[0:00]लाखों स्पेंड कर दिए मॉड्यूलर किचन पे। डिजाइन फाइनलाइज किया और इंस्टॉल भी हो गया। फिर भी हर सुबह जब उसे यूज करते हैं ना, कुछ ठीक सा नहीं लगता। अक्सर लोग सोचते हैं कि हमारी ही गलती होगी। हम ही उसे ढंग से यूज नहीं कर रहे। डिजाइन तो अच्छा ही है। लेकिन सच पता है क्या है? जो किचन डेमो में ब्यूटीफुल लगते हैं ना, वो अक्सर रियल लाइफ में आपके बॉडी के खिलाफ काम करते हैं। इसी वजह से रोज सुबह जब रोटी बेलते हो, तो कमर दर्द होती है। कढ़ाई गर्म हाथ में होती है, लेकिन रखने की जगह नहीं मिलती। चिमनी तो चलती है, लेकिन स्मेल नहीं जाती। और ये सब जब लाखों स्पेंड करने के बाद भी हो रहा हो ना, तो और भी ज्यादा बुरा लगता है। आज मैं बताऊंगा आपको ऐसे पांच फ्रस्ट्रेशंस जो आपके किचन में हर रोज होते हैं और उनको कैसे आप फिक्स कर सकते हो। पहली प्रॉब्लम है ऐसी स्टोरेज जो लिटरली आपकी बॉडी के साथ लड़ती है। आपको चाहिए प्रेशर कुकर और वो पड़ा है लोअर कैबिनेट की डीप शेल्फ में। तो आप झुकते हो, घुटने के बल बैठते हो और हाथ अंदर डालते हो और फिर तीन चीजें साइड में करने के बाद जाके कुकर मिलता है। कारपेंटर ने तो बना दिया इतना बड़ा स्टोरेज लेकिन रियलिटी में हर हैवी चीज बॉडी लेवल से नीचे चली जाती है। और मैजिक कॉर्नर फोटोज में कितने अच्छे लगते हैं लेकिन रियल लाइफ में मैकेनिज्म दो साल में अटकने लगता है। हैवी आइटम्स को पुल आउट ड्रोर्स में डालना चाहिए। ड्रॉअर जब पूरी खुलती है, सारी चीजें एक ग्लांस में दिख जाती है। दूसरी प्रॉब्लम है तड़का रेडी है। गरम-गरम कढ़ाई आपके हाथ में है और आपको जगह नहीं मिलती, रखे कहां पे। एक तरफ काउंटर पर रोटी, बेलन, आटा पड़ा होता है और दूसरी तरफ सिंक में बर्तन। प्रॉब्लम ये नहीं है कि काउंटर छोटा है। प्रॉब्लम है कि आपकी किचन में 18 इंच लैंडिंग रूल फॉलो ही नहीं हुआ। इंडियन किचन का एक सिंपल सा रूल है, जो मस्ट फॉलो है कि एट लीस्ट 18 इंच का गैप होना चाहिए चूल्हे के दोनों साइड में। ज्यादा रख पाते तो अच्छा, जैसे दो फिट दे दो। अगर नहीं है, तो किचन को थोड़ा सा रीडिजाइन करना पड़ेगा और एप्लायंसेज की प्लेसमेंट बदलनी पड़ेगी वरना बाद में पछताने वाले हो आप। तीसरी प्रॉब्लम है काउंटर की हाइट, जो लिटरली आपकी कमर तोड़ रही है। आप रोटी बनाते हो 10 मिनट, 20 मिनट और कभी-कभी तो आधा घंटा। फिर उसके बाद कमर दर्द होने लग जाती है या फिर शोल्डर में पेन होने लग जाता है। ना तो ये एक्चुअली पोश्चर की वजह से हो रहा है और ना ये पूरा का पूरा उम्र की वजह से हो रहा है। ये एक्चुअली हो रहा है काउंटर की हाइट की वजह से। इंडिया में मॉड्यूलर किचन का डिफॉल्ट काउंटर 34 से 36 इंच पर है। और ये डिजाइन किया गया है अमेरिकंस के हिसाब से। वो लोग काफी लंबे होते हैं। इंडियन विमेन की हाइट 5 फीट 3 इंच से 5 फीट 5 इंच के बीच में ज्यादातर वैरी करती है। और इस हाइट के हिसाब से काउंटर होना चाहिए 32 से 34 इंच मैक्सिमम। काउंटर हाइट अगर एल्बो