[0:00]आपने हिडन ट्रेजर पर बनी वो फ़िल्में या कहानियां जरूर देखी या सुनी होंगी जिनमें हजारों करोड़ की दौलत को किसी रहस्यमई जगह पर छुपा दिया जाता था। और उसे पाने के लिए कोड्स, सिंबल्स, पहेलियों और हिस्टोरिकल क्लूज़ की एक पूरी चेन को डीकोड करना पड़ता था। कहानी अक्सर एक छोटे से क्लू से शुरू होती थी जो धीरे-धीरे एक ऐसे रहस्य का दरवाजा खोलती थी जिसके पीछे सदियों पुराना खजाना छुपा होता था। लेकिन जरा सोचिए अगर ऐसी कोई कहानी सिर्फ फिल्मों तक सीमित ना हो बल्कि असल इतिहास में भी घट चुकी हो तो? आज की कहानी आपको समय के भारत में ले जाएगी जब सिंधिया डायनेस्टी ने अपनी हजारों करोड़ की संपत्ति को एक बेहद रहस्यमई तरीके से ग्वालियर फोर्ट में छुपाया था। इस खजाने को ग्वालियर किले के भीतर बने तहखानों की एक जटिल भूल भुलैया में रखा गया था और वहां तक पहुँचने का रास्ता सिर्फ एक सीक्रेट कोड था जिसे बीजक कहा जाता था। वो कोड सिर्फ राजा के पास हुआ करता था और परंपरा यह थी कि राजा मरने से पहले अपने उत्तराधिकारी को यह कोड देकर जाता था। ताकि खजाने का रहस्य सिर्फ राजघराने के भीतर ही सीमित रहे। दशकों तक यह सिलसिला बिना किसी रुकावट के चलता रहा लेकिन फिर एक ऐसी चूक हुई जिसने पूरे खेल को पलट कर रख दिया। साल 1886 में एक सिंधिया राजा की मृत्यु हो जाती है और वह अपने उत्तराधिकारी को यह सीक्रेट कोड बताए बिना ही दुनिया से चले जाते हैं। इससे सदियों से सुरक्षित रखा खजाना जिसकी कीमत हजारों करोड़ में आकी जाती है एक ही झटके में सिंधिया परिवार से दूर चला जाता है। इसके बाद शुरू होती है उस खोए हुए खजाने की ऐसी तलाश जिसमें इतिहास, रहस्य और रोमाँच एक साथ जुड़ जाते हैं। तो आइए जानते हैं, द लॉस्ट ट्रेजर ऑफ द सिंधिया डायनेस्टी की पूरी कहानी। कौन थे वह सिंधिया राजा जिन्होंने इस खजाने को इतने जटिल तरीके से छुपाया था? कैसे एक छोटी सी चूक ने हजारों करोड़ की संपत्ति से सिंधिया परिवार को दूर कर दिया और आखिर उस खोए हुए खजाने का क्या हुआ?
[1:54]इस पूरी कहानी की शुरुआत 18th सेंचुरी में महाराष्ट्र के सतारा के कनेरखेड़ गांव से हुई थी जहां शिंदे परिवार रहता था। तब महाराष्ट्र सहित साउथ, वेस्ट और नॉर्थ इंडिया के कई इलाकों पर मराठों का शासन हुआ करता था जिसकी कमान छत्रपति शिवाजी महाराज के पोते छत्रपति शाहूजी महाराज के हाथों में थी। शाहूजी महाराज ने अपने रिजाइम में पेशवा को काफी पावर दे रखी थी। पेशवा एक पद था जो मराठा एंपायर में प्राइम मिनिस्टर की हैसियत रखते थे। उस दौरान पेशवा पद एक बेहद ब्रेव और स्किल्ड फाइटर पेशवा बाजीराव वन संभाल रहे थे। उन दिनों पेशवा बाजीराव वन का राणोजी शिंदे नाम का एक सेवक हुआ करता था। अंग्रेज इंडियन लैंग्वेज के शब्दों का अच्छे से प्रोननसिएशन