[0:00]इंजीनियरिंग टीम ने जब टनल की खुदाई शुरू की तो एक मौके पर पहाड़ के अंदर छुपा हुआ पानी जेट प्रेशर की तेजी से टनल में भरने लगा।
[0:09]और सैलाब की सूरत हाल पैदा हो गई। स्विटजरलैंड में वाक्य एक गोट हार्ड बेस टनल को इंजीनियरिंग की दुनिया का माउंट एवरेस्ट भी कहा जाता है।
[0:18]57 किलोमीटर की लंबाई के साथ ये ना सिर्फ दुनिया का सबसे लंबा टनल है बल्कि ढाई किलोमीटर की गहराई में बना दुनिया का सबसे गहरा टनल भी है।
[0:29]यह टनल पूरे यूरोप की जरूरत क्यों बन चुका था?
[0:33]इंजीनियरिंग टीम ने पहाड़ के अंदर गिरते हुए पत्थरों, तेज बहते हुए पानी और इसमें से गुजरने वाली ट्रेन के शीशे तोड़ने वाली हवा का क्या हल निकाला?
[0:44]जैब टीवी की वीडियोस में एक बार फिर से खुशामदीद।
[0:47]नाजरीन यूरोप के नक्शे को गौर से देखा जाए तो इसके बीच में पहाड़ों की एक ऐसी दीवार खड़ी है जिसने बरसों से ट्रेड और ट्रेवल के लिए रुकावट खड़ी कर रखी है।
[0:58]पहाड़ों की इस दीवार को दी एल्प्स कहा जाता है।
[1:01]सदियों से लोग इनके ऊपर से लंबे जिगजैग रास्तों में ट्रैवल करते जबकि कभी बर्फ तो कभी एवलांच रास्ता बंद करने में देर नहीं करते थे।
[1:11]यहां पहाड़ों पर ब्रिजेस बनाए गए, रेलवे ट्रैक्स भी बढ़ाए गए लेकिन स्टीप पहाड़ियों पर ट्रेन का चढ़ना भी काफी दुश्वार और टाइम टेकिंग था।
[1:21]इसके बाद वक्त के साथ-साथ एक और बड़ा मसला खड़ा हो गया।
[1:25]यूरोप की इकॉनमी को बढ़ाने के लिए और ज्यादा सामान एक मुल्क से दूसरे मुल्क में भेजने के लिए अब बात इन जिगजैग रास्तों से काफी बढ़ चुकी थी।
[1:35]नॉर्थ यूरोप की फैक्ट्रीज और साउथ यूरोप के सी पोर्ट्स दोनों एक दूसरे पर डिपेंड करते थे।
[1:42]इस मसले को सॉल्व करने के लिए इंजीनियर्स के पास सिर्फ दो ही रास्ते थे।
[1:46]या तो पहाड़ों के ऊपर मजीद मुश्किल और चौड़ी सड़कें बनाई जाएं या फिर कुछ ऐसा किया जाए जो सदियों से इंपॉसिबल समझा जाता था।
[1:55]उन्होंने फैसला किया कि वह पहाड़ के ऊपर से नहीं बल्कि उसके ठीक बीच में से एक ऐसी टनल निकालेंगे जो दुनिया की सबसे लंबी और सबसे गहरी टनल होगी।
[2:07]पर यह मिशन जितना सुनने में आसान लग रहा है हकीकत में उतना ही खौफनाक।
[2:13]जमीन के इतना नीचे जहां पहाड़ का वजन किसी भी स्टील की दीवार को कागज की तरह फाड़ सकता था।
[2:20]इंजीनियर्स को मालूम था कि उनका मुकाबला सिर्फ मिट्टी और पत्थरों से नहीं बल्कि कुदरत की उन ताकतों से होने वाला है जिन्हें पहले कभी किसी ने चैलेंज नहीं किया था।
[2:31]गॉटहार्ट बेस टनल की कंस्ट्रक्शन कोई आम कंस्ट्रक्शन नहीं बल्कि इसका सबसे बड़ा दुश्मन था इंतहा से ज्यादा प्रेशर।
