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राजा भोज की असली कहानी || The Real History of Raja Bhoj

Divya Katha

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[0:00]क्या वे सिर्फ एक वीर योद्धा थे या एक ऐसे विद्वान जिनके सामने बड़े-बड़े आचार्य भी नतमस्तक हो जाते थे?
[0:00]जब मैं इस कहावत की सच्चाई बताऊंगा तो आप भी चौंक जाएंगे और सबसे बड़ा प्रश्न कि ऐसे वीर योद्धा का आखिर अंत कैसे हुआ?
[0:00]तो मित्रों आज की इस डॉक्यूमेंट्री में हम राजा भोज की पूरी कहानी को जानेंगे। जन्म से मृत्यु तक, षड्यंत्र से साम्राज्य तक, युद्ध से ज्ञान तक और इतिहास से लोककथा तक। तो वीडियो को अंत तक जरूर देखें।
[1:49]तब धर्मदेव ने कहा, महाराज मेरी जानकारी के अनुसार धार नगरी के राजकुमार राजा भोज ही सबसे बड़े धार्मिक राजा हैं। इसके बाद राजा सिद्धराज ने कर्मदेव से पूछा कि आप बताइए कि इस धरती पर सबसे अच्छे कर्म किसके हैं?
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[0:00]इतिहास में कुछ नाम ऐसे हुए हैं जिन्हें समय भी नहीं मिटा सका। यह कहानी है मालवा की उस पवित्र मिट्टी की जहां किलों की दीवारें वीरों के खून से रंगी थी। यह कहानी है उस राजा की जो तलवार उठाता तो बड़े-बड़े दुश्मन कांप जाते और जब उसकी कलम चलती तो बड़े-बड़े विद्वान नतमस्तक हो जाते। हम बात कर रहे हैं परमाणु वंश के महाप्रतापी राजा भोज की। जिनके लिए सिंहासन तक का सफर फूलों से नहीं बल्कि कांटों से सजा था। ऐसे कांटे जो उनके अपने ही परिवार वालों ने बिछाए थे। जब भोज मात्र 11 वर्ष के थे। लेकिन सवाल यह है कि राजा भोज आखिर थे कौन? क्या वे सिर्फ एक वीर योद्धा थे या एक ऐसे विद्वान जिनके सामने बड़े-बड़े आचार्य भी नतमस्तक हो जाते थे? और क्या रहस्य है उस कहावत का जिसने राजा भोज को अमर बना दिया? कहां राजा भोज और कहां गंगूतेली? जब मैं इस कहावत की सच्चाई बताऊंगा तो आप भी चौंक जाएंगे और सबसे बड़ा प्रश्न कि ऐसे वीर योद्धा का आखिर अंत कैसे हुआ? तो मित्रों आज की इस डॉक्यूमेंट्री में हम राजा भोज की पूरी कहानी को जानेंगे। जन्म से मृत्यु तक, षड्यंत्र से साम्राज्य तक, युद्ध से ज्ञान तक और इतिहास से लोककथा तक। तो वीडियो को अंत तक जरूर देखें।

[1:49]10वीं शताब्दी का अंत। मध्य भारत का मालवा क्षेत्र राजनीति, युद्ध और संस्कृति तीनों का केंद्र बन चुका था। परमाणु वंश उस समय मालवा पर शासन कर रहा था, जिसकी राजधानी धार थी। इसी परमाणु वंश में लगभग 980 ईसवी के आसपास एक बालक ने जन्म लिया। जिसका नाम रखा गया भोज जो परमाणु राजा सिंधुराज का पुत्र था और उनकी माता का नाम सावित्री बताया जाता है। उस समय किसी ने नहीं सोचा था कि यही बालक आगे चलकर मालवा ही नहीं, बल्कि पूरे भारत के इतिहास में अमर हो जाएगा। भोज का बचपन एक राजकुमार की तरह प्रारंभ हुआ। जहां शास्त्र और शस्त्र दोनों की शिक्षा दी गई। साथ ही संस्कृत, राजनीति, युद्ध कला और धर्म इन सभी विषयों में बालक भोज असाधारण प्रतिभा दिखा रहे थे। भोज बचपन से ही काफी ज्यादा बुद्धिमान