Thumbnail for How A Mysterious Letter Changed Pakistan FOREVER | Hindi Documentary | Episode 01 Part 01 by Char Batain

How A Mysterious Letter Changed Pakistan FOREVER | Hindi Documentary | Episode 01 Part 01

Char Batain

11m 17s1,193 words~6 min read
YouTube auto captions
Transcript source

YouTube auto captions

This transcript was extracted from YouTube's auto-generated caption track. The transcript below is server-rendered so it can be read, searched, cited, and shared without opening the original YouTube player.

Timestamped outline
[0:11]Section 1

जुलाई 1974 का दिन है। पाकिस्तान में गर्मी अपने उरूज पर है। इस्लामाबाद में प्रधानमंत्री के सचिवालय का एक अफसर सुबह के अखबार की सुर्खियां प...

[1:06]Section 2

ज़्वाननबर्ग से पाकिस्तानी प्रधानमंत्री के लिए ख़त आना एक अजीब सी बात थी। ज़्वाननबर्ग तो बस एम्सटर्डम का एक छोटा सा क़स्बा था जहां से हर वक्त...

[5:10]Section 3

पाकिस्तानी प्रधानमंत्री को यह ख़त मौसूल होने का इससे ज्यादा अच्छा वक्त नहीं हो सकता था। On the 138th day of the year at 02 hours 38 minut...

[7:54]Section 4

Bhutto ki UN Security Council ki taqreer हम सबको आज भी उनकी दलेरी की याद दिलाती रहती है। Yesterday my 11-year-old son telephoned me from...

[11:06]Section 5

जो रुके तो कोहे गरां थे हम जो चले तो जहां से गुजर गए राहे यार हमने कदम कदम तुझे यादगार बना दिया

Pull quotes
[1:06]उनकी कहानियां क्या थीं जिनकी बदौलत पाकिस्तान उन मुल्कों के सफ में खड़ा हो गया जिनसे टक्कर लेने का कोई सोच भी नहीं सकता।
[7:54]Bhutto ki UN Security Council ki taqreer हम सबको आज भी उनकी दलेरी की याद दिलाती रहती है। Yesterday my 11-year-old son telephoned me from Karachi and he said to me, "Do not come back with a document of surrender.
[7:54]We do not want to see you back in Pakistan if you come like that." I will not take back a document of surrender from the Security Council.
[7:54]So, the Security Council has acted shortsightedly by acquiescing to the dilatory tactics.
Use this transcript
Related transcript hubs

[0:11]जुलाई 1974 का दिन है। पाकिस्तान में गर्मी अपने उरूज पर है। इस्लामाबाद में प्रधानमंत्री के सचिवालय का एक अफसर सुबह के अखबार की सुर्खियां पढ़ने में मसरूफ है। कि एक क्लर्क दरवाजा खटखटाकर अंदर आ गया। सर ब्रुसेल्स की एम्बेसी से प्रधानमंत्री के लिए एक ख़त आया है। यह कहकर क्लर्क वह ख़त अफसर के मेज पर रख कर चला गया। इस अफसर ने अपने सामने पड़े इस ख़त को देखा और शशोपंज में मुब्तला हो गया। इस ख़त का लिफाफा बैनुल अकवामी डाक वाला था और उस पर लगी उड़ती फाखता की दो मोहरें इस अफसर को कश्मकश में डाले हुई थीं। उस लिफाफे पर ख़त भेजने वाले का पता भी लिखा हुआ था। वह पता था 71 एमस्टल स्ट्रीट ज़्वाननबर्ग।

