Thumbnail for How A Poor Boy Built ₹15,000 Crore Hotel Empire by Shivanshu Agrawal

How A Poor Boy Built ₹15,000 Crore Hotel Empire

Shivanshu Agrawal

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[0:00]आज से करीब 100 साल पहले एक 7 साल का लड़का मैसूर पैलेस के सामने खड़ा था। वह सिर्फ एक बार पैलेस को अंदर से देखना चाहता था। लेकिन एक तरफ जहां वह पैलेस राजघराने के लिए था, वहीं वो लड़का एक मामूली से प्यून का बेटा था। इसीलिए उसकी यह ख्वाहिश पूरी ना हो सकी। लेकिन उस समय किसी को अंदाजा तक नहीं था कि आगे चलकर यही लड़का मैसूर के इसी पैलेस से इंस्पायर्ड होकर खुद का पैलेस होटल बनाएगा। और केवल एक पैलेस होटल ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया की बेस्ट होटल चेन खड़ी कर देगा। यह कहानी है द लीला होटल्स की। साल 1922 केरला के कन्नूर शहर के पास एक छोटे से गांव में एक टूटी-फूटी झोपड़ी में जन्म होता है कृष्णन नायर का। उनके फादर एक गवर्नमेंट प्यून थे और मदर कोकोनट से ऑइल निकालकर बेचा करती थीं, जिस कारण उनके हाथों में छाले पड़ चुके थे। फैमिली के हालत देखते हुए कृष्णन को बचपन में ही एजुकेशन की इंपॉर्टेंस समझ आ चुकी थी। इसीलिए उन्होंने स्कूल को अपना मंदिर बना लिया। संस्कृत से लेकर साइंस तक सभी कॉन्सेप्ट्स में खुद को डुबा दिया। लकीली जब उनके एक्सेप्शनल डेडिकेशन और टैलेंट के बारे में वहां के राजा को पता चला तो उन्होंने डिक्लेयर कर दिया कि कृष्णन की हायर एजुकेशन का पूरा खर्चा वो उठाएंगे। इसी सपोर्ट के चलते कृष्णन ने आगे चलकर मद्रास के गवर्नमेंट आर्ट्स कॉलेज में एडमिशन ले लिया। उनका सपना था कॉलेज कंप्लीट करके एक रिस्पेक्टेबल नौकरी करना, लेकिन उन्हें किस्मत का साथ नहीं मिला। उनकी फैमिली अभी भी फाइनेंशियली स्ट्रगल कर रही थी। पेरेंट्स की एज हो रही थी और उन्हें जल्द से जल्द कृष्णन का सपोर्ट चाहिए था। इसीलिए 1942 में कृष्णन ने 20 साल की उम्र में कॉलेज को बीच में ही छोड़ दिया और ब्रिटिश इंडियन आर्मी में नौकरी ले ली। उन्हें सिविलियन वायरलेस ऑफिसर के तौर पे अबोटाबाद की बर्फीली पहाड़ियों में पोस्टिंग मिली। यहां उनका काम था एलाइड आर्मी के क्रिप्टिक मैसेजेस को सुनना और उन्हें डिकोड करके हेडक्वार्टर्स भेजना। कृष्णन को अपनी लाइफ में पहली बार चीजें सेटल होती हुई दिख रही थी। वो फैमिली को फाइनेंशियली सपोर्ट भी कर पा रहे थे, लेकिन तभी एक बहुत बड़ी ट्रेजेडी हो जाती है। केरला में एक फेमाइन, एक अकाल आ जाता है, जिसमें करीब 40,000 लोगों की जान जाने वाली थी। एक तरफ कृष्णन को आर्मी बेस में तीन टाइम का खाना मिलना गारंटीड था, तो वहीं उनके गांव के लोग उनके बचपन के दोस्त भूख से दम तोड़ रहे थे। उनके लिए यह बात अनएक्सेप्टेबल थी। इसीलिए उन्होंने जॉब क्विट कर दी और लोगों की मदद करने केरला वापस लौट आए। उन्होंने इमीडिएटली गवर्नमेंट के सिविल सप्लाइज डिपार्टमेंट को जॉइन कर लिया, जहां उन्हें राइस, शुगर और केरोसिन जैसे एसेंशियल्स को आम जनता तक