[0:02]23 नवंबर को इथोपिया में एक भयानक वोल्केनिक एक्सप्लोजन हुआ। लगभग 12,000 साल की रिकॉर्डेड हिस्ट्री में पहली बार यह हाइली गूबी नाम का ज्वालामुखी फट गया। यह धमाका इतनी तेजी से इतने अचानक से हुआ कि किलोमीटर दूर खड़े लोगों ने कहा कि उन्हें ऐसा लगा कि कोई बम फट गया हो। इससे करीब 50,000 फीट ऊंचा ऐश क्लाउड निकला। यह राख का बादल इतना बड़ा था कि यह बड़ी ही आसानी से स्पेस से दिख रहा था। नक्शे में देखो हवा के जरिए यह राख का बादल पहले ओमान और यमन के देश में गया और फिर धीरे-धीरे पाकिस्तान और इंडिया तक पहुंच गया।
[0:44]इसी की वजह से दिल्ली में कई सारी फ्लाइट्स भी कैंसिल हुई क्योंकि इन बादलों के आसपास फ्लाइट्स को ऑपरेट करना बहुत रिस्की होता है। इन ऐश क्लाउड्स में बहुत छोटे-छोटे पत्थर और कांच के पार्टिकल्स और क्रिस्टल्स होते हैं। अगर यह किसी भी हवाई जहाज के इंजन पर लग जाए तो बड़ी ही आसानी से उसके इंजन को बंद कर सकते हैं। ऊपर से एरोप्लेन के शीशों पर यह छोटे से रेजर ब्लेड्स की तरह काम करते हैं। कॉकपिट की विंडोस पर यह आ गए तो सैंड पेपर की तरह उसे घिसने का काम करेंगे। इतना स्क्रैच कर देंगे शीशे को कि पायलट्स को कुछ आगे दिखाई ही नहीं देगा। इसलिए इंडिया के अलावा मिडिल ईस्ट में भी कई सारी फ्लाइट्स को कैंसिल किया गया और अब यह ऐश क्लाउड धीरे-धीरे बढ़ रहा है चाइना और म्यांमार की तरफ। यह वोल्केनिक इरप्शन अपने आप में इतना पावरफुल था कि इसके धमाके की आवाज 190 किलोमीटर दूर के शहरों तक सुनाई दे रही थी। और बगल के पड़ोसी देश जिबूटी तक भूकंप के झटके महसूस किए गए थे। करीब 28 किलोमीटर दूर इथोपिया के अफेरा रीजन में कई सारे गांव पूरी तरीके से राख में ढक गए। लेकिन अच्छी खबर यहां पर यह है कि एक भी इंसान की जान नहीं गई। ऐसा इसलिए क्योंकि यह वोल्केनो जहां मौजूद है वह एक बहुत ही रिमोट जगह है। आसपास कोई लोग नहीं रहते इनफैक्ट इस एरिया को दुनिया की हॉटेस्ट प्लेस माना जाता है धरती पर। इस जगह का नाम है दानाकिल डिप्रेशन। यह पूरा एरिया नक्शे पर देखिए सी लेवल के नीचे आता है। यहां का तापमान अक्सर 50-55 डिग्री क्रॉस कर जाता है। बारिश लगभग ना के बराबर होती है और यह जियोलॉजिस्ट और टूरिस्ट के लिए बहुत ही दिलचस्प एरिया है। जियोलॉजिस्ट के लिए इंटरेस्टिंग इसलिए है क्योंकि यह बहुत ही जियोलॉजिकली एक्टिव रीजन है। ढेर सारे ज्वालामुखी यहां पर मौजूद हैं और टूरिस्ट के लिए इंटरेस्टिंग इसलिए है क्योंकि यहां पर बहुत ही कलरफुल और अनोखी सीनरीज देखने को मिलती हैं। यह देखिए जरा देखकर ऐसा लगता ही नहीं कि यह धरती पर हो। बहुत ही कमाल के येलोइश, ग्रीनिश, ब्लूइश से कलर्स देखने को मिलते हैं यहां हो रहे केमिकल रिएक्शंस की वजह से। अब यहां पर एक सवाल आपके मन में आएगा कि ऐसा आखिर क्या हुआ कि हजारों सालों बाद यह ज्वालामुखी एकदम से फट गया? तो इसके पीछे छुपी है दोस्तों एक बड़ी ही दिलचस्प कहानी अफ्रीकन कॉन्टिनेंट के दो हिस्सों में टूटने की। सही सुना आपने यह वोल्केनो जहां मौजूद है वहां पर टेक्टोनिक प्लेट्स शिफ्ट हो रही है और अफ्रीका का कॉन्टिनेंट टूट कर दो हिस्सों में धीरे-धीरे बंट रहा है। असल में कई मिलियंस ऑफ इयर्स पहले की बात है जब सारे कॉन्टिनेंट्स एक हुआ करते थे इसे पेंजिया कहा जाता था। आपको याद होगा स्कूल में पढ़ा था इसके बारे में। यह पेंजिया का सुपर कॉन्टिनेंट धीरे-धीरे टाइम के साथ-साथ अलग-अलग टुकड़ों में बटा और वहां से हमारे आज के कॉन्टिनेंट्स बने। अफ्रीका के रीजन पर अगर स्पेसिफिकली फोकस करोगे तो एक टाइम पर अफ्रीकन टेक्टोनिक प्लेट