[0:04]केशवनगर राज्य के चंदननगर नाम के छोटे से गांव में अर्जुन नाम का एक किसान रहता था. वो रोज़ की तरह अपने खेत में काम कर रहा था. तभी उसका मित्र बलराम वहां आ पहुंचा. अर्जुन ओ अर्जुन अरे अर्जुन अरे भाई तुम यहां खेत में काम कर रहे हो और उधर तुम्हारी पत्नी की प्रसव पीड़ा शुरू हो गई है. यह तो अच्छा हुआ कि मेरी पत्नी किसी काम से तुम्हारे घर गई थी. उसने भाभी को दर्द में तड़पते देखा और तुरंत दाई को बुलाकर लेकर गई. अरे चलो भाई तुम्हारा घर पर रहना जरूरी है चलो भाग कर चलो हां अरे देखना बलराम मेरा पुत्र ही होगा पुत्र. अरे अर्जुन पुत्र हो या पुत्री क्या फर्क पड़ता है तुम चलो बस. ओ बलराम फर्क है छोरा-छोरी में फर्क है और हमें चाहिए पुत्र समझे चलो. इतना कहकर अर्जुन घर की ओर दौड़ पड़ा. कुछ देर बाद अर्जुन घर के दरवाजे पर पहुंचा तभी बलराम की पत्नी बिंदिया दो नवजात कन्याओं को गोद में लेकर बाहर आई. मुबारक हो अर्जुन भैया तुम्हें जुड़वा बेटियां हुई है. अर्जुन का चेहरा उतर गया वो बिना कुछ कहे वहां से लौट गया. थोड़ी देर बाद जब वह घर में आया तो उसकी पत्नी आरती अपनी दोनों बेटियों को दूध पिला रही थी. क्या हुआ क्या आप खुश नहीं हुए. अरे अरे खुश नहीं हुए से तुम्हारा क्या मतलब है तुम जानती हो कि मुझे पुत्र चाहिए था पुत्री नहीं. और तुम तुम एक बेटा भी नहीं दे पाई अगर यही दो पुत्र हुए होते तो मैं सारे गांव में दावत करता सीना चौड़ा करके चलता. क्या करूं इन लड़कियों का क्या करूं इनका आरती के चेहरे पर गहरी उदासी उतर आई लेकिन कुछ देर बाद उसने संभलते हुए मुस्कुराने की कोशिश की. अच्छा सुनिए ना मैंने इनका नाम रख लिया है. बड़ी का नाम चारु लता और छोटी का सौम्या कैसे लगे आपको यह नाम. ऐसा है ये तुम्हारी बेटियां हैं चाहे तो नाम रखो चाहे तो ना रखो मुझे कोई मतलब नहीं इनसे. अर्जुन वहां से चला गया और आरती की आंखों से आंसू बहने लगे.
[2:36]समय बीतता गया आरती ने अकेले ही अपनी दोनों बेटियों का पालन पोषण किया. अर्जुन ने कभी उनकी परवाह नहीं की 10 वर्ष गुजर गए और अब सौम्या और चारु लता समझदार हो चुकी थी. मां पिताजी हम दोनों से बात क्यों नहीं करते. सौम्या की बात सुनकर आरती की आंखें भराई. ऐसा मत कहो बिटिया तुम्हारे पिताजी बहुत व्यस्त रहते हैं उन्हें समय नहीं मिलता. पर मां गांव के और किसान भी तो व्यस्त रहते हैं फिर भी वो अपनी बेटियों से प्यार करते हैं. हमारे पिता तो हमारी ओर देखते तक नहीं. आरती की आंखों में आंसू छलक पड़े. मैं तो तुमसे बहुत प्रेम करती हूं तुम अपने पिता की बातों पर ध्यान मत देना. अच्छा तुम दोनों यहीं रहो मैं नदी से पानी भरकर लाती हूं. आरती मटका उठाकर नदी की ओर चली गई और दोनों बेटियां आंगन में खेलने लगी. कुछ ही देर में बलराम घबराया हुआ आया उसकी आंखों से आंसू बह रहे थे. बलराम चाचा क्या हुआ आप रो क्यों रहे हैं. ए बेटा बेटा तुम्हारी मां