[0:00]पिछले कुछ सालों में हाइड्रोजन फॉसिल फ्यूल्स का रिप्लेसमेंट जैसे काफी पॉपुलर हो रहा है. फिलहाल हाइड्रोजन बनाने के लिए फॉसिल फ्यूल्स का यूज किया जाता है. इसका यूज कुछ ऐसे सेक्टरर्स में होता है जहां ट्रेडिशनल इलेक्ट्रिसिटी का यूज नहीं किया जा सकता. क्योंकि इसका स्टोरेज इजी होता है और ये हाई टेंपरेचरस पे बर्न भी करता है. स्टील इंडस्ट्री से लेके शिपिंग और एविएशन इंडस्ट्री तक हाइड्रोजन से बहुत हाई एक्सपेक्टेशंस हैं. ग्रीन हाइड्रोजन यानी रिन्यूएबल एनर्जी सोर्सेज यूज करके प्रोड्यूस किए गए हाइड्रोजन से भी काफी एक्सपेक्टेशंस हैं. लेकिन यह एक्सपेक्टेशंस फिलहाल मीट नहीं हो रहे हैं. हाइड्रोजन प्रोडक्शन दूसरे फ्यूल्स की तरह कमर्शियली फीसिबल नहीं है. इसीलिए इसका प्रोग्रेस बहुत स्लो है. ग्रीन हाइड्रोजन का कंडीशन तो और भी खराब है. मतलब हाइड्रोजन का फॉसिल फ्यूल्स को एक क्लीन फ्यूल जैसे रिप्लेस करने में काफी टाइम लग सकता है. आईएए या इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी ने रिसेंटली हाइड्रोजन प्रोडक्शन के करंट कंडीशन पे एक रिपोर्ट रिलीज किया. आज के इस वीडियो में हम इस रिपोर्ट को एक्सप्लोर करेंगे. सबसे पहले हम हाइड्रोजन प्रोडक्शन का करंट कंडीशन समझेंगे. फिर हम हाइड्रोजन प्रोडक्शन के चैलेंजेस भी समझेंगे. एंड में हम करंट हाइड्रोजन प्रोडक्शन में इंडिया का रोल भी देखेंगे. चलिए शुरू करते हैं.
[1:12]सबसे पहले हाइड्रोजन प्रोडक्शन का करंट कंडीशन समझेंगे. आईएए के लास्ट ईयर के रिपोर्ट के हिसाब से हाइड्रोजन प्रोडक्शन में बहुत एनर्जी वेस्ट होता है. तब से अब तक इस प्रॉब्लम में बहुत चेंज नहीं आया है. पानी से हाइड्रोजन बनाने के लिए इलेक्ट्रोलाइज़र्स का यूज किया जाता है. इलेक्ट्रोलाइजर ऑपरेट करने में 1/3 पावर लॉस होता है. उसके बाद हाइड्रोजन को ट्रांसपोर्ट करने के लिए उसे कंप्रेस करने कूल करने या अमोनिया में कन्वर्ट करने में और एनर्जी यूज होती है. इसके बाद अगर इलेक्ट्रिसिटी प्रोड्यूस करने के लिए हाइड्रोजन का यूज फ्यूल सेल में किया जाता है तो और 40% एनर्जी लॉस हो जाता है. इस पूरे प्रोसेस के एंड तक बस 30 टू 40% एनर्जी बचती है. फॉसिल फ्यूल से जनरेट होने के बावजूद ट्रेडिशनल इलेक्ट्रिसिटी एटलीस्ट इससे ज्यादा एफिशिएंट है. इसलिए कार्स और घरों जैसे एवरीडे कस्टमर्स के लिए हाइड्रोजन यूज करना फीसिबल नहीं है. फिलहाल हाइड्रोजन बस ऐसे सिचुएशंस में काम आता है जहां इलेक्ट्रिसिटी का एक्सेस नहीं मिलता. जैसे लॉन्ग डिस्टेंस शिपिंग स्टील प्लांट्स और केमिकल प्रोडक्शन. हाइड्रोजन का एफिशिएंसी बढ़ाने की कोशिश की जा रही है. लेकिन प्रोडक्शन के करंट कंडीशंस के कारण इसका लार्ज स्केल यूज नहीं हो पा रहा है. यह था आईए के लास्ट ईयर के रिपोर्ट का ब्रीफ. चलिए अब इस ईयर के रिपोर्ट को एक्सप्लोर करते हैं. रिपोर्ट के हिसाब से हाइड्रोजन का यूज बढ़ रहा है. 