[0:00]क्या कभी तुमने अपनी लाइफ को थोड़ा डिस्टेंस से ऑब्जर्व किया है? जैसे तुम अपनी कहानी से बाहर खड़े हो और देख रहे हो कि तुम क्या कर रहे हो। एक पैटर्न तुम्हें बार-बार रिपीट होता दिखेगा। कि जब तुम किसी चीज को पाने के लिए अंदर से जल रहे होते हो, जब तुम्हारा पूरा नर्वस सिस्टम उस चीज पर लटक रहा होता है। जब तुम हर सेकंड उस चीज के बारे में ही सोच रहे होते हो। तब एक्चुअली तुम उस चीज से और थोड़ा दूर चले जाते हो। और फिर एक दिन आता है जब तुम इमोशनली एग्जॉस्ट हो जाते हो। तुम्हारा सिस्टम गिव अप कर देता है। तुम बोलते हो कि यार अब देखा जाएगा जो भी होगा, मुझे फर्क नहीं पड़ता अब जो भी है। और उसी मोमेंट पर एक अलग सा शिफ्ट होता है। तुम सडनली ज्यादा अट्रैक्टिव लगने लगते हो, तुम्हारे डिसीजंस क्लियर होने लगते हैं। तुम्हारी प्रेजेंस हैवी हो जाती है और सबसे शॉकिंग बात, जो चीज अब तक तुम्हें इग्नोर कर रही थी वो तुम्हारी तरफ बढ़ने लगती है। यह कोइंसिडेंस नहीं है। यह एक प्रॉपर साइकोलॉजिकल और बायोलॉजिकल मैकेनिज्म है जो हर इंसान के अंदर ऑपरेट कर रहा है। पर लोग इसको समझते नहीं है और अपनी खुद की लाइफ को ही कॉम्प्लिकेट कर देते हैं। अब इसको थोड़ा और रिलेटेबल बनाते हैं रियल बनाते हैं। मानो एक लड़का है जो किसी लड़की को पसंद करता है। स्टार्टिंग में वो बिल्कुल नॉर्मल होता है। थोड़ा इंटरेस्ट दिखाता है, थोड़ा डिस्टेंस मेंटेन करता है, उसकी अपनी भी खुद की लाइफ चल रही होती है। अब इस टाइम पर लड़की भी हल्की-हल्की इंटरेस्टेड होती है, बिल्कुल फ्लो में बातें चल रही होती है, अट्रैक्शन भी बिल्ड हो रहा होता है। लेकिन उसी टाइम पर लड़के के मन में एक डर डेवलप हो जाता है। कि यार कहीं ये चली ना जाए, कहीं मैं इसको खो ना दूं। और बस उसी मोमेंट से गेम खत्म होना शुरू हो जाता है। अब वो ज्यादा टेक्स्ट करता है, ज्यादा अवेलेबल रहता है, हर छोटी-छोटी बात पर रिएक्ट करता है, हर साइलेंस पर ओवरथिंक करता है। बाहर से तो ये सब केयर दिख रही होती है कि भाई लड़का बहुत केयरिंग है। लेकिन अंदर से वो डर से ऑपरेट कर रहा होता है और इस टाइम पर लड़की क्या फील कर रही होती है? एक प्रेशर फील करती है, एक वजन फील करती है, एक नीडनेस फील करती है जो शब्दों से नहीं बल्कि एनर्जी से कम्युनिकेट होती है। और धीरे-धीरे वो उस लड़के से दूर होने लगती है। अब लड़का कंफ्यूज हो जाता है कि भाई मैं तो इतनी केयर कर रहा हूं उसका इतना ध्यान रखता हूं फिर भी यह क्यों चली गई? उसे लगने लग जाता है कि भई ये दुनिया अनफेयर है। जबकि रियलिटी क्या है? वो केयर नहीं कर रहा था वो चिपक रहा था। देखो केयर और अटैचमेंट में फर्क होता है। केयर नेचुरल होती है, हल्की होती है, बिल्कुल फ्री फ्लो में