[2:40]क्योंकि इस टनल की खुदाई 2500 मीटर ऊंचे पहाड़ के नीचे होनी थी जिसका मतलब है कि टनल की दीवारों पर मुसलसल पहाड़ का लाखों करोड़ों टन वजन हर वक्त पड़ता रहेगा।
[2:52]इस प्रेशर को एक्सपीरियंस करने के लिए इंजीनियर्स ने पहले छोटी सुरंग खोदने की कोशिश की लेकिन पहाड़ का प्रेशर सुरंग को वापस बंद करने की कोशिश करने लगा।
[3:03]लेकिन यह तो सिर्फ शुरुआत थी। दूसरा बड़ा चैलेंज था हद से ज्यादा गर्मी।
[3:08]जमीन हो या पहाड़ दोनों की इतनी गहराई में टेंपरेचर 50 डिग्री सेल्सियस तक आसानी से पहुंच जाता है।
[3:15]इतनी गर्मी में इंसान 15 से 20 मिनट से ज्यादा काम नहीं कर सकता और कूलिंग सिस्टम फेल होने की सूरत में यह टनल वर्कर्स के लिए एक जिंदा कब्र बन सकती है।
[3:27]प्रेशर और गर्मी के बाद इंजीनियरिंग टीम के लिए सबसे खौफनाक दुश्मन था पानी का प्रेशर।
[3:33]यह कोई आम अंडरग्राउंड पानी नहीं था।
[3:36]यह सदियों से छुपा हुआ वह प्रेशर था जो अगर अचानक निकल जाए तो कंक्रीट की दीवार को किसी तोप के गोले की तरह चीर कर रख सकता है।
[3:45]यही वजू हात थी कि दुनिया भर के नामी ग्रामीण इंजीनियर्स ने पहले साफ-साफ कह डाला कि यह टनल बन ही नहीं सकता।
[3:53]उनका कहना था कि इतने लंबे और गर्म टनल में मशीनस ही दम तोड़ जाएंगी।
[3:59]वर्कर्स का सरवाइव करना कैसे मुमकिन होगा?
[4:02]इसके अलावा दोनों साइड से खोदी जाने वाली टनल्स 57 किलोमीटर के फासले से खोदी जाएंगी।
[4:09]अगर अलाइनमेंट में एक मिलीमीटर का भी फर्क आ गया तो दोनों टीम्स पहाड़ के अंधेरों में ही भटक जाएंगी और करोड़ों डॉलर्स खाक में मिल जाएंगे।
[4:19]पर स्विटजरलैंड के लिए यह सिर्फ एक प्रोजेक्ट नहीं बल्कि सर्वाइवल का सवाल था।
[4:24]हर साल हजारों ट्रक्स एल्प्स से गुजरते पोल्यूशन बढ़ रहा था और रास्ते अपनी लिमिट्स पार कर चुके थे।
[4:32]अगर अब भी यह टनल ना बनता तो पूरे यूरोप का ट्रेड सिस्टम को लप्स होकर रह जाता।
[4:38]स्विटजरलैंड ने फैसला कर लिया कि खर्चा बेशक जितना भी हो दुनिया का यह सबसे बड़ा करिश्मा बनकर रहेगा।
[4:46]अब सवाल यह नहीं था कि टनल बनेगा या नहीं।
[4:49]सवाल था कि इन चैलेंजिस का सामना कैसे किया जाएगा।
[4:53]27 सितंबर 1992 को यह प्रोजेक्ट ऑफिशियली अप्रूव हो गया।
[4:58]यह कोई आम सुरंग नहीं थी इसका स्केल इंसानी सोच की हदों को पार कर रहा था।
[5:04]गॉटहार्ट बेस टनल की टोटल लंबाई रखी गई 57 किलोमीटर।
[5:10]यानी दिल्ली से गाजियाबाद या फिर लाहौर से कसूर इतना बड़ा फासला वह भी ढाई किलोमीटर पहाड़ के अंदर।
[5:18]मगर इंजीनियरिंग की दुनिया में लंबाई सिर्फ एक नंबर नहीं बल्कि यह चैलेंज की शिद्दत बताती है।
[5:24]रूल यह था कि टनल जितना लंबा होगा गलती का खतरा उतना ही बढ़ जाएगा।
[5:30]इंजीनियर्स को पहाड़ के दोनों साइड से खुदाई शुरू करनी थी और दोनों टनल्स को ठीक 57 किलोमीटर के सेंटर में मिलना था।
