Thumbnail for 'भारत भारती' में राष्ट्रीय भावना by CEC

'भारत भारती' में राष्ट्रीय भावना

CEC

27m 11s3,401 words~18 min read
AI audio transcription
Transcript source

AI audio transcription

This transcript was generated from the video's audio because no usable YouTube caption track was available. The transcript below is server-rendered so it can be read, searched, cited, and shared without opening the original YouTube player.

Timestamped outline
[0:26]Section 1

नमस्कार मित्रों, आज हम चर्चा करेंगे मैथिलीशरण गुप्त जी की प्रसिद्ध रचना भारत भारती में उनकी राष्ट्रीय भावना पर। भारत भारती एक ऐसी रचना रह...

[4:39]Section 2

उन पूर्वजों की कीर्ति का वर्णन अतीव अपार है, गाते नहीं उनके हम ही गुण गा रहा संसार है। उनकी यद्यपि सभी रचनाओं में चाहे हम साकेत की बात कर...

[7:01]Section 3

संसार के उपकार हित जब जन्म लेते थे सभी, निश्चेष्ट होकर इस तरह वे बैठ सकते थे कभी? तो यह प्रेरणा भी दे रहे हैं कि वे हमेशा कर्मशील रहे हैं...

[13:35]Section 4

अर्धांगिनियों को भी सु-शिक्षा दी न जब तक जाएगी। अब यहां गुप्त जी ने अर्धांगिनी शब्द का सभी प्राय: प्रयोग किया है। कि जितना अधिकार पुरुषों...

[19:41]Section 5

गुप्त जी ने भारत भारती में अतीत के पूर्वजों का गुणगान एक और किया। वर्तमान की सोचनीय स्थिति, शिक्षा की क्या व्यवस्था है, किस तरह से बीमारी...

Pull quotes
[7:01]संसार के उपकार हित जब जन्म लेते थे सभी, निश्चेष्ट होकर इस तरह वे बैठ सकते थे कभी?
Use this transcript
Related transcript hubs

[0:26]नमस्कार मित्रों, आज हम चर्चा करेंगे मैथिलीशरण गुप्त जी की प्रसिद्ध रचना भारत भारती में उनकी राष्ट्रीय भावना पर। भारत भारती एक ऐसी रचना रही, छोटी सी रचना है, पर राष्ट्रीय भावना से ओतप्रोत रचना है। और इसकी रचना गुप्त जी ने 1911 में शुरू की थी, 1912 में वह पूर्ण हो गई थी और 1914 में पुनः सुधार के साथ वह प्रकाशित हुई। और जैसे ही यह रचना प्रकाशित हुई, सरस्वती में महावीर प्रसाद द्विवेदी जी ने इस रचना की बहुत प्रशंसा की। और यह रचना उस समय जो जैसी स्थिति थी, स्वतंत्रता संग्राम के लिए जैसे आंदोलन चल रहा था, एक लहर चली हुई थी। वहां यह भारत भारती देश के देशवासियों में राष्ट्रभक्ति की भावना को जगाने में बहुत प्रेरक सिद्ध हुई। प्रभात नवयुवक जब स्वतंत्रता के लिए निकलते थे, प्रभात फेरी निकालते थे, तो वे भारत भारती की पंक्तियां गाते हुए निकलते थे। पूरी भारत भारती उनको कंठस्थ थी। विद्यालयों में पाठशालाओं में भारत भारती के गीत प्रार्थना के रूप में गाए जाते थे। तो इस तरह से भारत भारती ने उस समय एक राष्ट्रभक्ति की ऐसी लहर जगाई जो स्वतंत्रता आंदोलन में बड़ी सहायक सिद्ध हुई। और इस भारत भारती को देखते हुए महावीर प्रसाद द्विवेदी जी ने सरस्वती में कहा कि यह काव्य वर्तमान हिंदी साहित्य में युगांतर उत्पन्न करने वाला है। एक नया युग लाने वाला है। एक युग ही बदल जाएगा। वर्तमान और भावी कवियों के लिए यह आदर्श का काम करेगा। यह सोए हुओं को जगाने वाला है, भूले हुओं को ठीक राह पर लाने वाला है, निरुधोगियों को उद्योगशील बनाने वाला है, आत्म-विस्मृतों को पूर्व स्मृति दिलाने वाला है, निरुत्साहियों को उत्साहित करने वाला है। उदासीनों के हृदय में उत्तेजना उत्पन्न करने वाला है। यह स्वदेश पर प्रेम उत्पन्न कर सकता है। तो जो जिनके मन में उत्साह नहीं है, जो देश के प्रति उदासीन हो चुके हैं, जो आलस्य में डूब चुके हैं, और उनमें स्वदेश के प्रति प्रेम भाव जागृत करने वाली यह रचना है। आगे वे चलकर के कहते हैं, इसमें वह संजीवनी शक्ति है जिसकी प्राप्ति हिंदी के और किसी भी काव्य में नहीं हो सकती। तो इस तरह से एक संजीवनी शक्ति के रूप में भारत भारती की वे प्रशंसा करते हैं। और इसी भारत भारती पर ही महात्मा गांधी जी ने मैथिलीशरण गुप्त जी को राष्ट्रकवि कहकर के सम्मानित किया। और भारत भारती में तीन खंड है। पहला खंड है अतीत खंड, दूसरा है वर्तमान खंड और तीसरा है भविष्य खंड। वर्तमान अतीत से अतीत के गौरव से अतीत के स्वर्णिम इतिहास से प्रेरणा प्राप्त करता है। और वर्तमान में इस तरह से प्रयासशील होता है कि भविष्य का एक सुंदर सुखद भविष्य के निर्माण की ओर अग्रसर होता है। तो भारत की श्रेष्ठता, हमारे पूर्वज, हमारी सभ्यता, हमारा इतिहास, वीरता, संस्कृति, शिक्षा, साहित्य, कला-कौशल आदि के वर्णन के माध्यम से जातीय स्मृति पर गर्व।