होती है। अटैचमेंट हैवी होती है। वो कंट्रोलिंग होती है, वो फियर ड्रिवन होती है। अगर तुम बोलते हो कि यार मुझे तेरे से फर्क पड़ता है। इसके पीछे क्या इमोशन है? अगर इसके पीछे पीस है तो वो केयर है। लेकिन अगर इसके पीछे एंजाइटी है तो वो अटैचमेंट है। और जब तुम अटैचमेंट पर ऑपरेट कर रहे होते हो तो तुम्हारा पूरा नर्वस सिस्टम सर्वाइवल मोड में चला जाता है। अब यहां पर थोड़ा ब्रेन का गेम समझते हैं। तुम्हारे ब्रेन का एक पार्ट है जिसे एमिक्डाला कहते हैं। जिसका काम है डेंजर को डिटेक्ट करना। जब तुम किसी चीज को या किसी इंसान को बहुत इंपॉर्टेंट से लेवल कर देते हो, स्पेशली इमोशनली, तो तुम्हारा एमिक्डाला उसे सर्वाइवल से लिंक कर देता है। मतलब अब वो तुम्हारे लिए सिर्फ एक लड़की एक जो भी एक अपॉर्चुनिटी नहीं रही है। वो तुम्हारे लिए जीने मरने की बात हो जाती है। तुम्हारा एमिक्डाला एक्टिवेट हो जाता है, तुम्हारी बॉडी में स्ट्रेस हार्मोन रिलीज होने लगते हैं। तुम्हारी हार्ट बीट तेज हो जाती है, तुम ओवरथिंक करते हो, तुम इंपल्सिव डिसीजंस लेते हो। तुम लॉजिकली नहीं रिएक्टिवली जीने लगते हो। तुम्हें लगता है कि तुम कंट्रोल में हो लेकिन एक्चुअल में तुम्हारे प्रिमिटिव ब्रेन तुम पे कंट्रोल ले चुका है। अब यहां पर एक बहुत डेंजरस चीज होती है जो लोग समझते नहीं है। जब तुम किसी आउटकम से इमोशनली अटैच होते हो तो तुम्हारा ब्रेन वहां पे डोपामिन का भी गेम खेलता है। डोपामिन वो केमिकल है जो एंटीसिपेशन से रिलीज होता है। यानी जब तुम एक्सपेक्ट करते हो कि कुछ अच्छा होने वाला है। पर जब वह एक्सपेक्टेशन बार-बार बार-बार टूटती है तो तुम्हारा सिस्टम अनस्टेबल हो जाता है। तुम और चेज करते हो और ट्राई करते हो और पुश करते हो। क्योंकि तुम्हारे ब्रेन बोल रहा होता है कि बस एक बार मिल जाए तो सब कुछ ठीक हो जाएगा। यह एडिक्शन जैसा पैटर्न बन जाता है। तुम इंसान को नहीं, तुम उस फीलिंग को चेज कर रहे होते हो। और जब तक तुम अपनी फीलिंग के गुलाम हो तुम कभी भी जीत नहीं सकते हो। अब यहां पर मुझे तुम्हारा थोड़ा सा अटेंशन चाहिए। अगर तुम अपने इमोशनल पैटर्न्स को समझना चाहते हो कि क्यों तुम हर बार सेम तरह के इंसान से अटैच हो जाते हो, सेम ओवरथिंकिंग के लूप में फंस जाते हो। तो मैंने तुम्हारे लिए एक छोटी सी गाइड एक छोटी सी ई-बुक लिखी है। बिहाइंड द डार्क। यह सिर्फ 32 पेजों की है। और मैंने जानबूझकर इसे कम पेजेस की रखा है ताकि जो भी मैं तुम्हें बताना चाहूं वह स्ट्रेट टू द पॉइंट तुम तक पहुंचा सकूं बिना किसी फालतू थ्योरी के। तो अगर तुम भी अपने इमोशनल पैटर्न्स को समझना चाहते हो, तो डिस्क्रिप्शन और पिन कमेंट में तुम्हें इसकी लिंक मिल जाएगी। वीडियो पर वापस चलते हैं। अब थोड़ा