[0:00]सतसंगत अभी जिक्र हो रहा था समर्पण का और अक्सर बात कहते हुए यह कह दिया जाता है कि हमने समर्पण करना है मुझे समर्पण करना है
[0:10]लेकिन सतसंगत अपने आप में यह शब्द ही इतना कमाल है समर्पण की परिभाषा ही यही है जो करना ना पड़े जो सतसंगत एफर्टलेस हो
[0:20]एक वर्ड जो पिछले 15-20 सालों में इंडिया में बहुत पॉपुलर हुआ आज भी सतसंगत सुना जाता है एक वर्ड है ऑर्गेनिक
[0:29]कोई भी चीज सतसंगत आजकल ऑर्गेनिक वेजिटेबल्स ऑर्गेनिक फ्रूट्स और उसका मतलब क्या होता है कि जो सहज में अपने आप विदाउट एनी एक्सटर्नल सरकमस्टेंसस फैक्टर्स विदाउट एनी आर्टिफिशियल केमिकल्स अगर वह ग्रो हो पा रहा है तो उसको हम ऑर्गेनिक कहते हैं
[0:47]और समर्पण का तो अर्थ ही यही है जो सहज हो जो सतसंगत हो जाए और गुरु का इश्क जब होता है तो सतसंगत समर्पण करना नहीं पड़ता समर्पण हो जाता है
[0:58]सतसंगत अक्सर यह बात यह सवाल कि समर्पण है क्या तो किसी शिष्य ने अपने गुरु से पूछा कि समर्पण है क्या
[1:07]तो गुरु ने सतसंगत आगे से कहा कि क्या आपको लगता है कि सतगुरु के गुरु के चरणों में कुछ पुष्प चढ़ा कर के नतमस्तक हो जाना दंडवत प्रणाम कर लेना क्या इसको समर्पण कहते हैं
[1:20]क्या आपको लगता है गुरु की बात को मान लेना इसको समर्पण कहते हैं तो शिष्य भी सोच में पड़ गया कि गुरु की बात को मान लेना क्या इससे भी आगे कोई समर्पण हो सकता है
[1:34]तो फिर सतसंगत गुरु ने यही एक आशीर्वाद दिया यही फरमाया कि जब गुरसिख के मन में गुरु के प्रति गुरु की किसी बात के प्रति कोई संदेह ना रहे उसको समर्पण कहते हैं
[1:47]निसंदेह गुरु की बात जब जीवन में इशारों से ही उतरनी शुरू हो जाए उसको समर्पण कहते हैं
[1:54]और सतसंगत जब एहसान की बात आती है संपूर्ण अवतार वाणी की वह पंक्तियां जो हमने अनेकों अनेक बार सुनी भी दोहराई भी
[2:02]कि एहसान जो कीते पूरे सतगुरु बदला नहीं चुका सकदा कहे अवतार गुरु दा कर्जा जन्म जन्म नहीं ला सकदा
[2:13]गुरु का कर्जा है मुझ पर सतसंगत यह एक भाव है लेकिन इससे भी उत्तम भाव अगर यह जहन में उतर जाए कि यह कर्जा मैं जन्म जन्म नहीं उतार सकता तो सतसंगत वो समर्पण को जन्म देता है
[2:27]समर्पण इसी भाव के साथ जुड़ा होता है क्योंकि फिर वह सहज होता है एफर्टलेस होता है ऑर्गेनिक होता है जो सतसंगत यह भाव बना रहे कि यह कर्जा जन्म जन्म नहीं उतारा जा सकता और ऐसे सजदे भी लगातार गुरु के चरणों में होते रहे
[2:44]सतसंगत एक मुरीद अपने मुर्शद के आगे तो मांगता भी यही है कि तुझे भुलाकर और मैं करूंगा भी क्या
[2:54]तू इकलौता शौक है मेरी जिंदगी का सतसंगत बुलाया जा नहीं सकता यह एक बात है लेकिन सतसंगत बुलाकर के गुरसिख करेगा भी क्या जिनके प्रति