2024 में ग्लोबली लगभग 100 मिलियन टन हाइड्रोजन यूज हुआ था. लेकिन इस यूज में ज्यादा कंट्रीब्यूशन उन इंडस्ट्रीज में ही हुआ जहां हाइड्रोजन का यूज ऑलरेडी हो रहा था. जैसे ऑयल रिफाइनिंग फर्टिलाइजर मैन्युफैक्चरिंग और मेथनॉल जैसे केमिकल्स का प्रोडक्शन. एनर्जी प्रोडक्शन के लिए हाइड्रोजन का यूज बहुत कम है. इन इंडस्ट्रीज के अलावा हाइड्रोजन के लिए कोई नया या बड़ा सोर्स ऑफ डिमांड नहीं आ रहा. एक और चिंता का कारण है इस हाइड्रोजन का सोर्स. करंट प्रोडक्शन का 96% हाइड्रोजन फॉसिल फ्यूल से जनरेट होता है. फॉसिल फ्यूल के यूज के कारण इस हाइड्रोजन के लाइफ साइकिल में कार्बन एमिशन होता है. इसीलिए इसे ग्रे या ब्राउन हाइड्रोजन कहा जाता है. ग्रीन हाइड्रोजन के केस में कार्बन एमिशंस नेग्लिजिबल होते हैं. ना ही इसके प्रोडक्शन में ना ही इसके कंजप्शन में. तो अगर हाइड्रोजन यूज करने का मेन रीजन एमिशंस कम करना है तो भला हम ग्रे या ब्राउन हाइड्रोजन क्यों प्रोड्यूस कर रहे हैं? आइए देखते हैं. आईए सारे हाइड्रोजन प्रोजेक्ट्स ट्रैक करता है और उनके टोटल के बेसिस पर 2030 तक का पोटेंशियल प्रोडक्शन कैलकुलेट करता है. लास्ट ईयर 49 मिलियन टन के लोअर एमिशन हाइड्रोजन प्रोडक्शन प्रोजेक्ट्स थे. इस ईयर ये नंबर 37 मिलियन टन तक गिर गया और इस फॉल का कारण गारंटीड कस्टमर्स की कमी. देखो दोस्तों, किसी भी हाइड्रोजन प्लांट को फंक्शन करने के लिए इसके कस्टमर्स को ऑफटेक एग्रीमेंट साइन करने होते हैं. ऑफटेक एग्रीमेंट्स लॉन्ग टर्म कॉन्ट्रैक्ट्स होते हैं जिसमें कस्टमर हाइड्रोजन खरीदने का प्रॉमिस करता है. हाइड्रोजन प्लांट्स के लिए नए फैसिलिटीज तभी कमीशन हो पाते हैं जब प्रोड्यूसर के पास ऐसे कॉन्ट्रैक्ट्स हों. 2024 में सिर्फ 1.7 मिलियन टन हाइड्रोजन के लिए नए ऑफटेक एग्रीमेंट्स साइन किए गए थे. इनमें से भी बस 20% ही लीगली बाइंडिंग थे. बाकी एग्रीमेंट्स नॉन कमिटल थे. इस डिमांड वीकनेस और बायर्स के एब्सेंस के कारण डेवलपर्स नए प्रोजेक्ट्स के लिए पैसे रेज नहीं कर पाते. और तो और कई हाइड्रोजन प्रोडक्शन प्रोजेक्ट कैंसिल भी किए जा रहे हैं. इन कैंसिलेशंस का सबसे बड़ा कारण रेगुलेशंस है. टोटल कैंसिलेशंस में से लगभग 40% रेगुलेटरी इश्यूज के कारण हुए. स्लो परमिट्स अनक्लियर रूल्स नहीं तो रेड टेपिज्म. इनके कारण प्रोजेक्ट सस्टेन नहीं हो पाते. लैक ऑफ फंडिंग भी इन कैंसिलेशंस का एक बड़ा कारण है. कुछ अर्ली स्टेज प्रोजेक्ट्स भी कैंसिल हो गए जिनमें सफिशिएंट मोमेंटम ही नहीं था. इस वीक डिमांड और प्रोजेक्ट पाइपलाइन के श्रिंक होने के बावजूद हाइड्रोजन प्रोजेक्ट्स को फंड्स मिल रहे हैं. बस इनका टारगेट अब शिफ्ट हो गया है. ज्यादातर फंड्स अब अपकमिंग या स्पेकुलेटिव प्रोजेक्ट्स में इन्वेस्ट नहीं कर रहे हैं. यह ऐसे प्रोजेक्ट्स पर फोकस कर रहे हैं जो एक्चुअली कंस्ट्रक्शन फेज तक पहुंच चुके हों. 