[0:12]इस वक्त आप आराम से बैठकर इस वीडियो को देख रही हैं मगर मैं आपको कहूं आज जिस जगह पर आप अभी बैठे हो वह जमीन आज से करोड़ों साल पहले 8500 डिग्री के तापमान से उबल रही थी। या जिस जगह पर आप बैठे हैं, वह जगह लाखों सालों तक बर्फ से ढकी हुई थी। ये दोनों बातें सच है। इस 15 मिनट की वीडियो के अंदर आप पृथ्वी के 450 करोड़ साल के सफर को देखने वाले हैं। जिस जगह आज हमारा सौरमंडल है। वहां विभिन्न प्रकार की गैस और धूल के बादल हुआ करते थे। वैज्ञानिकों के मुताबिक इन धूल के बादलों से दूर एक तारा हुआ करता था। वक्त के साथ-साथ उस तारे की ऊर्जा कम होने लगी जिसके कारण उसके अंदर एक विशाल विस्फोट हुआ। विस्फोट की वजह से अंतरिक्ष की ये धूल एक दूसरे से दबने लगी। इस दौरान बादलों में स्थित धूल के कण दबाव और गर्मी के कारण बड़े उल्कापिंड और पत्थरों में परिवर्तित हो चुके थे। और इसी दबाव की वजह से इन बादलों में स्थित रेडियो एक्टिव पदार्थ ने ग्रेविटी का निर्माण किया। इस ग्रेविटी के कारण बीच में हाइड्रोजन और हीलियम इकट्ठा होने लगे। बीच के इस भयंकर दबाव के कारण एक विशाल विस्फोट हुआ। और इसी विस्फोट के कारण हमारे सूरज का जन्म हुआ। अंतरिक्ष में फैले एस्टेरॉयड यानी क्षुद्रग्रहों में भारी वजन की वजह से सूरज के करीब आकर सूरज की प्रक्रिया करने लगे। धीरे-धीरे इन्हीं एस्टेरॉयड में भारी टकराव हुआ। जिसके फलस्वरूप मरकरी, वीनस, अर्थ और मार्स जैसे ग्रहों का निर्माण हुआ। वैज्ञानिकों के मुताबिक उस वक्त पृथ्वी और मार्स यानी मंगल ग्रह के बीच थिया नामक ग्रह सूरज की प्रक्रिया किया करता था। पृथ्वी पर ग्रेविटी होने की वजह से सूरज की प्रक्रिया करने वाले एस्टेरॉयड अब पृथ्वी की प्रक्रिया करने लगे। और धीरे-धीरे करोड़ों सालों तक ये पृथ्वी पर गिरते रहे। और ऐसी ही घटना हमारे पड़ोसी ग्रह थिया पर भी हो रही थी। जिसके कारण थिया पृथ्वी के और करीब आने लगा। और आकर पृथ्वी से टकराया। इस भयंकर टकराव की वजह से पृथ्वी के हिस्से कणों के रूप में अंतरिक्ष में फैल गए और एक रिंग्स की तरह पृथ्वी की प्रक्रिया करने लगे। इन्हीं परिक्रमा करते हुए कणों में टकराव होने लगा। जिसके कारण हमारे चांद का निर्माण हुआ। उस वक्त पृथ्वी पर सिर्फ एक ही समुद्र हुआ करता था और वह था 1900 डिग्री सेल्सियस की तापमान पर उबलते हुए लावे का। उबल रही थी वो सारी चीजें जिसे आज आप अलग-अलग नाम से जानते हैं। वक्त के साथ-साथ पृथ्वी धीरे-धीरे ठंडी हो रही थी। जिसके कारण पृथ्वी के भारी तत्व जैसे धातु और रेडियो एक्टिव पदार्थ पृथ्वी के केंद्र में जाकर इकट्ठा हो गए। और हल्के पदार्थ पृथ्वी की सतह पर आ गए। लाखों सालों तक पृथ्वी पर उल्कापिंडों की बरसात हुई। और इन गिरते हुए उल्कापिंडों में जमा था नमक, मिनरल्स और पानी। करोड़ों सालों तक इन उल्कापिंडों की बरसात होती रही और धीरे-धीरे पृथ्वी की ऊपरी सतह पानी से ढकने लगी। वैज्ञानिकों के मुताबिक यही वो वक्त था जब दूर गहरे पानी के अंदर निकलते ज्वालामुखीओ से पहली बार सूक्ष्म जीवों का निर्माण हुआ। लाखों सालों बाद एक वक्त ऐसा आया जब पृथ्वी की पूरी सतह पानी से ढकी चुकी थी। हमारी पृथ्वी के सबसे अंदर का कोर रेडियो एक्टिव