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कामवाली बाई के भेष में जब मां पहुंची बेटे-बहू के घर… सामने जो देखा, रूह कांप उठी!

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[0:00]तुम्हारी देखभाल भी ठीक से नहीं हो पाएगी। दवा-दारू का वक्त, खाने-पीने का ध्यान...
[0:00]मुझे तुम्हारी बहुत चिंता रहेगी।" शारदा जी का दिल एक पल को बैठा, पर बेटे का प्यार देखकर पिघल गया। "अरे बेटा, मैं कोई बच्ची हूँ क्या?
[0:00]शांति बाई..." उनका वाक्य पूरा होता, उससे पहले ही सुनीता के चेहरे पर चिड़चिड़ाहट की जगह, एक स्वार्थ भरी राहत ने ले ली। उसे लगा कि ललिता ने अपनी सास को भेज ही दिया। "अच्छा-अच्छा, समझ गई!
[0:00]हमने ही सारी बुकिंग करवाई है, बढ़िया व्यवस्था की है। अब चार धाम यात्रा पर गई हैं, कुछ महीने तो लग ही जाएँगे वापस आने में। कल ही उनसे फ़ोन पर बात हुई थी, बता रही थी, बहुत अच्छे से दर्शन हुए हैं उन्हें बद्रीनाथ धाम में!
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[0:00]नमस्कार दोस्तों, आपके अपने चैनल में आपका स्वागत है। हमारी आज की कहानी है: नई पहचान। भोर की पहली किरण अभी ठीक से धरती पर उतरी भी नहीं थी कि शांति धाम वृद्धाश्रम के विशाल, लोहे के गेट पर शारदा जी की नजरें जम गई। यह उनका नित्यकर्म था। पिछले एक साल से, हर सुबह उनकी इसी तरह शुरू होती थी। उनकी नजरें किसी शिकारी की तरह सड़क पर टिकी रहतीं, सड़क पर गुजरती हर गाड़ी की घड़घड़ाहट उनके सीने में एक पल को धड़कने बढ़ा देती, और उनके मुरझाए हुए हृदय में आशा की एक किरण जाग उठती, "शायद मेरा बच्चा रमेश आ गया मुझे लेने!" और अगले ही पल, जब गाड़ी बिना रुके आगे बढ़ जाती, तो उनकी उम्मीद बेरहमी से कुचल दी जाती और मुरझाए चेहरे पर मायूसी की एक और परत चढ़ जाती। एक साल, पूरा एक साल होने को आया था, उन्हें इस वृद्धाश्रम में आए हुए। एक साल पहले, आज का ही दिन था, जब उनके घर में उत्सव का माहौल था। उनके जिगर के टुकड़े, उनके पोते रोहन के चौथे जन्मदिन की पार्टी थी। घर मेहमानों की हँसी-ठिठोली से गुलज़ार था। शारदा जी की दुनिया उस दिन कितनी रंगीन थी! उन्हें क्या मालूम था कि उनके अपने ही घर में, उनके अपनों के बीच ये उनकी आखिरी महफिल थी। उस जश्न की गूँज अभी शांत भी नहीं हुई थी कि पार्टी के हफ्ते भर बाद ही बेटे रमेश और बहू सुनीता ने एक बम फोड़ा। एक रात, जब शारदा जी अपने कमरे में माला जप रही थीं, रमेश उनके पास आया। उसके चेहरे पर चिंता का एक ऐसा मुखौटा था, जिसे शारदा जी उस वक्त पढ़ न सकी। "माँ, हम लोग एक महीने के लिए यूरोप जा रहे हैं," फिर आवाज़ में शहद जैसी मिठास और झूठी चिंता घोलते हुए रमेश, शारदा जी के घुटनों को दबाने लगा, "अब तुम घर पर अकेले कैसे रहोगी? तुम्हारी देखभाल भी ठीक से नहीं हो पाएगी। दवा-दारू का वक्त, खाने-पीने का ध्यान... मुझे तुम्हारी बहुत चिंता रहेगी।" शारदा जी का दिल एक पल को बैठा, पर बेटे का प्यार देखकर पिघल गया। "अरे बेटा, मैं कोई बच्ची हूँ क्या? संभाल लूँगी खुद को। तुम लोग घूम आओ।" "नहीं माँ," रमेश ने ज़ोर देते हुए कहा, "हम तुम्हें ऐसे छोड़कर तो नहीं जा सकते। बस एक महीने की तो बात है। मेरे एक दोस्त ने बताया है, 'शांति धाम वृद्धाश्रम' के बारे में। बहुत अच्छी जगह है। वहाँ तुम्हारी उम्र के लोग भी हैं, मन लगा रहेगा। भजन-कीर्तन होता है। हम आते ही, एयरपोर्ट से सीधा तुम्हें लेने आएँगे।" 