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Samrat Ashok: अंग्रेजों से पहले भारत के सबसे बड़े भूभाग पर राज करने वाले सम्राट की कहानी- विवेचना

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[0:03]विवेचना में आज सम्राट अशोक की कहानी जिन्होंने अंग्रेजों से पहले भारत के सबसे बड़े भूभाग पर किया था राज.
[0:26]अशोक के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने अपने 40 साल के राज में करीब-करीब पूरे भारतीय उपमहाद्वीप को एक सरकार के अंतर्गत जोड़ दिया.
[0:26]तमिलनाडु और केरल को छोड़कर आज का पूरा भारत, आज का पूरा पाकिस्तान और अफगानिस्तान का कम से कम पूर्वी भाग अशोक के अधिकार क्षेत्र में था.
[0:26]यही नहीं वो एक ऐसे धर्म को विश्वव्यापी धर्म की श्रेणी तक पहुंचाने में भी कामयाब रहे जिसके अनुयाई उस दौर में बहुत कम थे.
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[0:03]विवेचना में आज सम्राट अशोक की कहानी जिन्होंने अंग्रेजों से पहले भारत के सबसे बड़े भूभाग पर किया था राज.

[0:21]अभिवादन स्वीकार करिए रेहान फजल का.

[0:26]अशोक के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने अपने 40 साल के राज में करीब-करीब पूरे भारतीय उपमहाद्वीप को एक सरकार के अंतर्गत जोड़ दिया. तमिलनाडु और केरल को छोड़कर आज का पूरा भारत, आज का पूरा पाकिस्तान और अफगानिस्तान का कम से कम पूर्वी भाग अशोक के अधिकार क्षेत्र में था. यही नहीं वो एक ऐसे धर्म को विश्वव्यापी धर्म की श्रेणी तक पहुंचाने में भी कामयाब रहे जिसके अनुयाई उस दौर में बहुत कम थे. उन्होंने ऐसी नैतिक अवधारणाओं का सूत्रपात किया, जिनका असर आज तक देखा जा सकता है. चार्ल्स एलेन अपनी किताब अशोका द सर्च फॉर इंडियाज लॉस्ट एम्परर में लिखते हैं. अशोक को सही मायने में भारत का संस्थापक पिता कहा जा सकता है. वो पहले शासक थे, जिन्होंने भारत को एक राष्ट्र के रूप में पिरोया, इतना ही नहीं महात्मा गांधी से कहीं पहले उन्होंने ही अहिंसा की अवधारणा की शुरुआत की. वो शायद दुनिया के पहले राजा थे, जिन्होंने एक कल्याणकारी राज्य की स्थापना की. अशोक कई लोगों को कई रूपों में दिखाई देते हैं. एक विजेता जिसने युद्ध की विभीषिकाओं को देखते हुए विजय को त्याग दिया, एक साधु या कहें साधु और सम्राट का अद्भुत समन्वय, एक राजनीतिक जीनियस जिसे मानवीय मूल्यों की गहरी समझ थी. रोमिला थापर अपनी किताब अशोक एंड द डिक्लाइन ऑफ मौर्याज में लिखती हैं. अशोक बहुत मायनों में अपने काल का प्रतिनिधित्व करते थे. उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि थी कि उन्होंने अपने समय को समझा और भारतीय संदर्भ में उसकी जो जरूरतें थी, उन्हें पूरा किया. सम्राट अशोक की कहानी उनके दादा चंद्रगुप्त मौर्य और उस शख्स चाणक्य से शुरू होती है, जिसने उन्हें मगध की गद्दी पर बैठाया था. अशोक, चंद्रगुप्त मौर्य के पोते थे. 323 ईसा पूर्व में सिकंदर की मृत्यु के एक-दो साल के अंदर ही सिंधु नदी के पूर्व में यूनानी आधिपत्य समाप्त होने लगा था. चाणक्य के मार्गदर्शन में पहले तो चंद्रगुप्त ने धनानंदा के खिलाफ हार का स्वाद चखा, लेकिन फिर उन्हें हराकर उत्तरी भारत के निर्विवाद शासक बन गए.