पदार्थ से बने होने की वजह से हरदम गर्म होता रहता है। लेकिन जब भी पृथ्वी की ऊपरी जमीन ठंडी हो जाती है तब पृथ्वी के अंदर की गर्मी बाहर नहीं निकल पाती। जिसके कारण ज्वालामुखीयों का निर्माण होता है। और उस वक्त कुछ ऐसा ही हुआ। पानी से ढकी हुई पृथ्वी पर हजारों की तादाद में ज्वालामुखी निकलने लगे। और आने वाले लाखों सालों तक इन ज्वालामुखीओ का निकलना जारी रहा। जिससे पानी के ऊपर जमीन का निर्माण हो रहा था। इस वक्त भी पृथ्वी पर वातावरण ना होने की वजह से अंतरिक्ष से उल्कापिंडों की बरसात हो रही थी। आज से लगभग 300 करोड़ साल पहले पृथ्वी पर ऐसा वक्त आया जब पृथ्वी का वातावरण लगभग स्थिर होने लगा था। ज्वालामुखी निकलने धीरे हो गए थे और पृथ्वी का एक दिन 12 घंटे का हुआ करता था। साल बीतते गए और धीरे-धीरे ये सूक्ष्म जीव विकसित होते गए। और समूहों में रहने लगे। आज से लगभग 250 करोड़ साल पहले पहली बार पृथ्वी पर ऐसे जीवों का निर्माण हुआ जो जीने के लिए ये पानी के अंदर के मिनरल्स यानी खनिज पदार्थ और धूप का इस्तेमाल करते थे। और मल त्याग के रूप में ऑक्सीजन बाहर निकालते थे। इस वक्त तक पृथ्वी पर ज्यादातर ज्वालामुखी निकलने बंद हो चुके थे और इन माइक्रो बैक्टीरियास की वजह से वातावरण में ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ रही थी। वातावरण में ऑक्सीजन बनने की वजह से पृथ्वी का वायुमंडल बनना शुरू हुआ। और आने वाले हजारों सालों तक वातावरण में ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ती रही। जिसकी वजह से पृथ्वी के ज्यादातर हिस्सों में ये सूक्ष्म जीव फैल गए। हजारों सालों बाद एक वक्त ऐसा आया जब पृथ्वी में ज्यादा ऑक्सीजन बढ़ने के कारण ये सूक्ष्म जीव मरने शुरू हो गए। उस वक्त तक पृथ्वी का वातावरण ठंडा होने के साथ-साथ ऑक्सीजन से भी भर चुका था। जिसके कारण जमीन और वातावरण में स्थित आयरन यानी लोहे के मिनरल्स पानी में स्थित ऑक्सीजन से रिएक्ट होने लगे। और एक वक्त ऐसा आया जब पृथ्वी की जमीन आज के मास के जैसे लाल हो चुकी थी। वक्त बीतने के साथ-साथ धरती की टेक्टोनिक प्लेट्स में दरार होने लगी। जिसके कारण पृथ्वी के अंदर का लावा जमीन की तरह कई लाखों सालों तक खुला उबलता रहा। और यही वो कारण था जिसके कारण पृथ्वी के वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा बहुत बढ़ गई। और पृथ्वी पर एसिड की वर्षा शुरू हो गई। एसिड रेन की वजह से पृथ्वी का तापमान घटने लगा और तापमान इतना घटा कि पृथ्वी के ऊपर स्थित पानी बर्फ में परिवर्तित होने लगा। पृथ्वी पर पहली बार भयंकर आइस एज आया। इस वक्त पूरी पृथ्वी सफेद बर्फ से ढक चुकी थी। आमतौर पर जब धरती पर सूरज की किरणें गिरती हैं तब जमीन उन किरणों को सोख लेती है। मगर क्योंकि पूरी पृथ्वी बर्फ से ढक चुकी थी और क्योंकि बर्फ सफेद और चमकीली होती है जिसके कारण सूरज की किरणें धरती पर गिरने के बाद वापस चली जाती थी। इसी कारण से पृथ्वी कई लाखों सालों तक बर्फ से ढकी रही। मगर फिर से पृथ्वी के अंदर स्थित गर्मी ज्वालामुखी के रूप में निकलना शुरू हो गई। और इन ज्वालामुखीयों से निकलने वाली गर्मी ने बर्फ को पिघलाना शुरू कर दिया। इसी बीच पृथ्वी की गहराई