[4:39]उन पूर्वजों की कीर्ति का वर्णन अतीव अपार है, गाते नहीं उनके हम ही गुण गा रहा संसार है। उनकी यद्यपि सभी रचनाओं में चाहे हम साकेत की बात करें या यशोधरा की बात करें या जय भारत की बात करें। वे अतीत की घटनाएं लेते हैं ऐतिहासिक या पौराणिक कथाओं को लेकर के और उनको समसामयिक समस्याओं के साथ जोड़ते हुए, उनके समाधान के रूप में प्रस्तुत करते हैं। जैसे राम को ईश्वर के रूप में नहीं करते, राम ईश्वरत्व का संदेश नहीं लेकर के आते हैं, उनको एक महामानव के रूप में चित्रित करते हैं। इसी तरह से जो पूर्वजों की कीर्ति रही है, पूर्वज जिस प्रकार से दानशीलता उनकी, उनका बलिदान, पूर्वजों का जो ज्ञान है, वह किस प्रकार से हमारी सभ्यता को, हमारी संस्कृति को विश्व तक पहुंचाने में एक सहायक रहा है या उससे पूर्व हमारे भारत की एक पहचान बनी, एक अस्मिता बनी है। तो उन पूर्वजों की कीर्ति का वर्णन करते हुए भारत भारती में अतीत खंड में गुप्त जी कहते हैं, उन पूर्वजों की कीर्ति का वर्णन अतीव अपार है। गाते नहीं उनके हम ही गुण गा रहा संसार है। कि केवल हम ही अपने पूर्वजों की यश का, उनका गुणगान नहीं करते हैं, अभी तो हमारे जो पूर्वजों का सम्मान है, उनकी जो वीरता है, उनकी जो शिक्षा है, उनके द्वारा जो कला कौशल है, उसके गुणों का गान तो पूरा संसार कर रहा है। पूरा संसार उनकी यश को, उनकी कीर्ति को मानता है। और पूर्वजों ने जिस प्रकार त्याग किया देश के हित के लिए, जिस प्रकार निस्वार्थ भाव से कार्य किया परोपकार की भावना से युक्त होकर और निरंतर कर्मशील रहे। कर्मण्यता ही जिनका मूल कर्तव्य था, तो ऐसे पूर्वजों के त्याग, उनका निस्वार्थ भाव आज भी हमारे लिए प्रेरणा स्रोत है। वे आर्य ही थे जो कभी अपने लिए जीते ना थे। वे स्वार्थरहित हो मोह की मदिरा कभी पीते ना थे।