नदी में डूब कर मर गई जल्दी चलो बेटा जल्दी चलो. सौम्या और चारु लता चीख पड़ी दोनों रोती हुई बलराम के साथ नदी की ओर दौड़ी. नदी किनारे आरती की लाश पड़ी थी गांव के लोग वहां इकट्ठा थे थोड़ी देर में अर्जुन भी वहां पहुंचा. आरती आरती आरती तुम हमें छोड़कर क्यों चली गई क्यों चली गई अब मेरा क्या होगा. तुम्हारे बिना मैं अपनी दोनों बेटियों की परवरिश कैसे करूंगा कैसे करूंगा. बलराम की आंखों से भी आंसू बह रहे थे. जब मैं जब मैं नदी के किनारे पहुंचा तो तुम्हारी पत्नी डूब रही थी. मित्र मैंने उसे बचाने की बहुत कोशिश की पर तब तक बहुत देर हो चुकी थी. मुझे याद है जब वो नदी पर आई थी तब उसने अपने शरीर पर सोने के आभूषण पहने थे लेकिन लेकिन जब मैंने उनकी लाश बाहर निकाली. तो वो आभूषण गायब थे अब पता नहीं भाभी के आभूषण कौन ले गया क्या हो गया समझ नहीं आता. क्या मैं मैं उसे हमेशा समझाता था कि नदी जाते वक्त आभूषण उतार दिया करो. आजकल डाकुओं का आतंक बढ़ गया है लेकिन क्या करूं. हां अर्जुन लगता है कि भाभी किसी डाकू की लूट का शिकार बन गई हैं. किसी ने उनके आभूषण छीने और उन्हें नदी में धक्का दे दिया बेचारी भाभी उन्हें तैरना भी नहीं आता था. और बेचारी चली गई चली गई. कुछ देर बाद आरती का अंतिम संस्कार कर दिया गया. गांव का वातावरण शोक में डूब गया सौम्या और चारु लता घर के कोने में बैठकर फूट फूट कर रोने लगी. कुछ दिन ऐसे ही बीत गए सौम्या और चारु लता ने धीरे-धीरे घर का कामकाज संभालना सीख लिया था. वह अब घर के छोटे-मोटे काम अपने आप कर लेती थी और जवान हो रही थी. एक दिन वह घर के काम में लगी हुई थी कि अर्जुन एक दूसरी स्त्री को जो शादी का जोड़ा पहने थी घर पर लाकर खड़ा कर दिया दोनों लड़कियां चौक उठी. पिताजी यह कौन है. यह आज से तुम्हारी दूसरी मां है मैंने इससे विवाह कर लिया है. यह सुनकर सौम्या की आंखों में आंसू आ गए. पिताजी मां को गए हुए अभी कुछ ही दिन तो हुए थे. मैं यह विवाह नहीं करना चाहता था पर गांव के लोग जिद्द कर रहे थे मैं खेत में काम करने के लिए निकल जाता. और तुम दोनों दिन भर अकेली रहती अब जब तुम्हारी मां नहीं रही तो मैंने तुम्हारी वजह से राधा से शादी की है ताकि वह तुम्हारी देखभाल कर सके. इतना कहकर अर्जुन वहां से चला गया. शुरू में राधा का व्यवहार सौम्या और चारु लता के प्रति ठीक-ठाक था पर कुछ समय के बाद धीरे-धीरे उसका स्वभाव बदलने लगा. एक सुबह जब सौम्या सो रही थी राधा गुस्से में आकर उसे उठाकर बोली. जल्दी उठ घर पर पानी खत्म हो गया है नदी से पानी भरकर ला. सौम्या उठकर नदी से पानी भरने चली गई. राधा दूसरी ओर चलकर चारु लता को उठाने आई और बोली. तू भी उठ घर का झाड़ू पोछा कर बर्तन धोने हैं तुम दोनों के पास सोने के अलावा और कोई काम नहीं है जल्दी काम पर लग जाओ. राधा वहां से चली गई सौम्या और चारु लता मां आरती को याद करके काम करने लगी. समय के साथ राधा का