[0:00]एक बार की बात है, संत रविदास जी वाराणसी की गलियों से गुजरते हुए अपने गांव लौट रहे थे। धूप बहुत तेज थी। रास्ते में चलते-चलते उन्हें बहुत तेज प्यास लगी। उन्होंने देखा कि एक घर के सामने नल से पानी बह रहा है। वे आगे बढ़े और अपने दोनों हाथों को जोड़कर उस पानी को पीने लगे। इतने में घर के भीतर से एक मनुवादी ब्राह्मण बाहर निकला। उसने देखा कि एक दलित संत उसके घर के नल से पानी पी रहा है। उसका चेहरा क्रोध से लाल हो गया और वह चीख कर बोला, अरे ये तूने क्या किया? तू नीच जाति का है, ये पानी तेरे लिए नहीं है। ये तो ऊंची जातियों के लिए है। तूने इस नल को अपवित्र कर दिया है। संत रविदास जी शांत भाव से उसकी ओर देखकर मुस्कुराए। और शांत स्वर में कहा कि भाई पानी धरती से निकलता है। धरती तो सबकी है, सूरज की किरणें सब पर समान रूप से पड़ती हैं। हवा सबको समान रूप से जीवन देती है। फिर यह पानी केवल ऊंची जातियों का कैसे हो सकता है? क्या तुम्हें प्यास लगती है तो तुम्हारी प्यास ऊंची होती है और मेरी प्यास नीची। क्या तुम्हारे शरीर में बहने वाला रक्त अलग रंग का है और मेरा अलग। ब्राह्मण उनके शब्द सुनकर क्षण भर को स्तब्ध रह गया पर उसकी घमंडी सोच ने उसे और कठोर बना दिया। उसने ताना मारते हुए कहा, तेरी बातों से धर्म नहीं चलता। तू चाहे कितनी भी बातें कर ले पर समाज में ऊंच-नीच का भेद सदा रहेगा। संत रविदास जी ने गहरी सांस ली और बोले धर्म का अर्थ बांटना नहीं जोड़ना है। अगर धर्म मनुष्य को मनुष्य से अलग करे तो वह धर्म नहीं अधर्म है। सच्चा धर्म तो वही है जो हर प्यासे को पानी दे, हर भूखे को अन्न दे और हर पीड़ित को गले लगाए।

एक मनुवादी ने संत रविदास जी को पानी नहीं पीने दिया 😭 #ravidas #shorts
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