[0:00]मित्रों, आज मैं तुमसे उस रहस्य की बात करूँगा जो तुम्हारे पेट में छुपा है। हां, तुम्हारे पेट में, वह स्थान जिसे तुम केवल भोजन पचाने का यंत्र समझते हो, वह वास्तव में एक महा यज्ञशाला है।
[0:14]वहां एक अग्नि जलती है जो न केवल तुम्हारा भोजन पचाती है बल्कि तुम्हारे विचार, तुम्हारी भावनाएं, तुम्हारा भाग्य सब कुछ पचाती है। इस अग्नि का नाम है जठराग्नि।
[0:29]लेकिन रुको, पहले एक क्षण के लिए बाहर की दुनिया को छोड़ो। अपने हाथ अपने पेट पर रखो। अभी और महसूस करो, क्या वहां कुछ है?
[0:39]क्या वहां एक गर्माहट है, एक ऊर्जा है, एक जीवंतता है? अगर तुम ध्यान से सुनो तो तुम महसूस करोगे, वहां कुछ है।
[0:51]वहां एक अग्नि है। वेदों में अग्नि को देवता माना गया है। अग्नि सूक्त ऋग्वेद का पहला मंत्र है।
[0:58]सोचो हजारों साल पहले जब ऋषियों ने ज्ञान को संकलित किया तो उन्होंने सबसे पहले किसकी स्तुति की? अग्नि की, क्यों?
[1:10]क्योंकि अग्नि के बिना कुछ नहीं है। न जीवन, न सृजन, न रूपांतरण। अग्नि वह शक्ति है जो सब कुछ बदलती है। कच्चे को पके में, जड़ को चेतन में, अंधकार को प्रकाश में।
[1:21]और यही अग्नि तुम्हारे भीतर है जठराग्नि के रूप में। आयुर्वेद कहता है, जठराग्नि एवं मूलम आरोग्यस्य।
[1:31]अर्थात जठराग्नि ही स्वास्थ्य की जड़ है। केवल शारीरिक स्वास्थ्य नहीं, मानसिक स्वास्थ्य भी, आध्यात्मिक स्वास्थ्य भी।
[1:40]लेकिन आज का मनुष्य इस अग्नि को नहीं जानता। वह अपने पेट को एक समस्या समझता है।
[1:47]एसिडिटी, गैस, अपच, कब्ज यह सब उसे परेशान करते हैं। वह दवाइयां लेता है, परहेज करता है लेकिन जड़ तक नहीं जाता। जड़ है जठराग्नि।
[1:59]जब जठराग्नि ठीक है तो सब ठीक है। जब जठराग्नि बिगड़ी हुई है तो सब बिगड़ा हुआ है। अब तुम पूछोगे, जठराग्नि और भाग्य में क्या संबंध है?
[2:11]यह तो पाचन की बात है, भाग्य की नहीं। मैं तुमसे कहता हूं, पाचन और भाग्य में गहरा संबंध है। इतना गहरा कि तुम कल्पना भी नहीं कर सकते।
[2:43]जब तुम्हारा पाचन ठीक होता है तो तुम्हारे शरीर में ऊर्जा होती है। जब ऊर्जा होती है तो मन प्रसन्न होता है। जब मन प्रसन्न होता है तो विचार स्पष्ट होते हैं। तो निर्णय सही होते हैं।
[2:57]जब निर्णय सही होते हैं तो कर्म सही होते हैं और सही कर्म ही भाग्य बनाते हैं। यह कोई जादू नहीं है।
[3:09]यह कारण और कार्य की सीधी श्रृंखला है। लेकिन इससे भी गहरी बात है, जठराग्नि केवल भोजन नहीं पचाती।
[3:17]वह सब कुछ पचाती है। ए, जो तुम ग्रहण करते हो, तुम्हारे अनुभव, तुम्हारी भावनाएं, तुम्हारे संबंध, तुम्हारे विचार, सब कुछ जठराग्नि ही पचाती है।
[3:28]जब किसी का प्रिय व्यक्ति मर जाता है तो उसे भूख नहीं लगती, क्यों? क्योंकि जठराग्नि मंद हो जाती है।
[3:37]शरीर को पता है कि अभी इतना बड़ा दुख पचाना है कि भोजन के लिए ऊर्जा कहां। जब तुम बहुत डरे हुए होते हो तो पेट में एक अजीब सी घबराहट होती है।