पहुंचाने का इंचार्ज बना दिया गया। बहुत जल्द उन्हें रियलाइज हुआ कि पूरा सिस्टम करप्ट ऑफिशियल्स और डीलर्स से भरा हुआ है, जिस कारण खाना लोगों तक नहीं बल्कि ब्लैक मार्केट में पहुंच रहा था। लेकिन कृष्णन ने चार्ज लेते ही यह सब एक झटके में ही रोक दिया। वो डिपार्टमेंट से निकलने वाले एक-एक दाने का हिसाब रखने लगे और करप्ट डीलर्स को ब्लैकलिस्ट कर दिया। बहुत जल्द पूरे कन्नूर में उनकी ईमानदारी की चर्चा होने लगी और वह एक लोकल हीरो बन गए। सिचुएशन कंट्रोल होते ही कृष्णन ने दोबारा आर्मी जॉइन करने का डिसीजन लिया और इस बार उनका सिलेक्शन हुआ शॉर्ट कमीशन ऑफिसर के तौर पे, जो एक रियल कॉम्बैट रोल था। उन्हें मराठा लाइट इन्फेंट्री में असाइन किया गया और कुछ ही साल में वो कैप्टन की रैंक तक पहुंच गए और तभी उनकी लाइफ में एक मेजर टर्निंग पॉइंट आया। कन्नूर के सबसे रिस्पेक्टेड बिजनेसमैन ए के नायर कई सालों से कृष्णन को ऑब्जर्व कर रहे थे। फेमाइन के दौरान उनके काम और उनके बेहतरीन आर्मी करियर से वो काफी इंप्रेस्ड थे। इसीलिए उन्होंने अपनी बेटी की शादी कृष्णन से करने का डिसाइड कर लिया। दोनों साइड्स के एग्रीमेंट के बाद 1950 में उनकी शादी हो गई। ए के नायर की बेटी और कृष्णन की वाइफ का नाम था लीला। वही लीला जिसके नाम पे कृष्णन एक दिन दुनिया का बेस्ट होटल ब्रांड बनाने वाले थे। जहां दूसरे लोग कृष्णन में एक सक्सेसफुल आर्मी ऑफिसर देख रहे थे, वहीं लीला ने एक ऐसा लीडर देखा जो खुद का बिजनेस एंपायर बना सकता था। इसीलिए 1952 में उन्होंने कृष्णन को आर्मी क्विट करने के लिए कन्विंस कर लिया। लीला के फादर कन्नूर में राजेश्वरी मिल्स चलाते थे, जहां हाई क्वालिटी फैब्रिक्स बनते थे। कृष्णन ने डिसाइड किया कि वो इसी मिल के लिए एक सेल्स एजेंट बनेंगे। उनका काम था कन्नूर से फैब्रिक के सैंपल्स उठाना और बॉम्बे के मुलजी जैठा मार्केट में शॉप टू शॉप जाकर ऑर्डर्स लेना, जिसके बदले उन्हें एक कमीशन मिलता था। रातों-रात वो एक रिस्पेक्टेड आर्मी ऑफिसर से गली-गली भटकने वाले एक सेल्स एजेंट बन गए थे। पीठ पीछे लोग उनके ऊपर हंसते थे, लेकिन उन्हें कोई अंदाजा नहीं था कि कृष्णन केवल फैब्रिक्स नहीं बेच रहे थे। वो साइलेंटली इस बिजनेस को मास्टर कर रहे थे। 1958 में कृष्णन ने तमिलनाडु में एक यूनिक फैब्रिक डिस्कवर किया, एक लाइटवेट और ब्रीदेबल कॉटन फैब्रिक जिसे केवल नेचुरल इंग्रेडिएंट्स जैसे इंडिगो, टर्मरिक और सेसमे ऑइल से डाई किया जाता था। जिस कारण इसके कलर्स काफी वाइब्रेंट थे और सेंट एकदम नेचुरल थी। लेकिन इस कपड़े में एक बहुत बड़ी प्रॉब्लम थी। इसे वॉश करने पर इसके अलग-अलग कलर्स ब्लीड करके एक-दूसरे में मिक्स हो जाते थे। लेकिन कृष्णन ने इसी प्रॉब्लम को एक एडवांटेज में बदल दिया। उन्होंने इस फैब्रिक को अमेरिकन इंपोर्टर्स को पिच किया और कहा कि हर वॉश के साथ इस कपड़े के कलर्स ब्लीड करके एक-दूसरे में मिक्स हो जाएंगे। और एक नया पैटर्न बना देंगे। मतलब कस्टमर तो एक गारमेंट के लिए पे करेगा, लेकिन हर वॉश के बाद उसे