[7:01]संसार के उपकार हित जब जन्म लेते थे सभी, निश्चेष्ट होकर इस तरह वे बैठ सकते थे कभी? तो यह प्रेरणा भी दे रहे हैं कि वे हमेशा कर्मशील रहे हैं और हमेशा संसार के उपकार के लिए ही उनका जन्म हुआ है। दधीचि ने तो अपनी अस्थियों का भी दान कर दिया। राजा बलि की ने दान उनकी दानवीरता प्रसिद्ध है। शिवि की दानशीलता प्रसिद्ध है। और किस प्रकार निस्वार्थ भाव से वे संस्कृति की सेवा करने में अग्रसर रहे, संसार के उपकार करने में रगे रहे। तो वे पूर्वज हमारे जो गौरव हैं, तो उनको देखते हुए क्या हम आज निश्चेष्ट होकर अकर्मण्य होकर आलस्य में आकर के कभी बैठ सकते हैं? तो हमें उनसे प्रेरणा लेनी है, तो अतीत में भारत जो था वो विश्व गुरु के रूप में उसकी पहचान रही है। हम जो वेद है, प्राचीनतम साहित्य है और केवल भारत का ही नहीं विश्व के प्राचीनतम साहित्य माना जाता है। और ज्ञान की जितनी भी शाखाएं हैं, वे सब सर्वप्रथम भारत में ही विकसित हुई और यही भारत का ज्ञान दे संसार के अन्य देशों में पहुंचा। दूर-दूर से नालंदा तक्षशिला में पढ़ने के लिए आया करते थे, तो ज्ञान का प्रसार हमारे द्वारा किया गया। तो वे भारत जो विश्व गुरु रहा और आज क्या स्थिति हो गई है? अशिक्षित हो रहे हैं। शिक्षा का प्रसार ही नहीं है, अज्ञानता बढ़ रही है। तो विश्व गुरु के रूप में कैसी पहचान रही, इसके लिए वे भारत भारती में कहते हैं, शैशव दशा में देश प्राय: जिस समय सब व्याप्त थे। नि:शेष विषयों में तभी हम प्रौढ़ता को प्राप्त थे। संसार को पहले हमी ने ज्ञान-शिक्षा-दान की आचार की, व्यापार की, व्यवहार की, विज्ञान की। कि संसार के अब अन्य देश तो अभी शैशव अवस्था में थे, उनका तो विकास ही नहीं हुआ था, निशेष विषयों में तभी हम प्रौढ़ता को प्राप्त थे। और उस समय भारत ज्ञान के क्षेत्र में प्रौढ़ता को प्राप्त कर चुका था, सभी विषयों में। संसार को पहले हमी ने ज्ञान-शिक्षा-दान की आचार की, व्यापार की, व्यवहार की, विज्ञान की। तो किसी भी क्षेत्र में देख लीजिए, किसी भी विधा में चाहे वो सदाचार की शिक्षा थी, चाहे व्यापार के बारे में था, हम अर्थशास्त्र सबसे पहले भारत में ही रहा है। व्यवहार की शिक्षा, विज्ञान की शिक्षा, आयुर्वेद हमारा सबसे प्राचीनतम है पर आज हम अपने उस प्राचीनतम ज्ञान को भुलाए हुए हैं, उस शिक्षा को भुलाए हुए हैं। तो आज उसे पुनः स्मरण करने की आवश्यकता है। और शिक्षा की अनिवार्यता कितनी है? बिना शिक्षा के, बिना ज्ञान के कोई भी देश उन्नति प्रगति नहीं कर सकता। किसी भी देश की प्रगति जो है, वह शिक्षा से ही संभव