नहीं कर पाते थे और वह शिंदे को अक्सर सिंधिया कहकर बुलाते थे। ऐसे में राणोजी शिंदे को राणोजी सिंधिया भी कहा जाने लगा। एक रोज पेशवा बाजीराव की छत्रपति शाहू महाराज से किसी मुद्दे को लेकर एक लंबी मुलाकात चल रही थी और इस दौरान उनके साथ उनके सेवक राणोजी सिंधिया भी थे। मुलाकात काफी लंबी खिंच गई और ऐसे में राणोजी सिंधिया को राज दरबार के बाहर ही लंबा इंतजार करना पड़ा। काफी देर के बाद जब पेशवा बाजीराव छत्रपति शाहू महाराज से मुलाकात करके बाहर आए तो उन्होंने देखा कि उनके सेवक राणोजी जमीन पर सो रहे हैं। लेकिन नींद में होने के बावजूद उन्होंने उनकी जूतियां अपने सीने से कसकर लगा रखी है। उस दौर में दुश्मन राजाओं, पेशवाओं और ऊंचे पदों के लोगों की जूतियों में जहर लगाकर उन्हें मारने की कोशिश में रहते थे। ऐसे में जब पेशवा बाजीराव ने राणोजी को अपनी जूतियां नींद में भी संभाले देखा तो वो उनकी वफादारी से काफी खुश हुए और उन्हें अपनी खास टुकड़ी पागा में शामिल कर लिया। राणोजी अपनी बहादुरी और युद्ध कौशल से जल्द ही पेशवा बाजीराव के इतने करीब हो गए कि बाजीराव ने पहले उन्हें अपना बॉडीगार्ड और फिर मराठा सेना की एक टुकड़ी का जनरल बना दिया। इतना ही नहीं 1728 में जब पेशवा बाजीराव ने मालवा को मुगलों से छीना तो उन्होंने राणोजी को वहां का सूबेदार बना दिया और उन्हें वहां से टैक्स वसूलने का अधिकार भी दे दिया जिसका 65% हिस्सा वह अपने पास रख सकते थे। राणोजी ने इसके बाद मराठों की ओर से कई बड़ी लड़ाइयों में मराठा सेनापति के रूप में हिस्सा लिया और उनमें जीत हासिल की। जहां उन्होंने निजाम उल मुल्क के दांत खट्टे किए तो वहीं उन्होंने पुर्तगालियों की ईंट से ईंट बजाकर अपनी बहादुरी का लोहा मनवाया। उनकी काबिलियत को देखते हुए पेशवा बाजीराव ने उन्हें मालवा हमेशा के लिए सौंप दिया और यहीं से सिंधिया डायनेस्टी की इस्टैब्लिशमेंट हुई। ऐसे में राणोजी सिंधिया ने साल 1731 में उज्जैन को अपनी राजधानी बनाया और खुद को एक फ्री रूलर डिक्लेयर कर दिया। करीब 14 सालों तक राणोजी सिंधिया ने शासन किया और साल 1745 में उनकी मौत हो गई। उनकी मौत के बाद सिंधिया डायनेस्टी डगमगाने लगी। राणोजी के बड़े बेटे जयप्पा की हत्या करवा दी गई और रही सही कसर 1761 में अफगानों और मराठों के बीच हुई पानीपत की तीसरी लड़ाई ने पूरी कर दी। इस जंग ने मराठों के साथ-साथ सिंधिया परिवार की लगभग एक पूरी पीढ़ी को एक ही झटके में निगल लिया। ऐसा लग रहा था कि सिंधिया डायनेस्टी अपनी इस्टैब्लिशमेंट के कुछ ही साल बाद ही खत्म हो जाएगी। लेकिन अभी भी उम्मीद की एक धीमी लौ युद्ध के मैदान में आखिरी सांस से गिन रही थी। यह घायल योद्धा कोई और नहीं बल्कि राणोजी सिंधिया के सबसे छोटे बेटे महादजी सिंधिया थे। जिन्हें एक भिश्ती