में बचे कुछ सूक्ष्म जीव धीरे-धीरे बदल रहे थे और अब वह ऑक्सीजन को अपने शरीर को बड़ा और जटिल बनाने के लिए इस्तेमाल करने लगे थे। इस बीच पानी में अलग से भी छोटे समुद्री पौधे निकलने शुरू हो चुके थे। बाहर जैसे-जैसे ज्वालामुखी निकल रहे थे वैसे-वैसे वातावरण कार्बन डाइऑक्साइड की वजह से गर्म हो रहा था। वक्त के साथ-साथ बर्फ तो पिघलने लगी मगर धरती पर फिर से एसिड की वर्षा शुरू हो गई। जिसके कारण फिर पृथ्वी ठंडी होने लगी और फिर पृथ्वी की ज्यादातर सतह बर्फ से ढक गई। ऐसा बार-बार कई हजारों सालों तक होता रहा और इसी कारण से अब समुद्री जीव धीरे-धीरे वातावरण के हिसाब से विकसित हो रहे थे। इस बीच कई सारे जीव और समुद्री जंगल विलुप्त हो गए। मगर जो बच गए वो धीरे-धीरे पृथ्वी के बदलते तापमान के हिसाब से ढलते गए। और अब हजारों सालों बाद समुद्री पेड़ बर्फ की वजह से पूरी तरह से मरते या सूखते नहीं थे। अब सूक्ष्म जीव समुद्री जीव बन चुके थे। जब फिर से ज्वालामुखीओ ने पृथ्वी की बर्फ को पिघलाना शुरू किया। तब ये समुद्री पेड़ जल्दी विकसित होकर फैल गए। धीरे-धीरे वातावरण में ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ने लगी और पृथ्वी पर होने वाली एसिड की वर्षा कम होने लगी। वातावरण में ऑक्सीजन आने की वजह से पृथ्वी की ओजोन लेयर्स मोटी होने लगी। और आज से लगभग 47 करोड़ साल पहले पृथ्वी की ऊपरी सतह पर पहली बार मोसोस नामक प्लांट उगना शुरू हुआ। वक्त के साथ-साथ जमीन पर अलग-अलग प्रकार के पौधे और पेड़ उगना शुरू हुए। एक वक्त ऐसा आया जब जमीन के पेड़ों की लंबाई लगभग 80 से 100 फीट जितनी या आज के पांच से छह मंजिला बिल्डिंग जितनी ऊंची हो चुकी थी। यह वो वक्त था जब समुद्री जानवर समुद्र से बाहर निकल रहे थे। और जमीनी जानवरों में परिवर्तित हो रहे थे। धरती की ज्यादातर जमीन एक जगह इकट्ठी हो चुकी थी जिसे आज हम पेंजिया महाद्वीप के नाम से जानते हैं। पृथ्वी का वातावरण और तापमान लगभग स्थिर हो चुका था और अब करीब 21 से 23 घंटे का दिन हुआ करता था। अब समुद्री जीव पानी से बाहर रहने लगे थे और वातावरण के हिसाब से उनके शरीर का रंग-रूप बदल रहा था। धीरे-धीरे यह जमीनी जानवर डायनासॉर्स में परिवर्तित हो गए। जिन डायनासॉर्स ने पेड़-पौधे खाने शुरू कर दिए उनका शरीर लंबा और विशाल रूप से विकसित होने लगा। कुछ डायनासॉर्स शिकार किया करते थे जिसके कारण वे छोटे और तेज होते चले गए।
[9:28]पृथ्वी की ऊपरी जमीन एक जगह इकट्ठी होने के कारण ज्यादातर जमीन रेगिस्तान और बंजर हो चुकी थी। ज्यादातर जंगल समुद्र के करीब हुआ करते थे जिसमें डायनासॉर्स रहा करते थे। आज से लगभग 20 करोड़ साल पहले पेंजिया महाद्वीप टूटना शुरू हो गया। पेंजिया के विभाजित होने की वजह से पृथ्वी की ज्यादातर ऊपरी जमीन पानी के संपर्क में आने लगी जिसके फलस्वरूप पृथ्वी पर हरियाली बढ़ती गई। जिस वजह से डायनासॉर्स और ज्यादा विभिन्न और विशाल होते चले गए।
