[0:00]एक बार राधा रानी ने कान्हा से विनोद में पूछा कान्हा तुम हमेशा इस मोर पंख को अपने मस्तक पर धारण क्यों किए रहते हो क्या यह तुम्हें बहुत प्रिय है
[0:10]कान्हा मुस्कुराए और बोले राधे यह मोर पंख मेरा श्रृंगार नहीं मेरा स्मरण है
[0:17]राधा रानी को विश्वास नहीं हुआ उन्होंने कहा यह तो निर्जीव है यह भला कैसे तुम्हारा स्मरण हो सकता है
[0:23]कान्हा ने धीरे से अपने मस्तक से मोर पंख उतारा और राधा जी के कान के पास ले गए
[0:29]जैसे ही वह मोर पंख राधा रानी के कान के समीप पहुंचा उसमें से एक अत्यंत सूक्ष्म और मधुर ध्वनि आने लगी
[0:36]राधे राधे राधे
[0:41]राधा रानी चकित रह गई उस निर्जीव पंख के रोम रोम से केवल राधा नाम की ही झंकार निकल रही थी
[0:49]कान्हा ने बताया राधे जब तुमने वन में नृत्य किया था तब एक मोर ने अपने प्राण तुम्हारे चरणों में न्योछावर कर दिए थे
[0:58]मैंने उस मोर की भक्ति को अमर करने के लिए उसका पंख अपने शीर्ष पर सजा लिया अब यह पंख 24 घंटे तुम्हारा ही नाम जपता रहता है
[1:06]राधा रानी की आंखों से प्रेम अश्रुओं की धारा बह निकली उन्होंने वह मोर पंख वापस कान्हा के मस्तक पर सजा दिया और बोली
[1:15]कान्हा अब मैं समझी तुम दुनिया को अपना संगीत सुनाते हो पर खुद तो बस मेरे नाम के ही धुन में रमे रहते हो राधे राधे



