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Can Humans Ever Leave the Milky Way Galaxy? | The Wormholes Explained | Dhruv Rathee

Dhruv Rathee

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[1:36]कई सारी प्रैक्टिकल प्रॉब्लम्स यहां पर आती हैं वॉर्म होल्स को सच मानने पर। पहला सवाल तो ये कि वॉर्म होल की जो ओपनिंग है वो कैसे बनेगी?
[1:36]हमें यहां पर बहुत-बहुत भारी ग्रेविटेशनल फोर्स की जरूरत है। कहां से आएगा ये ग्रेविटेशनल फोर्स?
[15:24]लेकिन जब एक ब्लैक होल इवैपोरेट करके खत्म हो जाएगा तो उसके अंदर जो इंफॉर्मेशन मौजूद थी उसका क्या होगा?
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[0:04]नमस्कार दोस्तों, हमारे यूनिवर्स के बारे में शायद सबसे कमाल की बात है इसका साइज। कि ये ब्रह्मांड कितना अनइमैजिनेबली बड़ा है। लेकिन यही बात शायद सबसे निराशाजनक भी है। खुद ही सोच कर देखो अगर आज हम अपने पावरफुल टेलीस्कोप्स का इस्तेमाल करके धरती जैसा एक और प्लैनेट ढूंढ भी लेते हैं किसी गैलेक्सी में। जो इंसानों के लिए रहने लायक हो, वहां तक पहुंचने में सदियां लग जाएंगी। इनफैक्ट किसी भी एक इंडिविजुअल इंसान के लिए ये गैलेक्सी छोड़कर जाना इंपॉसिबल है। अब सब जानते हैं कि धरती मिल्की वे गैलेक्सी में है और मिल्की वे के जो सबसे करीब गैलेक्सी है, वो है एंड्रोमेडा गैलेक्सी। अपरोक्सिमेटली 2.5 मिलियन लाइट-इयर्स दूर है धरती से। तो अगर हम एक स्पेसक्राफ्ट का इस्तेमाल करें वहां तक जाने के लिए, यूजुअल स्पीड होती है एक स्पेसक्राफ्ट की 28,000 किलोमीटर प्रति घंटा। इस स्पीड से वहां तक जाने में 94.5 बिलियन इयर्स लग जाएंगे। इतना ही नहीं, अगर किसी तरीके से हम टेक्नोलॉजी बना लेते हैं लाइट की स्पीड पर ट्रैवल करने की तो भी वहां पर पहुंचने में 2.5 मिलियन इयर्स का समय लग जाएगा। ये बात सही मायनों में निराश कर देने वाली है। आखिर क्या तुक बना ये सारे प्लैनेट्स ढूंढने का, जब हम वहां पर कभी ट्रैवल ही नहीं कर पाएंगे? लेकिन अगर एक शॉर्टकट रास्ता हो गैलेक्सी के बाहर तक ट्रैवल करने का। एक ऐसा शॉर्टकट जिसके जरिए हम ये मिलियन लाइट इयर्स का सफर कुछ महीनों में ही तय कर लें। तब ये बातें जरूर दिलचस्प बन जाती हैं। ये शॉर्टकट्स हैं दोस्तों वॉर्महोल्स।

[1:36]साल 2014 की फिल्म इंटरस्टेलर मेरी फेवरेट स्पेस फिल्म, एक बार फिर से मैं यहां इसका मेंशन करना चाहूंगा। इस फिल्म में दिखाया गया है कि कूपर और उनकी टीम जब धरती छोड़कर निकलती है और हैबिटेबल प्लैनेट्स की तलाश में, धरती जैसे ही और प्लैनेट्स की खोज में, तो वो दूसरी गैलेक्सी में ट्रैवल करते हैं। अपनी गैलेक्सी से दूसरी गैलेक्सी में वो पहुंचते हैं एक वॉर्म होल के जरिए, कुछ ही मिनटों के अंदर। ये फिल्म का वो सीन है जब कूपर की टीम वॉर्म होल से गुजरती है। फिल्म के अनुसार इस वॉर्म होल को डिस्कवर किया गया था सैटर्न के ऑर्बिट के पास नासा के द्वारा। इसे फिल्म में कई बार मेंशन किया जाता है क्योंकि आगे चलकर ये फिल्म के प्लॉट में एक बड़ा इंपोर्टेंट रोल निभाता है। लेकिन सबसे दिलचस्प बात ये है कि वॉर्म होल्स का ये कॉन्सेप्ट कोई साइंस फिक्शन नहीं