[3:47]जब तुम बहुत क्रोधित होते हो तो पेट में जलन होती है। जब तुम बहुत चिंतित होते हो तो पाचन बिगड़ जाता है। यह सब सहयोग नहीं है।
[3:57]पेट और मन का संबंध इतना गहरा है कि आधुनिक विज्ञान अब इसे एंट्रिक नर्वस सिस्टम कहता है।
[4:04]पेट में नौ से 15 करोड़ तंत्रिका कोशिकाएं हैं। यह मस्तिष्क के बाहर सबसे बड़ा तंत्रिका तंत्र है।
[4:11]वैज्ञानिक इसे दूसरा मस्तिष्क कहते हैं और आयुर्वेद इसे जठराग्नि कहता है। दोनों एक ही बात कह रहे हैं।
[4:20]अलग-अलग भाषाओं में ऋग्वेद में कहा गया है, अग्निर्वै सर्वानि भूतानि, अग्नि ही सभी प्राणियों में है। प्रत्येक जीव में अग्नि है।
[4:30]यह अग्नि जठर में, पेट में सबसे प्रबल है। अग्नि तीन प्रकार की होती है वेदों में।
[4:38]पहली आहवनीय अग्नि जो यज्ञ में प्रयोग होती है। दूसरी गार्हपत्य अग्नि जो घर में रखी जाती है।
[4:47]तीसरी दक्षिणाग्नि जो पितृ कार्यों में प्रयोग होती है। लेकिन सबसे गुप्त और सबसे शक्तिशाली अग्नि वह है जो शरीर के भीतर है, जठराग्नि।
[4:57]यह वह अग्नि है जिसके बारे में तंत्र ग्रंथों में कहा गया है कि जो इसे जान लेता है वह सब कुछ जान लेता है।
[5:43]तैत्तिरीय उपनिषद में कहा गया है, अन्नं ब्रह्म। अन्न ही ब्रह्म है।
[5:48]और जो इस अन्न को पचाने वाली अग्नि है वह परमात्मा की शक्ति है। यह कितनी गहरी बात है। भोजन पचाना एक आध्यात्मिक क्रिया है।
[5:59]जठराग्नि एक दिव्य शक्ति है और इसे जानना, इसे जगाना, इसे स्वस्थ रखना यह एक साधना है।
[6:08]अब मैं तुम्हें बताता हूं जठराग्नि के विभिन्न रूपों के बारे में। आयुर्वेद में जठराग्नि के चार प्रकार बताए गए हैं।
[6:17]पहला है समाग्नि। जब जठराग्नि संतुलित होती है, सम होती है, न बहुत तेज, न बहुत मंद।
[6:26]यह आदर्श अवस्था है। जिस व्यक्ति की समाग्नि होती है, वह जो भी खाए पच जाता है। उसे न अपच होती है, न भूख की समस्या।
[6:36]ऐसा व्यक्ति सुखी होता है, स्वस्थ होता है, दीर्घायु होता है। उसका मन प्रसन्न रहता है। उसके निर्णय सही होते हैं। उसका जीवन एक लय में चलता है।
[6:47]दूसरा है विषमाग्नि। अस्थिर होती है, कभी तेज, कभी मंद। ऐसे व्यक्ति को कभी बहुत भूख लगती है, कभी बिल्कुल नहीं, कभी सब कुछ पच जाता है, कभी कुछ नहीं पचता।
[7:01]पेट में गैस, आंवले, पेट का फूलना यह लक्षण होते हैं। ऐसा व्यक्ति मानसिक रूप से भी अस्थिर होता है। उसके निर्णय बदलते रहते हैं।
[7:13]वह आज कुछ सोचता है, कल कुछ और। उसके संबंध भी अस्थिर होते हैं। तीसरा है तीक्ष्णाग्नि। जब जठराग्नि बहुत तेज होती है। ऐसे व्यक्ति को बहुत भूख लगती है।
[7:24]वह खाता है और जल्दी पच जाता है। लेकिन यह तेजी हानिकारक भी है। पेट में जलन, एसिडिटी, अल्सर की संभावना।
[7:34]ऐसा व्यक्ति मानसिक रूप से भी तीव्र होता है। जल्दी निर्णय लेता है लेकिन जल्दबाजी में गलत निर्णय भी लेता है। क्रोध जल्दी आता है।
