Thumbnail for The Disturbing Truth About Food Safety In India (FSSAI is a Joke) ft. Medha by Jist

The Disturbing Truth About Food Safety In India (FSSAI is a Joke) ft. Medha

Jist

24m 57s4,148 words~21 min read
YouTube auto captions
Transcript source

YouTube auto captions

This transcript was extracted from YouTube's auto-generated caption track. The transcript below is server-rendered so it can be read, searched, cited, and shared without opening the original YouTube player.

Timestamped outline
Pull quotes
[0:03]मैं और आप एक साइलेंट एपिडेमिक यानी बिना शोर धीरे-धीरे फैल रही महामारी में जी रहे हैं.
[0:03]जिस बड़े से गोलगप्पे को हम बड़ा सा मुंह खोलकर एक ही बार में निगल जाते हैं उसमें मल मूत्र तक मिलाया जा रहा है.
[0:46]हम सुन तो रहे हैं कि फूड एडल्ट्रेशन यानी खाने-पीने की चीजों में होने वाली मिलावट बड़ा खतरा बनती जा रही है.
[0:46]बहरहाल खबर आप तक पहुंची ही होगी कि अमूल दूध पीता है इंडिया समेत कई फेमस ब्रांड्स का दूध क्वालिटी टेस्टिंग में फेल पाया गया है.
Use this transcript
Related transcript hubs

[0:03]मैं और आप एक साइलेंट एपिडेमिक यानी बिना शोर धीरे-धीरे फैल रही महामारी में जी रहे हैं. अगर इसे यूं ही बढ़ने दिया तो इतिहास हमारी चुप्पी याद रखिएगा. चलिए आज आपकी स्वाद की दुनिया का पोस्टमार्टम करते हैं. जिस बड़े से गोलगप्पे को हम बड़ा सा मुंह खोलकर एक ही बार में निगल जाते हैं उसमें मल मूत्र तक मिलाया जा रहा है. पैकेज्ड फूड के नाम पर आपको कैंसर परोसा जा रहा है. ग्रेट नोएडा में एक ही सोसाइटी के कई लोग मोमो खाकर बीमार पड़ गए. लखनऊ में 11 क्विंटल नकली चाय पत्ती पकड़ी गई. ग्लोबल मार्केट्स में इंडियन फूड प्रोडक्ट्स की किरकिरी हो रही है.

[0:46]इन वीडियोस को देखकर आप इशारा समझ ही गए होंगे. आज बात हमारे खाने की सुरक्षा की यानी फूड सिक्योरिटी की होगी. असुरक्षित भोजन, फूड एडल्ट्रेशन, फूड एडल्ट्रेशन है. हम सुन तो रहे हैं कि फूड एडल्ट्रेशन यानी खाने-पीने की चीजों में होने वाली मिलावट बड़ा खतरा बनती जा रही है. लेकिन सच यह है कि ना हमें फर्क पड़ रहा है, ना सिस्टम को. What is India's food safety body doing about it? सर बाजार में प्योरिटी का लेबल लगाकर फर्जी लेबल लगाकर खुलेआम जहर बेचा जा रहा है. बहरहाल खबर आप तक पहुंची ही होगी कि अमूल दूध पीता है इंडिया समेत कई फेमस ब्रांड्स का दूध क्वालिटी टेस्टिंग में फेल पाया गया है. हालात ऐसे हैं कि अब मां दूध ना पीने पर नहीं बल्कि अगर पीने पर डांट दे तो हैरानी नहीं होगी. ऐसे में जरूरी है कि समय रहते भारत की फूड सेफ्टी और फूड एडल्ट्रेशन पर बैठ के बात की जाए. क्योंकि सभी जरूरी मुद्दों और उनके समाधान पर बैठकर ही बात होती है.