है, बल्कि असल साइंस पर बेस्ड है। क्या होते हैं वॉर्म होल्स एक्ज़ैक्टली और कैसे हम इसका इस्तेमाल कर सकते हैं? ये सब समझने से पहले हमें वापस आना पड़ेगा आइंस्टाइन की थ्योरी ऑफ रिलेटिविटी पर। इसकी बात मैंने ब्लैक होल्स वाले वीडियो में भी करी थी और बेसिक कॉन्सेप्ट भी समझा दिया था उस वीडियो में, अब थोड़ा और डीप चलते हैं इसके अंदर। जब अल्बर्ट आइंस्टाइन ने अपनी थ्योरी ऑफ रिलेटिविटी लिखी तो इसे एक सेट ऑफ इक्वेशन्स में लिखा था। इन इक्वेशन्स के सेट को आइंस्टाइन फील्ड इक्वेशन्स करके पुकारा जाता है। पहली बार इन्हें पब्लिकली रिवील किया गया था 25 नवंबर साल 1915 में जब आइंस्टाइन ने अपना पेपर सबमिट किया था टू द प्रशियन एकेडमी ऑफ साइंसेज बर्लिन जर्मनी में। टोटल में ये फील्ड इक्वेशन्स 10 अलग-अलग इक्वेशन से बनती हैं। 10 नॉन-लीनियर पार्शियल डिफरेंशियल इक्वेशन्स। लेकिन इन्हें शॉर्ट में एक इक्वेशन से भी रिप्रेजेंट किया जा सकता है। और वो एक इक्वेशन कुछ ऐसी दिखती है। कैपिटल जी म्यू न्यू प्लस लैम्डा छोटा जी म्यू न्यू इक्वल्स टू 8 पाई जी डिवाइडेड बाय सी टू द पावर ऑफ फोर और टी म्यू न्यू। चिंता मत कीजिए इस वीडियो में हम मैथमेटिकल डिटेल्स में नहीं जाएंगे। क्योंकि इस एक इक्वेशन के अंदर बहुत-बहुत ज्यादा कॉम्प्लेक्सिटी है। अगर इसे एक्सपैंड करते हुए इस एक इक्वेशन को तो देखो कैसी ये स्टेप्स दिखती हैं। अगर आप मैथ्स से प्यार भी करते हो तो भी आपका सर चकरा जाएगा ये देखकर। मोटे-मोटे तौर पर ये इक्वेशंस हमें बताती हैं कि मैटर और एनर्जी कैसे स्पेस टाइम के कर्वेचर को इन्फ्लुएंस करते हैं। अल्बर्ट आइंस्टाइन ने कहा था इस चीज को विजुअलाइज करने के लिए इमैजिन करो एक बड़ा सा मैश है। इस मैश के ऊपर जब आप ऑब्जेक्ट्स रखते हो, ये वजन से नीचे बेंड डाउन हो जाता है। जो स्पेस-टाइम का मैश है, वो भी कुछ इसी तरीके से बेंड हो जाता है, कर्व हो जाता है बड़े-बड़े प्लैनेट्स और स्टार्स के वजन से। जितना ज्यादा ग्रेविटेशनल फोर्स होगा किसी प्लैनेटरी ऑब्जेक्ट का उतना ही ज्यादा ये स्पेस-टाइम का मैश कर्व हो जाएगा उनके अराउंड। अब इंटरेस्टिंग बात ये है कि अल्बर्ट आइंस्टाइन खुद से अपनी फील्ड इक्वेशन्स को पूरी तरीके से सॉल्व नहीं कर पाए थे। उन्होंने बस एक अपरोक्सिमेट सॉल्यूशन निकाला था अपनी इक्वेशन का एक स्पेसिफिक केस में। पहले इंसान जिन्होंने इन फील्ड इक्वेशन्स को सॉल्व किया था वो थे कार्ल श्वात्शाइल्ड साल 1916 में। इन्होंने एक्ज़ैक्टली कैलकुलेट किया कि ये स्पेस-टाइम का कर्व कितना बेंड होता है, कैसे बेंड होता है एक सिंगल बॉल ऑफ मास के केस में। ये कार्ल श्वात्शाइल्ड का ही सॉल्यूशन था जिसकी मदद से साइंटिस्ट समझ पाए सिंग्युलैरिटी के कॉन्सेप्ट को। क्या होगा अगर ये मास इनफाइनाइटली डेंस बन जाए? स्पेस-टाइम का कर्वेचर इसके अराउंड इतनी टाइटली रैप हो जाएगा कि ये जो रीजन है, ये बाकी यूनिवर्स से पूरा पिंच ऑफ हो जाएगा। इसी की वजह से ही साइंटिस्ट्स ब्लैक होल के कॉन्सेप्ट को थ्योरेटिकली प्रूव कर पाए। और ये चीज आज से 100 साल पहले ही हो गई थी। एक्च्युअली में कई दशकों बाद जाकर साल 2019 में ही पहली बार था कि साइंटिस्ट ने एक ब्लैक