[3:06]समर्पित गुरसिख ने होना है जिनकी बख्शीश से जिनके रहम से जितनी शिक्षाएं यहां सतगुरु बाबा हरदेव सिंह जी महाराज के जीवन से प्रवाहित और प्रसारित की जा रही हैं जिनके रहम से यह जिंदगी में उतरनी है
[3:22]सतसंगत यह कारवां और सतगुरु का यह मिशन
[3:28]तो लगातार ही बढ़ता रहा है बढ़ रहा है और यकीन बढ़ता रहेगा
[3:34]लेकिन सतसंगत मुझे अपने लिए मेरे अपने लिए मुझे यह क्लेरिटी रहे कि मेरा मिशन क्या है
[3:41]सतगुरु के मिशन ने तो बढ़ना ही है मेरा मिशन मेरे लिए सतसंगत इतना क्लियर रहे कि जो गुरु आखे वो कुछ करना सेव गमाना सिखी है जो कुछ देवे वो कुछ खाके शुक्र मनाना सिखी है
[3:57]यह ही सतसंगत मेरा मिशन है यही मेरा समर्पण है और यही सतसंगत सतगुरु के आगे हमेशा गुरसिख अरदास करता है कि सच्चे पातशाह आपका मिशन तो बढ़े मेरा भी यह मिशन जिसमें आप जी बख्शीश करना कि यह हमेशा इसी तरह बरकरार रहे
[4:14]पलपल उते गुरु है राखा जे सिख इसदा ध्यान करे और सतसंगत यह ध्यान गुरसिख को गुरु का जो इनकी अमूलक दात है सौगात है बख्शीशे हैं रहमते हैं कृपाए हैं
[4:29]एहसान है वह हर पल हर क्षण याद रहते हैं और वह किसी सतसंगत सिचुएशन या आउटकम पर भी बेस्ड नहीं होते कि ऐसा हो जाए तो ध्यान हो क्योंकि सतसंगत इश्क है तो फिर ध्यान है
[4:42]सतसंगत इस कुल कायनात में
[4:47]कोई भी शब्द ऐसा नहीं बना कोई भी वोकैबुलरी ऐसी नहीं बनी जो सतगुरु की रहमतों को
[4:52]पूर्णतः बयां कर सके
[4:56]इसलिए सतसंगत आदरणीय पूर्ण प्रकाश साकी जी जो अपने आप में इतने कमाल के लेखक हुए कितनी सेवाएं सच्चे पातशाह ने उनकी कलम से परवान की
[5:06]उन्होंने भी सतसंगत बहुत कुछ लिखने के बाद एक शेर लिखा और वह यह कि कलमों के धनी यह नहीं जानते साकी
[5:16]कलमों के धनी यह नहीं जानते साकी कि तेरी रहमतों का जिक्र तो सजदों में बयां होता है
[5:24]सतगुरु बाबा हरदेव सिंह जी महाराज अक्सर जनाब निदा फाजली साहब का वह एक शेर अपने विचारों में बख्शीश करते हुए फरमाया करते थे कि घर से मस्जिद हो अगर दूर तो चलो यूं कर लें
[5:37]घर से मस्जिद है दूर तो चलो यूं कर ले कि किसी रोते हुए बच्चे को हंसाया जाए
[5:43]और वही बात सतसंगत इस बात का प्रमाण देती है कि सच्चे पातशाह ने किसी आने जाने किसी समय किसी स्थान को सीमित नहीं रखा गुरसिख की भक्ति के लिए इबादत के लिए
[5:57]जो मुझे दे रहे थे वह एक इल्म दे रहे थे कि यह कला दे रहे थे कि यह मुझे समझ में आए कि चलो यूं कर लें ऐसे भी प्यार बांटा जा सकता है चलो यूं कर लें गुरु का दिया हुआ प्यार है किसी को हंसा करके ही बांटा जाए
[6:11]यह सतसंगत इल्म जिस गुरसिख की जिंदगी में आता है फिर यहां वह खड़े होकर के ही नहीं केवल अपनी जिंदगी के हर एक पल में इसी प्यार का इसी इश्क का प्रकटावा करता है