एक न्यू लुकिंग गारमेंट मिल जाएगा। अमेरिका में इस फैब्रिक से जैकेट, शर्ट्स और शॉर्ट्स बनाकर बेची गई और क्योंकि ये मद्रास से था तो इसका नाम पड़ा ब्लीडिंग मद्रास। लोगों को ये कपड़े इतने पसंद आए कि एक ही हफ्ते में ना केवल पहला लॉट आउट ऑफ स्टॉक हो गया बल्कि यह अमेरिका में एक फैशन सेंसेशन बन गया, जिसके बाद कृष्णन के पास ऑर्डर्स की लाइन लग गई और यह उनके लिए एक बहुत बड़ी सक्सेस बन गया। लेकिन कृष्णन को एक बात खटक रही थी। वो अभी भी केवल एक मिडलमैन थे और अब उनका एक स्ट्रांग डिजायर था कि इंडिया में अपना खुद का फिनिश प्रोडक्ट मैन्युफैक्चर करें। तभी लंदन की एक ट्रिप के दौरान उनकी वाइफ लीला ने स्कॉटिश लेस को कर्टेन्स, टेबल लिनन और ड्रेसेस में यूज होते देखा और उन्होंने कृष्णन को इसी लेस को इंडिया में मैन्युफैक्चर करने का आइडिया दिया। लेकिन इसे मैन्युफैक्चर करना आसान नहीं था। इसे बनाने के लिए सोफिस्टिकेटेड स्कॉटिश मशीन्स, मैसिव कैपिटल और स्किल्ड लेबर चाहिए था। लेकिन कृष्णन ने समहाउ यह सब मैनेज कर लिया और 1964 में मुंबई में स्टार्ट हुआ लीला स्कॉटिश लेस। इंडिया का पहला लेस मैन्युफैक्चरिंग यूनिट। बिजनेस को इमीडिएट सक्सेस मिली। मिस इंडिया मेहर मिस्त्री ने उनके लेसेस से बने ड्रेस को ऑन स्टेज पहना। बॉलीवुड के बिगेस्ट स्टार राजेश खन्ना ने उनका कुर्ता अपने बर्थडे में पहना और पूरे इंडिया में उनका ब्रांड लग्जरी का सिनोनिम बन गया। अगले 15 सालों में कृष्णन के बिजनेस ने एक्सपोनेंशियल ग्रोथ देखी और फिर एक दिन सब कुछ कोलैप्स हो गया। 1979 में फैक्ट्री की कई मशीनें एक साथ ब्रेकडाउन हो गई। स्कॉटलैंड से स्पेयर पार्ट्स मंगवा के इन्हें रिपेयर किया जा सकता था। लेकिन इंडिया के ऑनगोइंग फॉरेन करेंसी क्राइसिस के चलते गवर्नमेंट ने इस इंपोर्ट पे रोक लगा दी। एज अ रिजल्ट प्रोडक्शन बंद हो गया, ऑर्डर्स कैंसिल हो गए और कृष्णन ने जो एक्सपेंशन और रॉ मटेरियल्स खरीदने में पैसे इन्वेस्ट किए थे वो सब डूब गए। 57 की एज में कृष्णन की वर्थ ज़ीरो नहीं नेगेटिव हो चुकी थी। डेट चुकाने के लिए उनके मुंबई का घर बिकने पे आ गया था। मतलब सर्वाइवल के लिए उन्हें जल्द से जल्द कुछ करना था। लकीली इसी दौरान उन्हें एक फ्लाइट में राजेंद्र सिंह मिल गए। राजेंद्र एक बिजनेसमैन थे जो अमेरिकन ब्रांड्स के लिए इंडिया में रेडीमेड गारमेंट्स की मैन्युफैक्चरिंग सेटअप करना चाहते थे। उस समय अमेरिकन फैशन में कैजुअल और कंफर्टेबल क्लोथिंग का ट्रेंड चल रहा था और उन्हें तलाश थी एक ऐसे इंडियन सप्लायर की जो ऐसे ही कपड़े बना सके। उनके क्लाइंट्स दो हफ्तों के अंदर-अंदर सैंपल्स देखने इंडिया आने वाले थे। इसीलिए उन्होंने कृष्णन को ऑफर किया कि अगर वो तब तक उनकी रिक्वायरमेंट्स के अकॉर्डिंग सैंपल्स रेडी कर लेते हैं तो वो उन्हें एक्सक्लूसिव ऑर्डर्स दिलवा देंगे। कृष्णन तुरंत काम पे लग गए। उन्होंने कुछ पैसे अरेंज किए और बंद होती हुई एक फैक्ट्री से इंपोर्टेड सुईंग मशीन सस्ते दाम में खरीद ली और अपनी बंद हो चुकी फैक्ट्री