[0:00]एक बहुत ही इंटरेस्टिंग हदीस है। जिसमें रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया था। क़यामत तब तक नहीं आएगी, जब तक तुम मुसलमान ऐसे लोगों से नहीं लड़ोगे, जिनकी शक्लें बिल्कुल रेड लाल होंगी। उनके नाक बिल्कुल फ्लैट होंगे। उनकी छोटी-छोटी आंखें होंगी, और चेहरे बिल्कुल शील्ड्स की तरह फ्लैट होंगे। और जिनके जूते बालों से बने होंगे।
[0:30]नाउ, रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इस हदीस के बाद अपनी वफ़ात तक पूरे अरब को फतह कर लिया था। और मुसलमानों की एंपायर पूरे अरब में फैल चुकी थी। जिसके बाद खिलाफत ए राशदा के 30 सालों में अबू बकर, उमर, उस्मान और अली की खिलाफत में मुसलमानों ने पहली बार अरब से निकल कर इंसानों की तारीख की सबसे बड़ी एंपायर बनाई। और पहली बार मुसलमान दुनिया के सुपर पावर बने। लेकिन सिर्फ 30 साल हुकूमत के बाद खिलाफत ए राशदा खत्म कर दी गई। और खिलाफत एक खानदान बनु उमय्या के कंट्रोल में आई। जिन्होंने फिर मुसलमानों की इस एंपायर पर 90 इयर्स तक हुकूमत की। और इसे राशिदुन खिलाफत के इस साइज से बढ़ा कर इतने इलाके तक पहुंचा दिया। उमय्या खिलाफत ने इतने बड़े इलाके को तो फतह कर लिया था। लेकिन बनु उमय्या की खिलाफत में एक बहुत बड़ा मसला था। कि यह खिलाफत सिर्फ और सिर्फ अरबों की थी। जिसमें नॉन अरब लोगों की कोई हैसियत नहीं थी। इस हद तक अरब कि इतनी बड़ी एंपायर के बावजूद अरब हमेशा इस पूरी एंपायर में बाकी आवाम से बहुत कम मिलते थे। और किसी नॉन अरब को अरब से शादी करना इम्प्रूवसिव था। और बनु उमय्या की गवर्नमेंट में सारे पोस्ट सिर्फ अरबों के पास थे। यह उसी तरह था जिस तरह आज यूएई और सऊदी में पाकिस्तानियों और इंडियंस को ट्रीट किया जाता है। इस सबसे तंग आकर उमय्या खिलाफत के खिलाफ उनके मुल्क के अंदर से ही बगावत हुई। और एक और खानदान अब्बासीयों ने खिलाफत संभाली। जो रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के चाचा हजरत अब्बास रज़ी अल्लाह ताला अन्हु की औलाद थी। अब अब्बासीयों के टाइम पर ही मुसलमानों की ताकत अपनी पीक तक पहुंची। जिसे वेस्ट में इस्लामिक गोल्डन ऐज के नाम से जाना जाता है। जब बगदाद अब्बासी खिलाफत का कैपिटल दुनिया की सबसे ताकतवर सिटी थी। अब्बासी खिलाफत ने दुनिया की सुपर पावर होने के साथ-साथ एक बहुत ही यूनिक काम किया। कि उन्होंने अपने कैपिटल बगदाद के अंदर दुनिया की सबसे बड़ी लाइब्रेरी बनाई। जिसे हाउस ऑफ विजडम कहा जाता था। और इस लाइब्रेरी को दुनिया की बेहतरीन किताबों स्टोरीज और पोएट्री से भर दिया। जिसकी वजह से दुनिया के सारे इंटेलेक्चुअल लोग, साइंटिस्ट, पोएट्स, आर्टिस्ट्स सब अपने इलाके छोड़कर यहां इस सिटी में जमा होने लगे। अब्बासी खलीफा ने इस हाउस ऑफ विजडम में एक