[0:00]Jeremy Betham, ये कोई नाम नहीं था ये हमारे फ्रीडम फाइटर्स के लिए एक सबसे बुरा सपना था। क्यूंकि इसने डिजाइन की थी इंडिया की सबसे डेंजरस जेल, सेल्यूलर जेल। और आज हम इंडियन इस जेल को जानते है काला पानी जेल के नाम से। और इसी चीज को एक्सपीरियंस करने के लिए मैं जाता हूं एग्जैक्ट उसी स्पॉट पे जहां पे हमारे फ्रीडम फाइटर्स ने स्ट्रगल किया था। और जब मैं प्लेन में था तब मुझे एक चीज रियलाइज हुई कि इस जेल से भागना क्यों इंपॉसिबल है? क्योंकि एक तरफ था पूरा ओपन ओशन जिसे तैर के पार करना तो एकदम इंपॉसिबल था और जेल की दूसरी तरफ था जंगल जहां पे रहते थे जारवा ट्राइब्स के लोग। जो बाहर से आने वाले लोगों पे बिल्कुल रहम नहीं करते थे उनको डायरेक्ट मार देते थे। और इसी रीजन की वजह से इस जेल की आउटसाइड वॉल्स बहुत छोटी हैं एस कंपेयर टू नॉर्मल जेलस के। क्योंकि अंग्रेजों को पता था भागने का कोई चांस ही नहीं है। एक तरफ जारवा ट्राइब और दूसरी तरफ एकदम ओपन ओशियन। और जैसे ही मैं लैंड करता हूं मुझे पिकअप करने के लिए आ जाते हैं ईट्रिप तो वाले इसके बारे में हम लोग आगे बात करेंगे। तो मैं इस जेल की एकदम रॉ और रियल स्टोरी सुनना चाहता था और इन सबके लिए इन भाई साहब से बेहतर कोई इंसान नहीं था। बट उससे पहले इस जेल का नाम तो सेल्यूलर जेल है बट यह काला पानी जेल के नाम से फेमस क्यों थी पता है? उस टाइम पे हम इंडियंस ये बिलीव करते थे कि अगर किसी ने भी समुद्र को पार कर दिया तो वो धर्म जात और समाज के रिश्तों से दूर हो जाता है। और वो लोग समुद्र को काला पानी कह के बोलते थे और इस जेल तक पहुंचने के लिए आपको समुद्र को पार करना पड़ता था। दैट्स व्हाई काला पानी जेल और आप जैसे ही इस जेल में कदम रखते हो आपको वो चीज फील होगी कि इन दीवारों ने कुछ तो भयानक सहा है। और जेल में घुसते ही जो मुझे सबसे पहली चीज दिखी और इसी से आईडिया लग जाता है कि यहां पे दी जाने वाली पनिशमेंट कितनी खतरनाक हुआ करती थी। क्योंकि जो चीज आप मेरे सामने देख रहे हैं ना जगह देख रहे हैं आप ये पूरा एरिया पनिशमेंट एरिया बोलते हैं उसको जो काम नहीं करेगा जेल में उनको कोड़े मारते थे कोड़े हमेशा पीछे मारते थे ताकि आदमी सो ना सके बैठ ना सके अगर 30 मारना है तो कपड़े उतार के मारेंगे किसी को 100 मारना है अंग्रेज क्या करेंगे 100 मारने के लिए एक टॉवल पहना देंगे उस टॉवल में दवाई लगा देंगे उससे ब्लड नहीं निकलेगा। एंड इसके बाद जब मैं जेल में एंटर करता हूं और मैं जो देखता हूं ये लॉक सिस्टम देखिए ये ऐसा बंद होता है कुंडा यहां से निकलेगा उसका तो देखिए कुंडा ये है ये देखिए और ताला अलीगढ़ का है यहां ताला आएगा ये खाने की जगह है यहां से खाना देंगे।