और डीप जाते हैं इवोल्यूशन के पर्सपेक्टिव से देखते हैं। जब ह्यूमंस जंगल में रहते थे तब सर्वाइवल का मतलब होता था अनसर्टेनटी को हैंडल करना। जो इंसान शांत रहता था जो ओवर रिएक्ट नहीं करता था जो सिचुएशन से डिटैच होकर उसको देख पाता था। वह सरवाइव कर जाता था। जो पैनिक करता था जो डेस्परेट डिसीजंस लेता था वो मर जाता था। मतलब तुम्हारा ब्रेन नेचुरली उन लोगों को पावरफुल पर्सिव करता है जो शांत होते हैं जो किसी चीज के पीछे नहीं भागते। जो इंटरनली स्टेबल होते हैं। इसलिए जब तुम किसी चीज को डेसपिरेटली चेज करते हो तो तुम वीक सिग्नल देते हो। और जब तुम डिटैच हो जाते हो तो तुम्हारे सिग्नल स्ट्रांग हो जाते हैं। समझ रहे हो अट्रैक्शन सिर्फ लुक्स या स्किल्स का गेम नहीं है। ये नर्वस सिस्टम का भी गेम है। तुम्हारे अंदर का स्टेट ही डिसाइड करता है कि ये दुनिया तुमको कैसे ट्रीट करेगी। जब तुम अंदर से नीड़ी हो तो ये दुनिया तुम्हें इग्नोर करती है। पर जब तुम अंदर से कंप्लीट होते हो तो ये दुनिया तुम्हें चेज करती है। फिलोसोफिकली देखो तो ये और भी डेंजरस है क्योंकि ये तुम्हारी आइडेंटिटी से जुड़ा हुआ है। तुम अपनी वैल्यू को बाहर के रिजल्ट से अटैच कर देते हो। अगर वो लड़की मिल गई तो मैं वर्दी हूं। अगर प्रमोशन मिल गया तो मैं सक्सेसफुल हूं। अगर लोग मेरी रेस्पेक्ट करेंगे तभी मैं इंपॉर्टेंट हूं। और फिर तुम अपनी पूरी एक्जिस्टेंस एक्सटर्नल चीजों के हाथों में दे देते हो। मतलब तुम अपनी लाइफ के ड्राइवर नहीं हो, तुम पैसेंजर बन चुके हो। और जब तक तुम्हारी आइडेंटिटी एक्सटर्नल वैलिडेशन पर डिपेंडेंट है, तुम फ्री नहीं हो सकते हो। तुम हमेशा लोगों के बारे में सोचते रहोगे केयर करते रहोगे और ये केयर तुम्हें बर्बाद कर देगी। रिलेशनशिप में देख लो। जो इंसान लीस्ट अटैच होता है उसके पास ज्यादा पावर होती है। क्यों? क्योंकि उसके पास खोने के लिए कुछ नहीं होता है।
[5:36]वो इमोशनली स्टेबल होता है, वह रिएक्ट नहीं करता है। और इंसान नेचुरली उस तरफ अट्रैक्ट होता है जहां स्टेबिलिटी हो, जहां फ्रीडम हो, जहां कोई प्रेशर ना हो। इसलिए तुम देखोगे कि अधिकतर जो लोग आई डोंट गिव अ फक वाला एटीट्यूड रखते हैं उनके पास लोग खुद चलकर आते हैं। अब यहां पर एक ट्विस्ट आता है। मैं यहां पर नॉट केयरिंग की बात नहीं कर रहा हूं। मैं ओवर अटैचमेंट से बचने की बात कर रहा हूं। वह इंसान अंदर से फुलफिल्ड होता है। इसीलिए वह किसी के जाके चिपकता नहीं है। अब एक और पैटर्न समझो। जब तुम केयर करते हो तो तुम कंट्रोल चाहते हो। तुम चाहते हो कि चीजें तुम्हारे हिसाब से चले। तुम चाहते हो कि सामने वाला तुम्हें वैसे ट्रीट करें जैसा तुम एक्सपेक्ट कर रहे हो। और जब वो ऐसा नहीं करता है तो तुम