पोर्शन ट्रांसलेशन के लिए बनाया। ताकि यहां पर लोग बैठकर दुनिया के पुराने अजीम लोगों की राइटिंग्स को अरबी जुबान में ट्रांसलेट कर सकें। और जब यह ट्रांसलेशन शुरू हुई, तो आहिस्ता-आहिस्ता अरबी जुबान दुनिया की सबसे ताकतवर जुबान बनने लगी। जिस तरह आज इंग्लिश जुबान है। अब्बासी खिलाफत ने दुनिया में पहली बार साइंटिस्ट को अपने रिसर्च करने के लिए फंडिंग करना शुरू की। जिसकी वजह से दुनिया में बड़े-बड़े मुसलमान साइंटिस्ट सामने आए। जैसे कि बगदाद के इस हाउस ऑफ विजडम का हेड जिसका नाम था अल ख्वारिज्मी। A man named Al Khawarzmi. जिन्होंने पहली बार दुनिया में अलजेब्रा इंट्रोड्यूस किया। was one of the greatest mathematicians of all time, a Muslim who worked in the golden age of Islam. जो आज भी दुनिया के साइंस में बहुत बड़ी इंपॉर्टेंस रखता है। अब्बासी खिलाफत में साइंस के साथ-साथ आर्ट्स भी बहुत आगे बढ़ा। और इसी दौर में alf Lail wa Lail जैसी किताब लिखी गई। thousand and one nights जिसमें ऐसी स्टोरीज लिखी गई जिन पर आज तक हॉलीवुड में मूवीज़ बनाई जाती है। फॉर एग्जांपल अलादीन, अली बाबा They all know about Ali Baba. और सिम्बाद वगैरह। इन शॉर्ट मुसलमान दुनिया के सुपर पावर थे। और इन्हें चैलेंज करने वाला दुनिया में कोई भी नहीं था। लेकिन जब भी हिस्ट्री में कोई एंपायर इस लेवल तक पहुंचती है, तो उससे आगे सिर्फ एक ही रास्ता होता है। डिक्लाइन। हुआ यूं कि अब्बासीयों से पहले उमय्या खिलाफत एज वी नो कि सिर्फ अरबों की खिलाफत थी। लेकिन अब्बासी खिलाफत उमय्या से बिल्कुल ऑपोज़िट थी। मतलब इस खिलाफत के दौर में एंपायर के हर कोने से लोग गवर्नमेंट में शामिल थे। पर्शियंस, टर्क्स, ग्रीक, सब। और एक अब्बासी खलीफा ने तो तुर्कों की एक बहुत पावरफुल फौज भी बनाई। सलजूग फौज। और यह फौज टाइम गुजरने के साथ-साथ इतनी स्ट्रांग हो गई कि इसने अब्बासी खिलाफत को मजबूत करने के बजाय खिलाफत का सारा कंट्रोल अपने हाथ में ले लिया। जिसके बाद खलीफा सिर्फ एक नाम का खलीफा था। और मुल्क की सारी ताकत सलजूग फौज के पास थी। यह ऐसा है जैसे आज किसी मुल्क का प्राइम मिनिस्टर सिर्फ नाम का प्राइम मिनिस्टर हो। और मुल्क की सारी ताकत किसी और के पास हो। सॉरी। सलजूग फौज के कंट्रोल के बाद इसी फौज की वजह से आहिस्ता-आहिस्ता अब्बासी खिलाफत कमजोर होती गई। और उनकी इस इतनी बड़ी एंपायर में हर तरफ बगावतें स्टार्ट होने लगी। जिससे आखिर यह इतनी बड़ी एंपायर छोटे-छोटे हिस्सों में डिवाइड हो गई। जिसकी वजह से मुसलमानों के हाथ से पहली बार फिलिस्तीन छीन लिया गया। इस सब से बहुत साल पहले पहली खिलाफत में जब हजरत उमर रज़ी अल्लाह ताला अन्हु इन सारे इलाकों को फतह कर रहे थे, तो उन्होंने क्रिश्चियंस की सबसे होली सिटी