है, इसीलिए वह भारत भारती में कहते हैं, सबसे प्रथम कर्तव्य है, शिक्षा बढ़ाना देश में। शिक्षा बिना ही पड़े रहे हैं आज हम सब क्लेश में। शिक्षा बिना कोई कभी बनता नहीं सत्पात्र है। शिक्षा बिना कल्याण की आशा दुशासन मात्र है। तो गुप्त जी बड़े सजग सचेत साहित्यकार थे। वे देश की अवनति के मूल कारणों की ओर जाते हैं। कि जब तक समाज शिक्षित नहीं होगा, तब तक देश उन्नति नहीं कर सकता। देश की प्रगति तभी संभव है जब यहां के स्त्री पुरुष सभी शिक्षित हो। केवल पुरुषों की शिक्षा की बात नहीं करते हैं, स्त्री को भी शिक्षित होने की वे बात करते हैं। और स्त्रियों की जो सोचनीय पतनशील स्थिति हो चुकी है, वे प्रश्न उठाते हैं कि उसके लिए कौन उत्तरदाई है? वैदिक काल में तो हमारी स्त्रियां सोचनीय स्थिति में नहीं थी। गार्गी रही, मैत्रेई रही, अपाला थी, लोपा मुद्रा थी, आगे चलकर के हम देखते हैं स्वयंबर प्रथा रही है। स्त्री को अपने पति के वरण करने का अधिकार था। पर जैसे-जैसे आक्रमणकारी शक्तियां आती गई, पहले मुगलों, तुर्कों का आक्रमण हुआ, मुगलों का आक्रमण हुआ, फिर ब्रिटिश शासन आया। तो नारियों की स्थिति सोचनीय होती चली गई, पर्दा प्रथा प्रारंभ हो गई। बाल विवाह की प्रथा प्रारंभ हो गई, सती प्रथा प्रारंभ हो गई, वैधव्य जीवन उनका त्रासदी पूर्ण हो गया। तो ऐसी उपेक्षा हमारे समाज में, हमारे देश में इससे पहले तो कभी नहीं रही, तो आज जो ये स्थिति हो रही है, उसके लिए उत्तरदाई कौन है? तो गुप्त जी कहते हैं, ऐसी उपेक्षा नारियों की जब स्वयं हम कर रहे। अपना किया अपराध उनके शीश पर हैं धर रहे। भागे ना क्यों हमसे भला फिर दूर सारी सिद्धियां। पाती स्त्रियां आदर जहां रहती वहीं सब वृद्धियां। यत्र नारियस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता। यह यहां पर भाव स्पष्ट हो रहा है। कि जहां स्त्रियों का सम्मान होता है, जहां उनका आदर होता है, सारी समृद्धि वृद्धि समृद्धि वहीं आती है। और जो देश की वर्तमान सोचनीय स्थिति हो रही है, उसका एक कारण स्त्रियों का अनादर भी रहा है, उनके प्रति उपेक्षा का भाव भी रहा है। और स्त्रियों के लिए शिक्षा को वे अनिवार्य मानते हैं। कि जैसे एक पुरुष को शिक्षा दी जाती है, तो एक पुरुष शिक्षित होता है। पर एक स्त्री को अगर शिक्षा दी जाए, तो केवल वे स्त्री ही शिक्षित नहीं होती, एक परिवार शिक्षित होता है, एक समाज शिक्षित होता है और समाज की शिक्षित से देश शिक्षित बनता है। तो इसलिए स्त्रियों की शिक्षा गुप्त जी अनिवार्य मानते हैं। विद्या हमारी भी न तब तक काम में कुछ आएगी।