से 4 इंच नीचे हो, तो ये आपकी कमर को काफी लंबे टाइम तक परेशान नहीं करता। खाना बनाने के जोन की काउंटर थोड़ी नीचे रखिए। सिंक वाले जोन की थोड़ी ऊंची। सेम किचन दो हाइट्स में डिवाइड कर सकते हो। चौथी प्रॉब्लम है ऐसी चिमनी जो आपके घर की स्मेल बाहर निकाल ही नहीं सकती। आप सरसों का साग बना रहे हो या फिर लगा रहे हो तड़का। चिमनी टॉप स्पीड पर चल रही है। नॉइस इतनी कि फोन पर बात भी नहीं कर सकते। किचन में स्मोक भी नजर नहीं आ रहा लेकिन 20 मिनट बाद पूरा किचन और आधा लिविंग रूम स्मेल से भर जाता है। क्यों? क्योंकि दो टाइप की किचन चिमनीज़ आती हैं। पहली आती है डक्टेड, जिसमें एक्चुअल में पाइप बाहर जाता है और आपके घर का जो धुआं है वो सारा का सारा बाहर चला जाता है। लेकिन जो डक्टलेस चिमनीज़ आती हैं, वह हवा को फिल्टर करके वापस किचन में डाल देता है। धुआं तो फिल्टर हो जाता है, लेकिन स्मेल फिल्टर नहीं होती। इंडियन कुकिंग के लिए तड़का, मसाला, डीप फ्राइंग सब कुछ चलता है। लेकिन जो डक्टलेस चिमनीज़ आती हैं, वह एक्चुअली बस एक ग्लोरिफाइड फैन की तरह काम करती है, जो बिल्कुल भी कामयाब नहीं है इंडिया में। अगली प्रॉब्लम है ऐसा हार्डवेयर, जो सिर्फ दो साल में खत्म हो जाता है, फेल हो जाता है। ये सबसे इंपोर्टेंट पॉइंट है। आपको इंस्टॉल करवाए हुए मॉड्यूलर किचन में सिर्फ 18 मंथ्स। एक दिन ड्रॉअर खोली तो सॉफ्ट क्लोज थोड़ा स्लो हो गया। ड्रॉअर खीचो तो एक तरफ झुक जाती है। हैंडल ढीले होने लग गए। आप कारपेंटर को बुलाते हो और वो बोलता है मैडम, हार्डवेयर चेंज करना पड़ेगा। मतलब लाखों खर्च कर दिए आपने अपनी किचन पे। दो साल नहीं हुए और आपको हार्डवेयर चेंज करना पड़ेगा। सोचो एक्चुअल में ये होता है हिंज साइकिल की वजह से। ये ना आपको कोई इंटीरियर डिजाइनर या कोई भी कॉन्ट्रैक्टर आगे से नहीं बताएगा। बजट हिंजेज़ होते हैं मैक्सिमम 30,000 साइकिल्स के। मतलब एक साल भी नहीं होगा, रेटेड लाइफ खत्म हो जाएगी। जो प्रीमियम हिंजेज़ होते हैं, जैसे हाफले, हैटेक या फिर ब्लम, ये सभी ज्यादातर 2 लाख साइकिल्स पे आते हैं। मतलब यही डिसाइड करेगा कि किचन की एक्सपायरी डेट क्या है। हार्डवेयर का डिसीजन कारपेंटर पर मत छोड़ो। बाद में हो सकता है बहुत पछताओ। खुद चेक करो कि ब्रांडिंग कौन सी है हार्डवेयर पे। उसकी कैपेसिटी कितनी है। एक पीस में आपको 300 से 400 रुपए का फर्क पड़ेगा और पूरी किचन में ऑलमोस्ट 15,000 रुपए एक्स्ट्रा। लाखों की किचन पे 15,000 का फर्क 3 साल और 15 साल का फर्क है। और एक्चुअल डिफरेंस इन पांच पॉइंट का भी नहीं है। डिफरेंस होता है ये किचन किसके लिए डिजाइन हुई है। अगर वो डिजाइन हुई है सिर्फ अच्छे दिखने के लिए, तो आपकी बॉडी हर रोज भुगतेगी। उसे सिर्फ अच्छा दिखने के लिए मत बनाओ। उसे बनाओ ऐसी जिंदगी के लिए, जो आप हर रोज जीते हो।

Why Indian Kitchens Feel Wrong (Even After Lakhs Spent)
Interiorz
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