थे और उनका बचपन सुखद बीत रहा था। लेकिन यह सुख ज्यादा दिन नहीं चला। लगभग 991 ईस्वी के आसपास जब भोज केवल 11 वर्ष के थे। तब उनके पिता राजा सिंधुराज की मृत्यु हो गई और मालवा की सत्ता का संतुलन बिगड़ने लगा। गद्दी पर बैठे राजा सिंधुराज के छोटे भाई और भोज के चाचा राजा मुंज और यहीं से इतिहास करवट लेता है। राजा मुंज एक शक्तिशाली, लेकिन महत्वाकांक्षी शासक थे। उनके मन में यह भय जगने लगा कि कल को भोज गद्दी पर बैठ सकता है और इसी डर ने उनके मन में एक घातक विचार को जन्म दिया। भोज को रास्ते से हटाने का विचार। कहा जाता है कि इसके लिए राजा मुंज ने अपने विश्वास पात्र सेनापति वत्सराज को चुना। उसने वत्सराज को आदेश दिया कि वह भोज को जंगल में ले जाए और चुपचाप किसी को पता चले बिना उसे मार दे और ऐसा ही हुआ। वत्सराज भोज को जंगल की ओर ले गया। भोज बुद्धिमान थे और वे समझ गए कि उनके साथ क्या होने वाला है और तभी उन्होंने अपनी जांग से खून निकालकर एक पत्ते पर संस्कृत में एक श्लोक लिखा और वत्सराज को देते हुए कहा कि यह राजा मुंज को दे देना। जब वत्सराज ने वह श्लोक देखा तो वह चकित रह गया और उसने जाकर वह राजा मुंज को दिखाया और यह देखते ही राजा मुंज के होश उड़ गए। आज तक किसी को नहीं पता कि उसमें क्या लिखा था पर माना जाता है कि उस श्लोक को पढ़कर राजा मुंज का हृदय परिवर्तन हो गया। और उसने तुरंत भोज को बुलाकर उसे अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया। लेकिन यह तो बस शुरुआत थी। असली परीक्षा असली युद्ध और असली इतिहास अभी बाकी था। और यहीं से शुरू होती है उस राजा की कहानी जिसने उसे इतिहास के पन्नों में अमर बना दिया। लेकिन उसके असली इतिहास को जानने से पहले हम यह जान लेते हैं कहां राजा भोज और कहां गंगू तेली। इस कहावत के पीछे क्या रहस्य है? लगभग 1010 ईसवी के आसपास भोज को मालवा का राजा बना दिया जाता है। लोक कथाओं के अनुसार राजा भोज एक न्यायप्रिय और दयालु राजा थे। वे प्रजा से अत्यधिक प्रेम करते थे और प्रजा भी उन्हें पूजती थी। राजा भोज रात में भेष बदलकर अपने राज्य में घूमते थे ताकि प्रजा के दुख सुख को जान सकें और एक रात जब वे एक ब्राह्मण पति-पत्नी की झोपड़ी के पास से गुजर रहे थे, तब उन्होंने उन्हें बातें करते सुना। ब्राह्मण अपनी पत्नी से कह रहा था कि अब वह काफी बूढ़ा और कमजोर हो चुका है। अब वह यजमानों के घर जाकर पूजा पाठ नहीं करा सकता। इस पर ब्राह्मणी ने कहा तो फिर स्वामी हमारा घर कैसे चलेगा? हमारा तो कोई पुत्र भी नहीं है। इस पर ब्राह्मण चिंतित हो गए और कहा कि अब राजा भोज ही कुछ कर सकते हैं। अगले दिन वह ब्राह्मण राजा भोज की दरबार में पहुंचा और राजा को प्रणाम करते हुए उन्हें सारी बातें बताएं। राजा यह सब पहले ही जानते थे इसलिए उन्होंने उस ब्राह्मण को 100 सोने के सिक्के दान में दिए ताकि वह अपना जीवन यापन कर सके। इससे ब्राह्मण अत्यधिक खुश था क्योंकि इतने ज्यादा सिक्कों से वह अपना बाकी जीवन खुशहाल बिता सकता था। और अपनी सारी रोजमर्रा की जरूरत पूरी कर सकता था। यह