'वृद्धाश्रम' शब्द एक हथौड़े की तरह शारदा जी के सीने पर लगा था। परन्तू फिर सोचा, 'चलो, बच्चे हैं, घूमना चाहते हैं। मेरे कारण उनका घूमने का प्रोग्राम कैंसिल नहीं होना चाहिए,' सी उन्होंने मन मारकर हामी भर दी। उस वक़्त शारदा जी को लगा था कि रमेश वाकई उनकी चिंता कर रहा है। उनका मासूम दिल इस बात को समझ नहीं पाया था कि यह चिंता नहीं, बल्कि उनसे छुटकारा पाने की एक सुनियोजित साज़िश की शुरुआत थी। वह दिन उन्हें आज भी याद है जब रमेश उन्हें यहाँ छोड़ने आया था। उसने आश्रम के मैनेजर से बातचीत की, सारी औपचारिकताएं पूरी की और फिर शारदा जी के पैर छूते हुए बोला, "माँ, बस एक महीना, अपना ख्याल रखना।" वो एक अजीब सी जल्दी में था, जैसे वह इस कर्तव्य से जल्द से जल्द मुक्त होना चाहता हो। शारदा जी उसे गेट से ओझल होने तक देखती रहीं। बड़ी मुश्किल से शारदा जी ने वो तीस दिन वहाँ काटे और फिर वह दिन आया, जब एक महीना पूरा हुआ। शारदा जी ने अपना सारा सामान बांध लिया था। पूरा दिन आँखें बिछाए बैठी रहीं। लेकिन रमेश नहीं आया। एक सप्ताह और बीत गया। आखिरकार उन्होंने रमेश को फ़ोन मिलाया। "माँ? कैसी हो?" रमेश की आवाज़ में कोई उत्साह नहीं था। "बेटा, एक महीना तो कब का हो गया," शारदा जी की आवाज़ भरा गई। "अरे माँ, मैं तो तुम्हें फ़ोन करने ही वाला था," रमेश ने तुरंत एक तैयार बहाना पेश किया। "वो हमने आते ही घर की मरम्मत का काम शुरू करवा दिया है। तुम्हें तो पता ही है, दीवारों में कितनी सीलन आ गई थी। बरसात से पहले ठीक कराना ज़रूरी है। अब काम चल रहा है तो धूल-मिट्टी और शोर में तुम्हें तकलीफ होगी। तुम्हारी सेहत के लिए ठीक नहीं है। बस, ये काम निपट जाए, फिर तुम्हें घर लाएँगे।" उन्होंने फिर भी विश्वास कर लिया। 'बेटा सही कह रहा है, मेरे भले के लिए ही सोच रहा है।' मरम्मत का वो काम फिर कुछ समय और खा गया। देखते-देखते तीन महीने गुज़र गए। आश्रम में रहने वाली उनकी हमउम्र औरतें, जो खुद इसी दर्द से गुज़र चुकी थीं, उन्हें सच्चाई का आईना दिखाने की कोशिश करतीं। "शारदा बहन, अपनी आंखों पर से यह धोखे का परदा हटा दो। हम सब यहाँ इसी तरह आए हैं। ये सब बहाने हैं तुम्हें यहाँ रखने के। अब कोई नहीं आएगा तुम्हें लेने।" पहले तो शारदा जी का दिल इन बातों को मानने से इनकार कर देता था। उनका मन गुस्से से भर जाता, 'नहीं! मेरा रमेश ऐसा नहीं है। वो मुझे प्यार करता है।' वो अपने मन को बार-बार यही कहकर शांत करतीं। पर जब महीने गुजरते गए। जब भी शारदा जी अपने घर फ़ोन करती, तो हर बार नया बहाना मिलता - कभी घर में पेंटिंग का काम, कभी सुनीता की तबीयत खराब, कभी रमेश के ऑफ़िस का काम। हर झूठ उनके दिल में एक नया ज़ख्म बनाता जाता। उन्हें यह एहसास होने लगा था कि उन्हें लेने अब कोई नहीं आएगा। यह 'शांति धाम' ही अब उनका स्थायी पता था। हर रविवार सुबह शारदा जी तैयार होकर गेट पर टकटकी लगाए बैठी रहतीं, पर सूरज चढ़ता और ढल जाता, सड़क पर गाड़ियाँ आती-जाती रहतीं, पर वह गाड़ी कभी नहीं आती, जिसका उन्हें इंतज़ार होता था। लेकिन आज का दिन सब्र का इम्तिहान लेने वाला था। आज उनके रोहन का पांचवां जन्मदिन था। बेटे से उम्मीद भले ही मर चुकी थी, लेकिन पोते की ममता का धागा अब भी उनकी साँसों से जुड़ा था। वह बस एक बार, सिर्फ़ एक बार उसे निगाह भर देखना चाहती थीं। उसे सीने से चिपकाना चाहती थीं। दो घंटे तक यूँ ही दरवाज़े की ओर ताकते ताकते उनके सब्र का बांध, जिसे वह एक साल से तिनका-तिनका जोड़कर बना रही थीं, आज एक ही झटके में टूट गया। एक हठीली ज़िद ने उनके कमज़ोर हो चुके इरादों को फिर से बुलंद कर दिया। 