में ही एक छोटा सा सेटअप किया। लेकिन यहां कृष्णन का असली मास्टर स्ट्रोक था उनका फैब्रिक का सिलेक्शन। अमेरिकन मार्केट की रिक्वायरमेंट्स को समझते हुए उन्होंने सैंपल्स बनाने के लिए चुना चीज़ क्लॉथ को। एक ऐसा सॉफ्ट और एयरी फैब्रिक जो कैजुअल वियर के लिए परफेक्ट था। लेकिन साथ ही यह बेहद वर्सेटाइल था। इसे इसके नेचुरल ऑफ वाइट कलर में यूज किया जा सकता था या फिर किसी भी कलर में डाई किया जा सकता था या फिर स्ट्राइप्स या चेक पैटर्न में भी वीव किया जा सकता था। कृष्णन ने फैब्रिक सोर्स किया, दिन रात मशीनों को काम पे लगाया और टाइम रहते सैंपल्स रेडी कर लिए। जब क्लाइंट ने सैंपल्स को देखा तो वो डिलाइटेड थे। उन्होंने इस नई क्लोथिंग को नाम दिया निर्वाणा और कृष्णन को फाइनली एक्सक्लूसिव ऑर्डर्स मिल गए। अगले 12 महीनों में कृष्णन ने ना केवल अपने सारे लोंस चुका दिए बल्कि प्रॉफिटेबल भी बन गए। अगले कुछ सालों में वो कई और अमेरिकन ब्रांड्स जैसे लिज़ क्लेबोर्न, केल्विन क्लेन और जॉर्डे के लिए भी गारमेंट्स बनाने लगे। ग्रोथ इतनी तेज हुई कि 1980s तक लीला स्कॉटिश लेस यूएस को रेडीमेड गारमेंट सप्लाई करने वाला इंडिया का लार्जेस्ट एक्सपोर्टर बन गया। 1983 तक कृष्णन की एज थी 61 और वो ऑलरेडी एक सक्सेसफुल बिजनेस एंपायर के मालिक थे। ऐसे में कोई और होता तो रिटायरमेंट की सोचता, लेकिन उनके लिए तो ये केवल शुरुआत थी। सालों पहले वो अपनी एक बिजनेस ट्रिप पे न्यूयॉर्क के वॉल्डोर्फ अस्टोरिया नाम के होटल में रुके थे, जो पूरी दुनिया का वन ऑफ द मोस्ट लग्जीरियस होटल है। होटल का खुद का प्राइवेट रेलवे प्लेटफार्म था जहां लोग अपनी प्राइवेट रेल कार से आ सकते थे। खुद का पावर प्लांट था और रॉयल इंटीरियर्स थे। इसी होटल से इंस्पायर होकर कृष्णन ने सपना देखा इंडिया में एक वर्ल्ड क्लास होटल एंपायर बनाने का और अब वो इसी सपने को पूरा करने निकल पड़े। उन्होंने देखा कि नॉर्थ बॉम्बे में सहार इंटरनेशनल एयरपोर्ट डेवलप हो रहा है, जिसे आज हम छत्रपति शिवाजी महाराज इंटरनेशनल एयरपोर्ट के नाम से जानते हैं। अब एयरपोर्ट तो बन रहा था लेकिन आसपास एक भी लग्जरी होटल नहीं था। दोनों ताज और ओबेरॉय होटल साउथ बॉम्बे में थे। ऑल्सो एयरपोर्ट के पास जनरली सस्ते होटल्स खुलते थे। इंडस्ट्री का मानना था कि एयरपोर्ट होटल्स केवल उन लोगों के लिए है, जो अपनी फ्लाइट से पहले कुछ घंटों के लिए सस्ते में कहीं रुकना चाहते हैं। लेकिन कृष्णन ने देखा कि सिंस मुंबई इंडिया का फाइनेंशियल कैपिटल है, तो बड़े-बड़े बिजनेसमैन, सेलिब्रिटीज और वीआईपी इसी होटल से आएंगे और उन्हें नियर बाय एक लग्जरी होटल चाहिए होगा। और इसी आइडिया के साथ उन्होंने एक नई कंपनी बनाई। होटल लीला वेंचर्स लिमिटेड। उन्होंने फंड रेज किया। एयरपोर्ट के पास 13 एकड़ की लैंड एक्वायर की और कंस्ट्रक्शन शुरू किया। 