फ्रस्ट्रेट हो जाते हो। मतलब तुम्हारी केयर सेल्फलेस नहीं है वो कंडीशनल है। और इंसान सबकॉन्शियसली ये फील कर लेता है। इसीलिए वो रेजिस्ट करता है क्योंकि किसी भी इंसान को पसंद नहीं है कि उसे कंट्रोल किया जाए। और जब तुम अचानक से थोड़ा सा रिलैक्स हो जाते हो थोड़ा सा फ्री कर देते हो तो तुम एक्चुअली कंट्रोल छोड़ रहे हो। चीजों को उनके नेचुरल फ्लो में आने देते हो। तुम्हारा नर्वस सिस्टम रिलैक्स हो जाता है, तुम्हारा सिस्टम भी सर्वाइवल मोड से निकलकर क्रिएटिव मोड में आ जाता है। तुम बेटर डिसीजन ले पाते हो, तुम ज्यादा प्रेजेंट रहते हो और सबसे इंपोर्टेंट तुम अपनी एनर्जी को वापस रिगेन करते हो। जो एनर्जी तुम दूसरों को इंप्रेस करने में चेज करने में या प्रूव करने में वेस्ट कर रहे थे। वह अब तुम्हारे पास है। यही वह पॉइंट है जहां से तुम जीतना शुरू करते हो। लेकिन यहां पर एक काफी बड़ी मिसअंडरस्टैंडिंग आती है। लोग सोचते हैं कि अच्छा तो मतलब मुझे सिर्फ केयर करना बंद करना है। और वो आर्टिफिशियली क्रूड बन जाते हैं, कोल्ड बन जाते हैं, इमोशनलेस बन जाते हैं। यह डिटैचमेंट नहीं है, यह सप्रेसन है। और सप्रेसन कभी भी पावर नहीं देता है। वह तुम्हें अंदर से सिर्फ तोड़ता है। रियल शिफ्ट तब होता है जब तुम जेनुअनली ये समझ जाते हो कि तुम्हारी वैल्यू किसी आउटकम पर डिपेंड नहीं करती है। जब तुम्हें सच में फर्क पड़ना बंद हो जाता है ना कि तुम प्रिटेंड करो। और ये तब होता है जब तुम अपनी आइडेंटिटी को आउटकम से अलग कर देते हो। जब तुम ये एक्सेप्ट कर लेते हो कि तुम्हारा काम सिर्फ एक्शन लेना है, रिजल्ट को कंट्रोल करना नहीं। जब तुम इंटरनली इतने स्टेबल हो जाते हो कि चाहे जीत मिले या हार तुम्हारा सेंटर कभी भी फ्लकचुएट नहीं कर सकता है। जब तुम केयर करते हो तो तुम्हारा फोकस रिजल्ट पर होता है। पर जब तुम ये करना कम करते हो तो तुम्हारा फोकस प्रोसेस पर शिफ्ट हो जाता है। और आइरॉनिकली, प्रोसेस पे फोकस करने से ही रिजल्ट और बेटर हो जाते हैं। ये पैराडॉक्स है कि जितना ज्यादा तुम रिजल्ट को चेज करोगे वो तुमसे और दूर भागेगा। पर जितना ज्यादा तुम प्रोसेस को चेज करोगे रिजल्ट खुद तुम्हारे पास चल के आएगा। अब सच सुनो। तुम जो बोलते हो ना मैं केयर करता हूं उसमें से 70% डर होता है। फियर ऑफ रिजेक्शन, फियर ऑफ बीइंग अलोन, फियर ऑफ नॉट बीइंग इनफ। और जब तुम डर से ऑपरेट कर रहे हो तो तुम जीत ही नहीं सकते क्योंकि डर तुम्हें श्रिंक करता है, कॉन्ट्रैक्ट करता है, छोटा बना देता है। और जीतने के लिए एक्सपेंशन चाहिए, ओपननेस चाहिए, रिस्क चाहिए। और वो तब होता है जब तुम्हें सच में फर्क पड़ना बंद हो जाता है। सोचो इस बारे में। अगर तुम्हें पता चले कि जो भी तुम अपनी लाइफ में चाहते