[7:45]चौथा है मंदाग्नि। जब जठराग्नि मंद होती है, कमजोर होती है। ऐसे व्यक्ति को भूख नहीं लगती।
[7:54]जो खाए वह पचता नहीं। थकान, सुस्ती, आलस्य रहता है। ऐसा व्यक्ति मानसिक रूप से भी सुस्त होता है। उसमें उत्साह नहीं होता।
[8:06]जीवन में आगे बढ़ने की इच्छा नहीं होती। वह निर्णय नहीं ले पाता और यही उसके भाग्य को कमजोर करता है।
[8:22]आयुर्वेद कहता है कि शरीर में केवल एक जठराग्नि नहीं है। शरीर में 13 अग्नियां हैं और इन 13 अग्नियों का जाल पूरे शरीर में फैला है।
[8:33]जठराग्नि तो मुख्य अग्नि है, केंद्रीय अग्नि है। लेकिन उससे सात धातु अग्नियां और पांच भूताग्नियां उत्पन्न होती हैं।
[8:43]सात धातुएं हैं शरीर की, रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा और शुक्र।
[8:50]प्रत्येक धातु की अपनी अग्नि है। इसे धातु अग्नि भोजन पचाती है। जब जठराग्नि भोजन पचाती है तो सर्वप्रथम रस धातु बनती है।
[9:00]रस धातु की अग्नि उसे और सूक्ष्म करती है और रक्त बनता है। रक्त की अग्नि मांस बनाती है। मांस की अग्नि मेद बनाती है।
[9:12]इस तरह क्रम से सभी धातुएं बनती हैं। यह एक अद्भुत प्रक्रिया है। एक साधारण भोजन का एक लंबी यात्रा से गुजरना और अंत में शुक्र धातु बनना जो जीवन निर्माण की सबसे शक्तिशाली धातु है।
[9:25]अब पांच भूताग्नियां, पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश। प्रत्येक भूत की अपनी अग्नि है और जो भोजन हम खाते हैं वह इन पांच तत्वों से बना है।
[9:39]पांच भूताग्नियां उन तत्वों को अपने समान तत्वों में बदलती है। यह विज्ञान आज के रसायन शास्त्र से कम नहीं है।
[9:46]जब तुम कुछ खाते हो तो शरीर उसके तत्वों को अलग-अलग करके अपने काम के लिए उपयोग करता है।
[9:55]यही धातु अग्नियां और भूताग्नियां करती है। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात यह है, ये सभी 13 अग्नियां जठराग्नि पर निर्भर हैं।
[10:04]जठराग्नि जितनी तेज सभी अग्नियां उतनी तेज। जठराग्नि जितनी मंद सभी अग्नियां उतनी मंद।
[10:13]जैसे एक बड़े यज्ञ में मुख्य अग्नि से छोटी-छोटी अग्नियां जलाई जाती है, वैसे ही जठराग्नि से यह सभी अग्नियां प्रज्वलित होती है।
[11:24]कितना व्यापक है यह विज्ञान। केवल पाचन नहीं बल्कि जीवन की हर महत्वपूर्ण शक्ति जठराग्नि से जुड़ी है।
[11:32]आयु जठराग्नि ठीक तो लंबी आयु। बल जठराग्नि ठीक तो शक्ति।
[11:37]उत्साह जठराग्नि, ठीक तो जीवन में उमंग। चमक जठराग्नि, ठीक तो चेहरे पर तेज।
[11:46]और तेज यह शब्द बहुत महत्वपूर्ण है। तेज का अर्थ है, वह आंतरिक प्रकाश जो व्यक्ति के भीतर से बाहर आता है।
[11:57]वह करिश्मा जो कुछ लोगों में होता है, वह आकर्षण जो बिना कुछ किए लोगों को खींच लेता है, यह तेज जठराग्नि से आता है।
[12:05]जब जठराग्नि प्रबल होती है तो व्यक्ति का तेज बढ़ता है। लोग उसकी ओर आकर्षित होते हैं।
