[0:04]एक नारियल का पेड़ था, जिसके पत्ते सुनहरे रंग के थे। उस पर रंग-बिरंगी चिड़िया थी। बहुत खास बात तो यह थी कि इस नारियल के पेड़ पर तीन जादुई नारियल लगे थे। एक नारियल के पानी से किसी को भी ठीक किया जा सकता था। दूसरे से कोई भी इच्छा पूरी की जा सकती थी और तीसरे नारियल में था जहर, जिसको पीने से इंसान मर सकता था। इस नारियल के पेड़ पर रहने वाली सुनहरी चिड़िया को ही इस बात का पता था और किसी को भी नहीं। एक बच्चा जो वहां अपने दोस्तों के साथ खेलने आता था, उसे यह पेड़ बहुत पसंद था। वह खड़े होकर पेड़ से बातें किया करता। पानी डालता और चिड़िया के लिए रोज दाना भी लाता। चिड़िया और बच्चों में दोस्ती हो गई थी। दोनों ढेर सारी बातें किया करते। एक बार बच्चे ने पूछा, “यह पेड़ इतना अलग क्यों है और आप भी इतनी अलग सुनहरी क्यों हो?” “मैं इसी पेड़ पर पैदा हुई हूं और मेरा रंग भी इसके जैसा हो गया है। एक जैसा रंग होने के कारण शिकारी मुझे देख नहीं पाते।” एक दिन बच्चा बहुत उदास था। तब चिड़िया ने उससे पूछा, “क्या बात है दोस्त? क्या हुआ? सब ठीक है ना?” “मेरी मां बहुत बीमार है। उसे आराम करने का भी समय नहीं मिलता। रोज बहुत दूर से पानी लाती है। लकड़ियां लाती है कि खाना बना सके। मैं बहुत छोटा हूं और कोई मदद नहीं कर पाता। दुखी मत हो दोस्त। मैं तुम्हें एक राज की बात बताती हूं। पर वादा करो, तुम किसी और से यह बात नहीं बताओगी। बच्चे ने पक्का वादा किया। तब चिड़िया बोली, “इस पेड़ पर जादुई नारियल है और अगर तुम यहां से एक नारियल जिसमें जहर नहीं है वो ले जाओगे तो तुम्हारी परेशानी हल हो जाएगी।” चिड़िया ने उसे नारियल पाने की तरकीब बताई। बच्चा अगले दिन सुबह-सुबह आया और बिल्कुल वैसा ही किया जैसा कि चिड़िया ने उसे कहा था। नारियल के पेड़ से दो नारियल गिरे। लड़का वो लेकर घर चला गया। लड़के ने मां को पानी वाले नारियल से थोड़ा पानी पिलाया और देखते ही देखते उसकी मां बिल्कुल स्वस्थ हो गई। मां को बहुत आश्चर्य हुआ। उसके बेटे ने गरीबों की मदद की और किसी से कोई पैसा नहीं लिया। वह देखते ही देखते बहुत प्रसिद्ध हो गया था। एक दिन एक वैद्य ने यह बात सुनी तो उसका चमत्कार देखने एक गरीब बीमार बनकर आया। बच्चे ने उन्हें थोड़ा नारियल का पानी दिया और वैद्य में बहुत ताकत आ गई। इस पानी में जरूर कोई जादू है। उसने बच्चे को लालच दिया और कहा, “बच्चे! यह नारियल मुझे दे दो। बच्चे ने मना कर दिया। वैद्य ने जाल बिछाया और बच्चे की मां को कैद कर लिया। बच्चा रोने लगा और तभी उसे दूसरे जादुई नारियल की बात याद आई। उसने जादुई नारियल से अपनी मां का पता पूछा और कहा, “जादुई पेड़! मुझे मेरी मां के पास पहुंचा दो। जादुई नारियल ने एक उड़ने वाली चटाई मंगाई और उस पर बच्चे को बिठा दिया। बच्चा अपनी मां के पास उड़ता हुआ पहुंच गया। वह बहुत हिम्मत से मां को छुड़ाकर ले आया। वैद्य को अपनी हार बर्दाश्त नहीं हुई। उसने जादुई नारियल के रहस्य को जानने के लिए बच्चे का रोज पीछा करना शुरू कर दिया। एक दिन वो उसके पीछे-पीछे सुनहरे नारियल के पेड़ के पास पहुंच गया। अब तो मैं पेड़ पे चढ़ के सारे नारियल तोड़ लूंगा। अगले दिन वो बड़ी सी सीढ़ी लाया। नारियल के पेड़ से जैसे ही