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Proof We Are Living in a Simulation? (My Experiment)

MR. PRAYOGER

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[0:00]Section 1

आपका फोन लिटरली ब्रह्मांड को सिम्युलेट कर सकता है जैसा कि मैंने यहां किया है. पर सवाल यह है मैं कर क्यों रहा हूं क्योंकि कभी-कभी लगता है...

[2:47]Section 2

वाह यह जो कुछ भी हुआ सब बोएसी कारण होता है. चलो एक बार और ट्राई करते हैं इसको यह. वाह यह जो कुछ भी हो रहा है ना सब बोएसी कारण हो रहा है....

[6:47]Section 3

जिस तरह से मनी यह सारे सिमुलेशन को क्रिएट किया किया उसी तरह हमारा पूरा ब्रह्मांड भी किसी के द्वारा बनाया गया सिमुलेशन तो नहीं. तो क्या हम...

[11:32]Section 4

धीरे-धीरे तीखापन बढ़ता जाएगा माउथ में सही.

[11:42]Section 5

तो गाइज यह जो मैं फील कर रहा हूं जो क्वालि है जो मैं एक्सपीरियंस फील कर रहा हूं ना उसको अब दोबारा मतलब यह यह क्या बताए यार बोलने नहीं बन...

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[0:00]पर सवाल यह है मैं कर क्यों रहा हूं क्योंकि कभी-कभी लगता है ना भाई यह दुनिया रियल नहीं है.
[0:00]और जो भी आप एक्सपीरियंस करते हो वह शायद सब फेक है तो इसी चीज को पता करने के लिए मैं अपने फोन में एक वर्चुअल यूनिवर्स बनाऊंगा और यह मीट्स खाऊंगा.
[0:00]यह पता करने के लिए कि क्या यह मीट्स से निकला दर रियल है जिसे हम अपने दिमाग में फील करते हैं और उस वर्चुअल यूनिवर्स सिमुलेशन से यह पड़ताल करेंगे कि क्या यह दुनिया रियल है भी.
[0:00]बट वेट आपका फोन उससे कई गुना ज्यादा पावरफुल है जो नासा ने चांद पर जाने के लिए यूज किया था.
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[0:00]आपका फोन लिटरली ब्रह्मांड को सिम्युलेट कर सकता है जैसा कि मैंने यहां किया है. पर सवाल यह है मैं कर क्यों रहा हूं क्योंकि कभी-कभी लगता है ना भाई यह दुनिया रियल नहीं है. और जो भी आप एक्सपीरियंस करते हो वह शायद सब फेक है तो इसी चीज को पता करने के लिए मैं अपने फोन में एक वर्चुअल यूनिवर्स बनाऊंगा और यह मीट्स खाऊंगा. यह पता करने के लिए कि क्या यह मीट्स से निकला दर रियल है जिसे हम अपने दिमाग में फील करते हैं और उस वर्चुअल यूनिवर्स सिमुलेशन से यह पड़ताल करेंगे कि क्या यह दुनिया रियल है भी. अब देखो यूनिवर्स बनाने के लिए सुपर कंप्यूटर चाहिए. लेकिन मेरे पास तो बस यह डब्बा है. बट वेट आपका फोन उससे कई गुना ज्यादा पावरफुल है जो नासा ने चांद पर जाने के लिए यूज किया था. तो मैंने वैसा ही किया और अपने फोन पर सिमुलेशन क्रिएट