हो वो तुम्हें चाहे मिले या ना मिले तुम फिर भी ठीक रहोगे। तुम फिर भी कंप्लीट रहोगे तो फिर तुम कैसे बिहेव करोगे? तुम ज्यादा फ्रीली बात करोगे, तुम ओवरथिंक नहीं करोगे, तुम ज्यादा रिस्की डिसीजंस ले पाओगे। तुम इंप्रेस करने की कोशिश नहीं करोगे, तुम बस होंगे और यही स्टेट सबसे अट्रैक्टिव होती है, सबसे पावरफुल होती है। पर ये स्टेट अचीव कैसे होती है? कैसे तुम अपने आप को उस पॉइंट पे ले जाते हो जहां तुम जेनुअनली डिटैच हो जाओ। जब तुम्हारा नर्वस सिस्टम शांत रहे, चाहे सिचुएशन कुछ भी हो, जहां तुम किसी आउटकम के बिना भी स्टेबल फील कर पाओ। क्योंकि जब तक तुम ये नहीं समझोगे कि कैसे तुम्हारा ब्रेन तुम्हें ट्रैप करता है, कैसे तुम्हें अपने इमोशन के जाल में फंसा लेता है, कैसे तुम्हें अपनी फीलिंग का गुलाम बना देता है। तब तक तुम चाहे कितनी भी कोशिश कर लो तुम उसी पैटर्न को रिपीट करोगे और सबसे डेंजरस पार्ट ये है कि तुम्हें लगता है कि तुम प्रोग्रेस कर रहे हो। जबकि तुम बस अपने उस इल्यूजन को रिपीट कर रहे होते हो और इस इल्यूजन के अंदर तुम चुपचाप अपनी लाइफ खोते रहोगे। बिना ये जाने कि तुम जीतने के काफी करीब हो। तुम्हें बस एक चीज छोड़नी है। एक चीज जो तुम इतने टाइटली पकड़ के बैठे हो कि तुम्हें पता भी नहीं चल रहा है कि वो चीज तुम्हें कंट्रोल कर रही है। और वो है तुम्हारी अटैचमेंट, तुम्हारी वो इनविजिबल ग्रिप जो तुम्हें लगता है कि तुमने पकड़ रखी है बट एक्चुअल में वो तुम्हें कंट्रोल कर रही है। और जब तक तुम्हारी ये ग्रिप लूज नहीं होगी तुम चाहे कितनी भी स्ट्रेटेजी बना लो कितने भी ज्ञान ले लो कितना भी असल कर लो तुम अंदर से वही इंसान रहोगे जो बिना अप्रूवल के हिल जाता है। जो साइलेंस से ट्रिगर हो जाता है, जो रिजेक्शन से टूट जाता है और उस स्टेट में जीत पॉसिबल ही नहीं है। क्योंकि इसमें तुम्हारा हर मूव डर के बेस पर हो रहा है, क्लेरिटी के बेस पे नहीं। क्लेरिटी के लिए बिहाइंड द डार्क काम आएगी। अब यहां से गेम शिफ्ट होता है बट यहां पर हम सिर्फ थ्योरी नहीं देंगे। हम रियल प्रैक्टिकल स्टेप्स देंगे। यह तुम्हारे नर्वस सिस्टम को दोबारा ट्रेन करने का एक प्रोसेस है। और यह अनकंफर्टेबल होगा क्योंकि तुम्हें अपनी पुरानी आइडेंटिटी को तोड़ना पड़ेगा। सबसे पहला स्टेप है अवेयरनेस ऑफ योर ट्रिगर्स। तुम्हें सबसे पहले यह समझना होगा कि तुम किन चीजों पे रिएक्ट करते हो। क्या तुम्हें इग्नोर किया जाना ट्रिगर करता है? क्या लेट रिप्लाईस तुम्हें एंग्जियस बना देता है? क्या किसी और की सक्सेस तुम्हें यह फील करवाती है कि तुम्हारी वैल्यू कम है? यह रैंडम नहीं है। यह तुम्हारे पास्ट एक्सपीरियंस से हुई हुई तुम्हारी कंडीशनिंग है। जब भी तुम ट्रिगर हो, तुरंत