[5:38]अगर कैलकुलेशन में सिर्फ एक सेंटीमीटर का भी फर्क रह गया तो दोनों टनल्स कभी एक दूसरे से नहीं मिल पाएंगे।
[5:47]इस मुश्किल को हल करने के लिए लेजर नेविगेशन और जीपीएस टेक्नोलॉजी की मदद से कैलकुलेशंस की गई कि दोनों साइड्स पर ठीक सुराख कहां पर करना है।
[5:57]इस नामुमकिन को मुमकिन बनाने के लिए दुनिया की सबसे अजीम टनल बोरिंग मशीनस बनाई गई।
[6:03]यह मशीनस इतनी बड़ी थी कि इनका कटर हेड दो मंजिला घर से भी ऊंचा था।
[6:08]टोटल लंबाई की बात की जाए तो यह टीबीएम जिसको सिसी का नाम दिया गया था 450 मीटर लंबी थी लगभग आधा किलोमीटर।
[6:17]लेकिन इतनी जाइंट मशीनस होने के बावजूद ये रोजाना सिर्फ कुछ ही मीटर्स पहाड़ काट रही थी।
[6:24]यह सिर्फ मशीनस नहीं थी यह इंजीनियर्स के लिए सबर का ऐसा इम्तिहान था जो अगले 17 साल तक चलने वाला था।
[6:32]डिगिंग के साथ-साथ एक जंग और भी लड़ी जा रही थी और वह थी निकले हुए पत्थर की जंग।
[6:38]गॉटहार्ट बेस टनल की खुदाई के दौरान पहाड़ के पेट से तकरीबन तीन करोड़ टन मलबा निकाला गया।
[6:46]यह इतना ज्यादा मलबा था कि इसे एक जगह जमा करें तो उससे एक पूरा नया पहाड़ खड़ा हो सकता है।
[6:52]सैकड़ों ट्रक्स दिन रात सिर्फ इस मलबे को बाहर निकालने में मसरूफ रहते थे।
[6:58]हर रोज हजारों वर्कर्स जमीन की गहराई में उतरते जहां ना दिन का पता था ना रात का ना कोई फोन सिग्नल और ना ही ताजा हवा।
[7:07]वहां था तो सिर्फ मशीनस का शोर, मिट्टी की नम खुशबू और एक ऐसी अंडरग्राउंड दुनिया जहां एक वक्त में 2600 वर्कर्स रहते और काम करते थे।
[7:19]लेकिन जल्द ही इंजीनियर्स को एहसास हो गया कि उनका असल दुश्मन टनल की लंबाई नहीं है।
[7:25]जब खुदाई पहाड़ की गहराई तक पहुंची तो इंजीनियर्स का सामना एक ऐसे दुश्मन से हुआ जिसकी उम्मीद तो थी लेकिन तैयारी नहीं।
[7:34]जमीन से 2 किलोमीटर नीचे पहाड़ के पत्थर अपनी गर्मी बाहर निकालते।
[7:40]जैसे-जैसे मशीनस आगे बढ़ती टेंपरेचर हदों को पार करने लगा।
[7:44]पहले 30, फिर 40 और आखिर में 50 डिग्री सेल्सियस।
[7:48]अब यह कोई कंस्ट्रक्शन साइट नहीं रही बल्कि एक ओवन बन चुकी थी।
[7:54]गॉटहार्ट बेस टनल के शुरुआती दिनों में हाल यह था कि जब वर्कर्स नीचे उतरते तो चंद ही मिनटों में पसीने से शराबोर हो जाते।
[8:03]मशीन चलाने वालों को सिर्फ दो से तीन घंटों की शिफ्ट्स दी जाती वरना हीट स्ट्रोक का खतरा बढ़ जाता था।
[8:10]इस मसले को हल करने के लिए कूलिंग पाइप्स बिछाए गए जिसमें टनल के बाहर से ठंडा पानी चलाया गया।
[8:17]यह दुनिया की पहली कंस्ट्रक्शन साइट थी जहां पहले वर्कर्स के लिए एनवायरनमेंट बनाया गया फिर कंस्ट्रक्शन शुरू हुई।
[8:24]आहिस्ता-आहिस्ता उनको मालूम पड़ा कि गर्मी का मसला तो सिर्फ एक शुरुआत थी।