करने लगा. अब जो लोग कंफ्यूज्ड हैं कि मैं कर क्या रहा हूं तो जरा आप इन बड़े-बड़े महाशय की बातों को सुनो. the odds that we're in base reality is one in billions. I wish I had a good argument against that hypothesis and I do not. बेसिकली यह कह रहे हैं कि हमारी यह दुनिया शायद किसी के द्वारा सिम्युलेटेड हो और हर वह काम जो आप करते हो वह शायद किसी के द्वारा करवाया जा रहा हो. टू फाइंड आउट मनी यह डिसाइड कर लिया कि मैं एक सिमुलेशन क्रिएट करूंगा और इस सिमुलेशन हाइपोथेसिस की पड़ताल करूंगा जो हमारी इस रियलिटी के बारे में कुछ तो राज उजागर करेगा वह भी बस इस फोन की मदद से. और गाइज आपका फोन भी किसी से कम नहीं आप देख सकते हो इस पर पूरा लिनक्स सिस्टम चल रहा है पूरा कंप्यूटर फुल फ्लेड कंप्यूटर यार. चिंता मत करो यह काम आपका फोन भी कर सकता है. अब इससे पहले कि मैं इसमें सिमुलेशन क्रिएट करूं मुझे यह जानना है कि आपके पास कौन सा फोन है. मैं चाहता हूं कि आप पूरा कमेंट सेक्शन ही इन फोन के कमेंट से भर दो देखते हैं किसके पास कौन सा फोन है. पहली बात कि यूनिवर्स को चलाने के लिए अरबों नियम नहीं चाहिए. फिजिक्स कहती है कि सब कुछ लिटरली सब कुछ बस कुछ प्राइम लॉ से चलता है और उनमें से सबसे बड़ा प्राइम इक्वेशन है न्यूटन का एफ इक्वल्स एमए. आपकी चड्डी भी ना बने अगर एफ इक्वल्स सेमी ना हो हां. यानी अगर मुझे किसी चीज का मास पता है और उस पर लगने वाला फोर्स पता है तो मैं उसका पूरा फ्यूचर प्रिडिक्ट कर सकता हूं. दैट्स इट और यही कारण है कि आप जितना भी कैनिमेटिक्स पढ़ते हो जहां पर कुछ मूवमेंट हो रहा होगा यह हर जगह काम आती है. तो चलो अब सिमुलेशंस को क्रिएट करते हैं तो पहले मैं क्रिएट करूंगा फा लिंग ग्रेविटी का. तो प्लान सिंपल है मैं एक खाली स्पेस लूंगा और उसमें कुछ और छोटे बॉल्स डालूंगा. अभी यह बोरिंग है क्योंकि इनमें जान नहीं है तो चलो इनमें न्यूटन बाबा की आत्मा डालते हैं. मैंने अप्लाई की ग्रेविटी और बूम सब नीचे गिर गए अब असली मजा तो तब आएगा जब यह टकराएंगे. एंड हेयर यू गो यह टकराने लगे. और अगर आप रियल वर्ल्ड में देखो तो असली ऑब्जेक्ट के बीच भी यही होता है यह गिर जाते हैं और टकरा जाते हैं जिसे मैंने कंप्यूटर वर्ल्ड में सिम्युलेट कर डाला. अब की बार मैंने पानी में पत्थर फेंका विच वाज रियली कूल बाय द वे. वाह बट क्या होगा अगर मैं पानी को ही सिम्युलेट कर डालूं मजा आ गया. तो वैसा करने से पहले मैं नदी के गहराई वाले लोकेशन पर चला गया और एक एक्सपेरिमेंट करने लगा वह भी इस फुटबॉल के साथ. तो गाइज चलो अब इस फुटबॉल को पानी के अंदर घुसा देता हूं.