किसी तरह अपनी बैलगाड़ी में डालकर दक्कन लेकर आया। यहीं से महादजी सिंधिया के उस सफर की शुरुआत हुई जो उन्हें दिल्ली का किंग मेकर बनाने वाला था। महादजी को समझ आ गया था कि अंग्रेजों की बढ़ती ताकत का मुकाबला पुरानी तरकीबों से नहीं किया जा सकता। ऐसे में उन्हें एक ऐसी फौज की जरूरत थी जो यूरोपियन स्टाइल में लड़ सके। इसलिए उन्होंने एक फ्रांसीसी कमांडर बेनवा द बोइन को अपनी सेना में रख लिया। द बोइन की मदद से महादजी ने कुछ ही सालों में पैदल सेना की 16 बटालियन, 500 तोपे और एक लाख से ज्यादा घुड़सवारों की एक ताकतवर फौज खड़ी कर ली। इसके दम पर उन्होंने सिंधिया एंपायर का विस्तार साउथ में नर्मदा नदी से लेकर नॉर्थ में सतलज नदी तक और ईस्ट में प्रयागराज से लेकर वेस्ट में जयपुर, जोधपुर और भरूच तक कर लिया। इतना ही नहीं महादजी सिंधिया ने दिल्ली के मुगल बादशाह शाह आलम सेकंड को दो बार उसकी छीनी हुई सत्ता वापस दिलवाई थी। पहली बार महादजी सिंधिया ने शाह आलम सेकंड को उसके ही वजीर अफरासियाब खान से बचाया और दूसरी बार रोहिल्ला सरदार गुलाम कादिर को मरवाकर बचाया था जिसने शाह आलम सेकंड से ना केवल दिल्ली की गद्दी छीन ली थी बल्कि शाह आलम सेकंड की आंखें भी निकलवा ली थी। इस मदद के बदले में महादजी सिंधिया मुगलों के वकील उल मुतलक यानी संरक्षक बन गए। इसका मतलब था कि मुगल बादशाह केवल नाम मात्र का शासक रह गया था और वह अपने सारे फैसले महादजी सिंधिया के कहे अनुसार लेता था। महादजी एक महान योद्धा थे और उनका सपना भारत की सभी ताकतों को अंग्रेजों के खिलाफ एकजुट करना था। लेकिन 1794 में उनकी मौत के साथ यह सपना अधूरा रह गया और यहीं से शुरू होता है सिंधिया डायनेस्टी का एक ऐसा दौर जिसमें सत्ता के साथ-साथ उनके खजाने की कहानी भी आगे बढ़ती है। यह वही खजाना था जिसे महादजी सिंधिया ने अपनी पत्नी गंगाबाई के नाम पर गंगाजली नाम दिया था जिसमें सोने चांदी हीरे जवाहरात और दौलत का विशाल भंडार शामिल था। दरअसल महादजी की नौ पत्नियां थी लेकिन उनके कोई बेटा नहीं था। मौत से पहले उन्होंने अपने भतीजे दौलतराव सिंधिया को अपना वारिस चुना था। लेकिन दौलतराव महादजी सिंधिया के मुकाबले एक कमजोर शासक साबित हुए और अंग्रेजों से एक के बाद एक लड़ाइयों में दिल्ली, आगरा, जयपुर और जोधपुर जैसे बड़े इलाके हार गए। लगातार मिल रही हार के बाद दौलतराव सिंधिया समझ चुके थे कि अगर उन्होंने अपने चाचा द्वारा अर्जित संपत्ति को सुरक्षित नहीं किया तो वह कहीं के नहीं रहेंगे। इस दौरान सिंधिया डायनेस्टी के कंट्रोल में ग्वालियर भी था इसलिए दौलतराव सिंधिया ने वक्त की नजाकत को समझते हुए 1810 में अपनी राजधानी उज्जैन से ग्वालियर शिफ्ट कर दी। ग्वालियर फोर्ट जो पहले से ही इंडिया के सबसे सिक्योर और ग्रैंड फोर्ट्स