250 कमरों का यह होटल मैसिव ग्रीन गार्डन्स के बीचो-बीच बनने वाला था और लग्जीरियस इंटीरियर्स बनाने के लिए लंदन बेस्ड इंटीरियर डिजाइनर फ्रैंक सोलानो को हायर किया गया था। काम इतनी तेजी से हुआ कि एक ही साल में चार फ्लोर्स कंस्ट्रक्ट हो चुके थे कि तभी कहानी में एक ट्विस्ट आता है। इंडियन एक्सप्रेस के फ्रंट पेज में खबर छपती है, ये क्लेम करते हुए कि लीला होटल के कंस्ट्रक्शन के लिए 19 रूल्स को तोड़ा जा रहा था और ये होटल अपनी ज्यादा हाइट के कारण फ्लाइट्स के पाथ को इंटरफेयर करेगा। खबर छपने के बाद ऑपोजिशन लीडर्स ने ऑब्जेक्ट किया, कंस्ट्रक्शन रुकवा दिया गया और एक इंक्वायरी बैठ गई। महीनों तक कंस्ट्रक्शन रुका रहा और प्रोजेक्ट का कॉस्ट बढ़ता चला गया। कृष्णन हार्टब्रोकन थे क्योंकि उन्हें पता था कि प्रोजेक्ट ने कोई रूल्स नहीं तोड़े हैं। फाइनली पीएम राजीव गांधी ने खुद एक ऑफिशियल को साइट इंस्पेक्शन में भेजा, जिसमें पता चला कि सारे एलिगेशंस कंप्लीटली बेसलेस हैं और इसी के बाद फाइनली कंस्ट्रक्शन रिज्यूम हुआ। 12th अक्टूबर 1986 को वो दिन आया। द लीला मुंबई ने गेस्ट के लिए अपने दरवाजों को खोला। यह केवल एक एयरपोर्ट होटल नहीं था। यह एक महल था। मार्बल फ्लोर्स, क्रिस्टल शैंडलियर्स और हर कोने में एक्सपेंसिव आर्ट पीसेस थे। स्टाफ को ऐसी ट्रेनिंग मिली थी कि वो गेस्ट की नीड्स को उनके बोलने से पहले ही एंटीसिपेट कर लें। जैसे एक बार होटल के गार्डनर ने कुछ नोटिस किया। एक गेस्ट गार्डन में गिरे हुए प्लमेरिया फ्लावर्स को उठा रहे थे। अगले दिन जब वो गेस्ट नीचे आए तो स्टाफ ने उन्हें प्लमेरिया फ्लावर से भरा हुआ पूरा बोल गिफ्ट किया, जिस कारण वो गेस्ट डिलाइटेड फील करने लगे और लाइफ टाइम के लिए लीला के कस्टमर बन गए। लीला मुंबई का सबसे बड़ा एडवांटेज था कि ज्यादातर इंटरनेशनल फ्लाइट्स का अराइवल और डिपार्चर टाइम रात 12:00 बजे के अराउंड था। मतलब इंडिया से बाहर जाने वाले ट्रैवलर्स फ्लाइट लेने के लिए रात के 10-11:00 बजे ही लीला से चेकआउट कर देते थे। जबकि रियल चेकआउट टाइम तो अगले दिन दोपहर में था। फिर उसी फ्लाइट से जो पैसेंजर इंडिया आया था वो लीला में चेक इन कर लेता था। मतलब एक दिन में एक रूम से लीला को दो बार रेंट मिलता था। ओपनिंग होते ही लीला मुंबई हाई नेटवर्थ इंडिविजुअल्स के लिए गो टू होटल बन गया। ऑल्सो क्योंकि फिल्म सिटी नॉर्थ मुंबई में थी तो बॉलीवुड के स्टार्स, डायरेक्टर्स और प्रोड्यूसर्स के लिए भी लीला फर्स्ट चॉइस बन गया और इसी तरह कृष्णन का पहला होटल ही एक मैसिव सक्सेस बन चुका था। मुंबई की सक्सेस के बाद अब बारी थी बैंगलोर फतेह करने की। बचपन में कृष्णन मैसूर पैलेस के अंदर जाने की सोच भी नहीं सकते थे और आज 65 साल बाद उसी कृष्णन ने डिसाइड किया कि वो उसी मैसूर पैलेस से इंस्पायर्ड एक पैलेस होटल बनाएंगे। 1990s में बैंगलोर में आईटी बूम चल रहा था। इंफोसिस, विप्रो, आईबीएम और ओरेकल जैसी कंपनीज ऑफिसेस खोल रही थी। इन्हीं कंपनीज के टॉप एग्जीक्यूटिव्स, फॉरेन क्लाइंट्स और बिजनेस ट्रैवलर्स को प्रीमियम एकोमोडेशन नीडेड था। मार्केट बहुत बड़ा था लेकिन कॉम्पिटिशन भी कम नहीं था। 