रिएक्ट मत करो। थोड़ा पोज करो ऑब्जर्व करो। अपने आप से तुरंत सवाल पूछो कि मैं अभी क्या फील कर रहा हूं और क्यों फील कर रहा हूं? ये सवाल सिंपल लगता है बट ये तुम्हें तुम्हारे ऑटो पायलट से बाहर निकाल देगा। जब तुम चीजों को ऑब्जर्व करते हो बिना रिएक्ट किए तो तुम अपने ब्रेन को एक नया सिग्नल दे रहे होते हो कि मैं स्लेव नहीं हूं। दूसरा स्टेप, रिस्पांस डिले की प्रैक्टिस करो। तुम्हारा नर्वस सिस्टम रिएक्शन का एडिक्ट है। मैसेज आया तुरंत रिप्लाई कर दो, स्टोरी देखी तुरंत रिएक्ट कर दो, इमोशन आया तुरंत एक्सप्रेस कर दो। यह सब तुम्हें वीक बना रहा है। अब कॉन्शियसली डिले करो। कोई मैसेज आया है तो उसका रिप्लाई 10 मिनट बाद दो, फिर 30 मिनट बाद दो, फिर 2 घंटे बाद दो। कोई गेम खेलने के लिए नहीं बोल रहा हूं मैं। अपने नर्वस सिस्टम को ट्रेन करने के लिए बोल रहा हूं क्योंकि यह इंस्टेंट रिएक्शन का एडिक्ट हो चुका है। और इससे तुम अपने ब्रेन को सिखाते हो कि ये जो भी एजेंसी क्रिएट हो रही है ना जो भी मुझे फील हो रही है। यह सब फेक है। जो लोग कंट्रोल में होते हैं वो इमीजेटली रिएक्ट नहीं करते हैं। वो खुद चूज करते हैं कि उन्हें कब रेस्पॉन्ड करना है और जब तुम यह कंट्रोल बिल्ड करते हो तो तुम्हारी इंटरनल पावर ऑटोमेटिकली बढ़ती है। तीसरा स्टेप, आउटकम से अपनी आइडेंटिटी को अलग करो। यह सबसे डिफिकल्ट है बट यही कोर है। तुम अपनी वैल्यू को रिजल्ट से अटैच करते हो, इसी वजह से रिजल्ट को अपनी जीवन या मृत्यु बना देते हो। अपने आप से बार-बार ये कहते रहो कि मेरा काम है एक्शन लेना, रिजल्ट मेरा काम नहीं है। जब तुम किसी काम को कर रहे होते हो और तुम उसमें अच्छा करना चाहते हो तो उसमें अपना 100% दो। पर एक चीज ये भी ध्यान रखो बैक ऑफ द माइंड ये भी चीज अपने दिमाग में चलाते रहो कि रिजल्ट अनप्रिडिक्टेबल है। ये कोई वीक माइंडसेट नहीं है। यह इंटेलिजेंट डिटेचमेंट है। यह तुम्हें शांत रखता है और शांत इंसान कंसिस्टेंट होता है और कंसिस्टेंसी जीत देती है। चौथा स्टेप प्रैक्टिकल टर्म्स में डोपामिन डिटॉक्स करो। तुम्हारा ब्रेन कांस्टेंट वैलिडेशन का एडिक्ट बन चुका है। रियल्स, नोटिफिकेशन, मैसेजेस, वैलिडेशन। इसीलिए जब रियल लाइफ स्लो होती है तो तुम एंग्जियस हो जाते हो। तुम्हें कॉन्शियसली अपनी स्टिमुलेशन पर काम करना पड़ेगा। सुबह उठते ही फोन मत उठाओ। कुछ टाइम साइलेंस में बैठो। बोरडम फील करो। बोरडम के ऊपर मैंने एक डिटेल वीडियो भी बना रखा है। शुरुआत में अनकंफर्टेबल लगेगा। तुम्हारा दिमाग भागेगा। तुम्हें अर्ज आएगी डिस्ट्रक्शन की तरफ भागने की। बट यहीं से गेम शिफ्ट होता है। जब तुम बोर्डम को टॉलरेट करना सीख जाते हो तो तुम्हारा फोकस शार्प होता है, तुम्हारा नर्वस सिस्टम