व्यवहार और क्रूर होता गया काम का बोझ बढ़ता गया. एक दिन सौम्या अपनी बहन चारु लता से बोली. हमारी सौतेली मां का व्यवहार तो हमारे प्रति बहुत ही क्रूर होता जा रहा है. हां मैं भी देख रही हूं वह हमें एक पल भी आराम नहीं करने देती. हमें पिताजी को यह बात बतानी चाहिए. शाम को जब अर्जुन काम से लौटा चारु लता रोते हुए अपने पिता के पास चली गई. पिताजी हमारी सौतेली मां हमें हमेशा काम पर लगाती है. वह हमें एक पल भी बैठने नहीं देती हमारा शरीर शाम तक थककर चूर हो जाता है. कभी-कभी तो सौतेली मां हमें खाना भी नहीं देती. यह सुनकर अर्जुन भड़क उठा. नालायक लड़कियों यह क्या सौतेली मां सौतेली मां लगा रखा है अरे वह तुम्हें झेल रही है यही उसके लिए बहुत बड़ी बात है जैसे मैं तुम्हें झेल रहा हूं. पता नहीं तुम दोनों पैदा ही क्यों हुई. सौम्या और चारु लता पिताजी की तरफ अविश्वास से देखने लगी. जब तुम दोनों पैदा हुई थी ना तो मैं बिल्कुल खुश नहीं था मैंने गांव में कोई मिठाई नहीं बटवाई थी कोई ढोल नहीं पिटवाया था. मैं चाहता था कि मेरी बीवी आरती तुम्हारी मां किसी पुत्र को जन्म दे पर उसने दी तो एक नहीं दो-दो बेटियां. तुम्हें समय पर खाना मिल रहा है तुम्हारे लिए यही बहुत है समझी अब देख क्या रही हो दफा हो जाओ मेरी आंखों के सामने से जाओ यहां से जाओ. दोनों रोते हुए कमरे में चली गई और मां की याद में बस रोती रही. फिर समय की धारा बहने लगी और 10 वर्ष और बीत गए चारु लता और सौम्या अब जवान हो चुकी थी. एक दिन अर्जुन घर लौटा. तुम्हारी दोनों पुत्रियां जवान हो गई है अब तुम्हें उनके विवाह की तैयारी करनी होगी. क्या तुम्हारे पास इतना धन है कि तुम दोनों का दहेज दे सको. यह बात सुनकर अर्जुन क्रोधित हो गया. मैं फूटी कौड़ी भी उनके विवाह में खर्च नहीं करने वाला. देखो मेरे पास एक उपाय है मैं अपने गले का हार गायब कर दूंगी. और चोरी का आरोप तुम्हारी दोनों पुत्रियों पर लगा दूंगी तुम मेरा साथ देना. फिर अपनी दोनों पुत्रियों को धक्का देकर बाहर निकाल देना इससे तुम्हें इन दोनों से हमेशा के लिए छुटकारा मिल जाएगा. तुम सही कह रही हो ठीक है. अगले दिन जब सौम्या और चारु लता काम कर रही थी राधा वहां पहुंची. मेरे सोने का हार जो मैं गले में पहनती थी नहाने से पहले मैं अपने कक्ष में रखकर जाती थी और अब वो गायब है वो कहां गया. कैसी बातें कर रही हो मां हम तो आपके कक्ष में जाते ही नहीं. मुझे शक है कि सौम्या और तुमने हार चुराया है क्योंकि तुम दोनों मेरे गले के हार को हमेशा घूरते रहती थी. मां हम पर चोरी का इल्जाम मत लगाइए. उसी समय अर्जुन वहां आया राधा ने इशारा किया अर्जुन ने डंडा उठाया और क्रोधित स्वर में कहा. ए साफ-साफ बोल सच बोल नहीं तो मैं धक्के मारकर बाहर निकाल दूंगा सच सच बता. चारु लता और सौम्या हाथ जोड़कर विनती करने लगी. पिताजी हमारी बात पर विश्वास कीजिए. अर्जुन ने भयंकर ठंड में