'नहीं! आज तो मैं अपने रोहन को देखकर ही रहूँगी। चाहे कुछ भी हो जाए!' लेकिन अगले ही पल विचार आया कि अगर वह अपनी इसी पहचान के साथ गई, तो शायद घर की दहलीज़ भी पार न कर पाएँ। सुनीता का तिरस्कार भरा चेहरा उनकी आँखों के सामने घूम गया। वह ज़रूर दरवाज़े से ही मुझे लौटा देगी। रमेश भी शायद अपनी पत्नी का ही साथ देगा। तभी उनके दिमाग में एक बिजली सी कौंधी। एक अद्भुत विचार उनके दिमाग में आया। उन्होंने तय किया कि वह भेष बदलकर जाएँगी। एक ऐसा भेष, जिसे उनका बेटा और बहू भी पहचान न सकें। यह निर्णय लेना आसान नहीं था। यह अपने ही अस्तित्व को नकारने जैसा था। पर पोते की ममता के आगे आज उनका स्वाभिमान हार गया था। उन्होंने स्वयं को हिम्मत दी और मैनेजर के दफ्तर की ओर चल पड़ी। मैनेजर वर्मा जी, एक भले और समझदार इंसान थे। वह इन बुजुर्गों के दर्द को समझते थे, पर आश्रम के नियमों से भी बंधे थे। शारदा जी ने दरवाज़ा खटखटाया। "अंदर आ जाइए, शारदा जी," वर्मा जी ने रजिस्टर से नज़रें उठाकर कहा। शारदा जी ने अपनी आवाज़ में जितनी हो सके, उतनी दीनता और विवशता भरकर कहा, "वर्मा जी, मुझे आज शाम तक के लिए छुट्टी चाहिए थी।" उन्होंने नज़रें झुका लीं, ताकि उनकी आँखों का सच वर्मा जी न पढ़ लें। "आज गाँव से फ़ोन आया था। मेरी एक ननद... बहुत बीमार हैं। शायद... शायद आख़िरी समय है उनका।" झूठ बोलते हुए उनकी ज़बान लड़खड़ा रही थी और आत्मा कॉप रही थी। जीवन में उन्होंने कभी किसी से छल नहीं किया था, पर आज वह अपने ही बेटे, अपने ही खून से मिलने के लिए झूठ का सहारा ले रही थी। यह कैसी विडंबना थी! वर्मा जी ने उनकी आँखों में झाँका। वह समझ गए कि कहानी कुछ और है, पर उस कहानी का दर्द इतना गहरा था कि वह उसे कुरेदना नहीं चाहते थे। उन्होंने एक रजिस्टर आगे बढ़ाते हुए कहा, "ठीक है, शारदा जी। यहाँ दस्तख़त कर दीजिए और शाम होने से पहले लौट आएगा। अपना ध्यान रखिएगा।" "जी... जी ठीक है," शारदा जी ने कॉपते हाथों से दस्तख़त किए और लगभग भागती हुई अपने कमरे में वापस आ गई। अब असली चुनौती शुरू होनी थी। अब उन्हें अपनी पहचान को, अपनी ममता को, अपने 'माँ' और 'दादी' होने के अस्तित्व को कुछ घंटों के लिए दफ़न करना था। 'शारदा' को पीछे छोड़कर एक ऐसा रूप धरना था, जिसे कोई पहचान न सके। यूँ तो चिंता और अकेलेपन की दीमक ने उनके शरीर को अंदर से खोखला कर ही दिया था। उम्र ने जो झुर्रियाँ चेहरे पर नहीं दी थीं, वे इस एक साल की मर्मान्तक पीड़ा ने माथे पर उकेर दी थीं। कभी भरा-पूरा लगने वाला उनका चेहरा अब पिचक गया था, गालों की हड्डियाँ उभर आई थीं। सिर पर चांदी की परत अब इतनी घनी हो चली थी कि केवल कहीं-कहीं ही काले बालों की लकीरें झाँकती थीं। वह पहले से ही बहुत बदल चुकी थीं, पर फिर भी कोई जोखिम नहीं उठाना चाहती थीं। उन्होंने काँपते हाथों से अपनी ट्रंक खोली। उसमें उनकी गिनी-चुनी साड़ियाँ थीं। उन्होंने अपनी सबसे पुरानी, सबसे फीके रंग की सूती साड़ी निकाली। जिसका नीला रंग धुल-धुलकर लगभग सफ़ेद हो चला था, जगह-जगह से घिस भी चुकी थी। उन्होंने वह फीकी सी साड़ी पहनी, लेकिन दूसरे तरीके से। फिर उनका ध्यान अपने चश्मे पर गया। यह चश्मा... यह उनकी पहचान का अभिन्न हिस्सा था। इसी चश्मे के पीछे से उनकी आँखों ने रमेश का बचपन देखा था, रोहन को बढ़ते हुए देखा था। इस चश्मे से कोई भी उन्हें पहचान सकता था। उन्होंने चश्मा उतारा