होल की फोटो ली हो। तो मोटे-मोटे तौर पर बात मैं ये कहना चाह रहा हूं कि इन फील्ड इक्वेशन्स का एक सॉल्यूशन ब्लैक होल्स निकला था। थ्योरेटिकली हम ब्लैक होल्स की एक्ज़िस्टेंस के बारे में ऑलरेडी जानते थे उनके डिस्कवर होने से करीब 100 साल पहले। और बात ये है दोस्तों कि इन्हीं फील्ड इक्वेशन्स का एक और सॉल्यूशन है वॉर्म होल्स। आप शायद सोचोगे कि एक इक्वेशन को सॉल्व करके ये दो-दो सॉल्यूशंस कैसे निकल रहे हैं? मैं कहूंगा याद करो स्कूल में क्वाड्रेटिक इक्वेशन्स पढ़ी थी। इस सिंपल सी इक्वेशन के भी दो सॉल्यूशंस हैं x=2 और x=3 दोनों फिट बैठते हैं। तो आइंस्टाइन की ये फील्ड इक्वेशन्स देखो तो ये तो कहीं ज्यादा और कॉम्प्लिकेटेड है। इनके एक्च्युअली में ढेर सारे सॉल्यूशंस हो सकते हैं। वॉर्म होल एक सॉल्यूशन है और इसका साइंटिफिक नाम है वॉर्म होल के सॉल्यूशन का, आइंस्टाइन-रोजेन ब्रिज। ये नाम आता है अल्बर्ट आइंस्टाइन और उनके असिस्टेंट नेथन रोजेन से, जिन्होंने साथ में मिलकर इस सॉल्यूशन को निकाला साल 1935 में। तो वॉर्म होल्स को समझना बड़ा आसान है ये बेसिकली एक शॉर्टकट रास्ता है जो स्पेस-टाइम के दो पॉइंट्स को कनेक्ट करता हो। पहले मैं आपको चीजें टू डायमेंशंस में समझाता हूं ताकि आपके लिए समझना आसान हो। इस पेपर को देखिए इस पेपर पर दो पॉइंट्स हैं ए और बी। अगर आपको पॉइंट ए से पॉइंट बी तक जाना है सबसे छोटा रास्ता इस्तेमाल करके, कौन सा रास्ता हो सकता है वो? डायरेक्ट स्ट्रेट लाइन जो ए और बी को कनेक्ट करती हो। है ना? टू डायमेंशंस में इससे छोटा रास्ता और कोई नहीं हो सकता एक्सेप्ट ये जो स्ट्रेट लाइन दोनों पॉइंट्स को कनेक्ट कर रही है। लेकिन अगर हम इस टू डायमेंशनल मैश को थ्री डायमेंशंस में बेंड कर दें तो अचानक से आप देखोगे कि नए रास्ते निकलते हैं। मैंने यहां पर ए और बी को इस तरीके से बेंड कर दिया है कि अब अगर आपको सबसे छोटा रास्ता चूज करना है ए से बी जाने के लिए, तो आप डायरेक्टली ये कुछ मिलीमीटर का जो डिस्टेंस बचा है ए और बी दोनों के बीच में, इस डिस्टेंस को आप यूज कर सकते हैं। और यहां अगर मैं एक रास्ता बना दूं इन दोनों के बीच में, लिटरली एक पेन डालकर, तो एक शॉर्टकट रास्ता निकल गया है ए से बी तक जाने का जो बहुत-बहुत छोटा है ऐज़ कंपेयर्ड टू ये वाला रास्ता। वॉर्म होल्स भी यही काम कर रहे हैं। हमारी थ्री डायमेंशनल दुनिया में हमें लगता है मिल्की वे गैलेक्सी से एंड्रोमेडा गैलेक्सी तक जाने का सबसे छोटा रास्ता है 2.5 मिलियन लाइट इयर्स दूर। लेकिन अगर हमारी थ्री डायमेंशनल स्पेस को फोर्थ डायमेंशन में कर्व किया जाए, बेंड किया जाए, तो हो सकता है इससे भी छोटा एक बड़ा शॉर्टकट रास्ता निकल सके। अब फोर्थ डायमेंशन हमारे लिए इमैजिन करना बहुत मुश्किल है क्योंकि हम सब थ्री डायमेंशंस में रहते हैं। लेकिन कुछ हद तक आप इसे बेहतर समझ सकते हो अगर आप टू डायमेंशंस और थ्री डायमेंशंस को कंपेयर करो तो। इसका एक और एग्जांपल बताता हूं। ये है दुनिया का नक्शा। मान लो अगर आपको दिल्ली से न्यूयॉर्क जाना है एक फ्लाइट लेकर, तो सबसे छोटा रास्ता क्या होगा फ्लाइट का? आप कहोगे दिल्ली से न्यूयॉर्क डायरेक्टली स्ट्रेट लाइन