[13:35]अर्धांगिनियों को भी सु-शिक्षा दी न जब तक जाएगी। अब यहां गुप्त जी ने अर्धांगिनी शब्द का सभी प्राय: प्रयोग किया है। कि जितना अधिकार पुरुषों का है शिक्षा प्राप्त करने का, उतना अधिकार स्त्रियों का भी है। क्योंकि पुरुष और स्त्री दोनों के संभाव से ही समाज चलता है, देश चलता है। तो केवल पुरुषों को ही शिक्षित ना किया जाए, स्त्रियों के लिए भी शिक्षा उतनी ही अनिवार्य है, क्योंकि वह अर्धांगिनी है। और सब परिवार को शिक्षित करने के लिए स्त्रियों को शिक्षित करना अनिवार्य है। इसी तरह से मित्रों उस समय महात्मा गांधी ने सत्याग्रह आंदोलन किया था। स्वदेशी का प्रचार किया था और विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार की बात करते हैं। और गुप्त जी पर गांधी जी का बहुत अधिक प्रभाव रहा है। और गुप्त जी ही क्या उस समय के जितने भी कवि रहे हैं, वे सब गांधी जी के इन अहिंसा मूलक सत्याग्रह आंदोलन को स्वीकार करते हैं। उसके पक्षधर बनते हैं, विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार की बात करते हैं, स्वावलंबन की बात करते हैं और साथ ही वे देश की आजादी के लिए हिंसा का मार्ग नहीं अपनाने के लिए कहते हैं। भारतेंदु युग में भारतेंदु ने पहले ब्रिटिश शासन की भी प्रशंसा करते हैं। अंग्रेज राज सब सुख साज सजे सब भारी। पर वही जब वह यह देखते हैं कि यहां का कच्चा माल तो सारा विदेशों में जा रहा है और वहां से तैयार माल होकर के फिर भारत में आ रहा है और दुगने तिगुने दामों में बेचा जा रहा है। और यहां के मजदूर बेरोजगार हो रहे हैं। यहां का कल कारखाने बंद हो रहे हैं, उद्योग धंधे बंद हो रहे हैं, अनाज सारा बाहर जा रहा है। तो भारतेंदु भी इसको कहते हैं कि पै धन विदेश चली जात यही अति ख्वारी। अब यह स्थिति का वर्णन गुप्त जी भी करते हैं। वे विदेशी वस्तुओं के जो नवयुवक भाषा को, वेशभूषा को, खानपान को सब विदेशी वस्तुओं की ओर आकर्षित हो रहे थे, उसे अपना रहे थे, तो वह कहते हैं, केवल विदेशी वस्तु ही क्यों अब स्वदेशी है कहां? वह वेशभूषा और भाषा, सब विदेशी है यहां। कि अपनी वेशभूषा को भुला करके और विदेशी वस्त्र धारण करने लग गए, शिक्षा प्रसारित हो रही थी, तो अंग्रेजों ने अंग्रेजी भाषा का यहां पर प्रचार किया। तो वो अंग्रेजी भाषा बोलने के लिए, पढ़ने की ओर नवयुवक प्रेरित होने लगे, विदेशी वस्तुओं को अपनाने के लिए। यहां तक कि माचिस सुई तक विदेश से आने लग गई, जरूरी प्रतिदिन की दैनिक चर्या की जो वस्तुएं थी, वे भी विदेश से आने लगी। तो राजनीतिक क्षेत्र में विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार की जो बात गांधी जी करते हैं, साहित्य के क्षेत्र में यही बात गुप्त जी और माखनलाल चतुर्वेदी, सुभद्रा कुमारी चौहान आदि कवियों द्वारा की गई। और आर्थिक व्यवस्था के पतन का मूल कारण भी यह विदेशी वस्तुओं के प्रचार प्रसार को मानते हैं। और यही गांधी जी ने चरखा की आंदोलन चलाया था, सूत कातने को प्रेरित किया था। और इसीलिए साकेत में गुप्त जी सीता के हाथ में भी खुरपी और सूत और कतली पकड़ाते हैं। तो वो स्वदेशी की भावना का प्रचार प्रसार अपनी रचनाओं के माध्यम से करते हैं, तो भारत भारती में भी वे आर्थिक व्यवस्था के पतन का मूल कारण इन विदेशी वस्तुओं का प्रयोग करना मानते हैं। तो वे कहते हैं, आती विदेशों से यहां सब वस्तुएं व्यवहार की, धन-धान्य जाता है यहां से, यह दशा व्यापार की। कैसे न फैले दीनता, कैसे न हम भूखों मरें, ऐसी दशा में देश की भगवान ही रक्षा करे। कि जब सब कुछ यहां से विदेश में जा रहा है और हम विदेशी वस्तुओं, आज भी देखो मित्रों, यही स्थिति हो रही है। आज भी बहुत राष्ट्रीय कंपनियां आ गई हैं और विदेशी वस्तुओं का ब्रांडेड वस्तुओं का इतना प्रचार-प्रसार हो रहा है और हमारे जो लघु उद्योग धंधे थे, जो हमारे कल कारखाने थे, वह धीरे-धीरे बंद होते जा रहे हैं। कृषि की स्थिति आज भी ऐसी ही है। तो गुप्त जी ने स्वतंत्रता पूर्व इस स्थिति को अनुभव किया। जो देश की स्थिति थी, आजादी के बाद भी आज भी हम विदेशी के आकर्षण के पीछे, विदेशी सभ्यता के पीछे भाग रहे हैं और अपनी संस्कृति को अपनी सभ्यता को छोड़ते जा रहे हैं। इसके साथ ही गुप्त जी ने श्रम को बड़ा महत्व दिया है। और वे कहते हैं कि परिश्रम करके एक अकर्मण्य जीवन जीना, जीने से आलस्यपूर्ण जीवन जीने से कभी भी देश की प्रगति नहीं हो सकती। कार्य करो, श्रम करो, अब तो उठो क्या पड़े रहे हो व्यर्थ सोच विचार में, सुख दूर जीना भी कठिन है श्रम बिना संसार में। तो इस तरह से समाज को कर्म करने की ओर प्रेरित करते हैं, स्वावलंबी बनने के लिए प्रेरणा प्रदान करते हैं। और गुप्त जी राष्ट्र के लिए मंगल कामना करते हैं।

[19:41]गुप्त जी ने भारत भारती में अतीत के पूर्वजों का गुणगान एक और किया। वर्तमान की सोचनीय स्थिति, शिक्षा की क्या व्यवस्था है, किस तरह से बीमारी फैल रही है, किस तरह से नवयुवक अकर्मण्य होता चला जा रहा है। कर्म नहीं, आलसी होता चला जा रहा है, कायरता से भरता चला जा रहा है, अज्ञान का साम्राज्य हो रहा है, विदेशी वस्तुओं का प्रचार बढ़ रहा है। तो केवल यथार्थ का वर्णन करना गुप्त जी का उद्देश्य कभी नहीं रहा। क्योंकि कवि वो कहते हैं, केवल मनोरंजन न कवि का कर्म होना चाहिए, उसमें उचित उपदेश का भी मर्म होना चाहिए। अब जब यह बात कहते हैं, तो वह अपने व्यक्तिगत जीवन पर भी लागू करते हैं कि साहित्य इस रूप में समाज को एक दिशा दे, एक प्रेरणा दे। भारत भारती में वह जब कहते हैं, हम कौन थे, क्या हो गए और क्या होंगे अभी, आओ मिलकर विचारे ये समस्याएं सभी। हम कौन थे, अतीत की बात करते हैं, स्वर्णिम गौरव की बात करते हैं, विश्व गुरु की बात करते हैं। तो अपनी जो संस्कृति, सनातन संस्कृति इतनी गौरवमय थी, हो, क्या हो गए और आज वर्तमान में हमारी स्थिति क्या हो गई है? और क्या होंगे अभी? अगर यही स्थिति रही, तो आगे हमारा भविष्य क्या रहेगा? आगे चलकर के हमारी स्थिति क्या होगी? तो ये आज विचार करने की आवश्यकता है। आज ये सोचने की आवश्यकता है और भविष्य खंड में भारत भारती के भविष्य खंड में वह राष्ट्र मंगल की कामना करते हैं। एक उज्जवल भविष्य की कामना करते हैं कि भारत अपने अतीत से प्रेरणा लेता हुआ अपने वर्तमान में सुधार करें। स्वावलंबी बने और प्रत्येक क्षेत्र में शिक्षित सुसभ्य होकर एक शिष्ट समाज का निर्माण हो। एक सुंदर स्वस्थ राष्ट्र का निर्माण हो, तो वह कहते हैं, सुख और दुख में एक साथ एक सब, एक साथ सब भाइयों का भाग हो। अंताकरण में गूंजता राष्ट्रीयता का राग हो। तो वे समाज के सभी प्राणियों के हृदय में राष्ट्रीयता का गीत जगाना चाहते हैं, राष्ट्रीयता की भावना जगाना चाहते हैं। विश्व बंधुत्व की बात करते हैं, मानवतावादी भावना की बात करते हैं। और कवि गुप्त जी जो है, वे निराशावादी कभी नहीं रहे। चाहे कितनी भी स्थिति गंभीर क्यों ना हो, कितने भी कष्ट क्यों ना सहन करने पड़ रहे हों, भले ही भारत कितना गुलाम रहा, कितने ही विदेशी सत्ता के अनाचार अत्याचार सहन करने पड़े। पर कवि को यह लगता है कि हमारा जो भविष्य है, यह निराशाएं सदा नहीं रहने वाली। यह समय सदा नहीं रहने वाला और यह परिवर्तित होगा, अवश्य परिवर्तित होगा। और कवि का यह जो आशावादी स्वर है, वे भारत भारती में ही नहीं उनकी सभी रचनाओं में गूंजता है। वे कहते हैं, सौ-सौ निराशाएं रहे, विश्वास यह दृढ़मूल है। इस आत्मलीला भूमि को वह विभु न सकता भूल है। अनुकूल अवसर पर दयामय फिर दया दिखलाएंगे। वे दिन यहां फिर आएंगे, फिर