और बगल के कमरे में गंगा जी के पास गई, जिनका हाल ही में मोतियाबिंद का ऑपरेशन हुआ था। "गंगा बहन," उन्होंने अपनी आवाज़ को दबाते हुए कहा, "ज़रा अपना पुराना वाला चश्मा देना। मेरी आँखों में कुछ चुभ रहा है, धूप में देखने में तकलीफ़ होगी।" गंगा जी ने बिना कोई सवाल किए, अपना पुराना, मोटे काँच वाला और काले फ्रेम का चश्मा दे दिया। जैसे ही शारदा जी ने वह चश्मा अपनी आँखों पर लगाया, दुनिया धुँधली हो गई। सब कुछ अस्पष्ट और कोहरे में लिपटा सा नज़र आने लगा। पर शायद यही ज़रूरी था। इस धुँधलके के पीछे उनकी ममतामयी, जानी-पहचानी आँखें लगभग छिप गईं। उन्होंने कमरे के छोटे से आईने में खुद को देखा। एक पल को वह खुद भी सहम गई। आईना भी उन्हें पहचान नहीं पा रहा था। यह कोई और ही औरत थी- थकी हुई, हारी हुई, दुनिया की ठोकरें खाई हुई। यह शारदा नहीं थी, यह एक बेनाम परछाई थी। उन्होंने अपनी कमर को जान-बूझकर थोड़ा और झुका लिया, चाल में एक लाचारी और थकान का भाव ले आई और सिर पर साड़ी का पल्लू इस तरह से डाल लिया, कि उनका आधा चेहरा ढंक गया। अब वह पूरी तरह से तैयार थीं। वह शारदा जी नहीं थीं, रमेश की माँ नहीं थीं, रोहन की दादी नहीं थीं। वो तो कोई और ही औरत दिखाई दे रही थी, जिसे दुनिया की भीड़ में कोई नहीं देखेगा, कोई नहीं पहचानेगा। आश्रम से बाहर की दुनिया आज कुछ अलग ही लग रही थी उन्हें। एक साल से उन्होंने यह दुनिया नहीं देखी थी। ऑटो से उतरकर जब उन्होंने अपने मोहल्ले की गलियों में कदम रखा, तो उनका दिल किसी कैद पंछी की तरह ज़ोर ज़ोर से फड़फड़ाने लगा। यह वही गलियाँ थीं, जहाँ उन्होंने रमेश को उंगली पकड़कर चलना सिखाया था, जहाँ उन्होंने उसे पहली बार साइकिल चलाना सिखाया था और उसके गिरने पर दौड़ी थीं। वह नुक्कड़ वाली हलवाई की दुकान, जहाँ से रमेश जलेबियाँ खाने की ज़िद करता था। वह हर मोड़, हर दुकान, हर घर किसी भूली हुई कहानी की तरह उनके ज़हन में ताज़ा हो रहा था। उनकी आँखों के धुँधले शीशों के पीछे से यादों का एक साफ़-सुथरा चलचित्र चल रहा था। एक तरफ खुशियों भरा सुनहरा अतीत था, दूसरी तरफ पीड़ा से भरा स्याह वर्तमान। जैसे-जैसे उनका घर नज़दीक आ रहा था, उनके क़दम भारी होते जा रहे थे। हर क़दम के साथ एक डर था, एक झिझक थी। आखिरकार, वह उस मोड़ पर आ गई, जहाँ से उनका दो-मंज़िला घर साफ़ दिखाई देता था। घर वैसा ही था, पर आज उस पर एक नई नवेली दुल्हन की तरह श्रृंगार किया गया था। रंग-बिरंगे गुब्बारे और झालरें हवा में लहरा रही थीं। गेट को सुनहरे और काले गुब्बारों से खूबसूरती से सजाया गया था। संगीत की हल्की-हल्की आवाज़ बाहर तक आ रही थी। आज उनके रोहन के जन्मदिन का जश्न मनाने की तैयारी चल रही थी, जिसमें वह खुद एक बिन बुलाई मेहमान बनकर, एक अजनबी का भेष धरकर जा रही थीं। घर के बाहर लगा वह पुराना पीपल का पेड़, जिसकी छाँव में बैठकर वह अपनी सहेलियों के साथ घंटों बतियाती थीं, आज उन्हें एक पनाहगाह सा लगा। वह उसकी ओट में छिपकर खड़ी हो गई। हिम्मत जवाब दे रही थी। किस मुँह से, किस बहाने से वह अंदर जाएँ? वह इन्हीं उधेड़बुन में थीं कि तभी उन्होंने देखा कि उनके घर की कामवाली बाई, ललिता, तेज़ी से घर की ओर बढ़ी और दरवाज़े की घंटी बजाई। एक पल बाद दरवाज़ा खुला और सुनीता बाहर आई। पार्टी की तैयारियों और मेहमानों को सँभालने के तनाव में उसका चेहरा तमतमाया हुआ था "मेमसाहब, आज मैं काम पर नहीं आ पाऊँगी," ललिता ने घबराते और सहमे हुए स्वर में कहा। "मुझे किसी बहुत