[12:12]क्या अब तुम समझे? भाग्य में तेज बड़ी भूमिका निभाता है। जब तुम्हारा तेज अच्छा होता है तो अवसर तुम्हारे पास आते हैं। लोग तुम्हारी मदद करते हैं।
[12:24]रास्ते खुलते हैं और यह तेज आता है जठराग्नि से। अब बात करते हैं ओजस की। ओजस शरीर का सबसे सूक्ष्म और सबसे शक्तिशाली तत्व है। यह सात धातुओं का सार है।
[12:39]जब सभी सात धातुएं ठीक से बनती है तो उनका परम सार ओजस होता है। ओजस वह है जो प्रतिरक्षा तंत्र को शक्तिशाली बनाता है।
[12:50]ओजस वह है जो आध्यात्मिक साधना में सहायक होता है और ओजस बनता है तभी जब जठराग्नि ठीक हो।
[12:57]जिस व्यक्ति का ओजस प्रबल हो उसे कोई बीमारी नहीं होती। उसका मन कभी चिंतित नहीं होता। उसके जीवन में एक सहजता होती है। सब कुछ आसानी से होता है।
[13:11]यही है समृद्ध भाग्य का रहस्य। ओजस प्रबल हो तो भाग्य प्रबल। लेकिन आज के मनुष्य का ओजस बहुत कमजोर है।
[13:21]क्यों? क्योंकि जठराग्नि कमजोर है। क्योंकि हम जो खाते हैं, जैसे जीते हैं, जो सोचते हैं, सब कुछ जठराग्नि को कमजोर करता है।
[13:30]अब मैं तुम्हें बताता हूं जठराग्नि कमजोर क्यों होती है। पहला कारण है, अनुचित आहार।
[13:37]जो भोजन जठराग्नि के अनुकूल नहीं है। बासी भोजन, अति मसालेदार भोजन, अति ठंडा भोजन, असंगत भोजन।
[13:46]दूसरा कारण है, अनुचित समय पर भोजन। देर रात भोजन करना, भूख न लगने पर भी खाना, पिछला भोजन पचे बिना फिर खाना।
[14:21]तीसरा कारण है मानसिक तनाव, चिंता, क्रोध, भय, शोक। यह सब जठराग्नि को सीधे प्रभावित करते हैं।
[14:32]जब मन अशांत होता है तो पेट भी अशांत होता है। चौथा कारण है अनुचित जीवन शैली।
[14:39]दिन में सोना, रात को जागना, व्यायाम न करना। पांचवा कारण है अयोग्य संगति।
[14:48]और यह बात आयुर्वेद में लिखी है। जो लोग निरंतर नकारात्मक विचारों वाले लोगों के साथ रहते हैं उनकी जठराग्नि कमजोर होती है।
[14:56]क्योंकि नकारात्मकता ऊर्जा को नीचे खींचती है। मित्रों इन कारणों को देखो और अपने जीवन में खोजो।
[15:04]तुम्हारी जठराग्नि क्यों कमजोर है? इसका उत्तर तुम्हारे जीवन में ही है। पेट और मस्तिष्क एक ही तंत्र के दो सिरे हैं।
[15:13]पेट में नौ करोड़ से अधिक तंत्रिका कोशिकाएं हैं। यह मस्तिष्क के बाहर सबसे बड़ा तंत्रिका तंत्र है। वैज्ञानिक इसे एंट्रिक नर्वस सिस्टम कहते हैं और इसे दूसरा मस्तिष्क भी कहा जाने लगा है।
[15:27]यह दूसरा मस्तिष्क पहले मस्तिष्क से स्वतंत्र रूप से काम कर सकता है और यह पहले मस्तिष्क को बहुत अधिक प्रभावित करता है।
[15:37]शोध बताते हैं कि शरीर में 90% सेरोटोनिन पेट में बनता है। सेरोटोनिन व रसायन है जो खुशी, शांति और संतुष्टि का एहसास देता है।
[15:47]अगर पेट ठीक है तो सेरोटोनिन ठीक बनता है। अगर पेट बिगड़ा है तो सेरोटोनिन कम बनता है।
[15:56]और सेरोटोनिन कम होने का क्या परिणाम है? अवसाद, चिंता, अशांति, नींद की समस्या।
[16:03]अब देखो कितनी सीधी बात है, तुम्हारी खुशी तुम्हारे पेट में बनती है।