[1:59]शुरुआत उस हालिया घटना से जिसने अचानक देश की फूड सेफ्टी को सुर्खियों में ला खड़ा किया. 8 फरवरी 2026. Trustified नाम के YouTube चैनल पर एक वीडियो अपलोड होता है. दावा किया जाता है कि देश के कुछ फेमस मिल्क ब्रांड्स की माइक्रोबायोलॉजिकल टेस्टिंग कराई गई. यानी यह जांच हुई कि दूध वाकई पीने लायक है या नहीं. रिजल्ट नतीजे चौंकाने वाले बताए गए. वीडियो के मुताबिक अमूल ताजा और अमूल गोल्ड के दूध में कोलिफॉर्म बैक्टीरिया की मात्रा तय सीमा यानी सेफ लिमिट से ज्यादा पाई गई. यहां सेफ लिमिट तय करता है फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया यानी FSSAI. फसाई के स्टैंडर्ड्स के अनुसार दूध में 10 CFU/ml से ज्यादा कॉलीफॉर्म बैक्टीरिया नहीं होने चाहिए. लेकिन अमूल ताजा में 980 CFU/ml निकले. वहीं अमूल गोल्ड में कोलिफॉर्म बैक्टीरिया का लेवल था 25 CFU/ml यानी सेफ लिमिट से कई गुना ज्यादा. यहां CFU/ml का मतलब Colony-Forming Units Per milliliter से है. बात यहीं खत्म नहीं होती. Mother Dairy Cow Milk में टोटल प्लेट काउंट TPC यानी कुल बैक्टीरिया की संख्या काफी ज्यादा पाई गई. TPC ज्यादा होना दिखाता है कि या तो प्रोसेसिंग में गड़बड़ी थी या गलत तापमान पर स्टोरेज किया गया या फिर दूध पुराना था. Mother Dairy Cow Milk में टीपीसी मिला 240000 CFU/ml जबकि सेफ लिमिट 30000 CFU/ml है. Country Delight के काऊ मिल्क में भी टोटल प्लेट काउंट 60000 CFU/ml मिले यानी सेफ लिमिट से दो गुना. खास बात यह है कि जिस फसाई का काम देश में मिलने वाले खाने-पीने के प्रोडक्ट्स की क्वालिटी जांचना है उसे इसके बारे में पता ही नहीं था. फसाई का काम जब किसी और प्राइवेट चैनल ने किया तो फसाई को पता चला कि अच्छा देश में बिक रहे टॉप मिल्क ब्रांड्स की क्वालिटी सही नहीं है. यह फसाई क्या है उसकी जिम्मेदारियां क्या है और सिस्टम में कहां चूक हो रही है. इन सवालों के जवाब आपको आगे वीडियो में मिल जाएंगे लेकिन पहले समझते हैं कि हमारी थाली का खाना कितना सुरक्षित है.