[2:47]वाह यह जो कुछ भी हुआ सब बोएसी कारण होता है. चलो एक बार और ट्राई करते हैं इसको यह. वाह यह जो कुछ भी हो रहा है ना सब बोएसी कारण हो रहा है. तो चलो गाइज अब पानी को सिम्युलेट करते हैं ठीक. अब इसी बोएसी को मैंने अपने फोन में सिम्युलेट किया और फिर जब मैंने बॉल को पानी में गिराया तो इसका बिहेवियर बिल्कुल रियल वाटर के जैसा था और बॉल को मैंने पानी के अंदर भी डाला. बट अगेन यह बाल रियल बाल की ही तरह बोएसी से ऊपर उठ गया ऑसम. अब एक काम करता हूं चलो यह पत्थर है मेरे पास चलो देखते हैं कौन डूबता है ठीक. यह क्या यह तो पत्थर डूब गया यही है बोएसी. यह जो भी हो रहा है सब बोएसी कारण हो रहा है. अब सिर्फ इतना सा क्लू यह नहीं बताता कि हम भी शायद सिमुलेशन में है. बट आगे मैं लिटरली ब्रह्मांड के रियल जलवे को सिम्युलेट करने वाला हूं और मिर्च भी खाने वाला हूं सिर्फ पेन को फील करने के लिए. हम सबको पता है कि हमारी धरती के साथ हम भी सूरज की परिक्रमा करते हैं और यह करवा कौन रहा है ऑफकोर्स ग्रेविटी के कारण. और यही कारण है कि जब आप पत्थर को ऊपर फेंकते हो तो वह गिर जाता है बिकॉज ऑफ अर्थ ग्रेविटी. और सिर्फ इतना ही नहीं लॉ ऑफ ग्रेविटेशन के अनुसार हर मैसिव ऑब्जेक्ट के पास खुद की ग्रेविटी होती है जो कि आसपास की चीज स्पेस को मोड़कर पैदा होती है. थैंक्स टू आइंस्टाइन तो इस बार मैं अपने फोन में ग्रेविटी ही सिम्युलेट करने वाला हूं और इस बिहेवियर को ऑब्जर्व करने वाला हूं. यह मैंने सिम्युलेट की ग्रेविटी एंड बूम लुक एट दिस यह ग्रेविटी भी सेम रियल वर्ल्ड के जैसा ही काम कर रहा है. दोनों ही ऑब्जेक्ट एक इमेजिनरी पॉइंट को ऑर्बिट कर रहे हैं जैसा कि रियल वर्ल्ड में होता है. यह देखो पूरी बात नहीं है कि धरती सूरज का चक्कर काटती है. पूरी बात यह है कि पृथ्वी और सूरज दोनों एक ही पॉइंट का चक्कर काटते हैं जहां पर उनका इमेजिनरी सेंटर ऑफ मास भरा होता है जिसे हम बेरी सेंटर भी बोलते हैं. संक्षेप में यह दोनों एक दूसरे को सेंटर ऑफ मास से बैलेंस कर रहे होते हैं एक दूसरे को ऑर्बिट करके. जैसा कि आप किसी डंडा को उसके सेंटर ऑफ मास को बैलेंस करके पूरे डंडे को गिरने नहीं देते. बिल्कुल ऐसा ही ठीक धरती और सूरज अपने ऑर्बिट में बैलेंस्ड रहते हैं और सौरमंडल के बाकी ग्रह भी. अब इन्हीं के बीच एक और चीज शामिल है जिसे बोला जाता है थ्री बॉडी प्रॉब्लम. अगर बैलेंस्ड सिस्टम के बीच कोई तीसरा ऑब्जेक्ट आ जाए तो पूरा सिस्टम कोलैप्स हो जाता है. जैसा कि आप यहां देख सकते हो कि तीसरे ऑब्जेक्ट के आते ही पूरा सिस्टम कोलैप्स हो गया. लेकिन अजीब बात यह है कि हमारे सोलर सिस्टम में ऐसा देखने को मिलता नहीं इसका कारण यह है कि हमारे सौरमंडल का 99% मास सूरज के पास ही है. और प्लेनेट भी काफी दूर-दूर हैं लेकिन मेरे सिमुलेशन में तो टिक बिहेवियर है ऐसा क्यों. अगर आप चाहो तो मैं केओस थ्योरी के बारे में वीडियो बना सकता हूं बस कमेंट में किसी पॉपुलर फोन का नाम लिख देना और जिस फोन को बहुत ज्यादा वोट मिले मैं उसी फोन में इसके सिमुलेशंस को बनाने की कोशिश करूंगा. एंड नाउ बैक टू द टॉपिक अब इस बार मैं लिटरली ग्रेविटी से गैलेक्सी सिमुलेट करने वाला हूं. बट यह फोन इस सिमुलेशन में लिटरली रो पड़ेगा इसमें सिमुलेशंस थोड़े धीरे चल रहे हैं क्योंकि फोन उतना ज्यादा पावरफुल है नहीं. सैमसंग का सबसे घटिया प्रोसेसर इसमें लगा है जिसको एक्सिनोस भी बोला जाता है अपनी घटिया परफॉर्मेंस के लिए बहुत ज्यादा फेमस है सैमसंग का वह जो एक्सिनोस प्रोसेसर है ना. खत्म इसलिए मैं इसे लैपटॉप में बनाऊंगा. अब कई लोग सोच रहे होंगे कि जब तेरे पास लैपटॉप है तो तू फोन से सिमुलेशन क्यों बना रहा है. तो मेरा भी आपसे एक सवाल है क्यों लोग माउंट एवरेस्ट जाते हैं क्यों लोग मिठाई खाते हैं और क्यों मैं यह मिर्च खाने वाला हूं. आई डोंट नो लेकिन इससे आप समझ गए होंगे कि आपका फोन भी किसी से कम नहीं. आप देख सकते हो इस पर पूरा लिनक्स सिस्टम चल रहा है पूरा कंप्यूटर फुल फ्लेजड कंप्यूटर यार. इफ यू डोंट हैव एनी पीसी यह देखो एंड हां यह लैपटॉप मेरा है ही नहीं बट इससे मदद काफी हो जाती है तो चलो अब गैलेक्सी सिम्युलेट करते हैं. हर एक गैलेक्सी के सेंटर में एक सुपर मैसिव ब्लैक होल होता है जिसको सारे स्टार्स ऑर्बिट करते हैं और मैंने वैसा ही किया. और आप यह जो पूरा का पूरा स्टार क्लस्टर देख रहे हो यही है गैलेक्सी. जानता हूं रियल गैलेक्सी की तरह नहीं दिख रहा बट जस्ट ऑब्जर्व द पैटर्न.