में कनेक्ट करता हुआ फ्लाइट अफ्रीका के ऊपर से होती हुई जाएगी। लेकिन असलियत में ये सबसे छोटा रास्ता नहीं होगा क्योंकि आप टू डायमेंशंस में सोच रहे हैं। सबसे छोटा रास्ता एक्च्युअली में होगा फिनलैंड, स्वीडन के ऊपर से गुजरते हुए आइसलैंड, ग्रीनलैंड के पास से जाते हुए न्यूयॉर्क पहुंचना। जो कि टू डायमेंशंस में देखकर लगता है कि ये क्या लंबा सा रास्ता ले लिया ऊपर से जाने की क्या जरूरत थी। लेकिन थ्री डायमेंशंस में इसे देखोगे तो लगेगा कि ये तो बड़ी ऑब्वियस सी बात है। सबसे छोटा रास्ता तो यही है। और ऐसे ही सबसे छोटे टाइम में सबसे ज्यादा प्रैक्टिकल नॉलेज अगर आपको एआई के बारे में चाहिए तो ये आपको मिलेगी मेरी एआई मास्टरक्लास में। अगर आपने अभी तक जॉइन नहीं किए जल्दी कीजिए आखिरी कुछ स्पॉट्स बचे हैं। ये ढाई घंटे से ज्यादा की मास्टरक्लास है जहां मैं आपको लाइव आकर 20 से ज्यादा एआई टूल्स सिखाऊंगा। जिसमें इमेज जनरेशन, वीडियो जनरेशन, वेबसाइट बनाना, ऑडियो जनरेशन, प्रेजेंटेशन बनाना ढेर सारे अलग-अलग यूज केसेस आपको समझाए जाएंगे एआई के। जिन्हें आप प्रैक्टिकली अपनी जिंदगी में इस्तेमाल कर पाएंगे अपनी प्रोडक्टिविटी अपने काम और अपनी पढ़ाई के लिए। जॉइन करने का लिंक नीचे डिस्क्रिप्शन और पिन कमेंट में मिल जाएगा या फिर आप इस क्यूआर कोड को भी स्कैन कर सकते हैं। और अब टॉपिक पर वापस आते हैं। साल 1957 में साइंटिस्ट जॉन व्हीलर ने एक पेपर पब्लिश किया था आइंस्टाइन रोजेन ब्रिजेस पर और इन्होंने सिमिलर सी एनालॉजी से इसे कंपेयर किया। इन्होंने कहा एक एप्पल है और एक कीड़ा उस एप्पल को खा रहा है एक वॉर्म। वो उस एप्पल की एक साइड से दूसरी साइड पहुंच जाता है बीच से ट्रैवल करके उसे खाते-खाते। इंस्टेड ऑफ कि वो एप्पल के सरफेस पे ट्रैवल करे जैसे हमारे एरोप्लेन्स ट्रैवल करते हैं अर्थ के सरफेस के अराउंड सर्कमफ्रेंस के अराउंड। तो ऐसा करने से ये वॉर्म एक छोटा डिस्टेंस ट्रैवल करेगा इसने एक तरीके से स्पेस-टाइम में शॉर्टकट ले लिया है। और इस टर्म को व्हीलर ने नाम दिया वॉर्म होल और यहीं से ही वॉर्म होल शब्द का ओरिजिन हुआ दोस्तों। वॉर्म होल शब्द को जब आप इंटरनेट पर सर्च करते हो तो ऐसे कई डायग्राम्स देखने को मिलते हैं। मोटे-मोटे तौर पर वही चीज जो मैंने पेपर के साथ करी दो पॉइंट्स को कनेक्ट कर दिया एक होल के थ्रू। यहां इमैजिन किया जा रहा है हमारा स्पेस-टाइम का मैश है, उस पर एक ऑब्जेक्ट है जिसमें बहुत-बहुत ज्यादा ग्रेविटेशनल फोर्स है। इतनी ज्यादा कि उससे ये स्पेस-टाइम का कर्वेचर इतना बेंड हो गया, इतना बेंड हो गया है कि वो दूसरी तरफ से निकलकर आ गया है। ये स्पेस-टाइम का मैश अपने आप में ही फोल्ड हो गया एक के ऊपर। ठीक उसी तरीके से जैसे वो पेपर फोल्ड किया मैंने। और ये वॉर्म होल एक शॉर्टकट तरीका बन गया एक से दूसरी गैलेक्सी में ट्रैवल करने का। लेकिन इन सारी विजुअलाइजेन्स में वही डायमेंशंस की प्रॉब्लम है। टू डायमेंशंस में रिप्रेजेंट करने की कोशिश करी गई है एक वॉर्म होल को। लेकिन जैसा कि मैंने बताया वॉर्म होल थ्री डी टू फोर डी में काम करता है। तो असलियत में अगर कभी वॉर्म होल एक्ज़िस्ट करेगा तो वो दिखने में एक