2024 में लो एमिशन हाइड्रोजन प्लांट्स बिल्ड करने में 4.3 बिलियन डॉलर्स स्पेंड किए गए थे. इस साल ये अमाउंट डबल होने का एक्सपेक्टेशन है. यह ग्रोथ चाइना, यूरोप और मिडिल ईस्ट के कुछ पार्ट्स से आ रहा है. इन रीजंस में गवर्नमेंट या तो डायरेक्टली प्रोजेक्ट्स फंड कर रही है नहीं तो पॉलिसी के थ्रू स्टेबल डिमांड क्रिएट कर रही है. लेकिन पब्लिक मार्केट्स में सिचुएशन अभी भी काफी अनस्टेबल है. कुछ साल पहले जो कंपनीज इलेक्ट्रोलाइजर्स, फ्यूल सेल्स या हाइड्रोजन ट्रक्स पे फोकस कर रही थी उन्हें बहुत स्ट्रॉन्ग पब्लिक सपोर्ट मिल रहा था. इनके स्टॉक प्राइसेस हाइप के कारण बढ़ रहे थे. लेकिन वीक डिमांड और कंपनीज के लो रेवेन्यू के कारण ये प्राइसेस बहुत तेजी से गिर भी गए. कुछ कंपनीज तो बैंकरप्ट भी हो गई. क्लियरली हाइड्रोजन इंडस्ट्री का हाइप फेज खत्म हो रहा है. और इन्वेस्टर्स अब लो रिस्क प्रोजेक्ट्स में अपने पैसे लगा रहे हैं. ऑलमोस्ट पूरे हाइड्रोजन इंडस्ट्री में एक ही ट्रेंड देखने मिल रहा है. हाइड्रोजन प्रोजेक्ट्स फेल हो रहे हैं. ऐसा इसलिए नहीं हो रहा क्योंकि हाइड्रोजन प्रोडक्शन नामुमकिन या बहुत मुश्किल है. ऐसा इसीलिए हो रहा है क्योंकि पॉलिसी फंडिंग और डिमांड अलाइन नहीं हो रहे. लेकिन जैसा मैंने कहा यह प्रॉब्लम ऑलमोस्ट पूरे हाइड्रोजन इंडस्ट्री को अफेक्ट कर रही है. एक कंट्री है जो इस प्रॉब्लम से सेफ है. चाइना. लेकिन चाइना के पास यह सेफ्टी आई कैसे? देखो दोस्तों, हाइड्रोजन प्रोडक्शन के लिए इलेक्ट्रोलाइज़र्स की जरूरत होती है. इलेक्ट्रोलाइज़र्स इलेक्ट्रिसिटी का यूज करके पानी को हाइड्रोजन और ऑक्सीजन में स्प्लिट करते हैं. बिना चीप इलेक्ट्रोलाइज़र्स के हाइड्रोजन प्रोडक्शन स्केल नहीं हो सकता. और यहीं चाइना के पास बेनिफिट है. चाइना ग्लोबल इलेक्ट्रोलाइजर मैन्युफैक्चरिंग स्पेस का 60% कंट्रोल करता है. और चाइना के पास ही दुनिया के इंस्टॉल कैपेसिटी का लगभग 50% भी है. और ये इस डोमिनेंट पोजीशन तक काफी तेजी से पहुंचा. चाइना में कमर्शियल डिप्लॉयमेंट 2021 में स्टार्ट हुआ था. मतलब दुनिया के हाइड्रोजन हार्डवेयर का मेजॉरिटी चाइना मैन्युफैक्चर या ऑपरेट करता है. चाइना के पास यह मेजॉरिटी कंट्री के कॉस्ट एडवांटेज के कारण है. यूरोप या यूएस के कंपैरिजन में चाइना में ग्रीन हाइड्रोजन 40 टू 45% चीपर रेट्स पे प्रोड्यूस किया जा सकता है. और इस कॉस्ट एडवांटेज के पीछे एक पूरा चेन है. चलिए इस चेन को समझते हैं. चाइना के लिए हाइड्रोजन प्रोडक्शन करना सस्ता है क्योंकि चाइना में इलेक्ट्रिसिटी कॉस्ट भी कम है. हाइड्रोजन प्रोडक्शन के कॉस्ट का 50% से भी ज्यादा इलेक्ट्रोलाइजर ऑपरेट करने का पावर कॉस्ट है. चीप क्रेडिट और स्ट्रांग सप्लाई चेन के कारण चाइना में सोलर और विंड फार्म्स बिल्ड