[6:47]जिस तरह से मनी यह सारे सिमुलेशन को क्रिएट किया किया उसी तरह हमारा पूरा ब्रह्मांड भी किसी के द्वारा बनाया गया सिमुलेशन तो नहीं. तो क्या हमारी यह जो दुनिया है वह सिमुलेशन है वेल जितना आसानी से मैंने इस वीडियो को कर दिया ना यह उसे भी कहीं ज्यादा कॉम्प्लिकेटेड है. बताता हूं क्यों देखो पहली बात तो कि इस सिमुलेशन हाइपोथेसिस का भी तक कोई प्रूफ है ही नहीं. ना इसको प्रूफ किया जा सकता है और ना ही डिस प्रूफ किया जा सकता है. और मैंने जो भी सिमुलेशन बनाया था वह बस दिखाती है कि सिमुलेशन पॉसिबल है यह नहीं बताती कि शायद हमारे भी ब्रह्मांड को सिमुलेशन हो. और अगर सही बताऊं ना तो यह जो सिमुलेशन हाइपोथेसिस है यह बहुत ज्यादा कॉम्प्लिकेटेड है और बहुत ज्यादा डिबेटेड टॉपिक भी है. जरा हमारी इस दुनिया को देखो कितना सुंदर दिखता है और अगर हम इस रियलिटी को खोलते जाए तो हम क्वांटम लेवल पर चले जाएंगे. अजीब वियर्डनेस और हम पाएंगे कि ना तो मैं एग्जिस्ट करता हूं ना यह माइक एग्जिस्ट करता है और ना ही आपकी जीएफ. वैसे आपकी होगी भी नहीं यह सारी चीजें इमरजेंस से निकली हुई हैं. यानी कि मैं भी इमरजेंस हूं यह माइक भी इमरजेंस है और आपकी जीएफ भी इमरजेंस का मतलब होता है कि उसे बनाई नहीं जाती. वह बस कुछ बेसिक रूल्स से अपने आप अप अप हो जाती हैं पेटर्न्स या फिर कॉन्फिगरेशन से. और मैंने यह जो सिमुलेशन बनाया था मैंने बोला नहीं था कि इसका फ्यूचर आउटकम क्या होगा. मैंने बस एक रूल सेट किया जो यह है और इस रूल से पूरा का पूरा दृश्य निकल गया. अब जरा सोचो एक बार मेरा फोन तो बहुत ही घटिया परफॉर्मेंस का था और एल्गोरिदम भी उतना एफिशिएंट नहीं था. पर जब आप गेम्स खेलते हो उसमें फिजिक्स के रूल सेट किए जाते हैं. फॉर एग्जांपल यह कार गेम इसमें जो भी कंपटीशन हो रहा है रेंटिंग से लेकर स्पीड, कोलिजन ग्रेविटी एटस सब फिजिक्स के लॉज से इस वीडियो गेम के. यानी कि वीडियो गेम की दुनिया भी रूल्स से चल रही है. क्योंकि हम अपनी रियलिटी पर भी देखते हैं तो अब इमेजिन करो अगर हमारे पास कुछ ऐसा सुपर कंप्यूटर होता है जो खतरनाक पावरफुल है और हम कैसे भी करके इंफिनिटी को डिकोड कर लें. और हम उस पर क्वांटम लेवल पर सिमुलेशन चालू कर दें तो शायद उस पर भी ऐसी फिजिकल दुनिया पॉप अप हो जाए एकदम सुपर हाई रेजोल्यूशन. और शायद वहां भी लाइफ की शुरुआत हो जाए और शायद कॉन्शियसनेस नाम की चीज भी वहां पैदा हो जाए. क्या कंप्यूटेशन से कॉन्शियसनेस लाया जा सकता है वेल आई डोंट नो कॉन्शियसनेस का मतलब होता