[10:04]डायनासॉर्स ने आने वाले लगभग 20 से 30 करोड़ सालों तक पृथ्वी पर राज किया। उस वक्त डायनासॉर्स समुद्र से लेकर जमीन और आसमान तक पूरी पृथ्वी पर राज किया करते थे। इस दौरान अफ्रीका से टूटा भारत सीधे आकर आज के तिब्बत से टकराया। और इस टकराव की वजह से हिमालय का निर्माण हुआ। आज से लगभग 6.5 करोड़ साल पहले पृथ्वी की तरफ आज के माउंट एवरेस्ट से भी बड़ा लगभग 4.5 लाख करोड़ किलो जितना वजन या उल्कापिंड लगभग 80000 किलोमीटर प्रति घंटे की स्पीड से पृथ्वी की तरफ आ रहा था। पृथ्वी की सतह को छूते ही उसमें भयंकर आग लगी और वो जलते हुए सीधा पृथ्वी से टकराया। इस टकराव से निकलने वाली ऊर्जा आज के 10 करोड़ परमाणु बम एक साथ फटने के बराबर थी। जहां यह उल्कापिंड गिरा वहां के जानवर और पेड़ तुरंत भाप बनकर जल गए। गिरते ही पृथ्वी पर पूरी तरह धूल फैलने लगी। समुद्र में भयंकर बाढ़ आने लगी। भूकंप और आग ने पृथ्वी को जलाना शुरू कर दिया। कुछ ही घंटों में पूरी पृथ्वी के वातावरण में हानिकारक गैस और धूल की वजह से पृथ्वी नरक हो चुकी थी। डायनासॉर्स घुटन, आग और भुखमरी से पूरी तरह विलुप्त हो गई। इस वक्त हमारे पूर्वज जमीन के अंदर रहा करते थे जिसके कारण वो इस विशाल प्रलय से बच गए। पृथ्वी का वातावरण पूरी तरह से काला और अंधेरा हो चुका था जिससे धूप भी जमीन तक नहीं पहुंच पा रही थी। पृथ्वी के पेड़ और ज्यादातर जानवर विलुप्त हो गए। वातावरण में धूल और हानिकारक गैस के कारण पृथ्वी पर फिर से एसिड की वर्षा शुरू हो गई। और फिर पृथ्वी ठंडी होकर बर्फ से ढक गई। लेकिन इस बार पृथ्वी की बर्फ लाखों सालों तक नहीं जमी रही और 80 से 90 हजार साल बाद ये बर्फ पिघलनी शुरू हो गई। जैसे ही धरती पर वातावरण फिर से पहले जैसा होने लगा वैसे ही ये छोटे जीव जमीन से बाहर आना शुरू हो गए। उस वक्त पृथ्वी की बर्फ पिघलनी शुरू ही हुई थी जिसके कारण अफ्रीका में घने ठंडे जंगल हुआ करते थे। और इसी बीच यह जमीनी जीव बंदरों में परिवर्तित हुए। मगर जैसे-जैसे पृथ्वी गर्म होने लगी वैसे-वैसे अफ्रीका के यह जंगल सूखने लगे। जंगल की चीजें खाने वाले बंदरों को खाने की कमी होने लगी। खाने की तलाश में इन बंदरों ने अपने पैरों पर चलना शुरू कर दिया। जिससे उन्हें दूसरे जानवरों के शिकार करने में मदद मिलती थी। धीरे-धीरे बंदर एप्स यानी वानर में परिवर्तित हुए। खाने की तलाश में ये एप्स पृथ्वी के दूसरे हिस्सों में फैलने लगे और धीरे-धीरे उनके शरीर का रंग-रूप वहां के मौसम के हिसाब से बदलता गया। वक्त के साथ-साथ हम आदिवासी बने। हमने हथियारों से लेकर आग का आविष्कार किया। हम धीरे-धीरे इंसान के रूप में विकसित हुए। हमने धर्म से लेकर परिवार, भाषा और संस्कृति का निर्माण किया। और वक्त के साथ-साथ हम विकसित होते चले गए और आज हम इस पृथ्वी की सबसे विकसित प्रजाति बन चुके हैं। पृथ्वी को आज के जैसे बनने में लगभग 450 करोड़ साल का वक्त लगा है। और हमें एक छोटे जमीन में रहने वाले जानवर से इंसान बनने में कई लाखों सालों का। मगर हमने इन 100 सालों में जितना पृथ्वी को गंदा और तबाह किया है, उतना आज तक किसी भी प्रजाति ने नहीं किया होगा। हम फिर से धरती को गर्म कर रहे हैं और कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा बढ़ा रहे हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि पृथ्वी पर फिर से विशाल परिवर्तन होने वाला है। भविष्य में पृथ्वी कैसी होगी? जानेंगे हमारी अगली वीडियो में।