ज़रूरी काम से गाँव जाना पड़ रहा है।" "आज ही?" सुनीता उस पर किसी नागिन की तरह फुफकार पड़ी। "तुझे आज ही सारे ज़रूरी काम याद आ रहे हैं? तुझे पता है न घर पर पार्टी है, ढेर सारे मेहमान आने वाले हैं और तू छुट्टी माँग रही है?" "मेमसाहब, जाना बहुत ज़रूरी है, वरना मैं कभी छुट्टी न करती," ललिता ने अपनी आवाज़ में मिन्नत भरते हुए कहा। "आप आज के लिए कोई और इंतज़ाम कर लीजिए।" "कोई और इंतज़ाम?" सुनीता का पारा चढ़ गया। "मैं इस वक़्त आसमान से उतार कर लाऊँ किसी को? देख ललिता, एक काम कर, अगर तू नहीं आ सकती, तो अपनी सास को भेज दे। पर मुझे आज काम के लिए कोई न कोई चाहिए ही!" पेड़ के पीछे खड़ी शारदा जी ने सब कुछ सुन लिया। उनके कान सुन्न पड़ गए थे और दिमाग़ खाली हो गया था। ललिता ने एक पल सोचा और फिर बोली, "ठीक है मेमसाहब, अगर मेरी सास मान गई तो भेज दूँगी। पर उनकी भी तबीयत ठीक नहीं रहती। मैं ज़ोर-ज़बरदस्ती तो नहीं कर सकती।" "तू बस भेज दे! मुझे नहीं पता... वो बीमार हो, या मर रही हो, मुझे कामवाली चाहिए, मतलब चाहिए," सुनीता ने झल्लाकर दरवाज़ा लगभग पटकते हुए कहा और अंदर चली गई। ललिता निराश होकर वापस मुड़ गई। गली में एक पल के लिए सन्नाटा छा गया। पीपल के पत्तों की सरसराहट के बीच शारदा जी अपनी ही साँसों की आवाज़ सुन रही थीं। किस्मत का खेल देखो! जिस घर में 'माँ' बनकर जाने के सारे रास्ते बंद थे, उसी घर में एक 'कामवाली बाई' की जगह ख़ाली हो गई थी। नियति उन्हें एक मौक़ा दे रही थी, पर उसकी क़ीमत उनका स्वाभिमान, उनकी इज़्ज़त थी। एक पल को उनका मन हुआ कि वापस लौट जाएँ। इस ज़िल्लत से बेहतर तो आश्रम का वह घुटन भरा अकेलापन है। पर फिर धुँधले चश्मे के पार उन्हें रोहन का हँसता हुआ चेहरा दिखाई दिया। पोते के प्रति अंधी ममता ने उनके टूटे हुए आत्मसम्मान के टुकड़ों को समेटा और एक अजीब सी हिम्मत दी। उन्होंने अपनी साड़ी के पल्लू से आँखों के कोनों में आई नमी को पोंछा। आज उन्हें अपने पोते को नज़र भर देखने के लिए एक नौकरानी बनना था। वह पेड़ की ओट से बाहर निकलीं। उनके क़दम ज़मीन पर नहीं, अपने ही स्वाभिमान की राख पर पड़ रहे थे। उन्होंने एक लंबी, गहरी साँस ली और आगे बढ़कर दरवाज़े की घंटी पर अपनी काँपती हुई उंगली रख दी। घंटी की आवाज़ पर दरवाज़ा लगभग एक झटके से खुला। सामने सुनीता खड़ी थी, जिसका चेहरा तनाव और झल्लाहट से तमतमाया हुआ था। "कौन?" उसका सवाल किसी तीर की तरह शारदा जी के सीने में लगा। शारदा जी का कलेजा मुँह को आ गया। उन्होंने अपनी आवाज़ बदलकर, उसे भारी और धीमा करते हुए कहा, "मैं... मैं... शांति बाई..." उनका वाक्य पूरा होता, उससे पहले ही सुनीता के चेहरे पर चिड़चिड़ाहट की जगह, एक स्वार्थ भरी राहत ने ले ली। उसे लगा कि ललिता ने अपनी सास को भेज ही दिया। "अच्छा-अच्छा, समझ गई! ललिता ने भेजा है न? भगवान का शुक्र है तू आ गई! मैं तो परेशान हो गई थी," सुनीता ने शारदा जी का हाथ पकड़ते हुए कहा। उसे उस झुके हुए चेहरे या उन धुँधली आँखों में झाँकने की फुर्सत ही कहाँ थी। उसके लिए यह झुकी हुई काया महज़ एक समस्या का समाधान थी, दो हाथ जो घर का काम निपटा देंगे। वह उन्हें अंदर लगभग खींचते हुए ले गई और तेज़ी से दरवाज़ा बंद कर दिया। जैसे ही शारदा जी ने दहलीज़ के अंदर क़दम रखा, घर की जानी-पहचानी महक, एक तेज़ झोंके की तरह उनसे टकराई। यह वही घर था, जिसका हर कोना उनकी ममता और मेहनत का गवाह था। सामने के दीवान पर पड़े कुशन, जिनकी ग़िलाफ़ उन्होंने खुद अपने हाथों से सिली थी। दीवार पर लगी पूरे परिवार की वह बड़ी सी तस्वीर, जिसमें वह अपने पति और छोटे से रमेश के साथ खड़ी थीं। सब देखते-देखते उनकी आँखें डबडबा गई। लेकिन फिर उनकी नज़रें बेचैनी से अपने पोते रोहन को ढूँढने लगीं। "ऐ! खड़ी-खड़ी क्या देख रही है? काम करने ही आई है ना? तो वहाँ क्या कर रही है?" सुनीता ने कड़कती आवाज़ में कहा और फिर रसोई की तरफ़ इशारा करते हुए हुक्म देते हुए बोली, "सुन, पहले ये सारे गंदे बर्तन साफ़ कर दे, सिंक भरा पड़ा है। फिर सब्ज़ियाँ काट देना। जल्दी कर ज़रा, शाम को मेहमान आने वाले हैं।" शारदा जी ने एक शब्द नहीं कहा। वह चुपचाप रसोई में चली गई। सिंक बर्तनों से लबालब भरा था। रात की पार्टी के और सुबह के नाश्ते के बर्तन। उन्होंने नल खोला और बर्तन माँजने लगी। तभी अंदर के कमरे से बच्चों के खिलखिलाने की आवाज़ आई और एक पाँच साल का बच्चा तूफ़ान की तरह दौड़ता हुआ बाहर आया। उसने नीले रंग की एक सुंदर सी सिल्क की शेरवानी पहनी हुई थी, जिसमें वह बिल्कुल किसी नन्हे शहज़ादे जैसा लग रहा था। "रोहन?" उसे देखकर शारदा जी वहीं जड़ हो गई। उनके हाथ रुक गए। साबुन लगा गिलास हाथ से फिसलते-फिसलते बचा। उनका मन चीत्कार उठा कि दौड़कर उसे अपनी बाँहों में भर लें, उसके माथे को चूम लें और कहें, "जन्मदिन मुबारक हो मेरे लाल!" पर वह अपनी हैसियत जानती थीं। वह 'दादी' नहीं, 'शांति बाई' थीं। वह बस दूर से उसे निहारती रहीं, अपनी आँखों में उमड़ आए आँसुओं के सैलाब को पल्लू के कोने में सोखती रही। रोहन उन पर एक नज़र डाले बिना ही, अपनी मस्ती भरी दुनिया में मगन, दूसरे बच्चों के साथ खेलने के लिए बाहर भाग गया। उसने नहीं देखा कि रसोई में खड़ी एक बूढ़ी औरत की आँखें उसे ऐसे देख रही थीं, जैसे रेगिस्तान में भटकता कोई प्यासा, पानी को देखता है। दोपहर में रमेश घर आया। वह फोन पर किसी दोस्त से हँस-हँसकर बात कर रहा था, "हाँ यार, शाम को ज़रूर आना। अरे, पूरी फ़ैमिली के साथ आना। भाभी जी और बच्चों को लेकर आना, नहीं तो मैं नाराज़ हो जाऊँगा।" ऐसा कहकर वह एक बनावटी ठहाका लगाने लगा। उसकी नज़र रसोई में काम करती हुई 'शांति बाई' पर पड़ी। एक पल के लिए, बस एक पल के लिए उसे एक अनजाना सा अपनापन महसूस हुआ। उस झुकी हुई कमर और कद-काठी में कुछ ऐसा था, जो उसे अपनी माँ की याद दिला रहा था। पर अगले ही पल उसने इस ख़याल को झटक दिया। 'यह माँ कैसे हो सकती हैं? वह तो आराम से आश्रम में हैं। मैं भी क्या-क्या सोचने लगता हूँ' उसने अपनी ही माँ को नहीं पहचाना। वह अपनी ही दुनिया में इतना मशगूल था कि अपनी जन्म देने वाली माँ की परछाई तक को न देख सका और मस्ती में फ़ोन पर बात करता हुआ अंदर चला गया। शाम होते-होते घर मेहमानों से भर गया। रमेश के दोस्त, सुनीता की सहेलियाँ, कुछ दूर के रिश्तेदार, सब मौजूद थे। महफ़िल में महँगे इत्र की खुशबू, ऊँची आवाज़ वाले कहकहे और तेज़ संगीत का शोर गूँज रहा था। और शारदा जी उस शोर में एक मूक दर्शक की तरह, कभी मेहमानों को पानी के गिलास पकड़ातीं, कभी नाश्ते की प्लेटें लेकर घूमतीं। वह चुपचाप सिर झुकाए अपना काम करती जा रही थीं। केक काटा गया। "हैप्पी बर्थडे टू यू रोहन" की धुन पर तालियाँ बजीं। रोहन ने मोमबत्तियाँ बुझाईं और केक काटा। उसने केक का पहला टुकड़ा रमेश और सुनीता को खिलाया। शारदा जी दूर रसोई के दरवाज़े पर खड़ी यह सब देख रही थीं। उनका दिल चाह रहा था कि रोहन एक बार... बस एक बार उनकी तरफ़ भी देखे, पर उसकी