उसने सीढ़ी लगाई, उसमें आग लग गई। सीढ़ी जलकर राख हो गई। वैद्य बहुत डर गया। फिर उसने पेड़ से कहा, “जादुई पेड़, मैं एक वैद्य हूं। मुझे नारियल दे दीजिए। नारियल से सबका उपकार करूंगा।” लेकिन पेड़ उसके लालच को समझ गया और फिर दो नारियल गिरे। लेकिन इस बार एक नारियल में जहर था। वैद्य अपने गांव आया और पूरे गांव और आसपास के गांव में खबर फैलाई कि वह किसी भी बीमारी को ठीक कर सकता है। उसके यहां लाइन लग गई। लोगों का तांता लग गया। वैद्य सबसे पैसे लेता। फिर थोड़ा सा पानी पिलाता। गरीब लोग बहुत परेशान हो गए। वैद्य सिर्फ अमीर लोगों को ही देखा करता था। तभी अच्छे नारियल में पानी खत्म हुआ। वैद्य ने सोचा कि दूसरे नारियल में भी वही जादू होगा। पर जैसे ही उसने वह पानी मरीजों को पिलाया, लोग मरने लगे। सब लोगों में बहुत गुस्सा आया। सब ने मिलकर वैद्य को बहुत पीटा और भागकर बच्चे के पास आए। बच्चे ने अपने दूसरे नारियल से प्रार्थना की कि सभी मरे लोगों को जीवित कर दें। सभी लोग उठ बैठे और बच्चे की जय-जयकार होने लगी। जादुई नारियल के पेड़ का एक रहस्य यह भी था कि वो सिर्फ सच्चे मन वालों को सहायता करता था। जो कि सिर्फ एक बच्चे में था। बच्चे ने सभी नारियल वापस पेड़ को दे दिए और खुशहाल होकर अपनी पढ़ाई करने लगा। सच्ची सेवा भावना इंसान को महान बनाती है। एक समय की बात है। चंदनपुर गांव में एक भाई और एक बहन रहते थे। भाई का नाम दिनेश था और बहन का नाम राधा। दिनेश बहुत ही आलसी था। वह कोई काम नहीं करता था। एक दिन राधा बोली, “दिनेश तुम कुछ काम क्यों नहीं करते? जब देखो खेलते रहते हो। मैं और मां कब तक तुम्हें ऐसे ही बोलते रहेंगे? तुम भी तो कुछ समझा करो।” “मेरी मर्जी मैं जो मर्जी करूं। मैं तुमसे छोटा हूं जो मेरा दिल कहेगा मैं वही करूंगा। जब मेरा समय आएगा तब काम कर लूंगा।” तभी दिनेश की मां आई, “दिनेश ऐसे कैसे बात कर रहे हो तुम अपनी बहन से? चलो माफी मांगो। वो तो तुम्हें सही ही कह रही थी। दिनेश को गुस्सा आ गया और वह घर से बाहर चला गया। राधा भी दिनेश को देखने उसके पीछे-पीछे चली गई। तभी राधा बोली, “दिनेश, दिनेश! इतने गुस्से से कहां जा रहे हो?” “मैं जंगल जा रहा हूं लकड़ी काटने। जब देखो तुम सब मुझे ताना मारते रहते हो।” और इस तरह राधा भी दिनेश का पीछा करते-करते जंगल पहुंच गई। लकड़ी काटते समय दिनेश का पैर फिसला और वह गड्ढे में जा गिरा। “राधा! राधा! मुझे बचाओ, मुझे बचाओ मैं गड्ढे में गिर गया हूं।” “दिनेश रुको, मैं गांव जाकर सबकी मदद लेकर आती हूं।” दिनेश उसी गड्ढे में पड़ा रहा। तभी उसे गड्ढे के अंदर कुछ चीज नजर आई। गड्ढे के अंदर ही एक गुफा थी। वहां से वह चीज चमक रही थी। दिनेश बोला, “अरे! गड्ढे में यह गुफा। और इसके अंदर यह क्या चमक रहा है? चलो! जाकर देखता हूं।” दिनेश जैसे ही जाने लगा तभी उसके पास एक परी आई और बोली, “ठहर जाओ बेटे! तुम उस चमकती हुई जगह पर जाना चाहते हो?” “हां। लेकिन आप कौन हो?” “मैं परी हूं और गुफा के अंदर एक सुंदर सा महल है। वहां से ये रोशनी की चमक तुम्हें दिखाई दे रही है। वह महल जादुई है। उस महल में तुम्हें जो चाहिए वह मिल जाएगा।” “परी जी जो भी चाहो मजे से खेलना, खाना-पीना सब कुछ।” “हां मैं उस महल की