में गिना जाता था अब सिंधिया के पावर का सेंटर बन गया। ग्वालियर को अपनी राजधानी बनाने के बाद दौलतराव सिंधिया ने ग्वालियर फोर्ट के नीचे कई सीक्रेट अंडरग्राउंड चैंबर्स बनवाए जो अननोन लोगों के लिए पूरी तरह से एक भूल भुलैया थे। इसके बाद उन्होंने गंगाजली नाम के उस खजाने को ग्वालियर किले के नीचे बने तहखानों के उस भूलभुलैया में छुपा दिया। यह कोई साधारण तहखाने नहीं थे बल्कि केयरफुली डिजाइंड हिडन वॉल्ट्स थे। इस हिडन ट्रेजर की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि वहां तक पहुंचने का रास्ता केवल एक कोड में छिपा हुआ था जिसे बीजक कहा जाता था। यह कोड केवल महाराजा और उनके कुछ बहुत ही ट्रस्टेड लोगों के पास होता था। परंपरा के अनुसार महाराजा अपनी मौत से पहले यह कोड अपने वारिस को सौंपते थे। इस तरह आगे आने वाले सालों में सिंधिया डायनेस्टी की सत्ता एक राजा से दूसरे राजा के हाथों में जाती रही और यह सीक्रेट कोड अगले वारिस तक पहुंचता रहा जिससे उनका खजाना सुरक्षित बना रहा। इन सब के बीच साल 1857 आ चुका था। देश में आजादी के दीवानों ने अंग्रेजों के खिलाफ आजादी की पहली लड़ाई छेड़ दी थी। दिल्ली, ग्वालियर और झांसी से लेकर बिहार तक पूरा देश जंग का मैदान बन चुका था। झांसी में जहां बेहद निडर और वीर महिला रानी लक्ष्मीबाई अंग्रेजों के दांत खट्टे कर रही थी तो वहीं बिहार के आरा में 80 साल के बाबू कुंवर सिंह ने अंग्रेजों का जीना हराम कर रखा था। लेकिन अफसोस भारत के ही कुछ राजघराने ऐसे थे जो अंग्रेजों का साथ दे रहे थे और सिंधिया डायनेस्टी उनमें से एक था। अब तक सिंधिया डायनेस्टी की सत्ता महाराजा जयाजी राव सिंधिया के हाथों में आ चुकी थी और वह अंग्रेजों से हाथ मिला चुके थे। ऐसे में अंग्रेजों से लड़ते हुए झांसी की रानी लक्ष्मीबाई जब ग्वालियर पहुंची तो जयाजी राव सिंधिया ने उनका साथ नहीं दिया। ऐसे में रानी लक्ष्मीबाई ने तात्या टोपे के साथ मिलकर कुछ समय के लिए ग्वालियर पर कंट्रोल कर लिया जिससे जयाजी राव सिंधिया को वहां से भागना पड़ा। गुस्से में उन्होंने सिंधिया के गुप्त और छिपे खजाने को हासिल करने की कोशिश भी की लेकिन खजाना ग्वालियर किले में इतने रहस्यमई तरीके से छुपाया गया था कि तमाम कोशिशों के बावजूद उन्हें खजाना नहीं मिल सका। कई इंडियन राजाओं के सपोर्ट की कमी के कारण 1857 का रिवॉल्ट सफल नहीं हो सका और अंग्रेजों की भारत में सत्ता और मजबूत हो गई। इसके बाद ग्वालियर किला भी उनके कब्जे में आ गया। साल 1886 आते-आते अंग्रेजों की सत्ता पूरे भारत में अच्छे से इस्टैब्लिश हो चुकी थी और ग्वालियर का किला अंग्रेजों के लिए अब स्ट्रेटेजिक दृष्टिकोण से अपना महत्व खो चुका था। इसलिए अंग्रेजों के प्रति वफादारी दिखाने के बदले अंग्रेजों ने महाराजा