जेरूशलेम को भी फतह कर लिया था। उसके बाद अगले 450 साल तक किसी की भी हिम्मत नहीं हुई थी कि वो फिलिस्तीन मुसलमानों से ले सकें। लेकिन जब अब्बासी खिलाफत कमजोर हो गई, और मुसलमान बहुत छोटे हिस्सों में डिवाइड होकर, तो इस टाइम का यूरोप के क्रिश्चियंस ने फुल फायदा उठाया। और जेरूशलेम फिलिस्तीन को मुसलमानों के हाथ से छुड़ाने के लिए एक बहुत बड़ी जंग स्टार्ट की। द क्रू सेट्स। The mightiest battle between Christianity and Islam. और आखिर 1099 में उन्होंने फिलिस्तीन और जेरूशलेम फतह करने के बाद हजारों मुसलमानों, बच्चे, औरतें, बूढ़ों को शहीद कर दिया। और उनके घरों को आग लगा दी। एक किताब में तो यह तक लिखा है कि क्रूसेडर्स ने मुसलमान मांओ से उनके बच्चे छीनकर बड़ी-बड़ी बिल्डिंग्स से नीचे फेंक दिए। मुसलमानों ने इन क्रूसेडर्स से भागकर घरों और मस्जिदों में छुपने की कोशिश की। लेकिन क्रूसेडर्स ने बजाय इसके कि उनको निकाला जाए, क्रूसेडर्स ने उन घरों को बाहर से आग लगा दी। जिससे हजारों मुसलमान जलकर राख हो गए। अगर आप सोचेंगे कि इतना जालिम कोई कैसे हो सकता है, तो आज भी फिलिस्तीन में यही सब कुछ एक्जेक्टली इसी तरह हो रहा है। क्रिश्चियंस के जुल्म से कुछ ही मुसलमान वहां से बचकर निकले। और यह मुसलमान मस्जिद ए अक्सा से उस पुराने कुरान मजीद को भी अपने साथ लेकर गए। जो हजरत उस्मान के दौर में लिखा गया था। इस सब जुल्म के बावजूद दुनिया में मुसलमानों का ऐसा कोई लीडर भी नहीं था। जो फिलिस्तीन को दोबारा फतह कर सके। लेकिन फिलिस्तीन खोने के सिर्फ 40 साल बाद इराक में एक आम से सोल्जर नजमुद्दीन अय्यूब के घर में एक बच्चा पैदा हुआ। यूसुफ सलाहुद्दीन अय्यूबी के नाम से याद किया जाता है। सलाहुद्दीन अय्यूबी 25 साल की एज में अपने चाचा के साथ इराक छोड़कर इजिप्ट की तरफ गए। और वहां आहिस्ता-आहिस्ता बहुत लंबी स्ट्रगल के बाद इजिप्ट के बादशाह, सुल्तान बन गए। यह बहुत लंबी कहानी है। इसे फिर करेंगे। अब जब यहां इजिप्ट में सलाहुद्दीन अय्यूबी इजिप्ट के बादशाह बनने की तरफ जा रहे थे, तो इसी दौरान यहां से बहुत दूर मंगोलिया में एक छोटे से गांव के एक छोटे से कबीले के सरदार के घर में भी एक बच्चा पैदा हुआ। जिसका नाम था थेमोजिन, जंगेज़ खान। यस, सलाहुद्दीन और जंगेज़ खान एक ही दौर में जिंदा थे। एक ने मुसलमानों को वापस ग्लोरी की तरफ लेकर जाना था। और दूसरे ने मुसलमानों को ऐसा तबाह करना था जो इससे पहले किसी ने भी नहीं किया था। फिलिस्तीन और स्पेशली जेरूशलेम को खोने के बाद मुसलमानों का कोई स्ट्रांग लीडर तो नहीं था। लेकिन इस दौरान सबसे जबरदस्त रूल मुस्लिम स्कॉलर्स, उलमा ने प्ले किया था। क्योंकि इससे पहले जो मुसलमान हर वक्त आपस में लड़ते रहते थे, और बहुत सारे फिरकों में डिवाइडेड