आएंगे, फिर आएंगे। अंतिम पंक्ति में जब कवि यह तीन बार कह रहा है, फिर आएंगे, फिर आएंगे, फिर आएंगे। यह उनका दृढ़ विश्वास बोल रहा है। यह उनका आशावादी स्वर है कि भले ही हमारा वर्तमान निराशा से परिपूर्ण है। भले ही आज हम पराधीन है पर सदैव पराधीन नहीं रहने वाले, जिस तरह से हमारे पूर्वजों ने अपने त्याग से, अपनी कर्मण्यता से, सत्य के बल पर, दृढ़ निष्ठा के बल पर एक गौरवमय स्थिति को प्राप्त किया। तो वह स्थान हमें पुनः प्राप्त होगा। यह विश्वास उनकी रचनाओं में उभर कर आता है और वह कहते हैं कि जो दयामय परमात्मा है, ईश्वर है, वे अपनी दया फिर से दिखलाएंगे। भविष्य खंड का प्रारंभ ही उद्बोधन गीत से होता है और यह अंतिम पंक्तियां हैं, अंत में यही कहते हैं कि वो दिन अवश्य लौट कर के आएंगे। तो इस तरह से कवि मैथिलीशरण गुप्त भारत भारती में अतीत के रूप में, वर्तमान के रूप में और भविष्य खंड के रूप में अतीत से प्रेरणा लेते हुए, वर्तमान में कर्मशील होते हुए, भविष्य एक स्वर्णिम भविष्य की कल्पना करते हैं। तो एक सेतु का कार्य करते हैं, उनको जोड़ने का कार्य करते हैं। और यही भारत भारती उस समय ही समाज के लिए एक दिशा बोधक नहीं बनी, एक प्रेरणा का स्रोत नहीं बनी। आज भी भारत भारती की रचना देखिए 1912 में हुई और 2012 पूरे हो गए। और 100 वर्षों के बाद भी आज भी राष्ट्रीयता की भावना जगाने के लिए इस रचना का उतने ही यह रचना प्रासंगिक है। उसी रूप में आज भी प्रभावित है और आज भी समाज को शिक्षित बनाने के लिए राष्ट्रभाषा की बात भारत भारती में जो कहते हैं कि हिंदी ही वह भाषा है जो समर्थ है। जो सभी भाषाओं को जोड़ने वाली है, एक भावात्मक एकता स्थापित करने वाली है। देखिए जब भारत भारती की रचना हुई थी, उस समय हिंदी राष्ट्रभाषा नहीं बनी थी। पर गुप्त जी ने यह तभी सोच लिए, तभी विचार कर लिया था, तभी उनको यह अनुभव हो गया था कि सभी क्षेत्रीय भाषाओं को जोड़ने वाली एक भाषा के रूप में हिंदी में ही वे सामर्थ्य है और यही हिंदी आजादी के बाद जब संविधान बना, तो भारत की राष्ट्रभाषा बनी। यह अलग बात है मित्रों, यह बड़ी हमारी देश की विडंबना है कि हिंदी राष्ट्रभाषा, राजभाषा, संपर्क भाषा होते हुए भी अंग्रेजी की वर्चस्व को तोड़ नहीं पाई है। और उसका प्रभुत्व अभी भी देश पर बना हुआ है, तो गुप्त जी के जो भविष्य की संकल्पनाएं हैं, उनके जो विचार हैं, अगर हम, उनकी जो राष्ट्रीय भावना है, अगर आज हम समाज में इसको स्वीकार करें, आज इसको माने, तो अवश्य ही हमारा राष्ट्र समुन्नत हो सकता है, समृद्ध हो सकता है, प्रगति कर सकता है। इन्हीं विचारों के साथ अब आज की चर्चा हम यहीं समाप्त करते हैं।

Need another transcript?

Paste any YouTube URL to get a clean transcript in seconds.

Get a Transcript