जयाजी राव सिंधिया को ग्वालियर फोर्ट वापस सौंप दिया। हालांकि किला वापस करने से पहले अंग्रेजों ने उस किले में छिपे खजाने को खोजने की कई बार कोशिश की थी लेकिन वह उसे ढूंढ नहीं पाए थे। इस समय तक महाराजा जयाजी राव सिंधिया के पास पैसों की काफी कमी हो चुकी थी और वह किसी भी तरह अपने खजाने को वापस पाना चाहते थे। इसलिए उन्होंने बनारस से कुछ मिस्त्री बुलवाए जिन्हें भगवान की कसम खिलाई गई कि वह इस बारे में किसी को कुछ भी नहीं बताएंगे। इसके बाद जब सभी मिस्त्री ग्वालियर किले तक पहुंचे तो उनकी आंखों पर पट्टी बांध दी गई और उन्हें बैलगाड़ी में बिठाकर एक भूलभुलैया वाले तहखाने तक ले जाया गया। तहखाने में उन्होंने राजा के कुछ भरोसेमंद लोगों की निगरानी में कुछ दिनों तक खुदाई की और खजाने के दरवाजे का पता लगा लिया। आखिर में जब जयाजी राव को विश्वास हो गया कि खजाना सही सलामत है तो मिस्त्रियों की आंखों पर पट्टी बांधकर उन्हें उसी तरह वापस बनारस भेज दिया गया जैसे उन्हें लाया गया था। हालांकि जयाजी राव सिंधिया अपने इस ट्रेजर को ज्यादा समय तक देख नहीं पाए और खजाना हाथ लगने के कुछ ही समय बाद उनकी अचानक मृत्यु हो गई। अचानक हुई मृत्यु के कारण जयाजी राव सिंधिया अपने उत्तराधिकारी माधव राव सिंधिया को वह सीक्रेट कोड नहीं बता पाए जिसके जरिए उस खजाने तक पहुंचा जा सकता था। अब सिचुएशन ऐसी थी कि खजाना था लेकिन उसका रास्ता पूरी तरह अंधेरे में खो चुका था। महाराजा माधव राव सिंधिया के लिए यह सिर्फ दौलत नहीं बल्कि उनकी विरासत थी और उसे खो देने का डर उन्हें लगातार परेशान करने लगा। कहा जाता है कि महाराजा जयाजी राव सिंधिया के अलावा उनके चार भरोसेमंद सेवकों को भी सिंधिया ट्रेजर के ठिकानों की जानकारी थी। लेकिन बड़ी चालाकी से जयाजी राव सिंधिया ने इन चारों सेवकों में से हर एक को ट्रेजर खोजने के केवल एक हिस्से का ही सीक्रेट बताया था। यानी खजाने तक पहुंचने का रास्ता चार टुकड़ों में बटा हुआ था। सबसे दिलचस्प बात यह थी कि उन चारों सेवकों में से किसी को भी यह नहीं पता था कि बाकी तीन लोग कौन है। हर एक के पास अधूरा सच था और जब तक यह चारों एक साथ ना आते तब तक खजाने तक पहुंचना नामुमकिन था। इतनी मुश्किल सिचुएशन में माधव राव सिंधिया ने आखिर इस खजाने को कैसे खोजा? इसकी एक जानकारी ब्रिटिश राइटर एमएमके की ऑटोबायोग्राफी द सन इन द मॉर्निंग में मिलती है। एमएमके के पिता एक ब्रिटिश सैनिक थे और काफी सालों तक ग्वालियर फोर्ट में पोस्टेड थे और खजाना खोजने की कहानी उन्होंने अपने पिता से सुनी थी। एमएमके के अनुसार महाराजा माधव राव सिंधिया को अपने पुरखों की संपत्ति किसी भी कीमत पर चाहिए थी इसलिए उन्होंने इसके लिए ज्योतिषियों से मदद लेनी शुरू की। एक दिन माधव राव सिंधिया अपने खजानों