उन दोनों को घर से निकाल दिया गांव वाले देख रहे थे पर कोई मदद के लिए आगे नहीं बढ़ा. सौम्या और चारु लता रोती हुई घर से दूर नदी के किनारे चली गई वो बेबसी और अपमान से टूट चुकी थी. मां तुम अकेले पानी भरने क्यों गई थी. हमें भी साथ ले लेती हमें यह दिन नहीं देखना पड़ता. मां तुम्हारे जाने के बाद हमने कितने अत्याचार सहे तुम्हें क्या बताएं. वह घंटों नदी के किनारे बैठकर रोती रही अपनी मां से बातें करती रही और उस बचपन की यादों में खुद को ढूंढती रही. सर्दी इतनी कड़क रही थी कि दोनों बहनों का शरीर ठंड में जम सा गया था. वह नदी के किनारे बैठी रही और ठिठुरती रात गुजार दी तभी बलराम वहां से गुजरा. अरे सौम्या और चारु लता तुम दोनों यहां सर्दी में अरे तुम दोनों बीमार पड़ जाओगी यहां क्या कर रही हो. दोनों बहनें रोने लगी और सारी घटना बलराम को बता दी बलराम की आंखों में आंसू आ गए. बेटा मैंने कई बार तुम्हारे पिता को समझाने की कोशिश की कि अपनी बेटियों के प्रति इतना कठोर रवैया सही नहीं है नहीं है. लेकिन पता नहीं उसके दिमाग में क्या चलता रहता है चलो तुम दोनों घबराओ नहीं बच्चों आ जाओ मेरे घर पर चलो अभी तुम्हारा चाचा है आ जाओ बेटा आ जाओ आ जाओ. नहीं बलराम चाचा अब हम किसी पर बोझ नहीं बनेंगे हम यहीं पर रहेंगे और यहीं अपनी जान देंगे जहां हमारी मां ने आखिरी सांस ली थी. बलराम ने बहुत समझाने की कोशिश की पर दोनों बहनें नहीं मानी वो निराश होकर वहां से चला गया. वह दोनों फिर बैठकर रोने लगी और पूरी ठंड में रात गुजार दी. अगली सुबह एक बूढ़ी औरत वहां आ पहुंची. तुम दोनों कौन हो और इतनी ठंड में इस नदी किनारे क्या कर रही हो. हम हम वहीं हैं. सौम्या ने रोते हुए सारी घटना बूढ़ी औरत को बता दी बूढ़ी औरत की आंखों में आंसू आ गए. अच्छा हुआ तुम यहां आ गई रोने से कुछ नहीं होगा हिम्मत मत हारो. तुम लड़की हो तो क्या हुआ तुम भी वही कर सकती हो जो मर्द कर सकते हैं पास में एक जंगल है. वहां से लकड़ी काट कर लाओ मैं तुम्हें झोपड़ी बनाना सिखाऊंगी तुम यहीं झोपड़ी बनाकर रहो किसी की मोहताज मत बनो. बूढ़ी औरत की बातों का असर दोनों बहनों पर हुआ वो तैयार हो गई और बूढ़ी औरत के बताए स्थान पर चली गई. वो लकड़ियां तोड़कर और बूढ़ी औरत के साथ मिलकर झोपड़ी तैयार करने लगी थोड़े ही समय में झोपड़ी तैयार हो गई. और उस दिन के बाद वो वहीं रहने लगी. कुछ दिन गुजरने के बाद बूढ़ी औरत उन दोनों से बोली. अब तुम दोनों को कोई काम धंधा करना चाहिए जंगल में बहुत से पेड़ हैं जिनके फल का कोई भी मालिक नहीं है. उन फलों को तोड़कर बाजार में बेचो इससे तुम्हें आमदनी होगी. हमें आपका यह सुझाव अच्छा लगा हम फल तोड़कर बाजार में बेचेंगे. दोनों बहनें रोज जंगल जाती फल तोड़कर बाजार में बेचने लगी और धीरे-धीरे उनकी आर्थिक स्थिति संभलने लगी. एक दिन जब वह फल तोड़ रही थी चारु लता की नजर पास में खड़े एक सैनिक पर पड़ी. अरे