[0:01]चुनाव आते ही बौखलाने वाली कांग्रेस अब ईवीएम का रोना छोड़ वोट चोरी का नया शोर मचा रही है. लेकिन सच यह है कि यह कोई नई चाल नहीं बल्कि कांग्रेस की पुरानी आदत और विरासत में मिली हुई हेराफेरी की राजनीति है. इतिहास गवाह है सन 1952 में कांग्रेस ने डॉ भीमराव अंबेडकर को हराने के लिए कम्युनिस्टों से हाथ मिला लिया था. झूठ फैलाया गया और कहीं ना कहीं नतीजों से भी छेड़छाड़ हुई. सन 1957 में बिहार के बेगूसराय में भारत का पहला बूथ कैप्चर कांग्रेस समर्थकों ने ही किया. बंदूक की नोक पर बैलेट बॉक्स लूटे गए. सन 1967 में जम्मू कश्मीर में कांग्रेस ने 61 सीटें जीत ली, कई तो बिना किसी मुकाबले के. यहां तक इन्होंने विपक्ष के नामांकन ही खारिज कर दिए. इतना ही नहीं सन 1975 में अदालत ने इंदिरा गांधी को चुनावी गड़बड़ी का दोषी भी पाया. लेकिन फैसले को मानने के बजाय उन्होंने आपातकाल लगा दिया और देश के लिए तानाशाही का उदाहरण बनी. सन 1987 में नेशनल कॉन्फ्रेंस के साथ मिलकर कश्मीर में हुए धांधली भरे चुनाव ने पूरी एक पीढ़ी को उग्रवाद की ओर धकेल दिया. यही इनका पैटर्न है जब सत्ता में रहो तो सिस्टम का दुरुपयोग करो और जब सत्ता से बाहर हो जाओ तो उसी सिस्टम पर हमला करो. आज राहुल गांधी उन्हीं के नक्शे कदम पर चलते हुए 'वोट चोरी' का रोना रो रहे हैं. इनके सिर्फ नाम बदले हैं सोच तो वही है. अब कांग्रेस और उसके राजकुमार ने चुनाव हारने और दूसरों को दोष देने की कला सीख ली है. लेकिन मजेदार बात तो यह है जब ये धोखाधड़ी का आरोप लगाते हैं तो ना यह कोई आधिकारिक शिकायत करते हैं ना कोई सबूत देते हैं. और जहां जीतते हैं वहां चुप्पी साध लेते हैं. विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया यानी एसआईआर एक सामान्य लेकिन बहुत जरूरी प्रक्रिया है. ताकि अवैध नामों को वोटर लिस्ट से हटाया जाए. लेकिन सवाल यह उठता है कि कांग्रेस इन्ही घुसपैठियों को बचाने में क्यों लगी है? सच तो यह है कि कांग्रेस सोची समझी साजिश के तहत देश की संस्थाओं को बदनाम करने में लगी है. ताकि इनका घुसपैठिया वोट कट ना जाए.

70 साल से कांग्रेस की चालबाजी | Congress Exposed | 70 Years of Election Fraud & Scams
Bharatiya Janata Party
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