के ख्यालों में खोए हुए अपने दरबार में बैठे थे तभी उनके दरबार में एक बूढ़ा ज्योतिषी आया और उसने दावा किया कि अगर उसे मौका दिया जाए तो वह उन्हें उनके खोए हुए खजाने तक पहुंचा सकता है। लेकिन इसके लिए उस ज्योतिषी ने एक शर्त रखी कि महाराजा को खजाने तक बिना किसी सिक्योरिटी और गार्ड के उसके साथ अकेले चलना होगा और वह भी अपनी आंखों पर पट्टी बांधकर। अब महाराजा माधव राव के लिए मरता क्या ना करता वाली स्थिति थी इसलिए मजबूरन वह इसके लिए तैयार हो गए। इसके बाद महाराजा माधव राव सिंधिया आंखों पर पट्टी बांधकर हाथों में एक छड़ी लिए उस ज्योतिषी के साथ किले के तहखाने की ओर चल पड़े। जैसे ही वह तहखाने में काफी अंदर तक पहुंचे अचानक वहां एक तेज आवाज हुई जिसने माधव राव सिंधिया को चौंकाने के साथ डरा भी दिया। उनकी आंखों पर पट्टी बंदी थी और वह एक अनजान, अंधेरे और सक्रे तहखाने में थे। उनके साथ कोई अंगरक्षक भी नहीं था इसलिए उन्हें ऐसा भरम होने लगा कि शायद उनकी हत्या की कोई साजिश रची जा रही है। घबराहट में उन्होंने अपने हाथ में पकड़ी छड़ी को पूरी ताकत से जोर-जोर से इधर-उधर घुमाना शुरू कर दिया। इसी दौरान छड़ी का एक जोरदार वार सीधे ज्योतिषी के सिर पर जा लगा और वह वही गिरकर मर गया। अब अंधेरे में अकेले फंसे महाराजा बाहर निकलने के लिए दीवारों को टटोलने लगे। इसी दौरान गलती से उनका हाथ एक खंभे से टकराया। जैसे ही उनका हाथ उस खंभे से टकराया वहां एक चमत्कार हुआ और खंभा अपनी जगह से हिलने लगा और देखते ही देखते वह अपनी जगह से हट गया। इसके बाद महाराजा माधव राव सिंधिया को एक दरवाजा नजर आया जो कुछ ही देर में अपने आप खुल गया। जैसे ही माधव राव सिंधिया उस दरवाजे के अंदर घुसे अंदर का नजारा देखकर उनकी आंखें खुली की खुली रह गई। वहां सोने और चांदी के सिक्को और मोतियों और हीरों का अंबार था। उन्हें अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हो रहा था कि वह अपने पुरखों के करोड़ों के खजाने तक पहुंच चुके हैं। एमएमके के अनुसार इस तरह महाराजा माधव राव सिंधिया ने अपना खोया हुआ ट्रेजर फिर से हासिल कर लिया। लेकिन उन्हें इस बात का अफसोस हुआ कि उन्होंने बेवजह उनका भला सोचने वाले उस ज्योतिषी की अनजाने में हत्या कर दी। कई ब्रिटिश सोर्सेस के अनुसार वह बूढ़ा ज्योतिषी कोई और नहीं बल्कि महाराजा जयाजी राव सिंधिया के चार लॉयल सेवकों में से एक था जो माधव राव सिंधिया को उस खजाने का पता बताकर कुछ उपहार पाने के लालच में आया था। हालांकि ब्रिटिश सोर्सेस के अनुसार एक ब्रिटिश अधिकारी कर्नल बैनरमैन ने माधव राव सिंधिया की खजाना ढूंढने में मदद की थी। साल 1889 में लंदन के न्यूज़पेपर द स्पेक्टेटर की एक रिपोर्ट में लिखा गया था कि ग्वालियर में एक ऐसे विशाल ट्रेजर की खोज