है कि मैं हूं का एक्सपीरियंस. यानी कि आप लाल रंग को कैसे देखते हो दर्द आपको कैसा महसूस होता है यह दुनिया आपको कैसे दिखती है आपको सारी फीलिंग्स कैसी महसूस होती हैं उन सबका एक्सपीरियंस. और इसे फिलोसोफी में क्वालि या बोला जाता है और यहीं से बात अटक जाती है क्योंकि कंप्यूटेशन से एक एक्सपीरियंस कैसे लाया जाएगा. हम पूरी ब्रेन एक्टिविटी कंप्यूट कर सकते हैं पर यह जरूरी नहीं कि उसमें कॉन्शियसनेस भी आ जाए और शायद उसको भी सब कुछ महसूस होने लगे. इसे ही बोलते हैं हार्ड प्रॉब्लम ऑफ द कॉन्शियसनेस प्रोसेस तो एक्सप्लेन हो जाएगा पर एक्सपीरियंस नहीं. इसलिए हमारी दुनिया सिम्युलेटेड है कि नहीं यह कोई नहीं बता सकता और इस सिमुलेशन हाइपोथेसिस को ना तो प्रूफ किया जा सकता है और ना ही डिस प्रूफ. दैट्स व्हाई इट्स एन हाइपोथेसिस अब मुझे तो मेरे सवाल का जवाब मिला नहीं तो मैंने सोचा क्यों ना मिर्च के दर्द को एक से कॉन्शियस बीइंग एक्सपीरियंस ही करके देखते हैं और मेरे क्वालिया का रिएक्शन और एक्सपीरियंस देखते हैं. तो गाइज अब बारी आ गई है इस मिर्च की यार सही बता रहा हूं देख कर ही बड़ा दर्द हो रहा है बड़ा तीखा लगेगा सही बता रहा हूं. मिर्च मैं खाता नहीं हूं उतना लेकिन आज वीडियो के लिए इसके लिए एक लाइक तो बनता है ठीक. तो चलो इसको फील करते हैं इसके दर्द को कि आखिर वाकई में यह जो मेरा क्वालि है वाकई में इसको मैं कैसे एक्सपीरियंस करता हूं. क्योंकि जिस तरीके से मैं लाल को देखता हूं यह जरूरी नहीं है कि वही लाल आप भी देख रहे होगे. हो सकता है कि जैसा मैं नीला देखता हूं वैसा आप लाल को देख रहे होगे सभी का क्वालि अलग-अलग है. तो चलो मेरे क्वालि से इस मिर्च को मिर्च के दर्द को यानी कि तीखेपन को फील करते हैं ठीक ना एक्सपीरियंस वो तो मैं ही करूंगा. और जो और जैसा मैं एक्सपीरियंस करूंगा ना इस तीखेपन को मैं जैसा एक्सपीरियंस करूंगा वैसा आप दुनिया में कोई भी नहीं करने वाला मतलब जिस तरीके से वह जो फील आएगा वह जो फीलिंग जो एक्सपीरियंस है तीखेपन का वह एक्सपीरियंस किसी के पास भी नहीं है सिवाय मेरे और सब का अलग-अलग एक्सपीरियंस है अपना यही तो सबसे बड़ा प्रॉब्लम है कॉन्शियसनेस का हार्ड प्रॉब्लम ऑफ द कॉन्शियसनेस यानी कि क्वालि. चलो आ गाइज क्या बताऊं तीखा लगने लगा यार. नहीं खाने वाला सबको अरे यार बहुत ही बुरा आईडिया था यार यह मिर्च खाना इस पर लेकिन क्या करें चलो. वैसे लग नहीं रहा अभी और खा गया मैं अभी थोड़ा कम लग रहा है ना अभी कुछ देर बाद और ज्यादा तीखा हो जाएगा.