[4:08]मिर्ज़ा गालिब ने कभी कहा था- हजारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पे दम निकले. लेकिन आज के भारत की हकीकत इस शेर को थोड़ा बदल देती है. आज गालिब होते तो कहते हजारों खाने यानी फूड आइटम हजारों खाने ऐसे के हर निवाले पे दम निकले. हम भारतीय खाने के शौकीन नहीं खाने के दीवाने हैं. कुछ तो खाने के लिए ही जीते हैं. हमारी सुबह अदरक वाली चाय के बिना अधूरी है और रात बिना कुछ मीठे के मुकम्मल नहीं होती. लेकिन जरा ठहरिए और सोचिए क्या हो अगर मैं आपसे कहूं कि आपकी थाली में परोसा गया खाना एक स्लो पॉइजन यानी धीरे-धीरे असर करने वाला जहर है. मैं कोई भी बात हवा में नहीं कर रही हूं ऐसा कहने के पीछे कुछ सख्त कठोर वजहे हैं. चलिए उन्हीं पर बात करती हूं. भारत में एक आम इंसान अपनी भूख मिटाने के लिए दो रास्तों पर चलता है. यानी हम दो तरह से खाना खरीदते या खाते हैं. पहला रास्ता जाता है स्ट्रीट फूड की ओर यानी वो नुक्कड़ वो ठेले जहां कढ़ाई में खोलता तेल और मसालों की खुशबू आपको अपनी ओर खींच लेती है. यहां हाइजीन भगवान भरोसे होता है लेकिन स्वाद शायद लाजवाब. अब कुछ लोग यह बोलेंगे कि हम तो स्ट्रीट फूड से दूर ही रहते हैं. ऐसे लोगों का रास्ता जाता है पैकेज्ड फूड की तरफ. चमचमाते सुपरमार्केट और दुकानों पर सीलबंद पैकेट जहां हर पैकेट पर सेहत और विटामिन का वादा लिखा होता है. इनका यूज हम हर दिन किचन में भी करते हैं सोचते हैं अरे इस पर तो एक्सपायरी डेट लिखी है किसी बड़ी कंपनी ने बनाया है सुरक्षित ही होगा. लेकिन कड़वा सच यह है कि आप सड़क पर खड़े होकर खाएं या घर पर पैकेट फाड़कर स्लो पॉइजन की होम डिलीवरी दोनों जगह बराबर हो रही है. चलिए आज आपकी स्वाद की दुनिया का पोस्टमार्टम करते हैं. शुरुआत स्ट्रीट फूड से. सबसे पहले बात गोलगप्पे की जिसे देखकर हमारी जीभ लपलपाने लगती है. पानी पूरी का वो तीखा मीठा खट्टा पानी जिसे आप भैया थोड़ा और तीखा कहकर मांगते हैं उसमें पुदीना या इमली नहीं बल्कि कपड़ों को रंगने वाला केमिकल हो सकता है. जून 2024 में कर्नाटक सरकार ने राज्य भर से पानी पूरी के 260 सैंपल उठाए. टेस्ट में 43 यानी 43 सैंपल्स फेल हो गए. चौंकाने वाली बात यह थी कि करीब 22% पानी पूरी के पानी में ब्रिलियंट ब्लू, सनसेट येलो, टार्ट्राज़ीन जैसे आर्टिफिशियल कलर और कार्सिनोजेनिक केमिकल्स आसान भाषा में कहूं तो कैंसर पैदा करने वाले केमिकल्स मिले थे. इससे पहले मई महीने में ही कर्नाटक में गोभी मंचूरियन और कॉटन कैंडी. हां वही बुढ़िया के बाल उन पर बैन लगा दिया गया. इनमें रोडामिन बी नाम का केमिकल मिलाया जा रहा था. यह एक टेक्सटाइल डाई है जिसका इस्तेमाल कपड़े रंगने में होता है. यह आगे चलकर सीधे तौर पर कैंसर का कारण बन सकता है. स्ट्रीट फूड में मोमो कैसे भूल सकते हैं. लेकिन उसकी वो लाल चटनी जिसमें डिप करने के बाद स्वाद थोड़ा तीखा हो जाता है वो आपको हॉस्पिटल भी पहुंचा सकती है. सितंबर 2024 में ग्रेट नोएडा में एक ही सोसाइटी के कई लोग मोमो खाकर बीमार पड़ गए. जांच हुई तो पता चला कि चटनी में टेक्सटाइल डाई मिलाया था. सोचिए जो रंग जींस पर चढ़ना चाहिए वह आपकी आंतों यानी इंटेस्टाइंस को रंगीन बना रहा है. इसके परिणाम क्या होंगे इसका अंदाजा आपको होगा ही. सड़क की टपरी वाली चाय भी सुरक्षित नहीं है. जनवरी 2025 में उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में 11 क्विंटल नकली चाय पत्ती पकड़ी गई. इस चाय पत्ती को रंगने के लिए चमड़े और पेंट इंडस्ट्री में इस्तेमाल होने वाले रंगों का प्रयोग किया जा रहा था. इसे पीने से लिवर और किडनी खराब होने का खतरा रहता है. बाहर का खाना तो बदनाम है ही लेकिन घर के अंदर अपनी रसोई में हम जिन ब्रांडेड पैकेट्स को शुद्धता की गारंटी मानकर लाते हैं. वहां तो धोखा और भी बड़ा है. यहां एडल्टरेटर्स यानी मिलावटखोर अब अपराधी नहीं साइंटिस्ट बन चुके हैं. नोएडा और ग्रेटर नोएडा में फूड सेफ्टी डिपार्टमेंट ने 2024 और 25 में शाकाहारियों का चिकन यानी पनीर पर एक बड़ा सर्वे किया. इसमें मार्केट से लिए गए 83% पनीर के सैंपल फेल हो गए. 40% तो अनसेफ यानी खाने लायक ही नहीं थे. यह पनीर दूध से नहीं बनता यह बनता है यूरिया डिटर्जेंट पाम ऑयल और सल्फ्यूरिक एसिड यानी तेजाब से. इसे सिंथेटिक पनीर कहते हैं. इसे खाकर आपकी किडनी कब जवाब दे जाए पता भी नहीं चलेगा. बचपन से आप सुनते आ रहे हैं असली मसाले सच सच लेकिन अब सच निकला है कि MDH और एवरेस्ट जैसे बड़े ब्रांड्स के मसालों में इथाइलीन ऑक्साइड नाम का कीटनाशक यानी पेस्टिसाइड मिला. जो कैंसर पैदा कर सकता है. मिलावट की हद तो तब पार हुई जब तिरुपति मंदिर के प्रसाद में इस्तेमाल होने वाले घी में पाम ऑयल और अन्य दूसरे केमिकल्स की मिलावट पाई गई. जब भगवान का प्रसाद सुरक्षित नहीं तो आपकी रसोई में रखे घी के डब्बे की क्या गारंटी. हालात इतने खराब हैं कि नवरात्रि में कुट्टू का आटा खाने से सैकड़ों लोग मंदिर की जगह अस्पताल पहुंच रहे हैं. इसी साल जनवरी महीने में NDTV में छपी यह हेडलाइन ही देख लीजिए. गुजरात में यूरिया और डिटर्जेंट से दूध बनाया जा रहा है. राजस्थान और उत्तर प्रदेश में हजारों लीटर नकली घी, अचार और गुड़ पकड़ा गया. असल में खबरों की यह हेडलाइंस हमारे सिस्टम की विफलता की चीखें हैं. कैसे इस पर आगे विस्तार से बात करेंगे. बहरहाल स्ट्रीट फूड हो या ब्रांडेड पैकेट मिलावट का जहर हर जगह घुल रहा है. सवाल यह है कि जब नमक से लेकर दूध तक सब कुछ मिलावटी है तो आखिर इंसान खाए तो खाए क्या.