हुई है जिसके बारे में अब तक सिर्फ कहानियां ही सुनी गई थी। इस रिपोर्ट के अनुसार ग्वालियर में तैनात ब्रिटिश कर्नल बैनरमैन ने महाराजा माधव राव सिंधिया के आदेश पर ग्वालियर फोर्ट में एक बड़ी सर्च करवाई। इस सर्च में कर्नल बैनरमैन ने फोर्ट में कई सीक्रेट चैंबर्स खोज निकाले जिनमें उन्हें सिंधिया ट्रेजर का एक बड़ा हिस्सा मिला। इस वाक्य का जिक्र इसी राजघराने की बहू विजयाराजे सिंधिया ने अपनी ऑटोबायोग्राफी में भी किया है। ग्वालिया फोर्ट में छिपे खजाने और उसके खोजे जाने को लेकर प्रचलित कहानियों के बारे में कई लोगों का मानना था कि यह ब्रिटिशर्स द्वारा बढ़ा चढ़ाकर सुनाई गई कहानियां है जो यूरोपियन ऑडियंस के लिए एग्जॉटिक इंडिया की छवि को और आकर्षक बनाने के लिए गड़ी गई थी। ऐसे में लाइव हिस्ट्री इंडिया के को-फाउंडर और रिसर्च हेड अक्षय चवन ने इस पर डीप रिसर्च करने का फैसला किया और वह लंदन की ब्रिटिश लाइब्रेरी में मौजूद इंडिया हाउस कलेक्शन के कैटलॉग्स तक जा पहुंचे। उन्हें पता चला था कि यहां 17th सेंचुरी से लेकर ईयर 1947 तक इंडिया में ब्रिटिश शासन से जुड़े ऑफिशियल डॉक्यूमेंट्स का सबसे बड़ा रिपॉजिटरी मौजूद है। हालांकि ब्रिटिश लाइब्रेरी पहुंचने पर उन्हें पता चला कि यह फाइल्स अब अनट्रेसेबल हो चुकी है क्योंकि वर्ल्ड वॉर 2 के दौरान नाजीज द्वारा लंदन पर की गई बॉम्बिंग में इस कलेक्शन का एक हिस्सा बर्बाद हो गया था। ऐसे में नाउम्मीद होकर अक्षय चवन सच्चाई की खोज में दिल्ली स्थित नेशनल आर्काइव्स ऑफ इंडिया एनएआई की ऑफिस पहुंचे। उनका अनुमान था कि कर्नल बैनरमैन ने इस रिपोर्ट को लेकर अपनी दो रिपोर्ट्स तैयार की होंगी। एक रिपोर्ट उन्होंने लंदन भेजी होगी और दूसरी कोलकाता में ब्रिटिश गवर्नर को भेजी होगी जो अब दिल्ली के एनएआई में मौजूद होगी। उनका अंदाजा सही निकला और यहां उन्हें वैल्यू एंड कंपोजीशन ऑफ द ट्रेजर लेफ्ट बाय द लेट महाराजा सिंधिया ऑफ ग्वालियर नाम का एक डॉक्यूमेंट हाथ लगा जिससे उन्हें सिंधिया डायनेस्टी के उस खजाने के बारे में कंफर्म जानकारी मिली। दिसंबर 1889 में कर्नल बैनरमैन द्वारा लिखे गए इस डॉक्यूमेंट में तीन जरूरी बातों के बारे में बताया गया है। पहली ये कि ट्रेजर की संख्या और उसकी उस समय की वैल्यू क्या थी, दूसरी ये कि उसे कहां छुपाया गया था और तीसरी बात इसमें उस ज्योतिषी के बारे में भी पता चली कि वह बूढ़ा ज्योतिषी वास्तव में जयाजी राव सिंधिया का सेवक था। इस डॉक्यूमेंट के अनुसार ग्वालियर ट्रेजर में दसों हजार गोल्ड कॉइंस, लाखों सिल्वर कॉइंस, 14720 डायमंड्स, 37667 पोल्स, 11273 रूबीज और हजारों अन्य प्रेशियस जूल्स भी शामिल थे जिनकी कीमत उस समय 6.2 करोड़ रुपए थी। अगर आज के हिसाब से देखें तो उस खजाने की कीमत आज हजारों करोड़ रुपए में