106 रूम्स के साथ ताज वेस्ट एंड होटल और 120 रूम के साथ दी ओबेरॉय होटल ऑलरेडी इस्टैब्लिश्ड थे। इसीलिए कृष्णन ने कुछ ऐसा करने का डिसाइड किया जिसने मार्केट को हिला के रख दिया। उन्होंने अनाउंस किया कि वो 256 रूम्स के साथ एक होटल बनाएंगे जो ताज और ओबेरॉय के कंबाइंड साइज से भी ज्यादा था। इससे हुआ ये कि होटल शुरू होने से पहले ही लीला पैलेस होटल को बैंगलोर के लार्जेस्ट लग्जरी होटल की ब्रांडिंग मिल गई। विजन तो अच्छा था लेकिन एग्जीक्यूशन के दौरान कुछ ऐसा हुआ जिसने पूरी कंपनी को मुसीबत में डाल दिया। इतने कॉम्प्लिकेटेड प्रोजेक्ट होने के कारण कंस्ट्रक्शन डिले होता गया और इसे फंड करने के लिए जो डेट लिया था उसे वापस लौटाने का टाइम आ गया। एग्जिस्टिंग होटल्स की इनकम इतनी नहीं थी कि उससे ये लोन चुकाया जा सके। मतलब कंपनी एसेंशियली बैंकक्रप्ट हो चुकी थी। यह प्रोजेक्ट इतना बड़ा और कॉम्प्लिकेटेड था कि इसे ट्रैक करना ऑलमोस्ट इंपॉसिबल हो गया और ये एक मेन कारण बना जिसके कारण टाइमलाइनस पुश होती चली गई। इनफैक्ट ज्यादातर इंडियन बिजनेसमैन सेम प्रॉब्लम फेस करते हैं। उनके पास टास्क असाइन करने का और प्रोग्रेस ट्रैक करने का कोई प्रॉपर सिस्टम ही नहीं होता, जिस कारण टीम को एग्जैक्टली पता ही नहीं होता कि किसे क्या करना है और कब तक करना है। और बिजनेस ओनर को हर छोटी-छोटी चीज के लिए अलग-अलग लोगों से फॉलोअप करना पड़ता है। जब क्लैरिटी नहीं होती तो डेडलाइन मिस होती है और प्रोडक्टिविटी भी कम होती है। इसी प्रॉब्लम को सॉल्व करता है ओडू का प्रोजेक्ट ऐप, जिसमें आप और आपकी पूरी टीम एक ही प्लेटफार्म पे होती है। आपके बिजनेस का हर प्रोजेक्ट यहां एक जगह दिखता है। हर प्रोजेक्ट को ट्रैक करने के लिए यहां अलग-अलग स्टेजेस होती हैं जैसे न्यू इन प्रोग्रेस, रिव्यू या कंप्लीटेड। इन स्टेजेस को भी आप अपने काम के अकॉर्डिंग कस्टमाइज कर सकते हो। हर प्रोजेक्ट के अंदर आप टास्क क्रिएट करते हो और हर टास्क को एक डेडलाइन के साथ एक स्पेसिफिक टीम मेंबर को असाइन करते हो। जैसे-जैसे काम आगे बढ़ता है आपकी टीम प्रोग्रेस अपडेट करती रहती है। मतलब अब अपडेट के लिए किसी को बार-बार कॉल करने की जरूरत नहीं है। सिंपली प्रोजेक्ट ऐप खोलो और जवाब सामने होगा। ऑल्सो प्रोजेक्ट्स को मैनेज करने के लिए तीन अलग-अलग व्यूज अवेलेबल हैं। कंबन व्यू में टास्क स्टिकी नोट्स की तरह दिखते हैं। टाइमलाइन व्यू में हर टास्क, हर डेडलाइन एक क्लीन टाइमलाइन पे दिखती है और लिस्ट व्यू में सब कुछ एक सिंपल टेबल में होता है। साथ में यह ऐप आपके टीम के वर्किंग आवर्स को भी ऑटोमैटिकली ट्रैक करता है बिल्ट-इन टाइमशीट्स के थ्रू। ओडू का फर्स्ट ऐप लाइफटाइम के लिए फ्री है। सो ट्राई इट नाउ। लिंक नीचे डिस्क्रिप्शन और पिन कमेंट में है। अब वीडियो पे वापस आते हैं। कंपनी को बैंकक्रप्सी से बचाने के लिए कृष्णन ने अपनी सालों तक डेवलप की सेल्स स्किल्स का यूज किया। उन्होंने एचडीएफसी बैंक के चेयरमैन दीपक पारेख के साथ एक मीटिंग अरेंज की और बैंगलोर प्रोजेक्ट के विजन को कॉन्फिडेंस के साथ पिच किया। दीपक पारेख कन्विंस