यह सैनिक यहां क्या कर रहा है. पता नहीं चल कर पूछते हैं. वह दोनों सैनिक के पास गई और विनम्रता से पूछ बैठी सैनिक मुस्कुराया और बोला. महाराज का शिकार करने का शौक है वह यहां ठहरते हैं नदी पास में है और पानी की कमी भी नहीं होगी. सैनिक चला गया सौम्या और चारु लता अपनी झोपड़ी लौटाई. शाम को वही बूढ़ी औरत उनकी झोपड़ी में आ पहुंची और मुस्कुराती हुई बोली. तुम्हारे चेहरे पर मुस्कान आ गई है ऐसे ही मुस्कान बिखेरते रहना. आपने हमारी बहुत सहायता की है पर आपने अभी तक हमें अपना घर नहीं दिखाया. यह सुनकर बूढ़ी औरत ने रहस्यमई अंदाज में सौम्या की ओर देखकर कहा. जिस नदी के किनारे तुम रहती हो वहीं पर वर्षों से मेरा घर रहा है जल्दी तुम्हें इसका रहस्य पता चल जाएगा. पर अब समय आ गया है दोषियों को सजा देने का. कौन दोषी. मैंने कहा था ना मैं वर्षों से इस नदी के किनारे रहती हूं तुमने मेरी बात पर ध्यान नहीं दिया. तुमने बताया था कि तुम्हारी मां इसी नदी में गिरकर मरी थी है ना. हां ऐसा ही है. और मरने से पहले उसके आभूषण गायब थे गांव को लगा कि किसी डाकू ने उसे लूटकर धक्का दे दिया. क्या यह बात सत्य है. हां यह सत्य है. तुम्हारे घर पर ही वह गहने अब भी रखे हुए हैं. दोनों बहनें एक साथ चौक गई. तो आप कहना क्या चाहती हैं. तुम्हारी मां की हत्या हुई थी और वो हत्या किसी और ने नहीं बल्कि तुम्हारे पिता अर्जुन ने की थी. उसे कभी अपनी पत्नी पसंद नहीं थी वो हमेशा से अपनी दूसरी पत्नी राधा से प्रेम करता था. अपने माता-पिता के दबाव में उसने तुम्हारी मां आरती से विवाह किया था पर जब तुम दोनों पैदा हुई उसकी नफरत और बढ़ गई. और एक दिन उसने अपना पाप पूरा कर लिया. क्या पर आपको इतनी गहराई से यह सब कैसे पता. समय आने पर सब बता दूंगी पर अभी राजा सूरज तुम्हारी झोपड़ी के पास शिकार के लिए डेरा डाले हुए हैं. वहीं जाकर सच्चाई बताओ. लेकिन राजा सूरज सबूत मांगेंगे. सबूत तुम्हारे पिता के कक्ष में हैं वो गहने वही रखे हैं अब देर मत करो. दोनों बहनें तुरंत बूढ़ी औरत की बात मानकर राजा सूरज के पास पहुंची. ओह तो तुम दोनों वही हो जो नदी के किनारे रहती हो मेरे सैनिकों ने बताया था. क्या तुम्हारे पिता भी तुम्हारे साथ रहते हैं. महाराज हम आपको एक सच्चाई बताने आए हैं हमारी मां की हत्या किसी और ने नहीं हमारे पिता ने की थी. इतना कहकर चारु लता राजा सूरज को धीमी आवाज में रोते हुए सब कुछ बताने लगी. क्या कहा तुम्हें इस बात का यकीन है. हां महाराज अब हमें सब समझ आ गया है. हम न्याय प्रिय राजा हैं यदि तुम्हारे पिता और उसकी दूसरी पत्नी दोषी पाए गए तो उन्हें दंड मिलेगा चलो मेरे साथ. राजा सूरज चारु लता सौम्या और सैनिक अर्जुन के घर पहुंचे. अर्जुन और उसकी पत्नी राधा राजा को देखकर डर गए. महाराज क्या हुआ महाराज यह तो मेरी दोनों पुत्रियां हैं क्या इन्होंने आपसे मेरी शिकायत की महाराज. हम्म तुम्हारी