[3:11]अपने 24 वर्ष के शासन में चंद्रगुप्त मौर्य की सेना अजेय रही. 305 ईसा पूर्व में जब बेबीलोन और पर्शिया के नए शासक सेल्युकस ने सिकंदर की खोई हुई भूमि जीतने की कोशिश की तो उन्हें चंद्रगुप्त मौर्य के हाथों हार का सामना करना पड़ा. चंद्रगुप्त मौर्य के बाद बिंदुसार मगध के राजा बने. चाणक्य बिंदुसार के भी मार्गदर्शक बने. उनके पोते और शिष्य राधागुप्त ने अशोक के मगध का राजा बनने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. एएल बाशम अपनी किताब द वंडर दैट वाज इंडिया में लिखते हैं. बिंदुसार का बेटा सुसीमा उनकी गद्दी का वारिस था और ये माना जा रहा था कि उनके बाद वो ही मगध का राजा बनेगा. बिंदुसार के उत्तराधिकारियों के क्रम में अशोक का नाम काफी नीचे था. वो नाटे कद के थे और मोटे भी थे. उनको त्वचा की बीमारी थी जिसकी वजह से वो बदसूरत दिखाई देते थे. शायद यही वजह थी कि उनके पिता उनसे खींचे-खींचे रहते थे और संभावित वारिसों की सूची से उनको हटा दिया गया था. यही कारण था कि राजधानी पाटलिपुत्र से दूर तक्षशिला में जब विद्रोह हुआ तो उनके पिता बिंदुसार ने उसे कुचलने अशोक को भेजा. उसके बाद उन्हें मध्य भारत में उज्जैन में सम्राट का राजप्रतिनिधि बनाकर भेजा गया. वहां विदिशा में एक स्थानीय व्यापारी की सुंदर बेटी महादेवी साक्य कुमारी से उन्हें प्रेम हो गया. रोमिला थापर अपनी किताब अशोक एंड द डिक्लाइन ऑफ मौर्याज में लिखती हैं. दीपावाम्सा में इस शादी का कोई जिक्र नहीं है, लेकिन उससे अशोक के दो बच्चे - महिंदा (महेंद्र) और संघमित्रा (संघमित्रा) पैदा हुए. जिन्हें बाद में बौद्ध धर्म का प्रचार करने श्रीलंका भेजा गया. जब अशोक सम्राट बन गए तो महादेवी ने पाटलिपुत्र जाने के बजाए विदिशा में ही रहना पसंद किया. कहा जाता है कि देवी एक बौद्ध थी और उस समय विदिशा बौद्ध धर्म का केंद्र हुआ करता था. दूसरे वो एक व्यापारी की पुत्री थी और उनकी सामाजिक स्थिति राज परिवार के लोगों के स्तर की नहीं थी. बिंदुसार ने अशोक के बड़े भाई सुसीमा को अपना उत्तराधिकारी चुना था. लेकिन 274 ईसा पूर्व में एक और विद्रोह हुआ और उससे निपटने के लिए इस बार युवराज सुसीमा को भेजा गया. यह विद्रोह पिछले विद्रोह से अधिक गंभीर था. इसलिए राजकुमार सुसीमा को अधिक समय तक तक्षशिला में रुकना पड़ा. इस बीच राजा बिंदुसार गंभीर रूप से बीमार पड़ गए. उन्होंने सुसीमा को वापस आने और उनकी जगह अशोक को तक्षशिला जाने का आदेश दिया. इस बीच अशोक के समर्थक मंत्री राधागुप्त ने हस्तक्षेप कर राजकीय आदेश को रुकवाने की कोशिश की. चार्ल्स एलेन लिखते हैं. अशोक ने अपनी बीमारी का नाटक किया और मांग की कि उनके पिता उन्हें अस्थाई राजा घोषित कर दें. ये सुनते ही बिंदुसार को मिर्गी का दौरा पड़ा और उनकी मृत्यु हो गई. जब सुसीमा पाटलिपुत्र वापस लौटे तो उन्होंने पाया कि उनके छोटे भाई अशोक ने पाटलिपुत्र पर आधिपत्य जमाया हुआ है और उसके मुख्य द्वार की रक्षा यूनान से भाड़े पर लाए गए सैनिक कर रहे हैं. चार साल सत्ता के लिए हुए संघर्ष में पाटलिपुत्र के पूर्वी द्वार पर सुसीमा की हत्या पहला चरण था. इस दौरान अशोक ने अपने 99 अन्य सौतेले भाइयों को भी मौत के घाट उतार दिया. तब जाकर वो अपने आप को मगध का राजा घोषित कर पाए. सुनील खिलनानी अपनी किताब इंकार्नेशंस इंडिया इन 50 लाइव्स में लिखते हैं. मारे गए भाइयों की संख्या वास्तव में छह थी, लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं कि गद्दी के लिए हुआ रक्तरंजीत संघर्ष कई सालों तक चला था. उस समय अशोक की उम्र 34 साल थी.