रखवाली करती हूं।” “परी जी मुझे भी उस जादुई महल में जाना है। मैं कुछ दिन अपने घरवालों से दूर रहकर यहां रहूंगा। मेरे घरवाले तब मुझे समझेंगे। “तुम महल में तो रह सकते हो लेकिन मेरी इजाजत के बिना बाहर जा नहीं सकते।” “हां परी जी, ठीक है।” तभी दिनेश गुफा के अंदर गया और दूसरी तरफ निकल कर उसने बहुत बड़ा विशाल महल देखा। वह बोला, “कितना सुंदर महल है। अब तो मैं मजे से रहूंगा खाऊंगा-पियूंगा।” दिनेश महल के अंदर गया और महल का दरवाजा बंद हो गया। तभी दिनेश महल से बोला, “जादुई महल, चलो मुझे सोना है। एक सुंदर सा पलंग दे दीजिए।” तभी एक सुंदर सा पलंग हाजिर हो गया। दिनेश खुश होकर वहां पर सो गया। उधर राधा अपने भाई को ढूंढने सबको लेकर आई तो वहां कोई गड्ढा नहीं था। सब उसे ढूंढने लग पड़े। आखिर में राधा बोली, “क्या पता, दिनेश गड्ढे से निकलकर चला गया हो?” और सभी वहां से चले गए। दिनेश उस जादुई महल में बहुत खुश था। जब वह खाने को मांगता तो खाना आ जाता। अब वह दिन भर अंदर कूदता खेलता रहता। दिनेश कुछ दिन तक तो खुश था लेकिन फिर उदास रहने लगा। उसे घर की और मां की याद सताने लगी। और एक दिन उसने खुद से कहा, “मुझे सबकी याद आ रही है। मैं इतने दिनों से यहां हूं। सब बड़े परेशान हो रहे होंगे। मुझे जाना चाहिए।” तभी दिनेश महल से बाहर निकलने लगा तो उसे जोर से झटका लगा और वह दूर जाकर गिरा। दिनेश रोते-रोते बोला, “मुझे, मुझे जाना है। मैं यहां नहीं रह सकता। मुझे जाने दो। मुझे जाने दो।” अब तुम यहीं रहोगे। जब परी का आदेश आएगा तभी तुम इस महल से बाहर जा सकते हो। दिनेश जोर-जोर से परी को आवाज देने लगा। तभी परी आ गई और कहने लगी, “क्या हुआ दिनेश?” “परी जी मुझे यहां नहीं रहना। मुझे घर जाना है।” “लेकिन तुम ही तो चाहते थे कि ऐशो आराम से रहो।” “नहीं-नहीं, मुझे बस अपने परिवार के पास जाना है। मैं अब सब काम करूंगा। अपने घरवालों को शिकायत का मौका नहीं दूंगा।” तभी परी ने उसकी बात मानी और जादुई महल से उसे आजाद कर दिया। दिनेश दौड़ते हुए अपने घर पहुंचा। वहां सब आराम से अपना काम कर रहे थे। “अरे दिनेश क्या हुआ? तुम तो अभी-अभी जंगल गए थे ना लकड़ी काटने? मैं भी तुम्हारे साथ ही थी। लेकिन तुम दिखे नहीं तो फिर मैं वापस आ गई।” दिनेश सोचने लगा, “मैं तो काफी दिन से घर से बाहर था। उस जादुई महल में था। लेकिन राधा ऐसा क्यों बोल रही है कि मैं अभी गया था?” तब दिनेश को पता चला कि जब तक वह जादुई महल में था, समय वहीं रुका हुआ था। राधा सब भूल चुकी थी इसीलिए किसी को पता नहीं चला। यह सब जादुई महल का जादू है। जो सिर्फ दिनेश ही जानता है। अगली सुबह जल्दी उठकर दिनेश बाहर लकड़ी काटने चला गया। जब वह लौटा तो मां और राधा उसके पास आए और कहने लगी, “दिनेश तुम तो बड़े मेहनती हो गए हो बेटा। हमें माफ कर दो। हम तुम्हें ऐसे ही डांटते थे। “नहीं मां अब मुझे समझ आ गया है कि काम कितना जरूरी है। अब मैं आराम नहीं करूंगा काम करूंगा।” इस तरह मां और राधा ने दिनेश को गले लगा लिया। मेहनत और परिश्रम ही इंसान की असली पहचान है।

जादुई नारियल और सोनेरी चिड़िया- Hindi Kahaniya | Original Stories | Moral Stories | Fairy Tales
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