खुशखबरी उसने घर आकर अपनी पत्नी को भी बताई। दोनों काफी खुश थे और रात में सोने से पहले उन सिक्कों को एक बक्से में रख दिया और जब वे सुबह उठे तो देखा कि सिक्के गायब थे। यह देखकर ब्राह्मण चौंक गया। उसने घबराहट में यह बात जाकर राजा भोज को बताई। राजा भोज भी चौक गए पर फिर राजा भोज ने उस ब्राह्मण को फिर से 100 सोने के सिक्के उपहार में दिए। ब्राह्मण फिर से खुशी-खुशी अपने घर को लौट आया और रात में सोने से पहले फिर से उन सिक्कों को उस संदूक में रख दिया और इस बार ताला अच्छे से लगा दिया। फिर रात में अचानक उनके घर राजा भोज आए और उन्होंने ब्राह्मण से कहा ब्राह्मण देवता हमारा राज्य खतरे में है। एक बड़ी विपदा आ पड़ी है इसीलिए आप मुझे वे 100 सिक्के वापस कर दीजिए। अभी हमारे राज्य को इसकी आवश्यकता है। यह बात सुनकर ब्राह्मण ने राजा भोज को वे सिक्के वापस दे दिए और सो गया। जब सुबह उसकी नींद खुली तो वे सिक्के संदूक से गायब थे और जब ब्राह्मण ने बताया कि राजा भोज इन्हें ले गए तब उनकी पत्नी ने कहा कि ऐसा कैसे हो सकता है। हमारे यहां रात में तो कोई नहीं आया। जरूर वह बहरूपिया होगा या आपने कोई बुरा सपना देखा होगा। फिर दुखी ब्राह्मण ने यह सारी बातें जाकर राजा भोज को बताई। तब राजा भोज चौंक गए। उन्होंने कहा कि मेरे जैसा कैसे हो सकता है। जरूर कोई बहरूपिया होगा। इतना कहकर राजा भोज शांत हो गए और उन्होंने ब्राह्मण को फिर से 100 सिक्के दिए। लेकिन इस बार राजा भोज ने तय किया कि वे स्वयं ही देखेंगे कि आखिर ऐसा कैसे हो सकता है। फिर रात में राजा भोज भेष बदलकर उस ब्राह्मण की कुटिया के सामने पहुंचे और तभी उन्होंने देखा कि उन्हीं की तरह दिखने वाला व्यक्ति कुटिया में प्रवेश करता है और ब्राह्मण से उन सिक्कों को मांगता है। यह देखकर राजा क्रोधित हो गए और तुरंत उसके पास जाकर कहा, अरे बहरूपिए तू कौन है और इस बुजुर्ग ब्राह्मण को क्यों परेशान कर रहा है? तब उस राजा जैसे दिखने वाले व्यक्ति ने अपने असली रूप में आकर कहा, राजा मैं भाग्य हूं और भाग्य का लिखा कोई नहीं टाल सकता। इस ब्राह्मण ने अपने जीवन में ऐसे कर्म किए हैं जिसके कारण इसके भाग्य में इन सिक्कों का सुख नहीं लिखा गया है। सबको अपने कर्मों का फल भुगतना पड़ता है। यह सुनकर राजा सोच में पड़ गए फिर करुणा भरे स्वर में कहा, तो महोदय मैं आपसे विनती करता हूं कि इस ब्राह्मण को बख्श दीजिए। इनके भाग्य का फल मैं भुगतने के लिए तैयार हूं। इतना सुनने के बाद भाग्य ने मुस्कुराते हुए कहा, ठीक है राजन जैसी तुम्हारी मर्जी। और इतना कहकर वह वहां से गायब हो गया। इसके कुछ दिनों बाद राजा भोज एक दिन अपने सैनिकों के साथ एक वन से गुजर रहे थे। तभी उनका घोड़ा बेकाबू होकर भागने लगा। वह घोड़ा भागते-भागते राजा को इतनी दूर ले आया कि उसकी सेना बहुत पीछे छूट गई और फिर वह घोड़ा एक खाई की ओर भाग चला और खाई के पास पहुंचकर जोर से रुका जिससे राजा घोड़े से उछलकर ऊंची खाई से गिर गए। राजा काफी ज्यादा घायल हो गए। उनकी हालत गंभीर थी। तभी वहां एक आदमी आया जिसका नाम था