[9:38]अब तक हमने समझा कि हमारी थाली में जहर कैसे घुल रहा है. लेकिन यह सिर्फ हमारे घर या मोहल्ले की बात नहीं है अब यह मामला इंटरनेशनल हो चुका है. जिस मेड इन इंडिया पर हमें गर्व होना चाहिए उसे दुनिया के बड़े देश अब रेड फ्लैग यानी लाल झंडी दिखा रहे हैं. भारत धीरे-धीरे एक अनरिलायबल एक्सपोर्टर यानी एक अविश्वसनीय निर्यातक बनता जा रहा है. आज भारत दुनिया का सबसे बड़ा मसाला एक्सपोर्टर है लेकिन क्या आप जानते हैं कि हमारे यह मसाले अब सरहदों पर रोके जा रहे हैं. अप्रैल 2024 में खबर आई कि हांगकांग और सिंगापुर के फूड रेगुलेटर्स ने भारत के MDH और एवरेस्ट जैसे बड़े ब्रांड्स के कुछ मसालों को बाजार से हटा दिया. यानी इनकी बिक्री रोक दी गई. वजह कोई छोटी-मोटी लापरवाही नहीं थी. बल्कि इन मसालों में एथलीन ऑक्साइड नाम का कीटनाशक पाया गया था. आसान भाषा में कहें तो यह वो केमिकल है जो इंसानों में सीधे तौर पर कैंसर पैदा कर सकता है. यूरोपियन यूनियन का डाटा तो और भी डरावना है. जो बताता है कि 2020 से 2024 के बीच भारत से भेजे गए करीब 527 फूड प्रोडक्ट्स में कैंसर पैदा करने वाले केमिकल्स पाए गए. इसमें सिर्फ मसाले नहीं बल्कि आपकी सेहत बनाने वाले नट्स, तिल के बीज और हर्बल प्रोडक्ट्स भी थे. यह लापरवाही की कहानी नई नहीं है. साल 2014 याद कीजिए जब यूरोपीय संघ ने भारत की शान और फलों का राजा अल्फोंसो आम पर ही बैन लगा दिया था. वजह बताई गई कि इन आमों के साथ फ्रूट फ्लाइज यानी फलों की मक्खियां भी यूरोप पहुंच रही थी. यूरोप का कहना साफ था भारत के एक्सपोर्ट नियम इतने ढीले हैं कि यह मक्खियां हमारी अपनी फसलों को तबाह कर देंगी. 2014 से 2015 के बीच यह बैन चला जिसने भारत को इंटरनेशनल मार्केट में एक अनरिलायबल एक्सपोर्टर बना दिया. असल में जब कोई देश हमारे खाने को रिजेक्ट करता है तो सिर्फ शिपमेंट वापस नहीं आता. भारत की साख और पैसा दोनों समंदर में डूब जाते हैं. ग्लोबल फूड सिक्योरिटी इंडेक्स यानी GFSI के 2022 के डेटा के मुताबिक भारत 113 देशों में 68वें पायदान पर है. क्वालिटी और सेफ्टी के मामले में हम दुनिया के कई छोटे और गरीब देशों से भी पीछे खड़े हैं. इसकी एक आर्थिक चोट भी है. ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव यानी GTRI की रिपोर्ट कहती है कि भारत के कुल मसाला निर्यात का 50% से ज्यादा हिस्सा आज खतरे में है. अगर दुनिया के देशों ने नियम और सख्त किए तो भारत को करीब 2.1 अरब डॉलर यानी 17000 करोड़ रुपये का नुकसान हो सकता है. चाहे वह हांगकांग में रिजेक्ट हुए मसाले हों या यूरोप में बैन हुआ आम. पूरी दुनिया आज हमें आईना दिखा रही है. उनका मैसेज बहुत क्लियर है. हिंदुस्तानियों आपका स्वाद तो लाजवाब हो सकता है लेकिन आपकी सुरक्षा यानी फूड सेफ्टी पर हमें शक है.