[2:05]गाइज राइट नाउ हम उस सेल के अंदर है जहां पे अगर आप एक बार कैदी आ जाता था तो उसके बाद उसकी फांसी होना तय है। यहां से देयर इज नो गोइंग बैक। ये जो गड्ढा देख रहे हैं बेसिकली खाने के प्लेट को रखना है और ठीक पास में बाथरूम का पॉट रखना है। जब बाथरूम हो जाएगा तो पॉट यहां से बाहर जाएगा। जेल में बहुत लोगों ने अपने आप को फांसी लगाई है वेंटिलेटर से। सारे कमरे देखिए एक ही डिजाइन के बने हुए हैं 13/7। एक में एक ही आदमी रहेगा इनमें जो आते है ये डार्क रूम है कार कोटरी बोलते हैं फांसी कंफर्म है। यहां इनको देखेंगे 15 दिन रखेंगे अच्छा खाना देंगे क्योंकि बीमार को फांसी नहीं होती हेल्थ शुड बी गुड। Real fasi place Real fasi place चलो गाइज राइट नाउ अभी हम इस जगह पे हैं यहां ऊपर फांसी दी जाती थी। और जब फांसी होने के बाद जो बॉडी होती थी हम लोगों के फ्रीडम फाइटर्स की वो डायरेक्ट यहां पे आके नीचे गिरती थी गाइस। बहुत डरावना है मजाक से इट्स वेरी स्केरी bodies after death और मैं यहां जनवरी में गया था तब मेरा गर्मी और ह्यूमिडिटी से इतना बुरा हाल था। अब सोचिए आज से 100 साल पहले यहां के कैदियों पे जब टॉर्चर किया जाता था पीक गर्मियों के सीजन में तो क्या हाल होता होगा उनका। देखिए क्या लिखा हुआ है ये पनिशमेंट ड्रेस है। अंडमान में क्या होता है यहां विंटर नहीं होता दो सीजन है गर्मी बरसात आपने गर्मी में पहन लिया बॉडी में खुजली होती है हम्म और अत्याचार करना है तो जंगल में खुजली पत्ती मिलती है वो खुजली पत्ती को बॉडी में लगा देंगे हाथ को बांधेंगे इसको पहना देंगे। तभी क्या होगा हाथ तो बंधा हुआ है आदमी ऐसे नहीं कर सकता आदमी डांस करेगा ब्रिटिश एंजॉय करेंगे। जेल में नया आदमी जो आता है नया जो क्रांतिकारी आते हैं उनको देखेंगे उनका व्यवहार कैसा है व्यवहार देखकर उनको दो मन रॉड में रखेंगे पहला देखिए दो मन जो आदमी का अच्छा व्यवहार हो जाएगा ब्रिटिश क्या करेंगे रॉड को हटा देंगे ये आखिरी है बाद में छोड़ देंगे आप गुलाम हो यहीं रहो यहीं काम करो अब हिंदुस्तान वापस मत जाओ। बट बट बट इस जेल को बनाया क्यों गया था? तो 1857 के रिवोल्ट के बाद ब्रिटिशर्स समझ गए थे कि ये लोग कोई नॉर्मल चोर वोर नहीं है। ये रेवोल्यूशनरीज हैं ये फ्रीडम फाइटर्स हैं इनको नॉर्मल जेल में डालने से कोई फर्क नहीं पड़ेगा। उन्हें कुछ ऐसा चाहिए था जहां पे वो इन फ्रीडम फाइटर्स को एकदम अकेला कर सके पूरा तोड़ सके फिजिकली भी मेंटली भी। तो 1857 के रिवोल्ट के बाद ब्रिटिशर्स ने अंडमान एंड निकोबार आइलैंड पे टेंपरेरी प्रिज न कैंप्स बनाए और पीनल कॉलोनी के तौर पर उसे यूज करने लगे। बट तब कुछ प्लान नहीं था फिर 1896 में इसका कंस्ट्रक्शन चालू होता है 10 साल तक और फिर 1906 में काला पानी जेल रेडी थी। जिसमें थे सेवन विंग्स थ्री फ्लोर्स 698 इंडिविजुअल सेल्स। क्योंकि जेल का पूरा एम ही था हर कैदी को एकदम मेंटली आइसोलेट करना इसकी वजह से हर कैदी का एक अलग सेल हुआ करता था। और फिर शुरू होता है पीक टॉर्चर पीरियड। सो गाइज फाइनली वी हैव अ स्पॉन्सर एंड आई वुड लाइक टू थैंक्स ईट्रिप तो फॉर हेल्पिंग मी इन दिस डॉक्यूमेंट्री। तो ईट्रिप तो एक ट्रैवल पैकेज एजेंसी है जो आपको अंडमान में सिक्किम में कश्मीर में हिमाचल में एकदम अफोर्डेबल प्राइजिंग में ट्रैवलिंग का आपको एकदम फर्स्ट इन क्लास एक्सपीरियंस करवाते हैं और इनका लिंक आपको मेरे बायो में मिल जाएगा। ये जो आप देख रहे हैं ये है टॉर्चर फैक्ट्री और कोलू के बैल