[8:29]असली दहशत तो पहाड़ का वह प्रेशर था जो कदम-कदम पर उनका इम्तिहान ले रहा था।
[8:35]पत्थरों पर क्रैक्स बिना वार्निंग के चट्टानों का कोलैब्स हो जाना यह रोज का मामूल बन चुका था।
[8:42]इस मसले को हल करने के लिए वर्कर्स फौरन उस हिस्से पर कंक्रीट का मिक्सचर स्प्रे करते।
[8:48]कुछ जगहों पर प्री कास्ट कंक्रीट स्लैब्स लगाए गए और कहीं-कहीं आर्टिफिशियल स्केलेटन बनाने के लिए स्टील की रिंग्स का इस्तेमाल किया गया।
[8:58]इससे हुआ यह कि अंदर के कमजोर पत्थर को सपोर्ट मिलती गई।
[9:02]अब कमजोर पत्थरों के गिरने का हल तो निकल आया पर आगे इंजीनियर्स ने एक ऐसे खतरे का सामना किया जो पत्थरों की तरह सॉलिड नहीं बल्कि लिक्विड था पानी।
[9:13]बोरिंग के दौरान एक वक्त ऐसा आया जब पहाड़ों के अंदर से पानी का सैलाब निकल पड़ा।
[9:18]पहाड़ों के अंदर पत्थरों की एक जैसी किस्म नहीं होती है।
[9:23]कहीं पत्थर इंतहा सख्त होते हैं तो कहीं पर काफी सॉफ्ट।
[9:27]और जैसे जमीन के नीचे पानी के जखीरे होते हैं पहाड़ों के क्रैक्स के अंदर भी पानी स्टोर होता है और क्योंकि यह पानी पहाड़ों के बोझ तले होता है इसका प्रेशर 2900 पीएसआई तक हो सकता है।
[9:42]यह ऐसे ही है जैसे सिर्फ एक इंच पर गाड़ी जितना वजन रख दिया जाए।
[9:47]इस मुश्किल को हल करने का एक ही तरीका था कि पानी को सॉलिड फॉर्म में तब्दील कर दिया जाए।
[9:53]इस काम के लिए बोरिंग से पहले छोटे पाइप्स ड्रिल किए गए जिनमें फ्रीजिंग लिक्विड चलाया गया।
[9:59]कई हफ्तों तक यह प्रोसेस ऐसे ही चलता रहा और फिर आखिरकार पहाड़ों का पानी फ्रीज होकर सॉलिड बन गया।
[10:07]अब अगर टीबीएम यहां बोरिंग करेगी तो जमा हुआ पानी नॉर्मल पत्थर की तरह ही टिका रहेगा।
[10:14]पानी वाले पोर्शन पर बोरिंग के बाद कंक्रीट लाइनिंग लगाकर फ्रीजर बंद कर दिया जाता।
[10:19]पर इंजीनियर्स ने एक और काम भी किया कि उन्होंने टनल के कंक्रीट स्लैब्स और पहाड़ के बीच पानी गुजरने के लिए कलेक्शन पॉइंट्स भी छोड़ दिए।
[10:29]ताकि पानी बाद में टनल की दीवारों पर प्रेशर ना डाले बल्कि आराम से बहकर टनल से बाहर निकल सके।
[10:36]इस आखिरी रुकावट के बाद अब सिर्फ एक ही चीज का इंतजार था।
[10:40]वह लम्हा जब टनल के दोनों सिरे आपस में मिलेंगे।
[10:44]15th अक्टूबर 2010 पूरी दुनिया की नजरें स्विटजरलैंड पर जमी थी।
[10:49]पहाड़ के दिल में जमीन से ढाई हजार मीटर नीचे दोनों तरफ से आने वाली टीम्स अब सिर्फ एक पतली सी दीवार के फासले पर थी।
[10:59]सबके जहन में एक ही सवाल था क्या 17 साल की मेहनत रंग लाएगी या बिलियंस ऑफ डॉलर्स की 57 किलोमीटर लंबी कब्र बनेगी।
[11:09]अचानक सिसी मशीन का जाइंट कटर हेड आखिरी दीवार को चीर कर बाहर निकल आया।