[12:26]अब सवाल यह उठता है कि क्या भारत हमेशा से ऐसा था. क्या हमारे पूर्वज भी इसी तरह का जहरीला खाना खाकर बड़े हुए थे. जवाब है बिल्कुल नहीं. भारत कभी दुनिया की सबसे हाइजीनिक फूड सोसाइटी हुआ करता था. इंडियन माइथोलॉजी में तो खाने की तुलना ब्रह्मा विष्णु और महेश से की गई है लेकिन फिर कुछ ऐसा हुआ कि हम शुद्धता के शिखर से गिरकर मिलावट की मंडी बन गए. चलिए समय के पहिए को पीछे घुमाते हैं और हजारों साल पहले जब दुनिया को साफ सफाई का मतलब भी नहीं पता था सिंधु घाटी सभ्यता में अनाज को सुरक्षित रखने के लिए ग्रेनरी यानी बड़े स्टोरेज यूनिट्स बनाए गए थे. कौटिल्य का अर्थशास्त्र हमें बताता है कि फोर्थ सेंचुरी बीसी में भी फूड सेफ्टी के कड़े नियम थे. उस दौर में अगर कोई दुकानदार अनाज या तेल में मिलावट करता है तो उस पर पन्नास के हिसाब से फाइन लगता था. मनुस्मृति में तो यहां तक कहा गया है कि जो व्यक्ति दूषित भोजन यानी अडल्टरेटेड फूड बेचता है उसे आउटकास्ट यानी समाज से अलग कर देना चाहिए. उस समय मिलावट करना सिर्फ अपराध नहीं सामाजिक मृत्यु के समान था. इतिहास आगे बढ़ा लेकिन सख्तियां कम नहीं हुई. अलाउद्दीन खिलजी के दौर में बाजार का नियम रूह कपा देने वाला था. अगर कोई दुकानदार मिलावट करता तो सुल्तान का आदेश था इसके शरीर से उतना ही मांस काट लो जितनी इसने मिलावट की है. सोचिए क्या उस दौर में किसी की हिम्मत होती होगी फूड एडल्ट्रेशन यानी जहर बेचने की. तो फिर यह सब बिगड़ा कब. इस तबाही की जड़ें किसी वायरस में नहीं बल्कि ब्रिटिश शासन में छिपी हैं. अंग्रेजों का फूड रेगुलेटरी फ्रेमवर्क पूरी तरह बकवास और भेदभाव पूर्ण था. उनका कॉलोनियल माइंडसेट बहुत क्लियर था इंडियंस के लिए सब कुछ चलता है. ब्रिटेन में उनके पास सेल ऑफ फूड एंड ड्रग्स एक्ट 1875 था. वे भारत से आने वाली चाय और मसालों की वहां कड़ी जांच करते थे लेकिन वही अंग्रेज जब अपने प्रोडक्ट्स भारत लाते थे तो यहां कोई चेक एंड बैलेंस नहीं था. उनके लिए भारत सिर्फ एक डंपिंग ग्राउंड था. अंग्रेजों ने कभी भारत के लिए एक नेशनल फूड सेफ्टी लॉ बनाया ही नहीं. IPC 1860 में मिलावट को अपराध तो माना गया लेकिन सजा इतनी मामूली थी कि किसी को फर्क ही नहीं पड़ा. उन्हें हमारी सेहत से कोई लेना देना नहीं था. दरअसल ब्रिटिश हुकूमत ने भारतीय व्यापारियों पर इतने भारी टैक्स और पाबंदियां लगा दी थी कि ईमानदारी से व्यापार करना मुश्किल हो गया था. जब पैसा कमाना कठिन हुआ तो व्यापारियों ने मिलावट का शॉर्टकट अपनाया. यहां से लालच एक कॉमन बिजनेस प्रैक्टिस बन गया.

