[0:00]ईश्वर ने उसे इसलिए बनाई, ताकि कोई तो हो जो दूसरों के जिंदगी के लिए संघर्ष करे। ईश्वर ने कहा, कोई ऐसा चाहिए जिसका दिल सेवा से भरा हो, जो रोज़ 24 घंटे काम करने के लिए खुशी से तैयार रहे। कोई ऐसा जो दूसरों की भलाई के लिए अपना जीवन समर्पित कर सके। ईश्वर ने कहा, मुझको कोई ऐसा चाहिए जो जीवन और मृत्यु देख सके, जो रक्त से ना डरे। जो त्याग के लिए हमेशा तैयार रहे, जिसमें जन्म और मृत्यु दोनों देखने का साहस हो।
[1:07]पहले के समय में लोग अस्पताल में जांच के लिए न जाकर अंधविश्वास और तांत्रिकों पर भरोसा करते थे। जिस कारण बहुतों ने अपनी जान गवा दी और कुछ लोग गंभीर बीमारियों के शिकार हो गए।
[1:43]इन्हीं मुश्किलों के बीच 12 मई सन 1820 को फ्लोरेंस नाइटिंगेल का जन्म इटली के फ्लोरेंस शहर में होता है। उनका परिवार काफी समृद्ध हुआ करता था और उनके माता-पिता की ख्वाहिश थी कि वह एक प्रभावयुक्त महिला बने। बहुत छोटी उम्र से ही फ्लोरेंस को लोगों की सेवा करने, गरीबों की मदद करने और बूढ़ों की देखभाल करने में बहुत रुचि थी। एक दिन उन्होंने अपने माता-पिता के समक्ष अपनी यह इच्छा जाहिर की कि वह आगे एक नर्स की जिंदगी व्यतीत करना चाहती हैं और लोगों की सेवा करना चाहती हैं।
[2:38]लेकिन उस समय एक महिला के लिए एक नर्स बनना इतना आसान नहीं था, इसलिए उनके माता-पिता ने उन्हें ऐसा करने से साफ इनकार कर दिया। बहुत कोशिशों के बाद आखिरकार फ्लोरेंस ने अपने माता-पिता को मना लिया। सन 1844 में फ्लोरेंस का दाखिला लूथरन हॉस्पिटल जर्मनी में एक नर्सिंग छात्रा के रूप में हुआ। अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद फ्लोरेंस लंदन वापस लौट गई और यहीं से उन्होंने मिडलसेक्स हॉस्पिटल लंदन से नर्सिंग करियर की शुरुआत की। वह अपने प्रोफेशन में अत्यधिक समर्पित और प्रभावशाली थी, जिसके कारण उन्हें एक वर्ष के अंतराल में ही सुपरिटेंडेंट के पद पर प्रमोट कर दिया गया। इसी दौरान अक्टूबर सन 1853 में इंग्लैंड और रशिया के बीच क्रीमिया युद्ध छिड़ गया।
[4:20]जिससे बड़े पैमाने पर सैनिक हताहत और घायल हो जाते हैं। घायल सैनिकों को विभिन्न मिलिट्री बेस कैंप में ले जाया जा रहा था। लेकिन इंग्लैंड अपने घायल सैनिकों को लेकर काफी परेशान था। इसी दौरान सन 1854 के अंत में नाइटिंगेल को युद्ध सचिव से एक पत्र मिला जिसमें युद्ध स्थल पर घायल सैनिकों की देखभाल के लिए नर्सों की एक टीम गठित करने की बात कही गई थी। नाइटींगेल ने 34 नर्सों की एक टीम इकट्ठी की और उनके साथ टर्की चली गई, जहां उनकी ड्यूटी लगाई गई थी। जब वे टर्की पहुंची तो भीड़भाड़ और अस्वच्छता वाले अस्पतालों को देखकर हैरान रह गई।