सच्चाई सामने आ चुकी है अर्जुन तूने ही वर्षों पहले अपनी पत्नी आरती की हत्या की थी. क्या यह आप क्या कह रहे हैं महाराज यह यह झूठ है यह सरासर झूठ है महाराज. सैनिकों इसके कक्ष की तलाशी लो जो भी आभूषण मिले उन्हें हमारे सामने लेकर आओ जाओ. सैनिक अंदर गए और थोड़ी देर बाद सोने के आभूषण लेकर लौटे. यह तो वही हार है जिसकी चोरी का इल्जाम हम दोनों बहनों के ऊपर लगाया गया था पिताजी ने हमें ठंड में घर से निकाल दिया था उसी इल्जाम के कारण. और यह वही आभूषण है जो मां ने उस दिन पहने थे जब वह नदी में डूबी थी. अर्जुन का चेहरा पीला पड़ गया तभी बाहर से बलराम आ पहुंचा. अरे बाप रे बाप यह तो वही गहने हैं जो आरती भाभी के गले में थे उस दिन जब वो नदी में जा रही थी. अर्जुन अब तू सच बोल तूने अपनी पत्नी की हत्या क्यों की सच बता. महाराज यह झूठ है मैं मैं अपनी पत्नी आरती से प्रेम करता था यह गहने मुझे नदी के किनारे झाड़ियों में मिले थे बस मैंने किसी को बताया नहीं यही मेरी गलती है. केवल आभूषण मिलने से आप मुझे हत्यारा नहीं कह सकते महाराज. राजा सूरज कुछ पल मौन रहा तभी वही बूढ़ी औरत वहां आ गई. यह झूठ बोल रहा है महाराज यह बहुत बड़ा पापी है. इतना कहते ही वह रंग बिरंगी रोशनी में घिरी और अगले ही पल आरती में परिवर्तित हो गई. हां कौन हो तुम. मैं आरती हूं वर्षों पहले जब मैं नदी में पानी भरने गई थी मेरा पति मेरे पास आया और बोला सोने के आभूषण दे दो डाकू घूम रहे हैं.
[21:44]मैंने उस पर भरोसा किया पर जैसे ही मैंने गहने उतारे उसने मुझे धक्का दे दिया मैं तैरना नहीं जानती थी डूबने लगी तभी बलराम आया पर तब तक मैं मर चुकी थी. सब लोग स्तब्ध रह गए. मेरी आत्मा वर्षों तक भटकती रही जब मैंने अपनी दोनों बेटियों को देखा तो रूप बदलकर उनके पास गई उन्हें हिम्मत दी सहारा दिया. अब मेरी आत्मा को शांति तभी मिलेगी जब मेरे पति का पाप सबके सामने आएगा. अर्जुन तूने अपनी पत्नी की हत्या की अब तू और तेरी पत्नी राधा जीवन भर कारागार में सोगे सैनिकों बंदी बनाओ इन्हें. सैनिकों ने अर्जुन और राधा को पकड़ लिया दोनों गिड़गिड़ाने लगे पर कोई दया नहीं हुई. अब मेरे मुक्त होने का समय आ गया है. मां हमें छोड़कर मत जाओ. लेकिन अगले ही पल रंग बिरंगी रोशनी में आती गायब हो गई दोनों बहनें फूट फूट कर रो पड़ी. बेटा सौम्या अब कहां जाओगी. अब हम इस घर में नहीं रहेंगे हम नदी किनारे अपने इस घर में रहेंगे वह झोपड़ी मां के हाथों की बनी है. अब हम उसी नदी किनारे रहेंगे जहां मां की आत्मा को शांति मिली. हां वही हमारा घर है वह मकान हमारा नहीं पिता का था जिसे देखकर हमें हर बार उनका पाप याद आएगा. और इस तरह नदी किनारे की वो झोपड़ी जो कभी दुख की गवाह थी अब आत्मा की शांति का स्थान बन गई. जहां आंसू बहते थे वहां अब विश्वास बहता है कभी-कभी सत्य देर से प्रकट होता है पर जब होता है तब नदी भी साक्षी बन जाती है.