[14:56]अंग्रेज देश से चले गए लेकिन आजादी के बाद भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी सबका पेट भरना. लेकिन कुछ ही सालों में यह जरूरत महसूस हुई कि पेट में क्या भरा जा रहा है इसकी भी जांच होनी चाहिए. इसके लिए 1954 में सरकार प्रिवेंशन ऑफ फूड एडल्ट्रेशन PFA एक्ट लाई. यह भारत का पहला बड़ा फूड लॉ था. कानून तो बन गया लेकिन इसे लागू करने के लिए लैब्स ही नहीं थी. नतीजन कानून किताब में रहा और मिलावट बाजारों में. इसके बाद मिलावट रोकने के लिए एक-एक करके आठ कानून बने. पर बात फिर भी नहीं बनी. फिर आया 2006. फूड सेफ्टी से जुड़े सभी आठ कानूनों को मिलाकर एक सुपर बॉडी बनाई गई नाम रखा फसाई FSSAI यानी फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया. फसाई का मकसद था एक साइंस बेस्ड रेगुलेटर बनाना. इसका काम सिर्फ लाइसेंस बांटना नहीं बल्कि फार्म टू फोक यानी खेत से थाली तक भोजन को सुरक्षित रखना था. लेकिन हकीकत यह है कि आज फसाई खुद एक फेल होता सिस्टम नजर आ रहा है. इसको प्रूव करती हैं साल 2017 में आई कैग यानी कंप्ट्रोलर एंड ऑडिटर जनरल ऑफ इंडिया की रिपोर्ट. इस ऑडिट ने साबित किया कि जो संस्था हमें सुरक्षित खाना खिलाने के लिए बनी थी वो खुद कितनी लापरवाह है. कैग ने पाया कि फसाई ने उन फूड बिजनेस ऑपरेटर्स को भी लाइसेंस बांट दिए जिन्होंने जरूरी डॉक्यूमेंट्स तक जमा नहीं किए थे. बिना किसी फिजिकल इंस्पेक्शन के शुद्धता के सर्टिफिकेट बांटे जा रहे हैं मतलब मिलावटखोरों को प्योरिटी सर्टिफिकेट मिल गया. रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि फसाई लैब्स में आधुनिक टेस्टिंग के लिए इक्विपमेंट ही नहीं है. इसका सीधा फायदा मिलावटखोरों को मिलता है और हम तक मिलावटी सामान पहुंचता है. कैग ने पाया कि फसाई ने कई फूड प्रोडक्ट्स के लिए स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर्स यानी एसओपीज तक तय नहीं किए थे. जब तक स्टैंडर्ड्स ही तय नहीं होंगे आप किसी चीज को मिलावटी साबित कैसे करेंगे. इतना ही नहीं फसाई के बड़े अधिकारी करप्शन केस में पकड़े गए. मई 2024 में सीबीआई ने मुंबई में फसाई के एक असिस्टेंट डायरेक्टर को रिश्वत लेते रंगे हाथों पकड़ा. यह रिश्वत फूड क्लीयरेंस देने के नाम पर ली जा रही थी. सोचिए चंद रुपयों के लिए किसी जहरीले प्रोडक्ट को सेफ बताकर आपकी थाली तक पहुंचाने का सौदा हो रहा था. फसाई के फेल होने की सबसे बड़ी वजह है सजा का खौफ ना होना. फसाई की 2022-23 की रिपोर्ट के मुताबिक देश भर में कुल फूड एडल्ट्रेशन के 38000 केस दर्ज किए गए. इन हजारों केसेस में से केवल 5017 मामलों में सजा हो पाई यानी सजा की दर इतनी कम है कि मिलावटखोर इसे बिजनेस का एक छोटा सा रिस्क मानकर चलते हैं. एक छोटा सा रिस्क. जब पेनल्टी लगाई भी जाती है तो उसे रिकवर ही नहीं किया जाता. फसाई का साबुन कितना स्लो है इसे आप इस घटना से समझ सकते हैं. 