[16:11]यह आयुर्वेद हजारों साल से कह रहा था। लेकिन आज विज्ञान ने इसे सिद्ध किया है। जठराग्नि और मन का संबंध इतना गहरा है कि जब भी मन में कोई तीव्र भावना आती है तो पेट पर उसका तुरंत प्रभाव होता है।
[16:24]और जब पेट में कोई समस्या होती है तो मन पर उसका तुरंत प्रभाव होता है।
[16:30]डर लगो तो पेट में गड़बड़ी। क्रोध आए तो पेट में जलन। गहरा दुख हो तो भूख न लगे। गहरा प्रेम हो तो पेट में तितलियां उड़ें। यह सब सहयोग नहीं है।
[16:54]यह जठराग्नि और मन का अविभाज्य संबंध है। अब बात करते हैं वेदों के दृष्टिकोण से।
[17:00]उपनिषदों में कहा गया है कि मनुष्य के पांच कोश है, अन्नमय कोश, प्राणमय कोश, मनोमय कोश, विज्ञानमय कोश और आनंदमय कोश।
[17:12]अन्नमय कोश स्थूल शरीर है जो भोजन से बना है। यह सबसे बाहरी कोश है।
[17:19]लेकिन इसकी ठीक स्थिति पर अन्य सभी कोशों का स्वास्थ्य निर्भर करता है। जब अन्नमय कोश ठीक होता, जब जठराग्नि प्रबल होती है तो प्राणमय कोश भी ठीक होता है।
[17:31]प्राण शक्ति बढ़ती है तो मनोमय कोश भी शांत होता है। देखो, यह क्रम पेट से प्राण, प्राण से मन।
[17:40]और जब मन शांत होता है तो विज्ञान शक्ति, बुद्धि भी स्पष्ट होती है और जब बुद्धि स्पष्ट होती है तो आनंद का अनुभव होता है।
[17:51]यह नीचे से जठराग्नि से शुरू होता है। इसीलिए कहा जाता है, पहले अन्न, फिर ब्रह्म। पहले शरीर, फिर आत्मा।
[18:00]यह भौतिकवाद नहीं है। यह व्यावहारिक आध्यात्मिकता है। जो लोग शरीर की उपेक्षा करके सीधे आत्मा तक पहुंचने की कोशिश करते हैं, वे अक्सर असफल होते हैं।
[18:12]क्योंकि शरीर ही वह वाहन है जिसमें बैठकर आत्मा यात्रा करती है। अगर वाहन खराब है तो यात्रा कहां होगी?
[18:21]जठराग्नि उस वाहन का इंजन है। अब मैं तुम्हें एक और गहरी बात बताता हूं।
[18:28]जठराग्नि और भावनाओं का संबंध। आयुर्वेद में कहा गया है कि प्रत्येक भावनाएं एक धातु को प्रभावित करती है।
[18:35]भय अस्थि धातु को कमजोर करता है। क्रोध पित्त को बढ़ाता है और रक्त धातु को प्रभावित करता है।
[18:43]शोक रस धातु को प्रभावित करता है। लालच मेद धातु को बढ़ाता है और यह सभी प्रभाव जठराग्नि के माध्यम से होते हैं।
[18:53]अगर तुम लंबे समय से किसी भावना को दबाकर रखते हो तो वह भावना तुम्हारे शरीर में संचित होती जाती है।
[19:01]और यह संचित भावना जठराग्नि को कमजोर करती है। आज के समय में अवसाद, चिंता और तनाव की महामारी है।
[19:11]और इसके साथ पाचन की समस्याओं की भी महामारी है। यह संयोग नहीं है। जब तुम अपनी भावनाओं को नहीं पचाते तो पेट भी नहीं पचाता।
[19:26]यह बहुत गहरी बात है। अगर तुम किसी से नाराज हो और उसे माफ नहीं किया तो वह नाराजगी तुम्हारे पेट में बैठी है।
[19:35]अगर तुम किसी दुख को भुलाए नहीं तो वह दुख तुम्हारी जठराग्नि को कमजोर कर रहा है।