थे, उन्हें कुछ बहुत अजीम स्कॉलर्स ने एक ही गोल पर यूनाइट करना शुरू की। कि किसी भी हाल में फिलिस्तीन को दोबारा फतह करना है। जिससे अगले कई सालों में मुस्लिम किंगडम्स की यंग पॉपुलेशन के दिमाग में यह बात बहुत अच्छी तरह बैठ गई। लेकिन फिर भी मुसलमानों का ऐसा कोई एक लीडर नहीं था। जो मुसलमानों को यूनाइट करके क्रिश्चियंस पर हमला कर सके। आखिर सलाहुद्दीन अय्यूबी ने इजिप्ट का सुल्तान बनने के बाद, पहले तो क्रिश्चियंस की एक ग्रुप से डील कर ली। कि अगले 10 साल तक बिल्कुल अमन होगा। और हम एक दूसरे पर हमला नहीं करेंगे। ऑलमोस्ट सुलेह हुदैबिया की तरह। इन 10 सालों को यूज करके सलाहुद्दीन अय्यूबी ने पहले मुसलमानों को यूनाइट करना शुरू किया। और फिर आखिर इस सारे इलाके को फतह करने के बाद अब सलाहुद्दीन अय्यूबी दुनिया के सबसे ताकतवर मुसलमान बादशाह बन चुके थे। और दुनिया के सारे मुसलमान फिलिस्तीन को फतह करने के लिए सलाहुद्दीन अय्यूबी की तरफ देखने लगे। आखिर सलाहुद्दीन अय्यूबी ने अपनी फौज लेकर क्रूसेडर्स पर हमला कर दिया। और साल 1192 में जेरूशलेम को मुकम्मल तौर पर फतह करके सिक्योर कर लिया। 1192 मुसलमानों की तारीख का बहुत इंपॉर्टेंट साल था। क्योंकि इस साल एक तरफ सलाहुद्दीन अय्यूबी ने इतनी बड़ी फतह हासिल की। और दूसरी तरफ शहाबुद्दीन गौरी ने इंडिया पर हमला करके इसे फतह कर लिया। और दिल्ली सल्तनत की बुनियाद भी रखी। अब ऑलमोस्ट 100 साल बाद मुसलमान आखिरकार दोबारा थोड़ा स्टेबल होने लगे। और मुसलमानों की खोई हुई इज्जत भी उन्हें वापस मिलने लगी। लेकिन अब जब मुसलमानों को थोड़ी कामयाबी मिल चुकी थी, तो इस सबसे 600 साल पहले रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की कही हुई हदीस के पूरे होने का टाइम आ चुका था। तो इस सबसे बहुत दूर जंगेज़ खान ने मंगोलिया को यूनाइट कर लिया था। और बहुत तेजी से हर तरफ अपनी ताकत बढ़ा रहा था। जंगेज़ खान का असली नाम थेमोजिन था। और उसका बाप मंगोलिया के एक छोटे से कबीले का सरदार था। लेकिन थेमोजिन के बचपन में ही एक दूसरे कबीले ने उसके बाप को सीक्रेटली जहर देकर मार दिया था। जिसके बाद थेमोजिन और उसका पूरा खानदान बहुत सख्त जिंदगी गुजारता रहा। और कहा जाता है कि एक वक्त में थेमोजिन चाइना में किसी और का गुलाम बनकर भी रहा। लेकिन फिर थेमोजिन ने आखिर वापस मंगोलिया आकर अपने कबीले को यूनाइट किया। और आहिस्ता-आहिस्ता उसकी ये मंगोल एंपायर बढ़ने लगी। और इतनी बड़ी हो गई कि मंगोलियंस ने थेमोजिन को एक बहुत बड़ा टाइटल दिया, जंगेज़ खान। जिसका मतलब है सबसे बड़ा बादशाह। खान यह नाम खान इससे पहले टर्किश जुबान में भी यूज किया जाता था। लेकिन जंगेज़ खान की वजह से यह नाम पूरी दुनिया में हमेशा के लिए फेमस हो गया। मतलब कुछ सर्विस के