[6:55]उनकी प्रयासों, ज्ञान और समझदारी से सैनिकों की मौत की संख्या में दो-तिहाई से गिरावट आने लगी। जब वह लंदन वापस आए तो उनका भव्य स्वागत किया गया और रानी ने उन्हें एक उत्कीर्ण ब्रोच भेंट करते हुए उनके काम को पुरस्कृत किया। जिसे बाद में नाइटिंगेल ज्वेल कहा गया। इसी के साथ उन्हें 2 लाख 50 हजार की नगद राशि भी मिली, जिसका उपयोग उन्होंने आगे के स्वास्थ्य कार्यों में करने का निर्णय लिया। सन 1860 में उन्होंने सेंट थॉमस हॉस्पिटल की स्थापना के लिए अपनी पुरस्कार राशि का उपयोग किया और यहीं पर उन्होंने नर्सों के लिए नाइटिंगेल ट्रेनिंग स्कूल के नाम से पहला नर्सिंग प्रशिक्षण स्कूल शुरू किया।
[8:06]इसके बाद नाइटिंगेल सार्वजनिक प्रशंसा की पात्र बन गई। युवा महिलाएं उनके जैसा बनने की ख्वाहिश रखने लगे और उच्च वर्ग के लोग भी ट्रेनिंग स्कूल में दाखिला लेने लगे। नाइटींगेल की बदौलत नर्सिंग पेशे को अब उच्च वर्ग द्वारा तिरस्कृत नहीं किया गया, बल्कि इसे सम्मानजनक पेशे के रूप में देखा जाने लगा।
[8:38]निकली थी एक चिराग लेकर, चिराग बन जाऊंगी सोचा ना था। शुरुआत तो बस एक मरहम से की, आज इलाज से जुड़ जाऊंगी कई सांसों की यह तो सोचा ना था।
[8:52]ऊंचाई के शिखर पर पहुंची हूं आज, हर जगह मेरी परछाई है। अब वक्त बदला है और यहां हर किसी को मेरी जरूरत समझ आई है। कई वर्ष पहले बस जीएनएम एएनएम तक सीमित थी मैं, अब दुनिया में बदलाव ला चुकी हूं। बीएससी को भी हासिल कर चुकी हूं। नुस्खों से लोगों के जुड़ गई हूं। पहले, पर्ज से आंखों में उजाला करती थी, आज दवा से भी दर्द को कम करना जानती हूं। मैं एमएससी को भी हासिल कर चुकी हूं। थ्योरी और प्रैक्टिकल के मेल को समझती हूं, रिसर्च में भी उपलब्धियां पा चुकी हूं। सिर्फ इंजेक्शन टैबलेट तक ही नहीं, अब टेक्नोलॉजी को भी मैं समझती हूं।
[9:37]आज कॉलेज भी अधूरे हैं मेरे बिना, क्योंकि आगे की पीढ़ी के ज्ञान में भी सहयोग जो मैं दे रही हूं। आज कहां तुम्हें मैं नहीं मिलूंगी? नर्स, प्रोफेसर, एडमिनिस्ट्रेटर, काउंसलर, रिसर्चर। मां के दर्द और बच्चे की चहचहाट से जो जुड़ती हूं, मुझे मिडवाइफ्री और पीडियाट्रिक नर्स कहते हैं। जहां एनाटॉमी एंड फिजियोलॉजी ईसीजी की तारों से जुड़ती हूं, मुझे मेडिकल सर्जिकल नर्स कहते हैं। जब किसी के इमोशंस और साइकोलॉजी से जुड़ती हूं, मुझे मेंटल हेल्थ नर्स कहते हैं। जहां लोगों के घरों से बीमारियों को दूर करती हूं, तो मुझे कम्युनिटी हेल्थ नर्स कहते हैं। उन सरहदों पे भी जब किसी की मुस्कुराहट बनती हूं, मुझे मिलिट्री नर्स कहते हैं। बस अपने देश में नहीं सिर्फ, बल्कि फारेन में भी पंख अपने उड़ा बैठी हूं। देख रहे हो, एक चिराग लेकर जो निकली थी, कहां तक मैं उसका प्रकाश फैला चुकी हूं।