[19:42]क्षमा करना केवल आध्यात्मिक नहीं शारीरिक भी आवश्यक है। जब तुम माफ करते हो तो तुम्हारी जठराग्नि भी ठीक होती है।
[19:51]अब मैं तुम्हें वे प्राचीन विधियां बताता हूं जो जठराग्नि को प्रबल बनाती है। यह विधियां आयुर्वेद, योग और तंत्र में बिखरी हुई है।
[20:49]पहली विधि अदरक का सेवन। आयुर्वेद में अदरक को महा औषधि कहा गया है।
[20:55]संस्कृत में इसे विश्व भेषज, सभी रोगों की दवा कहते हैं और जठराग्नि के लिए अदरक सबसे महत्वपूर्ण है।
[21:03]भोजन से 15-20 मिनट पहले अदरक के छोटे टुकड़े पर सेंधा नमक और नींबू लगाकर खाओ।
[21:10]यह तुरंत जठराग्नि को प्रज्वलित कर देता है। अदरक में जिंजरॉल और शोगाओल जैसे रसायन होते हैं जो पाचन एंजाइमों को सक्रिय करते हैं।
[21:20]यह वैज्ञानिक सिद्ध है, लेकिन आयुर्वेद इसे हजारों साल पहले से जानता था। दूसरी विधि त्रिकटु।
[21:27]त्रिकटु, तीन तीखी चीजें। सोंठ, काली मिर्च और पिपली।
[21:34]इन तीनों का चूर्ण बनाकर शहद के साथ भोजन से पहले लेना जठराग्नि के लिए बहुत लाभकारी है।
[21:40]सोंठ सूखा अदरक है। यह वात को नियंत्रित करती है। काली मिर्च पाचन को तेज करती है। पिपली पोषण को कोशिकाओं तक पहुंचाती है।
[21:52]यह तीनों मिलकर जठराग्नि को समाग्नि में लाने में मदद करती है। तीसरी विधि उचित जलपान।
[21:58]जल पीने का तरीका भी जठराग्नि को प्रभावित करता है। भोजन के समय अधिक जल पीना जठराग्नि को बुझा देता है।
[22:07]जैसे अग्नि पर पानी डालने से वह बुझ जाती है। भोजन से आधा घंटा पहले पानी पी सकते हो। भोजन के डेढ़ घंटे बाद पानी पी सकते हो।
[22:17]भोजन के बीच में केवल घूंट घूंट पानी और सुबह उठकर तांबे के बर्तन में रखा जल पीना अमृत के समान है।
[22:26]यह जठराग्नि को प्रातः काल प्रज्वलित करता है। चौथी विधि अग्नि मुद्राएं।
[22:31]योग में मुद्राएं हैं जो शरीर की ऊर्जा को प्रभावित करती है। अग्नि मुद्रा जठराग्नि के लिए विशेष है।
[22:39]अग्नि मुद्रा में अनामिका अंगुली को मोड़कर उसके नाखून को अंगूठे की जड़ में लगाओ और अंगूठे से अनामिका को दबाओ। शेष तीन अंगुलियां सीधी रखो।
[22:52]इस मुद्रा को प्रतिदिन 15 मिनट करने से जठराग्नि तेज होती है। यह पेट की चर्बी भी घटाती है और पाचन सुधारती है।
[23:11]पांचवी विधि कपालभाति। यह प्राणायाम जठराग्नि के लिए वरदान है।
[23:17]जब तुम तेजी से श्वास बाहर फेंकते हो तो पेट की मांसपेशियां जोर से काम करती है।
[23:24]यह पेट के अंगों की मालिश है। पाचन अंगों की यह मालिश जठराग्नि को प्रज्वलित करती है।
[23:30]पेट की समस्याएं दूर होती है। पाचन सुधरता है। लेकिन हमेशा खाली पेट और सही तरीके से करना।
[23:40]गर्भवती स्त्रियां और हृदय रोगी न करें।
[23:44]छठी विधि भोजन में घृत का प्रयोग। आयुर्वेद में घृत को सर्वश्रेष्ठ भोज्य पदार्थ कहा गया है।
[23:51]शुद्ध देसी घी में ब्यूटिरिक एसिड होती है जो पेट की आंतों के लिए सर्वश्रेष्ठ पोषण है।