और अरेबियन टेक्टोनिक प्लेट एक हुआ करती थी। लेकिन जब यह धीरे-धीरे अलग हुई तो इनके बीच जगह बनी और वहां पर आया रेड सी और गल्फ ऑफ ईडन। अब हो क्या रहा है दोस्तों क्योंकि यह टेक्टोनिक प्लेट्स हमेशा मूव करती रहती हैं। अब धीरे-धीरे अफ्रीकन प्लेट भी दो हिस्सों में टूट रही है, नूबियन प्लेट और सोमालियन प्लेट में। इथोपिया का यह वाला रीजन जहां पर यह हाइली गूबी ज्वालामुखी मौजूद है यहां पर तीन प्लेट्स एक साथ मिलती है नूबियन, सोमालियन और अरेबियन टेक्टोनिक प्लेट्स। अब यहां पर ये तीनों प्लेट्स धीरे-धीरे एक दूसरे से दूर होती जा रही हैं और जमीन तीन हिस्सों में टूट रही है। इस जगह को अफर रिफ्ट कहा जाता है। लेकिन यह रिफ्ट अपने आप में एक बड़ी ईस्ट अफ्रीकन रिफ्ट का हिस्सा है। अफ्रीकन कॉन्टिनेंट में यहां से साउथ की तरफ देखोगे तो एक पूरी लाइन सी बन रही है। करीब 6000 किलोमीटर लंबी लाइन जो रेड सी से होते हुए इथोपिया, कीनिया, तांजानिया, मालवी और मोजांबिक तक जा रही है। यही वह लाइन है दोस्तों जिस जगह से अफ्रीकन कॉन्टिनेंट के टूट कर दो हिस्से होंगे आने वाले समय में। अब यहां पर जब मैं आने वाले समय की बात कर रहा हूं तो जियोलॉजिकल टाइम स्केल की बात हो रही है तो इंसानों के परस्पेक्टिव से फिर भी बहुत लंबा समय है। यह पूरा बंटवारा होने में साइंटिस्ट का मानना है 5 से 10 मिलियन इयर्स का समय लग सकता है। क्योंकि यह दोनों कॉन्टिनेंटल प्लेट्स एक दूसरे से धीरे-धीरे दूर जा रही हैं 2 से 5 सेंटीमीटर पर ईयर के रेट से। बेसिकली यह वही रेट है जिस रेट से आपके नाखून बड़े होते हैं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हर चीज बहुत धीरे-धीरे से होगी इस पूरे ईस्ट अफ्रीकन रिफ्ट सिस्टम पर। ढेर सारे वोल्केनोस मौजूद हैं, ढेर सारी पहाड़ियां मौजूद हैं। जैसे कि माउंट किलिमंजारो, माउंट कीनिया, एरटा आले जो कि इथोपिया की फेमस लावा लेक है। और कई सारी लेक्स भी मौजूद हैं जो बनी ही इसलिए हैं क्योंकि यह कॉन्टिनेंट्स एक दूसरे से दूर होते जा रहे हैं। जैसे कि लेक मालवी, लेक टंगननईका, लेक अल्बर्ट या लेक कीवू। तो इस परस्पेक्टिव से अगर आप चीजों को देखोगे तो आपको समझ में आएगा कि जो हो रहा है वह बिल्कुल भी अनएक्सपेक्टेड नहीं है। जैसे-जैसे कॉन्टिनेंटल प्लेट्स एक दूसरे से दूर होंगी इस एरिया में अर्थक्वेक्स देखने को मिलेंगे, वोल्केनिक इरप्शन देखने को मिलेगी, छोटे-छोटे क्रैक्स आएंगे ग्राउंड पर। और पिछले कुछ सालों में ऐसी कई चीजें होती हुई देखी गई है जैसे कि जुलाई 2025 में हाइली गूबी के पास ही एक और वोल्केनिक इरप्शन हुआ था। यह इरटा आले नाम का वोल्केनो फटा था। जुलाई के महीने में ही हाइली गूबी वोल्केनो से सफेद धुआं भी निकला था और तभी से साइंटिस्ट की इस पर नजर थी। और साल 2005 में तो इथोपिया के इस रीजन में अचानक से एक बहुत बड़ा क्रैक भी देखने को मिला। एक 60 किलोमीटर लंबा फीचर जमीन के अंदर 10 दिन के अंदर-अंदर फॉर्म हो गया। फोटोज देखो इसकी बड़ी ही कमाल की है यहां पर लोगों को भी खड़े हुए आप देख सकते हो और स्केल इमेजिन कर सकते हो इस गड्ढे का क्या है। लिटरली कॉन्टिनेंट का बंटवारा होते हुए यहां पर हम रियल टाइम में चीजों को देख पा रहे हैं। अगर यह टॉपिक आपको इंटरेस्टिंग लगता है दोस्तों तो यह वाला वीडियो भी आपको जरूर पसंद आएगा क्योंकि इसमें मैंने बात करी है कि कैसे इन जियोलॉजिकल रीजंस की वजह से जापान दुनिया का सबसे डेंजरस देश है। इन्हीं टेक्टोनिक प्लेट्स की मूवमेंट्स की वजह से जापान में सबसे ज्यादा वोल्केनोस और सुनामीस देखने को मिलते हैं।