स्फेरिकल बॉल की तरह दिखेगा। एक ये बड़ी इंटरेस्टिंग वेबसाइट है जिसमें आप विजुअलाइज कर सकते हैं कि वॉर्म होल्स एक्च्युअली में कैसे दिखते होंगे अगर इनकी एक्ज़िस्टेंस प्रूव हो जाती है तो। एक बॉल सा फिगर जिसके जैसे आप अंदर जाते रहते हैं, जाते रहते हैं तो चीजें आपको कर्व्ड दिखती हैं अपने अराउंड। और पीछे मुड़कर आप देखेंगे तो धरती भी आपसे दूर हुई जा रही है और सब कुछ एक सर्कुलर सी शेप में दिखेगा आपको। इसलिए दोस्तों इंटरस्टेलर फिल्म में जो वॉर्म होल दिखाया गया है वो एक काफी रियलिस्टिक तरीके से डिपिक्ट किया गया है। यहां एक बात कहनी जरूरी है कि ये वॉर्म होल्स का जो पूरा कॉन्सेप्ट है अभी के लिए ये सिर्फ एक थ्योरेटिकल कॉन्सेप्ट है। इसे आइंस्टाइन की फील्ड इक्वेशन्स के सॉल्यूशन के तौर पर थ्योरेटिकली निकाला गया है। मूवीज में साइंटिस्ट्स के द्वारा इसे विजुअलाइज करने की बहुत कोशिश करी गई है। बहुत सी थ्योरीज इस पर बनाई गई हैं लेकिन प्रैक्टिकली आज तक किसी ने भी कोई वॉर्म होल नहीं देखा है। साइंटिस्ट नहीं जानते कि असली में वॉर्म होल्स एक्ज़िस्ट करते भी हैं या नहीं करते। लेकिन अगर वॉर्म होल्स एक्ज़िस्ट करते हैं तो ये टाइम मशीन का भी काम करेंगे। क्योंकि इमैजिन करके देखो आप कुछ मिनटों में मिलियंस ऑफ लाइट इयर्स दूर पहुंच सकते हो। इसका मतलब आप लाइट से भी पहले वहां पर पहुंच गए हो। लाइट भी नहीं वहां पहुंची तो बेसिकली आप टाइम में भी एक से दूसरी जगह जंप कर गए हो। अब वो अलग बात है कि अगर वॉर्म होल्स एक्ज़िस्ट करते हैं तो क्या इंसान इनके थ्रू ट्रैवल कर भी सकते हैं या नहीं कर सकते? कई सारी प्रैक्टिकल प्रॉब्लम्स यहां पर आती हैं वॉर्म होल्स को सच मानने पर। पहला सवाल तो ये कि वॉर्म होल की जो ओपनिंग है वो कैसे बनेगी? हमें यहां पर बहुत-बहुत भारी ग्रेविटेशनल फोर्स की जरूरत है। कहां से आएगा ये ग्रेविटेशनल फोर्स? अगर आपने मेरे पुराने स्पेस रिलेटेड वीडियोज देखे हैं तो आप गेस कर सकते हैं कि जवाब यहां क्या होने वाला है एक ब्लैक होल। आइंस्टाइन और उनके असिस्टेंट रोजेन ने थ्योराइज किया कि सिर्फ ब्लैक होल्स में ही इतनी ग्रेविटेशनल फोर्स हो सकती है कि वो वॉर्म होल्स की इंटरनल को ओपनअप कर पाए। ब्लैक होल्स की तरफ सब कुछ आकर्षित होता है तो सब कुछ उसकी तरफ अट्रैक्ट होकर इस वॉर्म होल के थ्रू फ्लो करेगा, इस टनल के थ्रू जाएगा। लेकिन अगला सवाल ये उठता है कि इस टनल की दूसरी तरफ क्या होगा? अगर दूसरी तरफ भी ब्लैक होल हुआ तो इस टनल से बाहर निकलने का कोई रास्ता ही नहीं होगा इसके अंदर कंप्लीटली ट्रैप होकर आप रह जाओगे। बेसिकली फिर ये वॉर्म होल कोई टनल नहीं होगी एक से दूसरी तरफ जाने के लिए बल्कि एक ट्रैप करने की जगह होगी। तो कुछ ऐसा होना चाहिए दूसरी तरफ जो ब्लैक होल के ऑपोजिट हो हर सेंस में। कोई ऐसी चीज जो ब्लैक होल जितनी ही पावरफुल हो लेकिन बिल्कुल ऑपोजिट तरीके से काम करे। जो चीजों को अपनी तरफ आकर्षित करने की जगह चीजों को अपने से दूर भेजे ताकि एक एक्ज़िट पॉइंट क्रिएट हो पाए। और यहां पर हमारी कहानी में एंट्री होती है दोस्तों व्हाइट होल्स की। एक बार फिर से व्हाइट होल्स एक ऐसा कॉन्सेप्ट है जिसे प्रूफ किया जा चुका है थ्योरेटिकली आइंस्टाइन की फील्ड इक्वेशन्स के द्वारा। ब्लैक होल्स वॉर्म होल्स के अलावा व्हाइट होल्स एक और सॉल्यूशन है इन फील्ड इक्वेशन्स का। क्या है ये व्हाइट होल्स? जैसे व्हाइट ब्लैक का ऑपोजिट होता है, एक व्हाइट होल ब्लैक होल का हर सेंस में ऑपोजिट होगा। जैसे कि ब्लैक होल में कोई भी लाइट एस्केप नहीं कर सकती एक बार ही उसके अंदर ट्रैप हो जाए तो, व्हाइट होल में दूसरी तरफ कोई भी लाइट एंटर नहीं कर सकती। सिर्फ बाहर ही निकल सकती है। इसका मतलब व्हाइट होल दिखने में बहुत ही एक्सट्रीमली ब्राइट कलर का होगा, व्हाइट कलर का होगा। रशियन थ्योरेटिकल फिज़िसिस्ट और कॉस्मोलॉजिस्ट इगोर नोविकोव पहले इंसान थे जिन्होंने इस व्हाइट होल शब्द का प्रयोग किया साल 1964 में। साइंटिस्ट्स के अनुसार व्हाइट होल बेसिकली ब्लैक होल का टाइम रिवर्सल है। जैसे ब्लैक होल का जो इवेंट होराइजन होता है, वो एक नो रिटर्न का पॉइंट होता है। उसे क्रॉस कर लिया तो उसके बाद कुछ भी एस्केप नहीं कर सकता। ऐसे ही व्हाइट होल का जो इवेंट होराइजन होता है, वो एक बाउंड्री ऑफ नो एडमिशन है। उस पॉइंट के आगे कुछ जा नहीं सकता। जो ऑब्जेक्ट्स व्हाइट होल के अंदर होते हैं, वो बाहर जरूर जा सकते हैं, बाहर की दुनिया से इंटरेक्ट कर सकते हैं। लेकिन अंदर वापस लौट कर कुछ नहीं आ सकता। इवन दो आइंस्टाइन की रिलेटिविटी थ्योरी का ये एक सॉल्यूशन है लेकिन कोई नहीं जानता कि रियलिटी में व्हाइट होल्स फॉर्म कैसे होंगे। ब्लैक होल्स की फॉर्मेशन के बारे में मैंने ब्लैक होल्स वाले वीडियो में एक्सप्लेन किया था जब एक स्टार अपने आप में कोलैप्स कर जाता है। लेकिन इसका उल्टा कुछ हो नहीं सकता। तो ये व्हाइट होल जैसी कोई चीज एक्ज़िस्ट कर भी सकती है या नहीं कर सकती ये चर्चा का मुद्दा है साइंटिस्ट्स के बीच में आज तक। कुछ साइंटिस्ट्स का मानना है कि जब बिग बैंग हुआ था और यूनिवर्स की शुरुआत हुई थी, उस मोमेंट ऑफ क्रिएशन पर सब कुछ एक बहुत ही बड़े व्हाइट होल से निकला होगा। एक दूसरी थ्योरी स्टीफन हॉकिंग के द्वारा दिए गए आइडिया पर बेस्ड है। स्टीफन हॉकिंग ने कहा था कि एक ब्लैक होल इवेंचुअली इवैपोरेट कर जाएगा रेडिएशन जब उससे लीक होती रहेगी, होती रहेगी।

[15:24]लेकिन जब एक ब्लैक होल इवैपोरेट करके खत्म हो जाएगा तो उसके अंदर जो इंफॉर्मेशन मौजूद थी उसका क्या होगा? उसके अंदर जो मैटर मौजूद था उसका क्या होगा? यहां क्वांटम थ्योरी में एक फंडामेंटल लॉ है जो कहता है कि कोई भी इंफॉर्मेशन लॉस्ट नहीं हो सकती इसे नो हाइडिंग थ्योरम कहा जाता है। नो हाइडिंग थ्योरम के अनुसार अगर कोई इंफॉर्मेशन एक सिस्टम से गायब हो जाती है तो वो यूनिवर्स में कहीं ना कहीं और एक्ज़िस्ट जरूर कर रही होगी। तो थ्योरेटिकली अगर एक ब्लैक होल में ये सारा मैटर ये सारी इंफॉर्मेशन अगर सकिन हो रही है, ब्लैक होल के जाने के बाद ये कहीं ना कहीं स्पिट आउट भी हो रही होगी। और ये लाइकली हो रहा होगा एक व्हाइट होल के थ्रू। इसी आर्गुमेंट के बेसिस पर कई साइंटिस्ट्स कहते हैं कि व्हाइट होल तब फॉर्म होता है जब एक ब्लैक होल मर जाता है। लेकिन आज तक हमारे पास कोई सब्सटेंशियल इंफॉर्मेशन नहीं है इस चीज को