[23:59]घी जठराग्नि को संतुलित करता है। यह तीक्ष्णाग्नि को शांत करता है और मंदाग्नि को प्रज्वलित करता है।
[24:08]यह विरोधाभासी लगता है लेकिन यही घी की विशेषता है। भोजन में प्रतिदिन एक दो चम्मच शुद्ध देसी घी अनिवार्य रूप से लेना चाहिए।
[24:19]सातवीं विधि हरितकी। हरड़ या हरितकी को आयुर्वेद में माता के समान कहा गया है।
[24:26]जैसे माता बच्चे की देखभाल करती है वैसे हरित की शरीर की देखभाल करती है।
[24:32]रात को सोते समय हरितकी का चूर्ण गरम पानी के साथ लेना जठराग्नि के लिए बहुत लाभकारी है।
[24:40]यह पेट की सफाई करती है और जब पेट साफ होता है तो जठराग्नि प्रबल होती है। आठवीं विधि अग्नि ध्यान।
[24:48]यह तंत्र की विधि है नाभि पर ध्यान केंद्रित करते हुए कल्पना करो कि वहां एक अग्नि जल रही है।
[24:56]पीले रंग की तेजस्वी अग्नि। प्रतिदिन 10 मिनट यह ध्यान करो। कल्पना करो कि यह अग्नि और तेज हो रही है, चमकीली हो रही है।
[25:07]पूरे पेट को प्रकाशित कर रही है। यह ध्यान मणिपुर चक्र को सक्रिय करता है और जब मणिपुर जागता है तो जठराग्नि प्रबल होती है।
[25:17]नवी विधि लंघन। सप्ताह में एक दिन उपवास जठराग्नि के लिए बहुत लाभकारी है।
[25:25]यह केवल शरीर के लिए नहीं, मन के लिए भी। उपवास में मन भी हल्का होता है।
[25:31]दसवीं विधि सात्विक आहार। जो भोजन जठराग्नि के अनुकूल है। वह है ताजा, सात्विक, सुपाच्य।
[25:39]गेहूं, चावल, दाल, सब्जियां, फल यह सात्विक आहार है। तामसिक भोजन बासी, भारी, मांसाहारी।
[25:51]यह जठराग्नि को मंद करता है। राजसिक भोजन, बहुत तीखा, बहुत मसालेदार, बहुत नमकीन।
[25:59]यह जठराग्नि को असंतुलित करता है। इन 10 विधियों को अपने जीवन में उतारो।
[26:05]धीरे-धीरे, एक-एक करके और तुम देखोगे कि कैसे तुम्हारी जठराग्नि प्रबल होती है।
[26:11]कैसे तुम्हारा मन बदलता है। भोजन क्या है? तुम कहोगे, भोजन वह है जो हम खाते हैं।
[26:19]सब्जी, रोटी, दाल, चावल। लेकिन यह बहुत सतही उत्तर है। भोजन वह है जो तुम बनते हो। तुम्हारा शरीर उसी से बना है जो तुमने खाया है।
[26:30]तुम्हारे मस्तिष्क की कोशिकाएं उसी से बनी है। तुम्हारे हृदय की धड़कन उसी ऊर्जा से है।
[26:38]तुम जो खाते हो वही बन जाते हो। इसीलिए आहार को अन्न ब्रह्म कहा गया है।
[26:45]भोजन केवल पेट नहीं भरता, यह तुम्हारे अस्तित्व को बनाता है। अब सोचो, अगर तुम क्रोध में बना भोजन खाते हो तो क्या होगा?
[26:54]भोजन में वह क्रोध की ऊर्जा भी होती है और वह ऊर्जा तुम्हारे शरीर में प्रवेश करती है।
[27:01]भारतीय परंपरा में इसीलिए कहा जाता था कि भोजन प्रसन्न मन से बनाओ, प्रेम से बनाओ।
[27:09]क्योंकि बनाने वाले की भावना भोजन में समाहित होती है जो खाने वाले को प्रभावित करता है।
[27:14]अब बात करते हैं भोजन के समय की। आयुर्वेद कहता है, सूर्य और जठराग्नि एक ही लय में चलते हैं।
[27:38]जब सूर्य ऊपर होता है जठराग्नि प्रबल होती है।