दुनिया अपने दोस्तों, खिलौनों और तोहफ़ों में सिमटी हुई थी। तभी रमेश की एक बुजुर्ग रिश्तेदार, कमला जी, जिनकी नज़रें किसी को ढूँढ रही थीं, ने पूछ ही लिया, "रमेश बेटा, सब तो हैं, पर तुम्हारी माँ कहाँ हैं?" शारदा के बिना घर में ये उत्सव अधूरा सा लग रहा है। वह तो रोहन पर जान छिड़कती थीं। उनके जन्मदिन पर वह न हों, ऐसा तो हो ही नहीं सकता। कहीं गई हैं क्या?" यह सवाल एक तीर की तरह माहौल में चुभ गया। पर रमेश और सुनीता इस सवाल के लिए पहले से ही तैयार थे। सुनीता ने अपने चेहरे पर एक कुशल अभिनेत्री की तरह चिंता और प्यार भरी मुस्कान सजाई और बोली, "क्या बताएँ कमला आंटी! माँ जी तो तीर्थ यात्रा पर गई हैं। उनकी बरसों से इच्छा थी चारों धाम करने की। हम तो कह रहे थे कि बाद में चली जाइएगा, पर वह नहीं मानीं।" रमेश ने तुरंत बात को आगे बढ़ाया। उसकी आवाज़ में एक झूठा गर्व और आत्म-संतुष्टि थी। "हाँ आंटी, हमने तो बहुत मना किया कि इस उम्र में इतना कष्ट क्यों उठा रही हैं। पर वह कहने लगीं, 'बेटा, तुम लोगों के लिए अपनी सारी उम्र खपा दी, अब थोड़ा पुण्य भी कमा लूँ। पता नहीं कब ऊपर वाले का बुलावा आ जाए।' आख़िर, माँ की इच्छा से बढ़कर हमारे लिए क्या हो सकता है? हमने ही सारी बुकिंग करवाई है, बढ़िया व्यवस्था की है। अब चार धाम यात्रा पर गई हैं, कुछ महीने तो लग ही जाएँगे वापस आने में। कल ही उनसे फ़ोन पर बात हुई थी, बता रही थी, बहुत अच्छे से दर्शन हुए हैं उन्हें बद्रीनाथ धाम में! फ़ोन पर ही इतनी दुआएँ दे रही थी हमें, कि सुनकर ही सुकून मिल गया दिल को" यह सुनते ही महफ़िल में 'वाह-वाह' की गूँज उठ गई। "क्या बात है! ऐसे भी बेटे हैं आज की मतलबी दुनिया में!" एक दोस्त ने रमेश की पीठ थपथपाते हुए कहा, "यार रमेश, तू तो सच में आज का श्रवण कुमार है। आजकल के ज़माने में कौन माँ-बाप के लिए इतना सोचता है! सलाम है तुझे, भाई!" प्रशंसा के ये शब्द सुनकर जहाँ रमेश और सुनीता के चेहरे गर्व से दमक उठे थे, वहीं मेहमानों को कोल्ड ड्रिंक सर्व करती शारदा जी के लिए वो शब्द पिछले हुए शीशे के फव्वारे की तरह थे, जो सीधे उनके कानों में उतर रहे थे। उनकी आत्मा छलनी हो रही थी। जिस माँ का हाल जानने की बेटे को एक साल से फुर्सत नहीं थी, आज उसकी झूठी तीर्थ यात्रा के नाम पर वह अपनी महानता की इमारत खड़ी कर रहा था। यह धोखा, यह पाखंड, यह सफ़ेद झूठ... उनसे सहा नहीं गया। उनके काँपते हाथों में कोल्ड ड्रिंक से भरे गिलासों से भरी एक ट्रे थी। 'श्रवण कुमार' का ख़िताब सुनकर उनके हाथ की पकड़ ढीली पड़ गई। उनका दिमाग़ सुन्न हो गया, आँखों के आगे अँधेरा छा गया, संतुलन बिगड़ गया और ट्रे... छन्न... की एक दिल दहला देने वाली तेज़ आवाज़ के साथ संगमरमर के फ़र्श पर जा गिरी। पूरे फ़र्श पर कोल्ड ड्रिंक फैल गई, जिसके छींटे मेहमानों के कपड़ों पर भी पड़ गए थे। काँच के गिलास दर्जनों टुकड़ों में बिखर गए थे। संगीत बंद हो गया। महफ़िल में मौजूद हर एक शख़्स की नज़रें उस ओर घूम गई, जहाँ एक बूढ़ी कामवाली बाई बिखरे हुए काँच के टुकड़ों के बीच पत्थर की मूरत बनी कॉप रही थी। इससे पहले कि कोई कुछ समझ पाता, सुनीता का चेहरा गुस्से से तमतमा उठा। उसकी सारी बनावटी मुस्कान हवा हो गई और एक ज़हरीली नागिन की तरह वह फुफकार उठी। "अंधी हो क्या? दिखाई नहीं देता?" उसकी चीख़ती हुई आवाज़ उस ख़ामोशी को तोड़ती हुई निकली। "सत्यानाश कर दिया! एक काम ठीक से नहीं होता तुझसे? नुक़सान करने ही आई थी क्या?" शारदा