मुताबिक आज दुनिया में ढाई करोड़ लोग ऐसे हैं जिनके नाम में खान आता है। जैसे कि शाहरुख खान, आमिर खान और ऑफ कोर्स इमरान खान। मंगोलिया को आज भी अगर देखा जाए तो एक बहुत ही गरीब और आम सा मुल्क है। और उस जमाने में तो इससे भी बहुत ज्यादा कमजोर था। इसीलिए जंगेज़ खान के इस एंपायर के बनने के बाद भी मंगोलिया के नेबर चाइना ने इसे सीरियसली नहीं लिया। क्योंकि आने वाले कुछ ही सालों में जंगेज़ खान ने चाइना के कैपिटल बीजिंग को फतह कर लिया। और पहली बार लोगों ने देखा कि जंगेज़ खान कितना जालिम है। और उसके जुल्म की कहानियां तो हम सब ने सुनी है। कि वह लोगों के सर काटकर उसके पिरामिड्स बनाया करता था। लेकिन यह जुल्म जंगेज़ खान का कोई शौक नहीं था। इस जुल्म से उसे बहुत बड़ा फायदा था। मतलब उसने अपनी पूरी फौज को 10 आदमियों के ग्रुप्स में डिवाइड किया। और फिर 10 से 100। और फिर 100 से हजार। और हजार से 10 हजार के ग्रुप्स में। नाउ, जंगेज़ खान ने अपनी आर्मी के लिए एक रूल बनाया था। कि हर 10 लोगों के ग्रुप में अगर एक बंदा भी जंग छोड़कर भाग जाए, तो उसके ग्रुप के बाकी नौ लोगों के सर काट दिए जाएंगे। जिससे जंगेज़ खान की आर्मी के सोल्जर्स एक दूसरे को जंग से भागने नहीं देते थे। और जो भी भागने की कोशिश करता था, उसे उसकी आर्मी खुद ही मार देती थी। इसके अलावा जंगेज़ खान ने जस्टिस का एक ऐसा सिस्टम बनाया। कि अगर कोई भी इस एंपायर में किसी दूसरे का घोड़ा चोरी करें, और पकड़ा जाए। उसे उस एक घोड़े के बदले 10 घोड़े वापस करने होंगे। और अगर वह वापस ना कर सका, तो सिर्फ उसे नहीं, उसके पूरे खानदान, बच्चे, बीवी, मां-बाप सबको मार दिया जाएगा। इस तरह जंगेज़ खान की ये जालिम एंपायर बहुत तेजी से फैलने लगी। और आखिर मुसलमानों की एक एंपायर ख्वारिज्म से टकरा गई। पहले तो जंगेज़ खान का कोई इरादा नहीं था। कि वह मुसलमानों से जंग करें। इसीलिए उसने ख्वारिज्म के बादशाह की तरफ दोस्ती का पैगाम लेकर एक डेलीगेशन भेजा। लेकिन ख्वारिज्म के बादशाह ने उन सारे लोगों को गिरफ्तार कर लिया। जिसकी वजह से उन्हें रिहा करने के लिए जंगेज़ खान ने अपने एंबेसडर को बादशाह की तरफ भेजा। लेकिन बादशाह ने उस एंबेसडर का सर काट दिया। अब यह बहुत बड़ी बात थी। एंबेसडर या मैसेंजर को कत्ल करना इस्लाम में और दुनिया के हर कानून में बहुत बड़ा जुर्म है। जब मंगोलिया में जंगेज़ खान को इसका पता चला, तो उसे बहुत गुस्सा आया। और अब उसकी इज्जत का सवाल भी था। तो उसने अपनी सबसे बड़ी फौज 1 लाख की फौज लेकर ख्वारिज्म की तरफ रवाना हुआ। और यहां मुसलमानों और मंगोल्स के दरमियान अगले 100 साल की जंग शुरू हुई। जंगेज़ खान ने बहुत तेजी से ख्वारिज्म की इस पूरी एंपायर को खत्म कर दिया। और हर सिटी को फतह करने के बाद वहां की सारी