होती है। खजाना इतना विशाल था कि सिक्कों और मोतियों की गिनती करने में ही महीनों लग गए थे। यह खजाना देख कर्नल बैनरमैन को अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हो रहा था क्योंकि उन्होंने अपने जीवन में इतना खजाना एक साथ कभी नहीं देखा था। यही वजह थी कि कर्नल बैनरमैन ने ग्वालियर किले के तहखाने में मिले खजाने को देखकर उसे अलादीन की गुफा कहा था। डॉक्यूमेंट से यह भी पता चलता है कि खजाना सिर्फ ग्वालियर किले के नीचे नहीं था बल्कि खजाने का एक हिस्सा मोती महल के नीचे बनी एक खुफिया जगह पर रखा गया था। जबकि एक हिस्सा महल के बगीचे के नीचे भी दफनाया गया था। खजाने के कुछ हिस्से फर्शखाना में पुराने फर्नीचर वाले कमरे के नीचे लगभग 8 फीट गहरे गड्ढे में फूलबाग के नीचे गुप्त चैंबर्स में बाड़ा इलाके में पक्की ईंटों के गड्ढे और कुछ खास कुओं के अंदर भी सुरक्षित रखा गया था। कहा जाता है कि खजाना खोजने के तौर तरीके उसे खोजने में लगने वाली मेहनत और सोने और चांदी के सिक्कों की गिनती से महाराजा माधव राव इतने ज्यादा फ्रस्ट्रेटेड हो गए थे कि उन्होंने पूरा ट्रेजर कैश में कन्वर्ट करवा लिया। इनसे मिले करोड़ों रुपयों को उन्होंने अपने फाइनेंशियल एडवाइजर एफई दिनशॉ की सलाह पर कई कंपनियों में इन्वेस्ट करवा दिया जिनमें एक उभरती हुई कंपनी टाटा स्टील यानी टिसको भी थी। साल 1924 के आसपास जब टाटा स्टील तेजी से एक्सपेंशन के कारण फाइनेंशियल क्राइसिस का सामना कर रही थी तब एफई दिनशॉ ने ही माधव राव सिंधिया का पैसा इन्वेस्ट करके टाटा स्टील को डूबने से बचाया था। इस डील के तहत सिंधिया फैमिली को टाटा स्टील में हिस्सेदारी मिली और धीरे-धीरे यह हिस्सेदारी इतनी बढ़ गई कि 1960 तक सिंधिया फैमिली टाटा स्टील के सबसे बड़े शेयर होल्डर्स में गिनी जाने लगी। लेकिन आजादी के बाद से ही सिंधिया फैमिली में प्रॉपर्टी और इन्हेरिटेंस को लेकर लड़ाई शुरू हो गई। इस विवाद में आज हजारों करोड़ की जमीन जायदाद स्टेक पर लगी हुई है और किसकी किस कंपनी में कितनी हिस्सेदारी है यह आज भी विवाद बना हुआ है। सिंधिया फैमिली के कई मेंबर्स सालों से पॉलिटिक्स में भी है जहां कुछ मेंबर्स सालों तक कांग्रेस के लीडर्स रहे तो कुछ भारतीय जनता पार्टी में शामिल होकर अपनी राजनीति को आगे बढ़ा रहे हैं। कहा जाता है कि ग्वालियर फोर्ट में अब भी कई सीक्रेट चैंबर्स नहीं खोजे जा सके हैं और उनमें हजारों करोड़ रुपए की संपत्ति छिपी हुई है। हालांकि इसी राजघराने से ताल्लुक रखने वाले और प्रेजेंट में इंडियन गवर्नमेंट में कैबिनेट मिनिस्टर ज्योतिरादित्य सिंधिया ग्वालियर फोर्ट में अब भी मौजूद ट्रेजर को किस्से कहानियां बताकर झुटलाते रहे हैं। ऐसे में इसके पीछे की सच्चाई क्या है यह तो शायद वक्त ही बताएगा।