[7:37]अशोक के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने अंग्रेजों से पहले भारत के सबसे बड़े भूभाग पर राज किया था. जिस समय अशोक गद्दी पर बैठे उस समय रोम और कार्थेज के बीच प्रथम प्यूनिक युद्ध हो रहा था. फारस में खूनी संघर्ष चल रहा था और चीन सम्राट अपनी महान दीवार बनवा रहा था. 362 ईसा पूर्व में अशोक ने कलिंग के खिलाफ युद्ध किया था. इस लड़ाई में एक लाख व्यक्ति मारे गए थे और इतने ही लोग युद्ध के बाद पैदा हुई परिस्थितियों से मरे थे. डेढ़ लाख से अधिक लोगों को या तो बंदी बनाया गया था या निर्वासित किया गया था. मारे गए लोगों में से अधिकतर लोग असैनिक थे. पैट्रिक ओलिवेल हाल ही में प्रकाशित अपनी किताब अशोका पोर्ट्रेट ऑफ ए फिलॉसफर किंग में लिखते हैं. सुमित गुहा उस समय के कलिंग की जनसंख्या 9 लाख 75 हजार बताते हैं. अगर जनसंख्या को 10 लाख भी मान लिया जाए तो मरने वालों की संख्या कुल जनसंख्या की 20 फीसदी थी. और अगर हम बंदियों की संख्या भी मिला ले तो कुल जनसंख्या के 35 फीसदी लोग इस युद्ध से प्रभावित हुए थे. इस दृष्टि से इस लड़ाई को अगर नरसंहार कहा जाए तो अनुचित नहीं होगा. इस विजय ने अशोक के साम्राज्य को बंगाल की खाड़ी तक पहुंचा दिया और अगले 37 सालों तक उसका उस पर आधिपत्य बना रहा. लेकिन ये जीत इतनी रक्त रंजित थी कि इसने अशोक के अंतरमन को झकझोर कर रख दिया. उसने सार्वजनिक रूप से उस पर अपना खेद प्रकट किया और उनके जीवन में एक बड़ा बदलाव आया. अशोक ने गौतम बुद्ध के विचारों को अपना लिया जो भारत में अभी नया-नया था. अशोक के शासन के समय भारतीय समाज में जितनी विविधताएं थी, उतनी पहले कभी नहीं थी. विविधताओं से भरे ऐसे समाज को एक साथ जोड़े रखने के लिए एक ऐसी विश्व दृष्टि चाहिए थी जो पर्याप्त लचीली हो. चार्ल्स एलेन लिखते हैं. कलिंग युद्ध ने अशोक को नाम मात्र के बौद्ध से एक धार्मिक बौद्ध बना दिया. उसके बाद से सम्राट अशोक ने अपने शासन को बुद्ध की शिक्षा के अनुरूप नैतिक मूल्यों में ढाल दिया. एक अच्छे शासक की तरह अशोक ने अपने आप को अपनी जनता के लिए उपलब्ध कराया. लेकिन उनके बोले हुए शब्दों को कुछ गिने चुने लोग ही सुन सकते थे. अशोक चाहते थे कि उनको पूरी दुनिया सुने. इसलिए उन्होंने उन्हें लिखित भाषा में कहने की पहल की ताकि वो हमेशा जीवित रहे. उन्होंने अपने संदेशों को प्राकृत भाषा में लिखवाया जो कि उनके साम्राज्य में बोली जाती थी. सुनील खिलनानी लिखते हैं. मौर्य सम्राटों में अशोक की संवाद शैली सबसे अलग थी. सातवें शिलालेख में अशोक ने लिखवाया था, जहां भी शिला स्तंभ या शिला खंड हो वहां उनके शब्द उकेरे जाएं, ताकि ये एक लंबे समय तक रहे. उस समय तक जब तक मेरे पुत्र या पौत्र राज करें, या जब तक सूर्य और चंद्र चमकते रहे, तब तक लोग ये शब्द पढ़ सकें. ज्यादातर शिलालेखों में अशोक का उल्लेख अन्य पुरुष या वह के रूप में किया गया है. लेकिन किसी-किसी शिलालेख में प्रथम पुरुष यानी मैं का भी प्रयोग है जिससे हमें इन शिलालेखों में व्यक्ति की संवेदनशीलता की क्षणिक झांकी मिलती है. अशोक के अधिकतर शिलालेख प्राकृत भाषा की ब्राह्मी लिपि में है. कुछ शिलालेख ग्रीक और अरामाई की लिपियों में भी मिले हैं. अशोक ने धम्म की अवधारणा को आत्मसात किया. धम्म आध्यात्मिक पवित्रता या पावन रीति-रिवाजों पर नहीं बल्कि दुनियावी आचार व्यवहार पर आधारित था. ये विचार सहिष्णुता का हामी था और हिंसा के खिलाफ था. रोमिला थापर कहती हैं. अशोक जिन