पॉपुलेशन के सर काट दिए। और फिर उनके पिरामिड्स बनाए। ताकि पूरी दुनिया को पता चल जाए कि जंगेज़ खान से फड्डा लेना कोई आसान काम नहीं है। जंगेज़ खान के हमले से पहले ख्वारिज्म एंपायर जिसमें आज अफगानिस्तान, उज्बेकिस्तान, ताजिकिस्तान जैसे इलाके हैं। इनकी आबादी 2 मिलियन, 20 लाख के करीब थी। और जंगेज़ खान के हमले के बाद अब यहां की आबादी सिर्फ 2 लाख रह गई थी। मतलब जंगेज़ खान ने 18 लाख मुसलमानों को शहीद किया था। इन इलाकों को फतह करने के बाद एक दिन जंगेज़ खान ने सारे मुसलमानों को एक मस्जिद में जमा किया। और फिर खुद मिंबर पर चढ़ा। और सारे मुसलमानों से कहा कि मैं तुम्हारे रब की तरफ से तुम पर अज़ाब बनाकर भेजा गया हूं। इसके बाद मंगोलियन एंपायर और भी बढ़ती गई। और ऊपर रशिया को भी फतह कर लिया। लेकिन उसी दौरान मंगोलिया में जंगेज़ खान फौत हो गया। और अपने बाद अपने बेटे ओगुदाय को सबका बादशाह बनाया। और अपनी पूरी एंपायर को अपने बेटों में डिवाइड कर दिया। लेकिन जंगेज़ खान के जाने के बाद मंगोल एंपायर हर तरफ फैलती गई। और आखिर बहुत साल बाद जंगेज़ खान के पोते हलाकू खान ने एक और बहुत बड़ी फौज तैयार की। और उसे लेकर बगदाद अब्बासी खिलाफत के कैपिटल की तरफ बढ़ने लगा। जो उस वक्त दुनिया की सबसे बड़ी और सबसे पावरफुल सिटी थी। अब चाहिए तो यह था कि उस वक्त के मुसलमान यूनाइट होकर मंगोल्स से लड़ते। लेकिन उस वक्त के मुसलमान इतने फिरकों में डिवाइड हो चुके थे, कि मंगोल एंपायर से लड़ने से ज्यादा वो एक दूसरे से डिबेट्स और मुनाज़रो में ज्यादा इंटरेस्टेड थे। हलाकू खान ने हर तरफ से बगदाद को घेर लिया। और फिर आखिर 1258 बगदाद को मुसलमानों से छीन लिया। और मुसलमानों के खलीफा को कत्ल कर दिया। जिसके बाद अब्बासी खिलाफत 500 साल तक हुकूमत करने के बाद हमेशा के लिए खत्म हो गई। बगदाद फतह करने के बाद हलाकू खान की फौज ने इतना खून बहाया। कि कहा जाता है कि बगदाद में दरिया ए फुराद का कलर मुसलमानों के खून की वजह से कई दिन तक बिल्कुल रेड। और रेड कलर के बाद यूफ्रेटिज रिवर का कलर ब्लैक हो गया। क्योंकि हलाकू खान ने बगदाद के हाउस ऑफ विजडम। जो दुनिया की सबसे बड़ी लाइब्रेरी थी, उसके सारे किताब जलाकर राख कर दिए। और उन्हें दरिया में फेंक दिया। जिसकी वजह से दरिया ए फुराद का कलर कई महीने तक बिल्कुल ब्लैक हो गया। हिस्ट्री में मुसलमानों पर इतना सख्त टाइम कभी भी नहीं आया। कि सिर्फ मुसलमानों को नहीं, बल्कि इस्लाम की सबसे होली साइट्स को भी खतरा हो। क्योंकि अब्बासी खिलाफत को खत्म करने के बाद अब मंगोलो के सामने सिर्फ एक और सल्तनत थी। ममलुक सल्तनत। और अगर यह इसे भी हरा देते, तो मक्का और मदीना का कंट्रोल मंगोलो के पास चला जाता। तो वह 100% मक्का में काबा को गिरा देते। बट ऐसा नहीं