गंगू तेली। तो आखिर गंगू तेली ने राजा के साथ क्या किया और क्या हुआ जब राजा बन गए नौकर तो चलिए अब जानते हैं आगे की कहानी। लेकिन उससे पहले अगर आपको वीडियो अच्छी लग रही है तो इसे एक लाइक जरूर करें। गंगू तेली ने जब घायल व्यक्ति को देखा तब वह नहीं जानता था कि वह कौन था। राजा भोज बेहोशी की हालत में थे। गंगू तेली ने उन्हें अपने बैलगाड़ी में सुलाया और अपने घर ले आया। गंगू तेली ने राजा भोज की दिन रात सेवा की और उनकी मल्हम पट्टी भी की जिसके बाद कुछ ही दिनों में राजा भोज ठीक हो गए और जब उन्हें होश आया तो वे समझ नहीं पाए कि वे कहां है। उन्होंने अपने सामने जीवनदाता को देखा पर राजा नहीं जानते थे कि वे किस राज्य में हैं। इसीलिए उन्हें लगा कि यह दुश्मनों का राज्य हो सकता है। इसीलिए उन्होंने गंगू तेली से कुछ नहीं कहा। गंगू तेली ने राजा को एक आम और लाचार आदमी समझकर अपने यहां काम पर रखने का सोचा और उसने राजा को कोल्हू पेने का काम दिया। राजा ने यह काम खुशी-खुशी स्वीकार किया और हर दिन राजा कोल्हू के बैल की तरह कोल्हू पेते और तेल निकालते। एक दिन राजा कोल्हू पेते-पेते कुछ गाने लगे जिससे सुन आसपास के लोग मंत्र मुग्ध हो गए। उन्हें राजा का संगीत काफी पसंद आया। राजा काफी अच्छा गाना गाते थे जिससे गंगू तेली का तेल भी ज्यादा बिकने लगा। राजा भोज अपने जीवनदाता का कर्ज चुकाना चाहते थे। इसलिए पूरी तरह ठीक होने पर भी चुप रहे और अपनी असलियत नहीं बताई। उस समय उस देश के राजा राजा सिद्धराज भी संगीत के बहुत बड़े प्रेमी थे। और उनसे भी बड़ी संगीत की प्रेमी थी, उनकी पुत्री यानी उस राज्य की राजकुमारी। एक दिन उस राज्य में संगीत का एक विशाल आयोजन रखा गया, जिसमें कई बड़े-बड़े संगीतकार आए और सबसे अच्छे संगीतकार को इनाम भी दिया जाना था। यह बात जब गंगू तेली को पता चली तो उसने अपने दास यानी राजा भोज को अच्छे कपड़े दिए और उन्हें भी संगीत में भाग लेने को कहा। दोनों महल पहुंचे और जब राजा भोज की बारी आई तो उन्होंने ऐसा संगीत सुनाया कि पूरी सभा चकित रह गई। इतना मधुर कि वहां बैठे बड़े-बड़े गायक तक नतमस्तक हो गए। उनके संगीत से राजकुमारी अत्यधिक प्रसन्न हुई और अपने पिता से उससे विवाह करने की मांग की। यह सुनकर राजा सिद्धराज चौंक गए और मना करते हुए कहा कि चाहे वह संगीत में कितना भी कुशल हो, पर है तो एक दास ही। तुम्हारा वर सबसे श्रेष्ठ होगा। तब राजकुमारी ने कहा, पिता श्री यह मुझे कोई साधारण व्यक्ति नहीं लगते। आप चाहे तो इनकी परीक्षा लेकर देख लीजिए। तब राजा सिद्धराज सोच में पड़ गए पर उनकी सभा में विद्वानों की कमी नहीं थी। उस समय सभा में चार विद्वान मौजूद थे। धर्मदेव, कर्मदेव, तपदेव और पुण्यदेव। राजा इन सभी से एक-एक कर प्रश्न करते हैं ताकि वे जान सकें कि इस आर्यावर्त में कौन सा राजा सबसे सर्वश्रेष्ठ है जो उनकी पुत्री से विवाह कर सके। राजा सिद्धराज ने सबसे पहले धर्मदेव से पूछा। धर्मदेव बताओ कि इस आर्यावर्त में सबसे धार्मिक राजा कौन है? तब धर्मदेव ने कहा, महाराज मेरी जानकारी के अनुसार धार