सिद्धांतों को सबसे अधिक महत्व देते हैं, उनमें पहला है विभिन्न मत-मतांतरों का सह-अस्तित्व. उनका मानना था कि सबको मिल-जुल कर सह-अस्तित्व की भावना से रहना सीखना होगा. दूसरे मनुष्यों के संप्रदायों का सम्मान करना होगा क्योंकि औरों के संप्रदायों का सम्मान करके ही तुम अपने संप्रदाय का सम्मान कर पाओगे. ये धम्म का मूल सिद्धांत है. मुझे ये दिलचस्प लगता है कि इस बात पर कितना ज्यादा जोर दिया गया था. शायद उस समय संप्रदायों के बीच बहुत बैर भाव रहा होगा. धम्म के अनुसार प्रजा के कल्याण उनके स्वास्थ्य और सुख के बारे में सोचना और इस दिशा में काम करना शासक का कर्तव्य है. राजा का ये भी फर्ज है कि वो सड़क के किनारे बरगद या आम के पेड़ लगवाए और यात्रियों के भोजन और विश्राम का प्रबंध करे. अशोक के सबसे प्रभावशाली विचार 12वें शिलालेख में है जिसमें धार्मिक सहिष्णुता पर जोर दिया गया है. अशोक इसे वाक संयम कहते हैं. शिलालेख में लिखा है जो कोई अपने धर्म में अतिशय भक्ति के कारण उसका गुणगान करता है और अन्य धर्मों की निंदा करता है, वह अपने धर्म को ही हानि पहुंचाता है. इसलिए विभिन्न धर्मों के बीच मेलजोल होना चाहिए. सभी को दूसरों के विचारों को सुनना चाहिए और उनका सम्मान करना चाहिए. सन 232 ईसा पूर्व में अशोक का देहावसान हो गया. मौर्य वंश कुल 137 वर्षों तक चला. रोमिला थापर लिखती हैं. दूसरे राजवंशों जैसे हान और रोमन की तुलना में मौर्य वंश बहुत कम समय के लिए था. इसका उदय चंद्रगुप्त मौर्य की जीत के साथ हुआ था. उनके पोते अशोक के समय में ये अपने चरम पर पहुंचा, लेकिन उसके बाद तेजी से पतन शुरू हो गया. अशोक के बेटे और पोते अपने दादा और परदादा की क्षमता और स्तर के नहीं थे. उनका शासन भी बहुत थोड़े समय के लिए था. अशोक का पूरा साम्राज्य उसके कई दावेदारों के बीच विभाजित हो गया. उनकी मृत्यु के बाद मौर्य साम्राज्य का पतन होने लगा. अंततः अशोक को भारतवासियों ने एक तरह से भुला दिया. धीरे-धीरे प्राकृत भाषा और ब्राह्मी लिपि का इस्तेमाल समाप्त हो गया और लोग शिलालेखों पर लिखे उनके संदेश को पढ़ना भूल गए. लेकिन नियति का खेल देखिए 19वीं सदी में अशोक की दोबारा खोज की ब्रिटिश इतिहासकारों विलियम जोंस और जेम्स प्रिंसिप ने. उन्होंने ब्राह्मी लिपि का मतलब लोगों को समझाया. भारत की आजादी से सिर्फ एक महीने पहले जुलाई 1947 में संविधान सभा में बोलते हुए जवाहरलाल नेहरू ने राष्ट्रीय झंडे का डिजाइन तय करने के लिए एक प्रस्ताव पेश किया. जिसमें अशोक के चक्र को भारतीय तिरंगे के मध्य में जगह दी गई. उन्होंने कहा मुझे इस बात की बहुत खुशी है कि हमने ना सिर्फ इस झंडे से अशोक के इस प्रतीक ही नहीं बल्कि उनको भी जोड़ा है जो भारत ही नहीं विश्व इतिहास की महत्वपूर्ण हस्ती थे. भारतीय लोगों के लिए अशोक इतना प्रेरणादाई व्यक्तित्व था कि भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने अशोक को कमोबेश नए राष्ट्र के संरक्षक संत का दर्जा दे डाला. अशोक के चार सिंह ना सिर्फ भारतीय डाक टिकटों पर अंकित हैं अपितु भारत का यह राजकीय चिन्ह संपूर्ण भारतीय जीवन का अभिन्न प्रतीक चिन्ह बन गया है. यह शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व का प्रतीक भी है. सार्वजनिक जीवन में भी संयम और आत्म नियंत्रण का सम्राट अशोक का संदेश आज भारतीयों के लिए चेतावनी भी है और प्रेरणा भी. रेहान फजल, बीबीसी हिंदी.

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