लेकर कि ब्लैक होल की डेथ कैसे होती है। दूसरी तरफ कुछ साइंटिस्ट्स आर्गु करते हैं कि व्हाइट होल्स जैसी चीज एक्ज़िस्ट करना थ्योरेटिकली इंपॉसिबल है क्योंकि ये सेकंड लॉ ऑफ थर्मोडायनामिक्स को वायलेट करता है। जैसा आपने स्कूल में पढ़ा होगा सेकंड लॉ ऑफ थर्मोडायनामिक्स कहता है कि एंट्रोपी किसी भी सिस्टम में कम नहीं हो सकती। इस पेपर का ही एग्जांपल लेकर देख लो अगर इस पेपर को मैं फाड़ दूं तो इस पेपर को के फटने के बाद जो एंट्रोपी है वो इंक्रीज हो रही है। अब इसे वापस एक्ज़ैक्टली उसी तरीके से जॉइन करना पॉसिबल नहीं है। जिस तरीके से कोई पेपर श्रेंडिंग मशीन पेपर्स को श्रेंड करने का काम करती है जिससे पेपर की एंट्रोपी बढ़ती है। ठीक इसी तरीके से ब्लैक होल्स यूनिवर्स में हर चीज को श्रेंड करने का काम करते हैं। पूरे के पूरे प्लैनेट्स और स्टार्स को ब्लैक होल्स निगल जाते हैं और सिर्फ रेडिएशन बचती है। इससे पूरे यूनिवर्स में एंट्रोपी बढ़ती है। लेकिन अगर इसी चीज को इमैजिन करने की कोशिश करो कि ये रिवर्स में हो रही है, एंट्रोपी कम हो रही है, ये पॉसिबल ही नहीं है। और अगर व्हाइट होल्स एक्ज़िस्ट करते हैं तो एसेंशियली वो यही काम करेंगे। इसलिए इस लॉजिक से वो एक्ज़िस्ट नहीं हो सकते शायद। लेकिन इसके बावजूद भी कुछ साइंटिस्ट्स का मानना है कि ना सिर्फ व्हाइट होल्स एक्ज़िस्ट करते हैं, बल्कि साल 2006 में साइंटिस्ट्स ने व्हाइट होल्स का एक दृश्य देखा। 14 जून साल 2006 की बात है। एक स्पेस सैटेलाइट जिसका नाम है नील गेहरेल्स स्विफ्ट ऑब्ज़र्वेटरी। इसने एक एस्ट्रोनॉमिकल इवेंट को कैप्चर किया। साइंटिस्ट ने देखा कि एक व्हाइट लाइट का एक एक्सप्लोजन सा हुआ है और ये अचानक से फिर गायब हो गया। इस इवेंट को नाम दिया गया जीआरबी 060614। ये एक गामा रे बर्स्ट था। गामा रे बर्स्ट बेसिकली बहुत-बहुत ज्यादा एनर्जेटिक एक्सप्लोजन्स होते हैं जो दूर की गैलेक्सीज़ में ऑब्ज़र्व किए जाते हैं। यूज़ुअली ये इवेंट्स तब होते हैं जब कोई ब्लैक होल एक बड़े से स्टार को निगल जाता है। लाइट के बड़े ब्राइट एक्सप्लोजन्स देखने को मिलते हैं। लेकिन इस केस में कोई स्टार के होने का एविडेंस नहीं पाया गया। तो ये हाइपोथेसाइज किया गया कि ये एक व्हाइट होल की ऑब्ज़र्वेशन थी। उसके बाद से लेकर अब तक कोई ऐसे इवेंट्स दोबारा देखने को हमें नहीं मिले हैं। और इसलिए अभी तक व्हाइट होल्स सिर्फ एक थ्योरेटिकल चीज है। लेकिन बात यहां ये नोट करने वाली है कि ब्लैक होल्स भी एक समय पर थ्योरेटिकल चीज हुआ करते थे लेकिन फिर एक दिन उन्हें प्रैक्टिकली प्रूव कर दिया गया। तो हो सकता है आने वाले टाइम में व्हाइट होल्स के साथ भी ऐसा ही हो। सेम चीज वॉर्म होल्स के बारे में भी कही जा सकती है दोस्तों। हो सकता है आने वाले टाइम में उन्हें साबित किया जा सके। लेकिन अगर इनकी एक्ज़िस्टेंस को साबित कर भी दिया जाए तो साइंटिस्ट्स इस बात पर भी बड़ा डाउट करते हैं कि इंसान एक्च्युअली में उनके थ्रू ट्रैवल कर पाएंगे या नहीं कर पाएंगे। वॉर्म होल्स की एक्ज़िस्टेंस को लेकर सबसे इंटरेस्टिंग लेटेस्ट खबर है साल 2015 की। जब साइंटिस्ट्स ने एक लेबोरेटरी में मैग्नेटिक वॉर्म होल क्रिएट कर