नगरी के राजकुमार राजा भोज ही सबसे बड़े धार्मिक राजा हैं। इसके बाद राजा सिद्धराज ने कर्मदेव से पूछा कि आप बताइए कि इस धरती पर सबसे अच्छे कर्म किसके हैं? तब कर्मदेव ने भी राजा भोज का नाम लिया और इसी तरह राजा सिद्धराज ने तपदेव और पुण्यदेव से भी प्रश्न किया और उनके उत्तर में भी एक ही नाम था। राजा भोज। यह सब सुनकर राजा ने भरी सभा में कहा कि मेरी पुत्री का वर्ष सिर्फ राजा भोज हो सकता है। यह सब सुनकर राजा भोज कुछ पल शांत हो गए और विनम्रता पूर्वक कहा, महाराज मैं ही राजा भोज हूं। यह सुन सब चौंक गए और राजा क्रोधित हो गए और बोले यह कैसी गुस्ताखी है। एक आम कलाकार होकर अपने आप को इतना बड़ा राजा बता रहे हो। किसी के चरित्र पर इस प्रकार की टिप्पणी तुम्हें शोभा नहीं देती और अगर तुम राजा भोज हो तो यहां कैसे आए? तब भोज ने कहा, महाराज सबसे बड़ी चीज होती है भाग्य और भाग्य का लिखा कोई नहीं बदल सकता। भाग्य गरीब को भी अमीर बना सकता है और राजा को पल भर में नौकर और मैं भी उसी भाग्य का शिकार हूं। यह मेरे भाग्य का ही फल है कि आज मैं यहां गंगू तेली के नौकर के रूप में खड़ा हूं। यह सुन राजा सोच में पड़ गए और थोड़ी जांच पड़ताल के बाद पता चला कि यही राजा भोज हैं। यह सुनकर गंगू तेली भी चोंक गया। इसके बाद राजा सिद्धराज ने अपनी पुत्री का विवाह राजा भोज से करा दिया और फिर जब पूरे राज्य को यह बात चली कि गंगू तेली ने अनजाने में एक राजा को अपना दास बना लिया था तब सब गंगू तेली को मजाक में कहने लगे। कहां राजा भोज और कहां गंगू तेली? पर मित्रों हमारी कहानी यहीं समाप्त नहीं होती। अभी जो मैंने आपको कहानी बताई यह कहानी हमें ज्यादातर लोक कथाओं और परंपराओं में मिलती है जो राजा भोज और गंगू तेली के प्रसंग को एक कहानी रूप में दर्शाती है पर इतिहास और सच्चाई इससे काफी अलग है। राजा भोज का असली इतिहास इससे भी कहीं ज्यादा चौंकाने वाला है। और अब यहीं से शुरू होती है उस राजा की असली यात्रा जिसने युद्ध भूमि को दुश्मनों के लहू से लाल कर दिया। उस राजपूत राजा की कहानी जिसके ज्ञान के सामने बड़े-बड़े विद्वान नतमस्तक हो जाते थे और उस राजा की कहानी जिसके अंत ने सबको हैरान कर दिया और सबसे बड़ी बात कहां राजा भोज और कहां गंगू तेली इस कहावत की असली सच्चाई। क्योंकि अभी हमने जो जाना वह लोक कथाओं और सदियों से चली आ रही कहानियों में मिलता है। लेकिन इसकी असली सच्चाई कुछ और ही है तो चलिए अब जानते हैं परमाणु वंश के महान राजपूत राजा भोज का असली इतिहास।

[19:34]11वीं शताब्दी का भारत विशेषकर मालवा राजा भोज के शासनकाल में केवल सैन्य शक्ति का केंद्र नहीं रहा बल्कि ज्ञान साहित्य विज्ञान और स्थापत्य का भी प्रमुख केंद्र बन गया। माना जाता है कि राजा भोज के नाम से कई दर्जन ग्रंथ जुड़े हुए हैं। परंपरागत रूप से उन्हें लगभग 84 ग्रंथों का रचयिता या संरक्षक माना जाता है। इन ग्रंथों में राजनीति, राज्यशास्त्र, काव्य, व्याकरण, वास्तुशास्त्र और आयुर्वेद जैसे विषय शामिल थे। इनमें सबसे प्रसिद्ध है समरांगण सूत्रधार जिसे भारतीय