[1:06]ज़्वाननबर्ग से पाकिस्तानी प्रधानमंत्री के लिए ख़त आना एक अजीब सी बात थी। ज़्वाननबर्ग तो बस एम्सटर्डम का एक छोटा सा क़स्बा था जहां से हर वक्त शिफोल के एयरपोर्ट से उड़ते जहाज़ों का शोर सुनाई देता रहता था। प्रधानमंत्री के सेक्रेटेरियट तक पहुंचने से पहले यह ख़त आईएसआई और प्रधानमंत्री के सिक्योरिटी स्टाफ ने पढ़कर खंगाल लिया था। ख़त के साथ लगे सिक्योरिटी क्लियरेंस की हिदायत के मुताबिक इस ख़त को प्रधानमंत्री के डेस्क पर पहुंचा दिया गया। ख़त के शुरू में ख़त नवीस ने लिखा था कि वो एक पाकिस्तानी है जो आला तालीम हासिल करने के लिए मुल्क से बाहर गया था। यूरोप में पढ़ लिखकर वह दोबारा पाकिस्तान वापस आया लेकिन हजारों कोशिशें करने के बावजूद भी पाकिस्तान में कोई उसकी ख़िदमात का फायदा नहीं उठा सका। इसी वजह से वह शख्स मायूस होकर दोबारा पाकिस्तान से यूरोप चला गया। अमूमन प्रधानमंत्री के स्टाफ को रोजाना ऐसे बहुत से ख़त मौसूल होते थे। लेकिन इस ख़त में कुछ ख़ास था। ख़त नवीस ने लिखा था कि वह एक फिज़िसिस्ट यानी माहिर तबियात है जो यूरोप में क़ायम एक ऐसे इदारे में काम कर रहा है जो न्यूक्लियर एनर्जी यानी जोहरी तवानी पर रिसर्च करती है। ख़त नवीस ने लिखा कि इस इदारे में काम के दौरान उसके हाथ कुछ इंतेहाई दर्जा बंद यानी टॉप सीक्रेट दस्तावेज़ लगे हैं। और इन दस्तावेज़ में वह नया इंकलाबी तरीका है जो पाकिस्तान के प्रधानमंत्री का वह देरीना ख़्वाब पूरा कर सकता था जो वह बरसों से देख रहे थे। वह ख्वाब था पाकिस्तान का अपना एटम बम। और इस ख़त नवीस का नाम था अब्दुल क़दीर खान। पाकिस्तान के न्यूक्लियर बम की इस कहानी में मैं नौख़ेज़ सलीम आप सबको खुशा मदीद कहता हूं। पाकिस्तान जो फिलहाल तीसरी दुनिया का एक मुल्क है कि आलमी मैदान में अहम होने की वजह क्या है? क्या वह हमारा जुग़राफिया है? हमारा एक इस्लामी मुल्क होना है? पाक चाइना ताल्लुकात हैं? सीपेक गवादर। इन सब चीजों के हक और खिलाफ में हर कोई बहस करता है मगर सिर्फ एक खासियत ऐसी है जिस पर दुनिया का हर शख्स दोस्त या दुश्मन मुत्तफिक है। और वह है पाकिस्तान का एक न्यूक्लियर ताकत होना। 28 मई 1998 को पाकिस्तानी साइज़दानों ने पांच धमाके करके पूरे मुल्क का सर फख्र से बुलंद कर दिया था। यह धमाके इंडिया के धमाकों के 17 दिन के अंदर-अंदर करके पाकिस्तान ने पूरी दुनिया को हैरान कर छोड़ा था। लेकिन सवाल यह है कि तीसरी दुनिया का एक पसमांदा मुल्क जहरी बम जैसी खुफ़िया और जदीद टेक्नोलॉजी कैसे हासिल कर पाया? और इस सवाल का जवाब है 28 साल की वह मुसलसल जद्दोजहद जो इस वीडियो सीरीज के ज़रिए मैं पाकिस्तानी कौम को याद दिलाना चाहता हूं। मैं याद दिलाना चाहता हूं कि कैसे पाकिस्तानी साइज़दानों, सियासतदानों, ब्यूरोक्रेसी, फौज और आईएसआई ने दुनिया की सबसे बड़ी ताकतों से लड़कर हमें एक जोहरी ताकत बनाया। वह बेनाम मुजाहिद कौन थे? उनकी कहानियां क्या थीं जिनकी बदौलत पाकिस्तान उन मुल्कों के सफ में खड़ा हो गया जिनसे टक्कर लेने का कोई सोच भी नहीं सकता।