हो गए और उन्होंने इमरजेंसी फंडिंग को मंजूरी दे दी। लेकिन यह फंडिंग इतनी नहीं थी कि पूरे होटल को कंप्लीट किया जा सके। इसीलिए कृष्णन ने इस होटल को फेजेस में बनाया। फेज वन में वेस्ट विंग बना, मतलब पहले केवल 90 रूम्स, लॉबी और सिट्रस रेस्टोरेंट बना और उसे गेस्ट के लिए खोल दिया गया, जिससे रेवेन्यू आना शुरू हो गया। ऐसे ही एक-एक करके पूरा होटल फिनिश हुआ। जहां दूसरे होटल्स केवल लग्जरी ऑफर कर रहे थे, वहीं लीला पैलेस बैंगलोर रॉयल्टी ऑफर कर रहा था। क्योंकि ये केवल एक होटल नहीं बल्कि एक रियल पैलेस जैसा था। इसीलिए बहुत जल्द ये बैंगलोर के लग्जरी होटल्स में अनडिस्प्यूटेड किंग बन गया और 90% ऑक्युपेंसी रेट के साथ ये कंपनी के लिए एक कैश काऊ बन गया था। इस सक्सेस के बाद लीला होटल्स की रफ्तार और भी तेज हो गई। मिड 2000s तक ये मुंबई और बैंगलोर के साथ-साथ गोवा और कोवलम में भी वर्ल्ड क्लास रिसॉर्ट्स के साथ एक्सपेंड कर चुके थे। लेकिन अभी भी एक बहुत बड़ा गैप फिल करना बाकी था। कृष्णन को पता था कि जब तक वो इस एक शहर में अपने आप को साबित नहीं कर लेते तब तक लीला इंडिया में एक टॉप टियर होटल चेन नहीं कहला पाएगा और वो शहर था महाराणाओं की भूमि उदयपुर। उदयपुर इंडिया की अल्ट्रा लग्जरी वेडिंग्स के लिए एक टॉप डेस्टिनेशन था। जब 1983 में जेम्स बॉन्ड की मूवी यहां शूट हुई तो यह पूरी दुनिया से टूरिस्ट को अट्रैक्ट करने लगा था और हर टॉप होटल चेन का फ्लैगशिप और सबसे एक्सपेंसिव होटल उदयपुर में ही था। जैसे एक और था द लेजेंडरी ताज लेक पैलेस, एक 270 साल पुराना मार्बल मॉन्यूमेंट जो लेक पिछोला के बीचों-बीच बना था। वहीं दूसरी ओर था दी ओबेरॉय उदैविलास। 30 एकड़ में बना यह पैलेस होटल अपने प्राइवेट पूल्स और फ्लॉलेस सर्विस के लिए जाना जाता था। 2015 में इसे बेस्ट होटल इन द वर्ल्ड का अवॉर्ड मिलने वाला था। लेकिन कृष्णन ने ठान लिया कि चाहे चैलेंज कितना भी बड़ा हो वो उदयपुर में लीला को एस्टेब्लिश करके ही रहेंगे। उन्होंने लेक पिछोला के किनारे एक पिंक स्ट्रक्चर स्पॉट किया। जहां दूसरों को ये केवल एक खंडहर दिख रहा था वहीं कृष्णन ने इसमें अपना फ्यूचर होटल देख लिया था। उन्होंने वहां छह एकड़ का एरिया खरीद लिया और कंस्ट्रक्शन स्टार्ट कर दिया। उनका प्लान था कि होटल का ग्रैंड एंट्रेंस लेक पिछोला की ओर खोलेगा और गेस्ट बोट से आएंगे। लेकिन सालों की मेहनत के बाद जब होटल बनकर तैयार हुआ तो ऐसा लगा कि जैसे किस्मत ने उनके साथ खिलवाड़ किया हो। ओपनिंग से पहले लेक पिछोला कंप्लीटली सूख गया। मतलब गेस्ट के लिए होटल के अंदर आने का कोई रास्ता ही नहीं था। लेकिन कृष्णन ने हार नहीं मानी। उन्होंने टीम के साथ कैलकुलेशंस की और डिसाइड किया कि वो ऑपोजिट साइड में डेढ़ एकड़ लैंड खरीदेंगे और होटल को मेन रोड से कनेक्ट करते हुए एक रोड बनाएंगे। प्रॉब्लम ये थी कि इस डेढ़ एकड़ में कई अलग-अलग लोग रहते थे। उन सबसे नेगोशिएट करना, उन्हें मनाना बेहद मुश्किल था। लेकिन समहाउ एक-एक करके डील्स क्लोज हुई, लैंड एक्वायर