वाली सजा यहीं दी जाती थी। आप देख रहे हैं ये कोलू है ये कोलू कास्ट आयरन से बना है। इसकी उम्र 120 साल हो गई है वेट 150 किलो है। इसको हैंडल पकड़ के ऐसे घूमना है बैल की तरह आठ घंटे कंटीन्यू घूमना है। आप नीचे देखिए गड्ढा दिख रहा है आपको गड्ढे में डब्बा रख देंगे। उसको जोड़ेंगे ट्यूब से तो ये ड्रॉप ड्रॉप तेल गिरेगा इनको चाहिए पर डे 30 पौन तेल यानी कि 12 लीटर लगभग। जिसने काम नहीं किया उसको कोड़े मारते थे। बाई चांस आदमी रुक गया स्पीड कम हो गया उसको मारेंगे बैल की तरह फिर क्या करेंगे मारने के बाद और 40 किलो वेट डाल देंगे। और इतनी ज्यादा सजा और मेहनत करने के बाद खाना भी एकदम बेकार मिलता था। ये लोग सब्जियां भी बगल वाले जंगल से तोड़ के ही ले आते थे जिसकी वजह से उसमें सांप वहां के कन खजूर आ जाते थे और ये लोग उनके साथ ही खाना बना देते थे। और कैदियों के पास कोई ऑप्शन नहीं होता था उनको यह खाना खाना ही पड़ता था। क्योंकि अगर उन लोगों ने खाना नहीं खाया तो उन्हें कोड़ों से मार पड़ेगी और इन्हीं सब चीजों से परेशान होकर कैदियों ने हंगर स्ट्राइक करी थी यानी भूख हड़ताल करी थी 1933 में। और ये एक दो दिन नहीं पूरे 15 से 16 दिन चली थी और इसके बाद ब्रिटिशर्स गुस्से में आके फोर्स फीडिंग करना चालू कर देते हैं। यह पता क्या करते थे एक रॉड लेते थे और उसको डायरेक्ट कैदी के नाक से डालते थे जो डायरेक्ट उनके फूड पाइप में मिल जाती थी और इसकी वजह से कई बार जो वो रॉड होती थी ना वो गलती से विंड पाइप में चली जाती थी और जो खाने और दूध का पेस्ट होता था वो उनके फेफड़ों में जाके भर जाता था। और इसी वजह से महावीर सिंह राठौड़, मोहन किशोर नामदास, मोहित मोहन इन फ्रीडम फाइटर्स की मौत हो जाती है ऐसी भूख हड़ताल में। इस जेल के आज के टाइम पे सात टावर की जगह बस तीन टावर बचे हैं और ये जेल आज के टाइम पे बस एक म्यूजियम बन के रह गई है। और आज जब मैं यहां खड़ा हूं तो यह जगह सिर्फ एक मॉन्यूमेंट लगती है पर एक वक्त था जब यह काला पानी हमारे फ्रीडम फाइटर्स के लिए एक जिंदा कब्र हुआ करती थी। उनका बस एक ही जुर्म था भारत को आजाद देखने का सपना। इसके लिए वो मर मिटने को तैयार थे छोटे-छोटे सेल्स में बंद होकर कुछ ने तो अपनी पूरी जिंदगी निकाल दी। ना कोई परिवार ना कोई आवाज ना कोई उम्मीद अगर कोई भागने के बारे में सोचता भी था तो मौत के घाट चढ़ा दिया जाता था। ना जाने यहां कितने शहीद हो गए हमारे लिए लड़ते-लड़ते। यह कोई साधारण इंसान नहीं थे ये वो लोग थे जिन्होंने अपना सुकून अपना परिवार अपना घर सब छोड़ दिया और हंसते-हंसते देश के लिए कुर्बान हो गए। आज हम लोग अपनी मर्जी से घूमते हैं बोलते हैं सपने देखते हैं इनमें से कुछ भी नहीं होता अगर ये लोग नहीं होते। आज ये जगह शांत है पर कभी यहां चीखे हुआ करती थी प्रार्थनाएं हुआ करती थी। और शायद यही सबसे बड़ी आयरन है जो कभी एक नर्क हुआ करता था वो आज हम लोगों के लिए एक इतिहास बन चुका है। और गाइज एक बार मैं फिर से याद दिला दूं ईट्रिप तो ट्रेवल एजेंसी का आपको लिंक मेरे बायो में मिल जाएगा एक बार जरूर ट्राई करें।