वास्तु और स्थापत्य का एक अत्यंत महत्वपूर्ण ग्रंथ माना जाता है। इस ग्रंथ में मंदिर निर्माण, नगर नियोजन, मूर्तिशिल्प और यहां तक कि यांत्रिक उपकरणों का भी वर्णन मिलता है। इसी तरह युक्ति कल्प तरु जैसे ग्रंथों में प्रशासन, नीति और व्यवहारिक बुद्धि पर गहन विचार दिखाई देते हैं। यह स्पष्ट करता है कि राजा भोज केवल ग्रंथों के संरक्षक नहीं थे, बल्कि स्वयं एक गहन चिंतक और विद्वान थे। ज्ञान के साथ-साथ राजा भोज ने अपने विचारों को धरातल पर भी उतारा। इसका सबसे भव्य उदाहरण है भोजपुर का शिव मंदिर जो आज मध्य प्रदेश के भोजपुर क्षेत्र में स्थित है। यह मंदिर अधूरा होने के बावजूद अपनी विशालता और स्थापत्य के कारण आज भी लोगों को चकित करता है। यहां स्थापित किया जाने वाला शिवलिंग इतना विशाल था कि उसे अक्सर पूर्व का सोमनाथ कहा जाता है। इतिहासकार मानते हैं कि किसी कारणवश संभवतः राजनीतिक अस्थिरता या प्राकृतिक आपदा इस मंदिर का निर्माण पूर्ण नहीं हो सका। लेकिन फिर भी यह राजा भोज की स्थापत्य महत्वाकांक्षा का सजीव प्रमाण है। राजा भोज की इंजीनियरिंग दृष्टि केवल मंदिरों तक सीमित नहीं थी। उन्होंने जल प्रबंधन के क्षेत्र में भी असाधारण कार्य किया। भोपाल के पास स्थित भोजताल जिसे आज अपर लेख या भोपाल झील कहा जाता है, को परंपरागत रूप से राजा भोज से जोड़ा जाता है। यह अपने समय की सबसे बड़ी कृत्रिम झीलों में से एक मानी जाती है। इतनी विशाल झील का निर्माण उस युग में करना जब आधुनिक तकनीक उपलब्ध नहीं थी। राजा भोज की वैज्ञानिक समझ और प्रशासनिक क्षमता को दर्शाता है। यह झील ना केवल जल संरक्षण का साधन थी, बल्कि आसपास के क्षेत्रों की समृद्धि का आधार भी बनी। राजा भोज का ज्ञान अपार था। इसलिए जब उनकी मृत्यु हुई तो कहा गया कि सरस्वती स्वयं शोक में डूब गई क्योंकि उनका सबसे बड़ा संरक्षक चला गया था। लेकिन राजा भोज की कहानी अभी पूरी नहीं हुई थी क्योंकि उनके नाम से जुड़ी एक कहावत ने इतिहास को एक अलग ही मोड़ दे दिया। राजा भोज से जुड़ी सबसे प्रसिद्ध पंक्ति अगर कोई है तो वह यही है। कहां राजा भोज, कहां गंगू तेली। आज यह कहावत आम बोलचाल में किसी महान व्यक्ति की तुलना एक साधारण या तुच्छ व्यक्ति से करने के लिए इस्तेमाल की जाती है पर इतिहास की गहराई में उतरने पर पता चलता है कि इस कहावत का मूल रूप कुछ और ही था। कई विद्वानों के अनुसार इसका असली वाक्य था। कहां राजा भोज, कहां गांगेय तैलांग। समय के साथ यह पंक्ति विकृत होती चली गई और धीरे-धीरे गांगेय तैलांग का रूप बदलकर गंगू तेली बन गया। दरअसल यहां गांगेय और तैलांग कोई साधारण शब्द नहीं थे। गांगेय का संकेत था चेदी वंश के महान राजा गांगेय देव की ओर जो 11वीं शताब्दी में मध्य भारत के एक शक्तिशाली शासक थे। वहीं तेलंग शब्द का संबंध था चालुक्य वंश के राजा जय सिंह तैलांग से जो दक्कन क्षेत्र में प्रभावशाली शासक माने जाते थे। अर्थात यह कहावत किसी तेली या साधारण व्यक्ति की तुलना नहीं कर रही थी बल्कि तीन शक्तिशाली राजाओं की तुलना कर रही थी। राजा भोज, राजा गांगेय