[11:32]धीरे-धीरे तीखापन बढ़ता जाएगा माउथ में सही.

[11:42]तो गाइज यह जो मैं फील कर रहा हूं जो क्वालि है जो मैं एक्सपीरियंस फील कर रहा हूं ना उसको अब दोबारा मतलब यह यह क्या बताए यार बोलने नहीं बन रहा तीखापन लग रहा है ना थोड़ा. तो यह जो मैं फील कर रहा हूं उसको कोई नहीं फील कर सकता यह जो और जो ब्रेन एक्टिविटी मेरे दिमाग में चल रही होगी ना उसको मैं मेजर कर सकता हूं उसको मैं एक्सप्लेन कर सकता हूं कि सारी चीजें कैसे हो रही है मेरे दिमाग में लेकिन यह जो फील आ रहा है जिसको मैं एक्सपीरियंस कर रहा हूं उसको साइंस के द्वारा नहीं बताया जा सकता उसको नहीं बताया जा सकता सही बता रहा हूं. उसको एक्सप्लेन ही नहीं किया जा सकता वह यह जो एक्सपीरियंस जैसा मैं फील कर रहा हूं उसको एक्सप्लेन ही नहीं किया जा सकता. तो हमारी दुनिया सिमुलेशन है कि नहीं यह मुझे नहीं पता देखो क्यों क्योंकि इसको ही सिम्युलेट करना ये जो क्वालि है जो एक्सपीरियंस है उसको कैसे सिम्युलेट करें कि हमें हमें कंप्यूटर में बताओ ना. उसको हम कैसे सिम्युलेट करेंगे एक कंप्यूटर में हमारे पास इंफाइनाइट पावर वाला भी यदि कंप्यूटर आ जाए तो उसको कैसे मुझे नहीं पता. क्या हम क्वालिया को मैथमेटिकली सिम्युलेट सिम्युलेट कर भी सकते हैं रूल्स के जरिए या फिर नहीं मुझे नहीं पता. हमारी यह जो दुनिया है वाकई बहुत ज्यादा वियर्ड है जो अभी मेरे दिमाग में एक्टिविटी चल रही होगी जो न्यूरल पाथवेज जो जितने भी इलेक्ट्रिकल सिग्नल मेरे दिमाग में चल रहे होंगे उन सबको हम मेजर कर सकते हैं बट जो फीलिंग है यह जो मैं फील कर रहा हूं उसको कोई नहीं कर सकता. तो इस वाले वीडियो के लिए क्लिक करो दूसरे वीडियो में मिलता हूं ठीक.

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