[5:10]पाकिस्तानी प्रधानमंत्री को यह ख़त मौसूल होने का इससे ज्यादा अच्छा वक्त नहीं हो सकता था। On the 138th day of the year at 02 hours 38 minutes 20 seconds Greenwich Mean Time, corresponding to 8 hours 8 minutes 20 seconds in the morning Indian Standard Time, the graph went haywire. वह इसलिए कि 2 महीने पहले ही 18 मई 1974 को इंडिया ने राजस्थान के मग़रिबी रेगिस्तानों में एक कामयाब जोहरी बम का पहला टेस्ट किया था। जी हां, इंडिया ने अपना पहला न्यूक्लियर टेस्ट 1974 में कर लिया था। इंडिया के इस धमाके ने पूरी दुनिया की ताकतों को हिला के रख दिया था। हैरानी से नहीं गुस्से से। सीआईए की उस ज़माने की रिपोर्ट्स पढ़ें तो पता चलता है कि आलमी ताकतों को पहले से ही इंडिया के न्यूक्लियर प्रोग्राम का अंदाज़ा था। इंडिया के इस जोहरी तजुर्बे की वजह से दुनिया की सारी बड़ी एटमी ताकतें इंडिया से नाराज हो गई थीं। इन मुल्कों में अमेरिका, बर्तानिया, फ्रांस, चाइना और सोवियत यूनियन थे। यह मुल्क इंडिया से इसलिए नाराज हुए कि इंडिया ने इन मुल्कों से जोहरी टेक्नोलॉजी सिर्फ बिजली बनाने का कह कर ली थी। मगर फिर इन सब मुल्कों को एतमाद में रख के जोहरी तजुर्बा कर डाला था। और इस पर इंडियन आवाम बहुत खुश थी। हम पाकिस्तानियों के लिए तो यह एक बहुत बड़ा धचका था। आप मानें या न मानें उस वक्त हमारी सबसे बड़ी खुश्किस्मती यह थी कि हमारे पास जुल्फिकार अली भुट्टो जैसे लीडर थे।

[7:54]Bhutto ki UN Security Council ki taqreer हम सबको आज भी उनकी दलेरी की याद दिलाती रहती है। Yesterday my 11-year-old son telephoned me from Karachi and he said to me, "Do not come back with a document of surrender. We do not want to see you back in Pakistan if you come like that." I will not take back a document of surrender from the Security Council. I will not be a party to the legalization of aggression. The Security Council has failed miserably, shamefully. For four days we have deliberated here. For four days the Security Council has procrastinated. Why? Because the object was for Dacca to fall. That was the object. It was quite clear to me from the beginning. All right, so what if Dacca falls? So what if the whole of East Pakistan falls? So what if the whole of West Pakistan falls? So what if we are obliterated? We will build a new Pakistan. We will build a better Pakistan. We will build a greater Pakistan. So, the Security Council has acted shortsightedly by acquiescing to the dilatory tactics. You know! You have come to a point when we'll say, "Do what you like." If before you had come to this point, we could have made a commitment. We could have said, "All right, we are prepared to do some things." Now why should we? You want us to silence us by guns. Silence our voices by arms. So, why should we say that we are agreeing to anything? Now you decide what you like. Your decision will not be binding on us. You can decide what you like. You can do because if you had left us a margin of hope. We might have been a party to some settlement.

[11:06]जो रुके तो कोहे गरां थे हम जो चले तो जहां से गुजर गए राहे यार हमने कदम कदम तुझे यादगार बना दिया

Need another transcript?

Paste any YouTube URL to get a clean transcript in seconds.

Get a Transcript