करना वेस्टर्न कंट्रीज से 40% सस्ता है. सस्ते रिन्यूबल्स के कारण इलेक्ट्रिसिटी कॉस्ट भी कम हो जाते हैं. जिससे हाइड्रोजन कॉस्ट भी कम हो जाते हैं. यह कॉस्ट स्केल के साथ और कम हो जाएंगे. चाइना में दुनिया का सबसे बड़ा हाइड्रोजन मार्केट भी है. यहां ग्लोबल सप्लाई का 1/3 हाइड्रोजन यूज होता है. इस हाइड्रोजन को इंडस्ट्रीज में डायरेक्ट किया जाता है ताकि डोमेस्टिक डिमांड स्टेबल रहे. लेकिन चाइनीस इलेक्ट्रोलाइजर्स ने एफिशिएंसी और परफॉर्मेंस इश्यूज भी फेस किए हैं. कुछ इलेक्ट्रोलाइजर्स टेक्निकल स्टैंडर्ड्स मीट नहीं कर पाते हैं. इन्हें ग्लोबली शिप करना भी मुश्किल है. लेकिन चाइना ने तेजी से स्केल अचीव कर लिया है. कॉस्ट भी कम कर लिए हैं. और हाइड्रोजन के लिए डिमांड भी क्रिएट किया है. इससे वेस्टर्न कंट्रीज को एक टफ चॉइस से डील करना पड़ता है. या तो चीप चाइनीस मशीनंस यूज करके जल्दी स्केल अचीव करना नहीं तो डोमेस्टिक कैपेसिटी में बहुत सारा खर्चा करना. कंट्रीज को हाइड्रोजन की जरूरत सिर्फ पावर के लिए ही नहीं बल्कि शिपिंग के लिए भी हो सकती है. कार्गो शिपिंग पॉल्यूशन का एक मेजर सोर्स है. कार्गो शिप्स हाई सल्फर फ्यूल जलाते हैं जिससे ग्रीन हाउस गैसेस और टॉक्सिक एयर पोल्यूटेंट्स रिलीज होते हैं. शिपिंग इंडस्ट्री का ग्लोबल एमिशंस में 3% कंट्रीब्यूशन है. शिपिंग के बढ़ते डिमांड के कारण इसे क्लीन फ्यूल में शिफ्ट करना जरूरी है. लेकिन ज्यादातर अल्टरनेट पावर सोर्सेज शिप्स पे काम नहीं करते. बैटरीज बहुत भारी होते हैं. और प्योर हाइड्रोजन शिप्स में स्टोर करना मुश्किल है. लेकिन हाइड्रोजन डेरिवेटिव्स जैसे अमोनिया या मेथनॉल जिससे ग्रीन हाइड्रोजन से बनाया जाए एक पॉसिबल सलूशन हो सकते हैं. आज टोटल मरीन फ्यूल का 60% सिर्फ 17 पोर्ट से सप्लाई किया जाता है. अगर यह पोर्ट्स अमोनिया और मेथनॉल सप्लाई करने लग जाते हैं तो शिपिंग कंपनीज कॉन्फिडेंटली स्विच कर सकते हैं. आईए के हिसाब से लगभग 80 पोर्ट्स ऑलरेडी हाइड्रोजन बेस्ड फ्यूल्स अडॉप्ट करने के लिए रेडी हैं. लेकिन यह अडॉप्शन इजी नहीं होगा. सिंगापुर दुनिया का सबसे बड़ा बंकरिंग पोर्ट है. लेकिन इसके पास चीप रिन्यूएबल एनर्जी नहीं है. तो ये लोकली हाइड्रोजन प्रोड्यूस नहीं कर सकते. मतलब सिंगापुर को हाइड्रोजन यूज करने के लिए इंपोर्ट्स पे डिपेंड करना होगा. तो जिन कंट्रीज के पास रिन्यूएबल एनर्जी का एक्सेस होगा उनके लिए हाइड्रोजन में स्विच करना इजी होगा. मतलब हाइड्रोजन के अडॉप्शन में कुछ मेजर चैलेंजेस हैं. हाइड्रोजन का वायबिलिटी प्रूव करना पड़ेगा. पोर्ट्स को नए फ्यूल सोर्स में अडॉप्ट भी करना होगा. और इंपोर्ट डिपेंडेंस के कारण कुछ कंट्रीज इस चेंज को रेजिस्ट भी करेंगे. हाइड्रोजन के अडॉप्शन में लीकेज भी एक प्रॉब्लम है. हाइड्रोजन अगर हवा में लीक होता है तो इससे ग्रीन हाउस गैसेस का