स्टेबल हो जाता है। और जब तुम अंदर से स्टेबल होते हो तो तुम्हें एक्सटर्नल वैलिडेशन की जरूरत ही नहीं पड़ती। पांचवा स्टेप, बिल्ड अ लाइफ बियोंड द थिंग यू वांट। ये थोड़ा कड़वा है पर सच है। जिस चीज को तुम ज्यादा डेस्परेटली चाहते हो ना उसके अलावा फिर तुम्हारी लाइफ में कुछ बचता नहीं है। इसलिए तुम चिपकते हो। जब तुम्हारी लाइफ ऑलरेडी फुल होती है, काम होता है, पर्पस होता है, फ्रेंड्स होते हैं, फैमिली होती है तो तुम नेचुरली डिटैच रहोगे। तुम्हें किसी एक चीज पे लटकने की जरूरत नहीं पड़ेगी। इसीलिए अपने लाइफ को डाइवर्सिफाई करो। किसी एक चीज को अपनी सारी खुशी का सोर्स बनाना बंद करो। तुम्हारी लाइफ के जितने ज्यादा पिलर्स होंगे उतनी कम अटैचमेंट होगी तुम्हें किसी एक चीज से। समझ रहे हो? देखो स्टॉप केयरिंग का मतलब ये नहीं है कि तुम्हें कुछ फील ना हो तुम कोल्ड बन जाओ या फिर तुम इमोशनलेस बन जाओ। इसका मतलब सिर्फ इतना है कि तुम अपने इमोशंस के स्लेव ना रहो। तुम फील करो पर उसमें डूबो मत, तुम चाहो पर उसके चिपको मत। तुम एफर्ट दो पर उसको अपनी पूरी आइडेंटिटी मत बनाओ। और जब तुम ये सब इंप्लीमेंट करते हो तो तुम देखते हो कि धीरे-धीरे तुम्हारी लाइफ चेंज हो रही है। तुम शांत हो गए हो, ग्राउंडेड हो गए हो, तुम्हारी प्रेजेंस हैवी हो गई है। तुम चेज नहीं कर रहे, तुम अट्रैक्ट कर रहे हो। लोग तुम्हें समझ नहीं पाते पर फील कर पाते हैं। अपॉर्चुनिटी खुद तुम्हारे पास आती है और सबसे इंपोर्टेंट तुम अपने खुद के साथ पीस में रहते हो। पर यहां पर एक और ट्रैप आता है जो बहुत से लोगों को वापस खींच लेता है। जब तुम जीतना शुरू करते हो तो तुम्हारा ईगो एक्टिवेट हो जाता है। तुम्हें लगता है कि अब तो मैं जीत रहा हूं अब तो सब सही है, अब तो मैं कंट्रोल में हूं। और इसी से ही तुम वापस से ओवरथिंक करने लग जाते हो, वापस से अटैच हो जाते हो किसी एक चीज को लेकर। अपने इस कंट्रोल को लेकर तुम अटैच हो जाते हो। तुम वापस प्रूव करने लगते हो ओवरथिंक करने लगते हो। और तुम वापस उसी लूप में गिर जाते हो जहां से तुम निकले थे। इसलिए याद रखो, यह एक बार का काम नहीं है। तुम्हें हर दिन चूज करना पड़ेगा कि तुम डर से ऑपरेट कर रहे हो या फिर फ्रीडम से। तुम्हें हर दिन ये ऑब्जर्व करना पड़ेगा कि तुम जबरदस्ती किसी चीज को पकड़ तो नहीं रहे हो। हर दिन तुम्हें अपने आप को ही रिमाइंड कराना पड़ेगा कि तुम बिना किसी रिजल्ट के भी इनफ हो। सो अगर यह वीडियो तुम्हें रिलेटेबल और वैल्यूएबल लगा तो इसे लाइक करके चैनल को सब्सक्राइब कर लीजिए। और हां, अगर तुम मेरी ई-बुक को पढ़ना चाहते हो तो डिस्क्रिप्शन और पिन कमेंट में तुम्हें उसकी लिंक मिल जाएगी। मिलते हैं नेक्स्ट वीडियो में, थैंक यू वेरी मच।