हुई और रोड बनी और कुछ महीनों बाद लकीली लेक की प्रॉब्लम भी सॉल्व हो गई। इस होटल के रूम्स ताज और ओबेरॉय से काफी बड़े थे। हर एक रूम से लेक का व्यू मिलता था और होटल का स्टाफ आपको लिटरली किंग और क्वीन की तरह ट्रीट करता था। जैसे एक बार एक गेस्ट अपने साथ भगवान की मूर्तियां लेकर आई थी और एक दिन जल्दबाजी में वो मूर्तियों को ड्रेसिंग टेबल पे छोड़ के घूमने निकल गए। जब वो वापस आई तो उन्होंने देखा कि होटल स्टाफ ने प्रॉपर रिस्पेक्ट के साथ मूर्तियों को रेड सिल्क कपड़े पे रख दिया था और प्रॉपर रिचुअल के अकॉर्डिंग उनके सामने मैरीगोल्ड फ्लावर्स भी चढ़ाए थे। होटल बनते वक्त कृष्णन ने एक इंटरेस्टिंग चीज नोटिस की। उनके होटल का बेस्ट व्यू मिलता था ताज लेक पैलेस से क्योंकि वो बिल्कुल सामने था। इसीलिए उन्होंने टॉप आर्किटेक्ट बिल बेंसली और एक लाइटिंग एक्सपर्ट को हायर किया और उन्हें ऐसी लाइटिंग लगाने को कहा ताकि ताज लेक पैलेस के गेस्ट उनके होटल को नोटिस करें। स्पेशली रात में। उन्होंने ना केवल लाइटिंग की बल्कि पूरे होटल को ज्वेल्स से सजा दिया, जिस कारण रात होते ही लीला पैलेस ऐसे ग्लो करता था जैसे कोई सपनों का महल हो। ताज में रुकने वाले गेस्ट इसे नोटिस करते थे। अगले दिन कॉफी के बहाने लीला पैलेस होटल विजिट करते थे और अपनी नेक्स्ट ट्रिप पे उनमें से कई लोग लीला को चूज करते थे। इसी के साथ फाइनली लीला होटल्स ने उदयपुर में भी अपनी जगह बना ली थी और कृष्णन ने अपनी लाइफ का सबसे बड़ा चैलेंज सक्सेसफुली पार कर लिया था। उनकी अचीवमेंट्स को रिकॉग्नाइज करते हुए 2009 में इंटरनेशनल होटल्स एंड रेस्टोरेंट एसोसिएशन ने उन्हें होटलियर ऑफ द सेंचुरी के खिताब से नवाजा। और 2010 में भारत सरकार ने उन्हें पद्मभूषण से सम्मानित किया। अगले कुछ सालों में गुड़गांव और दिल्ली में भी लीला ने अपने होटल्स खोले, लेकिन फिर आया 2014, जब 92 की उम्र में कृष्णन ने अपनी आखिरी सांसे ली। लेकिन पीछे छोड़ गए एक ऐसा होटल ब्रांड जिसने उन्हें हमेशा के लिए अमर कर दिया। उनके जाने के बाद उनके होटल एंपायर ने फाइनेंशियली कई अप्स एंड डाउंस देखे। कई होटल्स की ओनरशिप भी चेंज हुई, लेकिन क्वालिटी और सर्विस हमेशा टॉप नॉच रही। 2019 में ट्रेवल प्लस लेजर ने लीला पैलेस उदयपुर को बेस्ट होटल इन द वर्ल्ड नेम किया। फिर 2020 और 2021 में दो लगातार साल लीला पैलेस होटल्स एंड रिसॉर्ट्स को द बेस्ट होटल ब्रांड इन द वर्ल्ड का रिकॉग्निशन मिला। इसका मतलब कि कन्नूर के गांव से एक हम्बल बैकग्राउंड से आए लड़के ने एक ऐसी होटल चेन बना दी थी जिसने हॉस्पिटैलिटी की दुनिया का ऑस्कर जीत लिया था। कैप्टन कृष्णन नायर का कहना था कि “Failure may be a comma, but it is never a full stop.” और इसी माइंडसेट के चलते कोई भी फेलियर कितना भी बड़ा फेलियर उन्हें कभी आगे बढ़ने से नहीं रोक पाया। ये थी कहानी द लीला होटल्स की। अगर वीडियो अच्छी लगी तो आप नेक्स्ट ओबेरॉय होटल्स की कहानी देख सकते हैं।

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