[11:15]यह लम्हा पूरे यूरोप के लिए एक हिस्टोरिक मोमेंट था।
[11:19]जब कैलकुलेशंस चेक की गई तो दोनों टनल्स में सिर्फ आधे इंच का फर्क था।
[11:25]यह एक्यूरेसी ऐसी थी जैसे किसी ने 50 किलोमीटर दूर से सुई में धागा डाला हो।
[11:30]यहां तक आपको भी लग रहा होगा कि सबसे बड़ा दुश्मन पत्थर और पानी ही था पर असल में यहां सबसे बड़ा दुश्मन कोई और नहीं बल्कि टनल के अंदर की हवा थी।
[11:41]कंस्ट्रक्शन कंप्लीट होने के बाद जब हाई स्पीड ट्रेन गॉटहार्ट बेस टनल के अंदर तेजी से घुसेगी तो अंदर की हवा को बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं मिलेगा।
[11:51]जिसकी वजह से एक शॉक वेव पैदा होगी जो ट्रेन की विंडोज को धमाके से चकनाचूर कर देगी।
[11:59]खुशकिस्मती से यह मसला पहले से ही अजूम कर लिया गया था जिसके चलते यहां एक नहीं बल्कि दो टनल्स बनाए गए।
[12:07]हर कुछ मीटर्स के बाद दोनों टनल्स के बीच रास्ता भी बनाया गया और कुछ वेंटिलेशन शाफ्ट्स भी बनाई गई जो ट्रेन के गुजरने से पैदा होने वाली शॉक वेव को बाहर निकलने का रास्ता दे सके।
[12:19]पर सोचें अगर इस अनदेखी ताकत के बारे में पहले से ना सोचा जाता तो 17 सालों की मेहनत और अरबों डॉलर्स खाक में मिल जाते।
[12:29]गॉटहार्ट बेस टनल का आइडिया सबसे पहले 1940 में दिया गया था लेकिन इंजीनियरिंग चैलेंजिस की वजह से इसका काम 1993 में शुरू हुआ।
[12:38]इसकी कंस्ट्रक्शन में 17 सालों का वक्त 2600 वर्कर्स की खून पसीने की मेहनत और 12.5 अरब डॉलर्स का खर्चा आया।
[12:49]इसके ऊपर पहाड़ की ऊंचाई तीन बुर्ज खलीफा की ऊंचाई जितनी है।
[12:53]दोनों तरफ से आने वाले टनल्स को सीधा एक सीध में अलाइन रखने के लिए जीपीएस गायरो स्कोप्स और लेजर नेविगेशन का इस्तेमाल किया गया।
[13:02]गॉटहार्ट बेस टनल इतना लंबा है कि इसको अर्थ के कर्वेचर के हिसाब से कैलकुलेट किया गया।
[13:08]टनल की खुदाई में जो मलबा निकाला गया अगर इस मलबे को शेप दी जाए तो पांच ग्रेट पिरामिड्स बन सकते थे।
[13:16]पर स्विटजरलैंड ने इस मलबे से लेक लूसर्न में छोटे-छोटे आर्टिफिशियल आइलैंड्स बना दिए।
[13:22]450 मीटर लंबी सिसी टीबीएम ने अकेले इतनी बिजली इस्तेमाल की जितनी 20000 घरों में होती है।
[13:30]इस वीडियो के आखिर में मैं उन नौ हीरो वर्कर्स को सलाम पेश करना चाहता हूं जो मुख्तलिफ हादसात में पहाड़ के अंदर से कभी नहीं निकल सके।
[13:39]उनकी याद में टनल की एंट्रेंस पर एक मेमोरियल भी बनाया गया है ताकि दुनिया को याद रह सके कि इस इंजीनियरिंग मार्वल की असल कीमत क्या थी।
[13:49]उम्मीद है जम टीवी की यह वीडियो भी आप लोग भरपूर लाइक और शेयर करेंगे।
[13:54]आप लोगों के प्यार भरे कमेंट्स का बेहद शुक्रिया।
[13:58]मिलते हैं अगली शानदार वीडियो में।



