[0:00]महाराज श्री हमारे जीवन में दो तरह के गुरु होते हैं। एक लौकिक गुरु एक पारलौकिक गुरु। दोनों के बहुत उपकार होते हैं हमारे। महाराज श्री उनका ऋण हम कैसे चुकाए और इनमें क्या अंतर होना चाहिए।
[0:13]गुरु का ऋण कैसे चुकाए गुरु का ऋण तो चुकाया नहीं जा सकता।
[0:18]वह नहीं प्रतिकार है।
[0:22]द्वि प्रतिकार। फिर भी लौकिक और लोक जो भी गुरु उनके प्रति कृतज्ञता का भाव बनाए रखना।
[0:34]उनके बहुमान को बनाए रखना।
[0:40]उनके द्वारा प्राप्त निर्देशों को आत्मसात करना।
[0:46]उनके आदर्शों को अपने जीवन का आदर्श बना करके चलना।
[0:51]यह सब अपने आचरण और व्यवहार से उनके गौरव और गरिमा को बढ़ाना।
[0:59]यह सब गुरु गरिमा को बढ़ाने में निमित्त है और कुछ अंशों में गुरु को के ऋण को चुकाने का आधार है।