नेगेटिव इंपैक्ट और बढ़ जाता है. मीथेन एक ग्रीन हाउस गैस है जो बहुत धीरे ब्रेक डाउन होता है. यह जितना जल्दी ब्रेक डाउन हो उतना बेटर होता है. लेकिन हाइड्रोजन इस ब्रेक डाउन प्रोसेस से इंटरफेयर करता है. एक छोटा हाइड्रोजन लीक भी मीथेन के नेगेटिव इंपैक्ट को काफी बढ़ा सकता है. साइंटिस्ट के हिसाब से एक 100 ईयर टाइम स्केल पे लीक्ड हाइड्रोजन का ग्लोबल वार्मिंग पे इंपैक्ट कार्बन डाइऑक्साइड से 12 टाइम्स ज्यादा है. कुछ स्टडीज ने यह भी रिपोर्ट किया है कि प्रोडक्शन के टाइम पे 1 टू 2% हाइड्रोजन लीक हो जाता है. यह परसेंटेज अमाउंट छोटा लग सकता है. लेकिन जब टोटल हाइड्रोजन प्रोडक्शन स्केल पे ये नंबर देखें तो यह 1 टू 2% एक बहुत बड़ा नंबर बन जाता है. और कार्बन डाइऑक्साइड की तरह हाइड्रोजन लीकेजेस मेजर नहीं किए जाते. इसलिए यह मेजर करने का कोई तरीका नहीं है कि हाइड्रोजन प्रोडक्शन के एडवांटेजेस ज्यादा हैं या इससे होने वाले लीक्स के प्रॉब्लम्स. ये तो था ग्रीन हाइड्रोजन का ग्लोबल सीन. इंडिया का इस स्पेस में क्या रोल है? आईए के रिपोर्ट में इंडिया उन कंट्रीज में गिना जाता है जिनके पास एक सीरियस नेशनल हाइड्रोजन प्रोग्राम है. चाइना की तरह इंडिया ने भी हाइड्रोजन उन इंडस्ट्रीज में डाइवर्ट करना स्टार्ट कर दिया है जहां इनका यूज होता है. जैसे रिफाइनरीज और फर्टिलाइजर्स. इन इंडस्ट्रीज से करंट हाइड्रोजन डिमांड का बल्क जनरेट होता है. इंडिया अपना हाइड्रोजन मोस्टली कोल और गैस से बनाता है. इंडिया ऑप्शंस के थ्रू इंश्योर कर रहा है कि डेवलपर्स को बायर्स मिल जाएं. ये हाइड्रोजन इंडस्ट्री के सबसे बड़े चैलेंजेस में से एक है. आईओसीएल और बीपीसीएल जैसे ऑयल रिफाइनर्स डायरेक्टली ग्रीन हाइड्रोजन खरीदने के लिए बिड कर रहे हैं. फर्टिलाइजर प्लांट्स भी अमोनिया के लिए रिवर्स ऑप्शंस होल्ड कर रहे हैं. करंटली इन्हें 50 टू 60 पर किलो के बिड्स मिल रहे हैं. इंडिया हाइड्रोजन के सप्लाई साइड को भी इनसेंटिवाइज कर रहा है. डोमेस्टिक इलेक्ट्रोलाइजर मैन्युफैक्चरिंग को पॉलिसी के थ्रू इनकरेज किया जा रहा है. तेलंगाना इज आल्सो प्रोवाइडिंग सब्सिडीज फॉर इलेक्ट्रोलाइजर प्रोडक्शन. इन गवर्नमेंट इनसेंटिव्स के थ्रू हमारा चाइनीज डोमिनेंस से डिपेंडेंस भी कम हो सकता है. आपको क्या लगता है? क्या ग्रीन हाइड्रोजन एक वायबल एनर्जी सोर्स है? क्या इंडिया का ग्रीन हाइड्रोजन इंडस्ट्री हमें चाइनीज डिपेंडेंस से प्रोटेक्ट कर पाएगा? अपने व्यूज हमें कमेंट सेक्शन में जरूर बताना. आगे आप कौन से टॉपिक्स पे वीडियोस देखना चाहते हो, ये भी हमें कमेंट सेक्शन में जरूर बताना. अगर ये वीडियो आपको इनफॉर्मेटिव लगा तो इसे लाइक और शेयर जरूर करना. ऐसे ही और वीडियोस के लिए चैनल को सब्सक्राइब भी कर लेना. आज की वीडियो के लिए इतना ही, मैं हूं आपका होस्ट देव, मिलते हैं अगले वीडियो में.



