[0:00]छोटे से शहर गोरखपुर की तंग गलियों में हर सुबह सूरज की पहली किरणों के साथ एक ठेले की आवाज गूंजती थी। टमाटर ले लो, आलू ले लो। यह ठेला चलाते थे रामलाल और उनके साथ होता था उनका 16 साल का बेटा, आरव। आरव का जीवन साधारण था। सुबह पापा के साथ सब्जियां बेचना, दिन में सरकारी स्कूल जाना और रात को छत पर बैठकर सपने देखना। उसका सबसे बड़ा सपना था आईआईटी में जाना। लेकिन एक सब्जी वाले का बेटा जिसे ठीक से ट्यूशन भी नसीब नहीं। क्या वाकई आईआईटी तक पहुंच सकता है? एक दिन स्कूल में एक प्रोफेसर ने बताया कि आईआईटी की कोचिंग क्लासेस शहर के कोने में खुली है, जहां फ्री में तैयारी करवाई जाती है अगर बच्चा एंट्रेंस क्लियर कर ले। आरव की आंखों में चमक आ गई। वह जानता था यही मौका है जिससे उसकी दुनिया बदल सकती है। वह घर आया और बोला, पापा मुझे कोचिंग का टेस्ट देना है। पापा ने थका चेहरा ऊपर उठाया। बेटा, हमारे पास इतना टाइम और पैसा नहीं। तू सुबह सब्जी बेचने नहीं जाएगा तो दुकान कौन संभालेगा? आरव चुप हो गया, लेकिन सपने नहीं मरे। कई दिनों तक उसने कोई बात नहीं की। वह खुद से लड़ रहा था। क्या वाकई उसके जैसे किसी के लिए बड़ा सपना देखना सही है? उसे लगता था सपने अमीरों के होते हैं, गरीबों को तो बस गुजारा करना होता है। एक रात जब बिजली नहीं थी और पूरा मोहल्ला अंधेरे में था, आरव छत पर लेटा आसमान देख रहा था। उसने मन ही मन कहा, अगर चांद सबके लिए है तो सपने भी सबके हो सकते हैं। अगले दिन स्कूल में नई मैथ्स टीचर आई, अनुष्का मैम। उन्होंने आरव की कॉपी देखकर कहा, तुम्हारा कांसेप्ट बहुत क्लियर है। क्या तुमने कोचिंग के लिए अप्लाई किया? आरव ने सिर झुका लिया, घर की हालत ऐसी नहीं है मैम। अनुष्का मैम मुस्कुराई, तुम्हारी मेहनत देखकर मैं तुम्हें खुद गाइड करूंगी। शाम को लाइब्रेरी आ जाना। और यहीं से शुरू हुआ उसका असली सफर। लाइब्रेरी की लकड़ी की बेंच, पसीने से भीगी शर्ट और अधूरी नींद। लेकिन आरव डटा रहा रोज सब्जी बेचने के बाद वो लाइब्रेरी में रात 9:00 बजे तक पढ़ता। शुरुआत में दिक्कत हुई। किताबें समझ नहीं आतीं, आंखें थक जाती। लेकिन वह खुद से बस एक बात कहता, अगर अब हार गया तो फिर कभी जीत नहीं पाऊंगा। तीन महीने बाद कोचिंग एंट्रेंस का रिजल्ट आया। आरव सेलेक्ट हो गया था। उस दिन पहली बार उसके पापा की आंखों में आंसू थे। गर्व के आंसू। लेकिन चुनौतियां अभी खत्म नहीं हुई थी। कोचिंग में सब अमीर बच्चों के ब्रांडेड बैग थे और आरव के पास था सिर्फ एक पुराना झोला। जब मोबाइल में लेक्चर डाउनलोड करने की बात होती तो वो पापा का बटन वाला फोन दिखा देता और सब उसपे हंसते। कई बार खुद को दूसरों से छोटा समझने लगा। लेकिन अनुष्का मैम हमेशा कहती, तुम्हारी कहानी बाकी सबसे अलग है इसलिए तुम जीतोगे। रात को नींद में भी सवाल हल करता था और सुबह फिर सब्जी की दुकान पर लग जाता। कुछ दिनों बाद आईआईटी जीई का दिन आया। आरव ने कांपते हाथों से पेन उठाया। उसने खुद से कहा, मैं किसी से कम नहीं। हर सवाल को पूरी एकाग्रता से पढ़ा। जहां फंसता वहां अनुष्का मैम की आवाज गूंजती, डर से नहीं दिमाग से लड़ो। यही सोचकर वह आगे बढ़ता गया। परीक्षा देकर बाहर आया तो चेहरे पर संतोष था। रिजल्ट वाले दिन पूरे मोहल्ले की सांसे थमी थी। और फिर मोबाइल पर मैसेज आया, ऑल इंडिया रैंक 432। पापा की आंखों में आंसू थे। उन्होंने आरव को गले लगाकर कहा, बेटा, तूने हमारा नाम रोशन कर दिया। आरव को आईआईटी बॉम्बे में एडमिशन मिला। पहली बार हवाई जहाज में बैठा और जब क्लास में प्रोफेसर ने पूछा, कौन-कौन टॉप 500 से है तो उसने गर्व से हाथ उठाया। वहां वो उन बच्चों के साथ बैठा जिनके पास दुनिया की हर सुविधा थी लेकिन उसके पास था जज्बा, संघर्ष और सपने। चार साल बाद आरव ने एक नामी टेक कंपनी में नौकरी पा ली। लेकिन उसने फैसला किया वो गोरखपुर लौटेगा। वहीं एक कोचिंग खोलकर उन बच्चों को पढ़ाएगा जिनके पास साधन नहीं पर सपना है। अब वो आरव नहीं, आरव सर बन चुका था। उसके पास महंगी गाड़ी थी लेकिन वो अब भी सब्जी वालों के बच्चों को गले लगाता क्योंकि वो जानता था कि सपनों की कोई जात, हैसियत या रेट नहीं होती। हर नए बैच में वह एक बात जरूर कहता, मैं ठेले वाले का बेटा हूं। अगर मैं कर सकता हूं तो तुम भी कर सकते हो। बस कभी हार मत मानना। अब आरव के पापा सुबह सब्जी नहीं बेचते। पूरा मोहल्ला कहता है, ये देखो हमारा लड़का जिसने गोरखपुर का नाम ऊंचा किया। आरव की कहानी इंटरनेट पर वायरल हो गई। The Boy Who Never Gave Up Moral: कभी हार मत मानो। हालात कितने भी मुश्किल क्यों ना हो। अगर सपना सच्चा है और इरादा मजबूत तो एक ठेले वाले का बेटा भी आईआईटी पहुंच सकता है।

छोटे शहर का बड़ा सपना – The Boy Who Never Gave Up | Motivational Story in Hindi
Victory Tales YT
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