2014 में एक प्रपोजल चल रहा है कि फूड पैकेट्स में न्यूट्री ग्रेड लिखे जाएं यानी पैकेट के सामने साफ लिखा होना चाहिए कि इसमें नमक चीनी या फैट कितना है. लेकिन 12 साल बीत गए. कुछ दिन पहले ही सुप्रीम कोर्ट ने भी मामले में दखल दिया लेकिन फाइनल नोटिफिकेशन अब भी लटका हुआ है. आज हालत यह है कि विदेशी लैब हमारे मसालों में जहर ढूंढ लेती हैं. लेकिन फसाई की लैब्स को सब कुछ ठीक लगता है. पदों की भारी कमी है. एक अधिकारी पर हजारों दुकानों का बोझ है और लैब के पास पावर नहीं है. कैग की रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि फसाई अपने प्राथमिक कार्य में विफल रहा है. जब भी भारत में मिलावट या गंदगी की बात होती है तो एक रटा रटाया तर्क दिया जाता है. भाई इतनी बड़ी आबादी है यहां यह सब तो चलेगा ही. लेकिन क्या वाकई आबादी ही समस्या है. दुनिया के देशों को देखें तो समझ आता है कि समस्या आबादी नहीं बल्कि अकाउंटेबिलिटी यानी जवाबदेही की कमी है. जापान में खाने की शुद्धता को लेकर एक अलग ही स्तर का जुनून है जिसे वहां पॉजिटिव लिस्ट सिस्टम कहा जाता है. जापान में 800 से ज्यादा कीटनाशकों यानी पेस्टिसाइड्स की एक लिस्ट है. अगर किसी फल या सब्जी में लिस्ट से बाहर का सिर्फ 0.01% केमिकल भी मिल गया तो उसे तुरंत जहर घोषित कर दिया जाता है. वहां सुपरमार्केट में रखे एक सेब या मीट के टुकड़े पर क्यूआर कोड होता है. इसे स्कैन करते ही आपको पता चल जाएगा कि इसे किस किसान ने उगाया, किस दिन तोड़ा और किस ट्रक से यह दुकान तक पहुंचा. इसे कहते हैं फार्म टू फोक ट्रैसेबिलिटी. चिली देश ने तो पैकेज्ड फूड इंडस्ट्री की मनमानी को जड़ से खत्म कर दिया. वहां भारत की तरह पैकेट के पीछे बारीक अक्षरों में जानकारी नहीं छुपाई जाती. चिली में अगर किसी प्रोडक्ट में चीनी नमक या फैट ज्यादा है तो पैकेट के सामने एक बड़ा काला ऑक्टागन बनाना पड़ता है जिस पर हाई इन शुगर या हाई इन सॉल्ट लिखा होता है. हम अक्सर सोचते हैं कि सड़क का खाना तो भगवान भरोसे ही होगा लेकिन सिंगापुर ने इस सोच को बदल दिया. वहां हर स्ट्रीट फूड वेंडर को अपनी दुकान के सामने हाइजीन ग्रेड ए बी या सी का बोर्ड लगाना अनिवार्य है मैंडेटरी है. अगर किसी की सफाई रेटिंग गिरी तो उसका धंधा बंद. इधर फ्रांस ने न्यूट्री स्कोर के जरिए क्रांति लाने का काम किया है. वहां पर हर पैकेट पर सामने की तरफ ए से ई तक की रेटिंग होती है. ए और हरा रंग मतलब सेफ ई और लाल रंग मतलब डेंजर. चीन के नियम ही इतने कड़े हैं कि कोई मिलावट के बारे में सोच भी नहीं सकता. एक घटना के बारे में आपको जानना चाहिए. बात साल 2008 की है. चीन में मिलावटी दूध पीने से छह छोटे बच्चों की मौत हो गई. चीन ने बिना देरी किए दो दोषियों को सीधे मौत की सजा सुना दी. उसी साल भारत में भी मिलावटी दूध पीने से छह बच्चों की मौत हो गई लेकिन कुछ साल की सजा और मामूली जुर्माने के बाद अपराधी बेल पर बाहर आ गए. 2024 में स्विट्जरलैंड की ऑर्गेनाइजेशन पब्लिक आई ने खुलासा किया कि नेस्ले भारत में बच्चों को जो सेरिलैक बेचता है उसमें एडेड शुगर यानी अतिरिक्त चीनी होती है. जबकि यूरोप में बेचे जाने वाले सेरिलैक में चीनी नहीं होती. ऐसा इसलिए क्योंकि वहां कानून सख्त है. असल में जब तक सजा का खौफ जहर के मुनाफे से छोटा रहेगा तब तक मिलावट नहीं रुकेगी. अब तक हमने इतिहास देख लिया दुनिया के तमाम अच्छे मॉडल देख लिए और सिस्टम की नाकामी भी समझ ली. अब सवाल यह है कि हम क्या करें क्या सिस्टम के सुधरने का इंतजार किया जाए. मेरा जवाब है बिल्कुल नहीं. दरअसल जरूरत है आपको एक कॉन्शियस सिटिजन यानी एक जागरूक नागरिक बनने की. अगर आपको