हुआ। जब मंगोल्स बगदाद फतह करके आगे बढ़े, तो यह देखकर इजिप्ट के ममलुक सुल्तान ने अपने जनरल बेबर्स के साथ मंगोलो से लड़ने का फैसला किया। सुल्तान को सब ने समझाने की कोशिश की कि मंगोलो से लड़ना इंपॉसिबल काम है। क्योंकि उस जमाने के लोगों और कुछ बड़े-बड़े स्कॉलर्स ने भी यह कह दिया था कि यह मंगोल ही असल में याजूज माजूज है। और बस इसके कुछ ही अरसे बाद कयामत आने वाली है। तो इनसे जीतना नामुमकिन है। लेकिन फिर भी सुल्तान और उसका जनरल बेबर्स मंगोलो के खिलाफ एक फौज जमा करने लगे। अब इसी दौरान मंगोलिया में हलाकू खान का भाई जो उस वक्त पूरे मंगोल एंपायर का बादशाह था, मार दिया गया। तो हलाकू खान मजबूरन अपनी बड़ी फौज लेकर वहां से वापस चला गया। और एक छोटी फौज को यहां पर छोड़ा। और आखिर फिलिस्तीन में ऐन जालूद के मुकाम पर मंगोल्स और मुसलमानों की फौज आमने-सामने हुई। यह ऐन जालूद इलाका फिलिस्तीन में है। और इसे ऐन जालूद इसलिए कहा जाता है, क्योंकि यहूदियों के मुताबिक यह वही एग्जैक्ट जगह है जहां पर इससे हजारों साल पहले दाऊद अलैहिस्सलाम ने एक बहुत बड़े वॉरियर जालूत को हराया था। और अगेन, अब हजारों साल बाद यहां एग्जैक्टली ऐसा ही हुआ कि कमजोर मुसलमानों ने पहली बार द ग्रेट मंगोल एंपायर को बहुत बुरी तरह हरा दिया। और मंगोल एंपायर की एक्सपेंशन को हमेशा के लिए रोक दिया। मतलब यह जंग हारने के बाद मंगोल एंपायर कभी भी इससे आगे नहीं बढ़ी। यह थी मंगोल्स और मुसलमानों की जंग जिसका इससे बहुत साल पहले रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने पहले ही बता दिया था। जो आखिर ऐन जालूद की जंग के साथ खत्म हो गई। लेकिन फिर भी मुस्लिम दुनिया के एक बहुत बड़े हिस्से पर मंगोल्स का कंट्रोल था। और उन्हें दुनिया में कोई भी चैलेंज नहीं कर सकता था। लेकिन फिर आहिस्ता-आहिस्ता यही मंगोल यहां के रिलीजन इस्लाम को स्टडी करने लगे। और आखिर इतना इंप्रेस हुए कि सारा मंगोल खानदान जो इन इलाकों में आबाद था, मुसलमान हो गया। और यह सारे इलाके दोबारा इस्लाम के कंट्रोल में आए। अगर आप जंगेज़ खान की औलाद के सारे नाम देखें, तो पहले इन सारों के नाम बिल्कुल मंगोल नाम थे। जैसे कि ओगोदाय, जोची, हलाकू। लेकिन आहिस्ता-आहिस्ता इनके नाम मंगोल से मुसलमान नाम होने लगे। जैसे कि मोहम्मद, तैमूर, यूनुस और बाबर। क्योंकि इंडिया पर बहुत साल हुकूमत करने वाली मुगल एंपायर इसी जंगेज़ खान की औलाद में से थी। हजरत उमर और जंगेज़ खान में एक बात कॉमन है, कि इन्होंने अपनी जमाने की सबसे बड़ी और सबसे ताकतवर एंपायर्स बनाई थी। लेकिन इन दोनों एंपायर्स में एक बहुत बड़ा डिफरेंस है, कि आज जंगेज़ खान को सिर्फ एक जालिम के तौर पर याद किया जाता है। लेकिन हजरत उमर को पूरी दुनिया एक ग्रेट लीडर मानती है।