देव और राजा जय सिंह तैलांग। इस पंक्ति का भाव यह था कि राजा भोज की महानता इतनी विशाल थी कि उनके सामने उस सदी के दो बड़े राजा भी टिक नहीं पाए। लेकिन समय के साथ जब इतिहास की बारीक समझ आम जनमानस से दूर होती गई तो गांगेय तैलांग जैसे कठिन नाम सरल उच्चारण में बदलते चले गए और धीरे-धीरे गांगेय तैलांग बन गया गंगू तेली। दुर्भाग्यवश इस परिवर्तन के साथ कहावत का मूल अर्थ भी उलट गया और एक महान राजा की तुलना एक तुच्छ छवि से जोड़ दी गई। लेकिन यहां राजा भोज की कहानी समाप्त नहीं होती। उसका आखिरी और अंतिम अध्याय अभी बाकी है। राजा भोज की मृत्यु का अध्याय की आखिर उनकी मृत्यु कैसे हुई तो चलिए अब इसे भी जान लेते हैं। समय चाहे कितना भी शक्तिशाली क्यों ना हो वह हर युग को अपने साथ बहा ले जाता है। 11वी शताब्दी के मध्य तक आते-आते वह मालवा भी एक ऐसे मोड पर खड़ा था जहां शक्ति, राजनीति और थकान तीनों एक साथ टकरा रहे थे। राजा भोज अब युवा योद्धा नहीं रहे थे। वर्षों के युद्ध, प्रशासनिक दबाव और निरंतर संघर्षों ने उनके शरीर और राज्य दोनों पर गहरा प्रभाव डाला था। लेकिन उनकी प्रतिष्ठा अब भी इतनी प्रबल थी कि शत्रु उनसे सीधे टकराने से हिचकिचाते थे। इसी काल में राजा भोज के विरुद्ध एक शक्तिशाली गठबंधन बना। पश्चिम में गुजरात के सोलंकी वंश के राजा भीम प्रथम और पूर्व में छेदी वंश के राजा कर्ण। दोनों ने मिलकर मालवा पर आक्रमण करने की योजना बनाई। यह कोई सामान्य युद्ध नहीं था बल्कि एक रणनीतिक प्रयास था जिसका उद्देश्य राजा भोज की शक्ति को अंतिम रूप से तोड़ देना था। वृद्धावस्था में भी राजा भोज ने इस चुनौती का सामना किया। लेकिन अब परिस्थितियां पहले जैसी अनुकूल नहीं थी। दो दिशाओं से हो रहे आक्रमण ने मालवा की सैन्य क्षमता को गंभीर रूप से कमजोर कर दिया। इतिहासकारों के अनुसार इन संघर्षों के दौरान राजा भोज शारीरिक रूप से भी अस्वस्थ रहने लगे। लगातार युद्ध और बीमारी ने उनके शरीर को तोड़ दिया था और अंततः साल 1055 ईसवी में वह दिन आया जब मालवा का यह महान सम्राट संसार से विदा हो गया। राजा भोज का स्वर्गारोहण केवल एक राजा की मृत्यु नहीं थी, बल्कि एक पूरे युग का अंत था। एक ऐसा युग जिसमें तलवार और विद्या साथ-साथ चली थी। राजा भोज की मृत्यु का प्रभाव केवल राजनीति तक सीमित नहीं रहा। उनके निधन पर विद्वानों, कवियों और आचार्यों में गहरा शोक फैल गया। कहा जाता है कि उस समय यह वाक्य प्रचलित हुआ। आज सरस्वती निराधार हो गई हैं। अर्थात ज्ञान की देवी ने अपना सबसे बड़ा संरक्षक खो दिया। यह कथन इस बात का प्रतीक था कि राजा भोज केवल सत्ता के संरक्षक नहीं थे, बल्कि ज्ञान, संस्कृति और विद्या के भी सबसे बड़े सहायक थे। राजा भोज के बाद मालवा वैसी स्थिरता और वैसा वैभव फिर कभी प्राप्त नहीं कर सका। उनके नाम से जुड़ी इमारतें, ग्रंथ, कहावतें और कथाएं ही शेष रह गई। लेकिन शायद यही किसी महान राजा की असली अमरता होती है कि वह अपने जाने के बाद भी इतिहास में जीवित रहता है।

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