कभी भी लगे कि किसी सामान में मिलावट है, बदबू है या वह एक्सपायर्ड है तो चुप रहकर उसे फेंके नहीं बल्कि शिकायत करें. आप फसाई की आधिकारिक वेबसाइट पर फोटो और बिल अपलोड करके कंप्लेन कर सकते हैं. नेशनल कंज्यूमर हेल्पलाइन पर कॉल करके अपनी शिकायत दर्ज करवा सकते हैं. इससे भी जरूरी है कि पैकेट पर लिखे न्यूट्रिशन लेबल्स की बेसिक अंडरस्टैंडिंग बना ही लीजिए. सामान खरीदने से पहले आपको किन चीजों पर ध्यान देना चाहिए इसे समझने के लिए हमने एक्सपर्ट से बात की. खाने के सामान पर या फूड लेबल्स पर हमें इन चीजों पर ध्यान देना चाहिए. ये है कि हमारा सर्विंग साइज क्या है. दूसरा कि शुगर की क्वांटिटी क्या है. कैलरी की इंटेक कितनी है. और इसमें कोई सैचुरेटेड फैट्स है कि नहीं है. और इसमें कोई हिडन चीजें है कि नहीं जो हमारे हेल्थ के लिए खराब हो. तो हमारे सर्विंग जो का जो साइज है वह एक सर्विंग स्कूप या सर्विंग साइज के प्रोपोर्शन में है यह पूरे क्वांटिटी के हिसाब से है. कभी-कभी हम इस विषय में गलती करते हैं और हम समझते हैं कि अगर हमारे इस सामान में इतना ग्राम प्रोटीन है या इतना ग्राम कार्बोहाइड्रेट है. ये पूरे सामान में है या एक सर्विंग स्कूप में है इस चीज का हमें ख्याल रखना चाहिए. दूसरा है कि इस फूड आइटम में कितना शुगर है. शुगर अक्सर शुगर के हिसाब से भी हो सकता है या शुगर के बहुत कई अलग-अलग तरीकों और अलग-अलग फॉर्म्स में भी हो सकता है. तो शुगर माल्टोडेक्सट्रिन फ्रूट जूसेस डेक्सट्रोज और कॉर्न सिरप अलग-अलग फॉर्म्स में हो सकते हैं. जो चीजें हाई शुगर क्वांटिटी में हो उन चीजों को अवॉइड करनी पड़ेगी. इसी तरह सैचुरेटेड फैट्स या ट्रांस फैट अगर हो किसी भी सामान में तो उन चीजों को अवॉइड करनी चाहिए. यह हमारे कार्डियक हेल्थ या हमारे हृदय रोगों को बढ़ावा देता है. यह भी देखना चाहिए कि हमारा कैलोरी इंटेक कितना हो रहा है. कई सारे सामान में बहुत जंक कैलोरीज होती हैं जो हमारे कैलोरी इंटेक को बढ़ा देती है. तो उन उन चीजों को हमें अवॉइड करनी चाहिए. इसी तरह कुछ हेल्दी आइटम्स होते हैं जैसे हाई फाइबर डाइट होता है या कुछ आइटम्स होते हैं जिनको हमें अच्छे होते हैं और उन चीजों को हमें लेना चाहिए. जब आप इन लेबल्स को पढ़ना शुरू करते हैं तो आप कंपनियों के लिए सिर्फ एक ग्राहक नहीं रह जाते आप एक जागरूक प्रहरी बन जाते हैं. सच तो यह है कि कंपनियों को उस कानून से डर नहीं लगता जो सालों साल अदालतों में लटकता है. उन्हें सबसे ज्यादा डर उस ग्राहक से लगता है जो सवाल पूछना और पैकेट के पीछे का सच पढ़ना जानता है. अंत में बस इतना ही कि बाजार जहर बेच रहा है यह सिस्टम की खता है लेकिन हम जहर खरीद रहे हैं यह हमारी खता है. अपनी थाली के खाने के खुद रक्षक बनिए क्योंकि याद रखिएगा जैसा अन्न वैसा मन. अगर हम आज नहीं जागे तो आने वाली नस्लों के पास विरासत में सिर्फ बीमारियां होंगी. इस वीडियो में फिलहाल इतना ही जल्द ही किसी और जरूरी मुद्दे पर बैठ के बात करेंगे आप कमेंट सेक्शन में हमें बताएं कि आप फूड सेफ्टी पर क्या सोचते हैं. साथ ही यह भी बताएं कि हम और किन मुद्दों पर बैठकर बात कर सकते हैं या करनी चाहिए.

Need another transcript?

Paste any YouTube URL to get a clean transcript in seconds.

Get a Transcript