जी की आत्मा तक कॉप उठी। वह अपनी ही बहू के मुँह से अपने लिए ऐसे शब्द सुन रही थीं। सुनीता का पारा सातवें आसमान पर था। वह शारदा जी के पास आकर गुस्से से बोली, "न जाने कहाँ-कहाँ से मुँह उठाकर चली आती हैं काम करने! काम करने का सलीक़ा नहीं, बस नुक़सान करना आता है! पैसे कटेंगे तेरे! पूरे पैसे काटूँगी इन गिलासों के, समझी?" सुनीता के ये अपमानजनक शब्द सुनकर कमला आंटी से रहा नहीं गया। वह आगे बढ़ीं और सुनीता का हाथ पकड़कर उसे शांत करने की कोशिश की। "अरे, क्या हो गया सुनीता, क्या हो गया?" उन्होंने नरमी से कहा। "बेचारी बूढ़ी औरत है, थक गई होगी, हाथ कॉप गए होंगे। कोई बात नहीं।" "क्या कोई बात नहीं आंटी?" सुनीता और भड़क गई। "आप नहीं जानतीं... जानती हूँ," कमला जी ने उसकी बात काटी। "काँच के गिलास ही तो टूटे हैं, कोई आसमान तो नहीं टूट पड़ा। छोड़ दे इसे, बेचारी वैसे ही डरी हुई है!" इसी हड़बड़ाहट और अपमान के बीच, जब शारदा जी काँपते हाथों से काँच के टुकड़े उठाने के लिए झुकीं, तो उनके सिर से साड़ी का पल्लू सरक गया। इससे पहले कि वो उसे सँभाल पातीं, घबराहट में उनका भारी, मोटे काँच वाला चश्मा भी फिसलकर खटाक से ज़मीन पर जा गिरा। एक पल के लिए वहाँ मौत का सा सन्नाटा छा गया। कमला जी, जो उन्हें तसल्ली देने के लिए झुकी ही थीं, उनकी नज़रें उस बेपरदा चेहरे पर पड़ीं और वहीं जम गई। उन आँखों में तैरती एक उम्र की पीड़ा, वो जाना-पहचाना चेहरा... उनका दिल बैठ गया। उनका मुँह खुला का खुला रह गया। उनकी आवाज़ एक काँपती हुई फुसफुसाहट में निकली, "शारदा...? शारदा... तुम? तुम शारदा ही हो ना? रमेश की माँ?" समय जैसे थम गया था। सच एक नग्न और क्रूर रूप में सबके सामने था। वह औरत, जिसे सब कामवाली बाई 'शांति' समझ रहे थे, वह कोई और नहीं, इस घर की मालकिन, रमेश की 'तीर्थ यात्रा' पर गई माँ, शारदा जी थीं। वही चेहरा, जिसे अभी-अभी 'श्रवण कुमार' बेटा याद कर रहा था। कमला आंटी की आँखों में अविश्वास तैर रहा था। वह एक क़दम आगे बढ़ीं। उन्होंने शारदा जी को ऊपर से नीचे तक देखा। फिर वो घूमीं और उनकी आग उगलती हुई नज़रें रमेश पर जा टिकीं। "रमेश, बेटा... ये... ये क्या है?" उनकी आवाज़ इतनी ऊँची थी कि हर मेहमान सुन सके। "तुम्हारी माँ तो... तीर्थ यात्रा पर थीं ना? यह कौन सी तीर्थ यात्रा है? जवाब दो!" रमेश और सुनीता के चेहरे सफ़ेद पड़ गए थे, जैसे किसी ने उनका सारा खून निचोड़ लिया हो। उनकी ज़बान तालू से चिपक गई। जिन चेहरों पर अभी कुछ देर पहले प्रशंसा की चमक थी, अब उन पर शर्मिंदगी और पकड़े जाने की कालिख़ पुत गई थी। जिन मेहमानों ने कुछ देर पहले रमेश की पीठ थपथपाई थी, वे अब घृणा और अविश्वास से उसे देख रहे थे। यह शब्द नहीं, तमाचे थे जो रमेश और सुनीता के ज़मीर पर एक-एक करके पड़ रहे थे। कुछ ही देर में सब लोग निकल गए। पीछे रह गया वह सजा-सजाया घर, बिखरे हुए तोहफ़े, आधा खाया हुआ केक, और फ़र्श पर पड़े काँच के वो टुकड़े... और उन सबके बीच खड़े थे रमेश और सुनीता, जो खुद को ज़मीन में गड़ने जैसी स्थिति में पा रहे थे। तो दोस्तों, आपको क्या लगता है? शारदा जी ने जो किया, क्या वह सही था? अपनी राय कमेंट बॉक्स में ज़रूर लिखें और यह भी बताएँ कि आप यह कहानी भारत के किस शहर से सुन रहे हैं। अगर कहानी पसंद आई हो, तो वीडियो को लाइक और चैनल को सब्सक्राइब ज़रूर करें और वीडियो को शेयर करना बिल्कुल न भूलें। धन्यवाद।

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