दिया। तो अभी तक जो हम वॉर्म होल्स की बात कर रहे थे वो ग्रेविटेशनल फोर्स के सेंस में कर रहे थे। लेकिन अगर मैग्नेटिक फोर्स की बात करी जाए तो साइंटिस्ट्स ऑलरेडी वॉर्म होल को क्रिएट करने में सक्सेसफुल रहे हैं। इसका मतलब क्या हुआ यहां पर? अब मैग्नेट के दो एंड्स होते हैं दोस्तों, एक नॉर्थ पोल, एक साउथ पोल। हम सब जानते हैं कि दो एंड्स हमेशा साथ में रहते हैं। अगर आप एक मैग्नेट को दो पीसेज में तोड़ भी दोगे तो दोनों पीसेज के अपने दो पोल्स फिर भी रहेंगे। अब साइंटिस्ट्स ने कुछ स्पेशल मटेरियल्स का इस्तेमाल करके क्या अचीव कर लिया कि मैग्नेट के जो दो पोल हैं उन्हें सेपरेट कर दिया। बीच में इनविजिबल गैप लगा दी। बेसिकली एक मैग्नेट की मैग्नेटिक फील्ड वॉर्म होल के एक एंड से अंदर गई और दूसरे एंड से बाहर निकली। इसकी विजुअलाइजेन यहां आप देख सकते हो। लेफ्ट वाली इमेज एक डिवाइस दिखाती है जो साइंटिस्ट ने क्रिएट किया जिसने मैग्नेट के दो पोल्स को सेपरेट कर दिया। तो ये डिवाइस बेसिकली वॉर्म होल का काम कर रहा है मैग्नेटिक फील्ड के लिए। हमें आंखों से तो ये डिवाइस दिख रहा है लेकिन अगर मैग्नेटिक फील्ड्स को ही आप देखोगे राइट पिक्चर में तो आपको दिखेगा कि एक तरफ एक पोल है मैग्नेट का दूसरी तरफ सेपरेट आउट होकर दूर दूसरा पोल है। जैसे स्पेस में वॉर्म होल स्पेस-टाइम कर्वेचर को बेंड करने का काम करेगा। यहां इस वॉर्म होल ने मैग्नेटिक फील्ड को बेंड करने का काम किया। इस मैग्नेटिक वॉर्म होल को बनाने के लिए एक हाई टेंपरेचर सुपरकंडक्टिंग मटेरियल का इस्तेमाल किया गया था जिसका नाम है यीटीरियम बेरीयम कॉपर ऑक्साइड। और इसे एक लिक्विड नाइट्रोजन बाथ में रखा गया था इस एक्सपेरिमेंट को करने के लिए। फाइनली दोस्तों मैं ये कहना चाहूंगा कि अगर वॉर्म होल का एक्ज़िस्टेंस नहीं भी प्रूव हो पाता है आने वाले टाइम में। इसका मतलब ये नहीं कि हम और तरीके नहीं ढूंढ सकते फास्टर देन लाइट ट्रैवल करने के। थ्योरेटिकली देखा जाए दोस्तों आइंस्टाइन की फील्ड इक्वेशन का एक और सॉल्यूशन यहां पर एलक्यूबियर ड्राइव प्रेजेंट करता है। इसे प्रपोज किया गया था साल 1994 में थ्योरेटिकल फिज़िसिस्ट मिगुएल एलक्यूबियर के द्वारा। आईडिया यहां ये है कि एक ऐसा स्पेसक्राफ्ट होगा जो लाइट से तेज स्पीड पर ट्रैवल कर पाएगा। लेकिन कैसे कर पाएगा? ये कर सकेगा अपने सामने के स्पेस-टाइम कर्वेचर को कॉन्ट्रैक्ट करके और अपने पीछे के स्पेस-टाइम कर्वेचर को एक्सपैंड करके। थ्योरेटिकली देखा जाए दोस्तों आइंस्टाइन की फील्ड इक्वेशन का एक और सॉल्यूशन यहां पर एलक्यूबियर ड्राइव प्रेजेंट करता है। ये बड़ा इंटरेस्टिंग होगा देखना कि आने वाले टाइम में और कौन-कौन से सॉल्यूशंस प्रपोज किए जाते हैं इन फील्ड इक्वेशन्स के और क्या-क्या प्रैक्टिकल चीजें इनसे निकल पाती हैं। अभी के लिए ये वीडियो पसंद आया तो एआई मास्टरक्लास को जॉइन करने का लिंक नीचे डिस्क्रिप्शन में मिल जाएगा। और ऐसे ही और स्पेस रिलेटेड टॉपिक्स के बारे में अगर आप जानना चाहते हैं तो ब्लैक होल्स वाला वीडियो अब यहां क्लिक करके देख सकते हैं। बहुत-बहुत धन्यवाद।

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