरे को संभालती है। चल अब रोना बंद कर वरना मार खाएगी बड़ी बहन से। नहीं बहन मुझे समझ आ गया है। पैसा नहीं इंसान बड़ा होता है। यह सुनकर सीता की आंखों से आंसू बह निकले। उसने गीता को गले से लगा लिया। अरे पागल बहनें माफी नहीं मांगती। एक दूसरे को संभालती हैं। चल अब रोना बंद कर वरना मार खाएगी बड़ी बहन से।
[16:12]इस तरह दिन बीतने लगे। गीता ने राम और सीता के साथ काम करके कुछ पैसे इकट्ठे किए और खुद का एक रेस्टोरेंट खोलने का निश्चय किया। राम और सीता ने गीता का साथ दिया और जल्द ही गीता और सीता ने मिलकर पार्टनरशिप में शहर के बीचोंबीच एक रेस्टोरेंट खोल लिया। रेस्टोरेंट बहुत अच्छा चलने लगा और जल्द ही गीता और सीता का नाम स्टार्टअप आइकन गर्ल्स के रूप में मशहूर हो गया। एक दिन मोहन हरिनाथ के घर आया। नमस्ते पिताजी गीता कहां है? अब तुझे गीता से क्या काम है? उसे दिया दुख काफी नहीं था क्या जो तू फिर से चला आया जले पर नमक छिड़कने? ऐसा मत बोलिए पिताजी मुझसे भारी गलती हो गई। मैं गीता को वापस अपने साथ ले जाने आया हूं। मैं इतनी परेशानियों के बीच क्या सही है और क्या गलत समझ ही नहीं पाया। बेटा जो इंसान सही गलत ना समझ पाया इसलिए मेरी बेटी को छोड़ दिया तो उस इंसान के साथ मैं अपनी बेटी को दोबारा कैसे भेज दूं। कि मेरी बेटी को इंसान नहीं कोई सामान समझता हो। ऐसा मत बोलिए पिताजी मुझे अपनी गलती का एहसास है मैं फिर कभी ऐसा नहीं करूंगा। मोहन बोल ही रहा था कि तभी पीछे से सीता और गीता भी वहां आ गई। मोहन तुम यहां क्या कर रहे हो? मैं गीता को अपने साथ वापस ले जाना चाहता हूं। इतना सब करके तुम्हारा मन नहीं भरा कि तुम वापस आ गए। सीता तुम बीच में मत बोलो। मैं गीता से बात कर रहा हूं। तुम हमारे बीच मत आओ। मोहन की बात सुनकर गीता ने तीखे अंदाज में कहा, मिस्टर मोहन तमीज में रहकर बात कीजिए। आप मेरी बहन से बात कर रहे हैं। और मुझे आप यह बताइए आज अचानक आपको मेरी याद कैसे आ गई? क्योंकि मुझे अपनी गलती का एहसास है। मैं तुम्हें वापस अपने साथ ले जाना चाहता हूं। क्या मजाक है? मैं तुम्हारा अफसोस अच्छे से जानती हूं। आज मेरे पास दौलत शोहरत आ गई तो तुम्हें मेरी याद आ गई। तुम सिर्फ लालची इंसान हो मोहन बिन पेंदे के लोटे की तरह जो आज यहां तो कल वहां। अपनी हद में रहो गीता तुम मेरी बेइज्जती कर रही हो। बेइज्जती उसकी की जाती है जिसकी कोई इज्जत हो। आप जैसे लोगों की तो कोई इज्जत नहीं होती। अब चले जाइए यहां से। वरना हमें धक्के देकर बाहर निकालना पड़ेगा। मैं मैं तुम सबको देख लूंगा। हां हां देख लेना अब जा यहां से। इस तरह मोहन आग बबूला होकर वहां से चला जाता है। इसके बाद दोनों बहनों ने बहुत तरक्की की और सीता और राम ने मिलकर गीता के लिए बहुत अच्छा लड़का ढूंढा और गीता की शादी कृष्ण से करवा दी और इस तरह दोनों बहनें खुशी-खुशी रहने लगी।



