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Iran की Strait of Hormuz में बिछाई Naval Mines कैसे हटेंगी, US के पास इन्हें हटाने के क्या ऑप्शन? |

Khabargaon

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[0:00]एक छोटा सा लकड़ी का बैरल जिसमें बस बारूद भरा हुआ है और समंदर में तैर रहा है. इसी लकड़ी के बैरल ने एक समय पर ब्रिटिश सेना की नाक में दम कर दिया था और इन बैरल्स को समंदर में फेंकने वाला देश कोई और नहीं बल्कि अमेरिका था. अमेरिका ने तब ब्रिटेन की नेवी को बिना गोली चलाए सिर्फ लकड़ी के बैरल से डराकर भगा दिया था. हुआ कुछ यूं था 1777 में अमेरिका की कॉलोनीज और ब्रिटेन के बीच में लड़ाई चल रही थी. लड़ाई के दौरान डेलावेयर नदी के पास ब्रिटिश की सेना तैनात थी. अमेरिकी नेवी तब सीधे मुकाबला करने में कमजोर थी तो अमेरिका ने एक आविष्कारक डेविड बुशनल की हेल्प ली. उन्होंने सेना को लकड़ी के बैरल्स दिए इनमें बारूद भरा हुआ था. छोटा सा ट्रिगर भी लगा हुआ था जो जहाजों से टकराते ही फट जाता. इसे दुनिया की पहली नेवल माइन कहा गया. जैसे ही ब्रिटिश सैनिकों ने यह तैरते हुए बैरल देखे वह घबरा गए और नदी में दिखने वाली हर चीज पर गोली चलाने लगे. पूरा दिन वह ऐसे दुश्मन से लड़ते रहे जो असल में दिख ही नहीं रहा था. दिलचस्प बात यह है कि उस दिन ब्रिटिश सेना का एक भी जहाज तो नहीं डूबा लेकिन अमेरिका को यह समझ आ गया कि युद्ध में ताकत हथियार नहीं बल्कि डर होता है. जिस सोच को कभी अमेरिका ने शुरू किया था आज वही आईडिया ईरान उसके खिलाफ इस्तेमाल कर रहा है स्ट्रेट ऑफ हॉर्मूज में माइंस बिछाकर. ईरान ने छोटी-छोटी नावों को इस्तेमाल करके पूरे स्ट्रेट में माइंस बिछा दी हैं इतनी कि इतनी माइंस कि ईरान खुद उनकी लोकेशन नहीं जानता. अमेरिकन नेवी स्ट्रेट ऑफ हर्मस की ब्लॉकेड तो कर रही है लेकिन ईरान की बिछाई हुई माइंस को नहीं खोज पा रही. हार्मूज में माइंस ढूंढना ठीक वैसा ही है जैसे आप किसी घास के मैदान में कांटे ढूंढ रहे हो और फिर अपना रास्ता साफ कर रहे हो. लेकिन दिक्कत यह है कि यह कांटे कल फिर आ सकते हैं यानी आज अगर स्ट्रेट ऑफ हर्मस से माइंस हटा भी दी गई तो ईरान अपनी बोट से फिर से इन्हें बिछा देगा. ईरान के पास कौन-कौन सी माइंस हैं और ये काम कैसे करती हैं इन्हें डिटेक्ट कैसे किया जाता है और क्या अमेरिकन नेवी हार्मूज में बिछी माइंस को हटा पाएगी. आज के फौजी के एपिसोड में इन्हीं सवालों के जवाब जानेंगे. हेलो मैं रिया हूं और आप खबरगांव देख रहे हैं.

[2:18]स्ट्रेट ऑफ हॉर्मूज 33 किलोमीटर चौड़ा समुद्री रास्ता है दुनिया का लगभग एक तिहाई तेल इसी रास्ते से जाता है. अभी ईरान ने इस रास्ते को लगभग बंद कर दिया है. ईरान ने इसे जहाज खड़े कर कर या फिर कोई चेन लगाकर नहीं ब्लॉक किया बल्कि एक अलग स्ट्रेटजी बनाई है. पहला सीधे हमले करो ड्रोन या फिर मिसाइल से दूसरा छोटी स्पीड बोट से कमर्शियल जहाजों पर हमला करना और तीसरा समुद्र में माइंस बिछा देना. जो जहाज के छूने से या फिर उसकी आवाज से भी फट सकती हैं. माइंस होती क्या है माइंस असल में ऐसे विस्फोटक उपकरण होते हैं जिन्हें पानी के अंदर रखा जाता है ताकि दुश्मन के जहाज या सबमरीन जैसे ही उनके पास आए उन्हें नुकसान पहुंचाया जा सके. इनका इस्तेमाल सिर्फ हमला करने के लिए नहीं बल्कि किसी इलाके में जहाजों की एंट्री रोकने के लिए या फिर दुश्मन को एक जगह तक लिमिटेड रखने के लिए भी किया जाता है. दूसरे हथियारों के मुकाबले यह बहुत सस्ती होती है एक आम माइन की कीमत करीब 1500 डॉलर तक होती है भारतीय रुपए के हिसाब से ₹1 लाख. यही वजह है कि नॉर्थ कोरिया, चीन, रूस जैसे 30 और देश इन्हें बनाते हैं और दुनिया भर में बेचते हैं लेकिन सस्ती होने का मतलब यह नहीं है कि यह कमजोर है. स्ट्रॉ सेंटर फॉर इंटरनेशनल सिक्योरिटी एंड लॉ के आंकड़ों के मुताबिक 1950 के बाद से अमेरिका के जहाजों को जितना नुकसान हुआ है उसमें लगभग 77 पर मामलों में नेवल माइंस का हाथ रहा है. यानी कि कम खर्चे में ये माइंस अमेरिका को नुकसान पहुंचा सकती हैं जिनका इस्तेमाल ईरान कर रहा है. अल जजीरा की रिपोर्ट के मुताबिक ईरान के पास करीब 2000 से 6000 नेवल माइंस हैं और इनमें से काफी माइंस ईरान ने खुद अपने देश में ही बनाई है. तीन तरह की माइंस होती है पहली होती है कांटेक्ट माइंस. सबसे पुरानी सबसे बेसिक किस्म की माइन जिनका इस्तेमाल वर्ल्ड वॉर वन के समय से होता आ रहा है. इन्हें मुरड माइंस भी कहा जाता है जो समुद्र के नीचे एक भारी एंकर से चेन के जरिए बांध दी जाती है. ताकि यह पानी में एक तय गहराई पर स्टेबल रह सके. इनका गोल गेंद जैसा स्ट्रक्चर होता है बाहरी हिस्सा जो असल में वर हेड होता है. गेंद के अंदर नीचे वाले हिस्से में विस्फोटक भरा जाता है और ऊपर वाले हिस्से में थोड़ी हवा रहती है जिससे यह पानी में तैरती रहती है. गेंद के बाहर की तरफ निकले हुए होते हैं मोटे-मोटे कांटे हॉन्स कहते हैं जिनमें जिनमें छोटे-छोटे सेंसर लगे होते हैं. जैसे ही कोई जहाज इनसे टकराता है ये तुरंत एक्टिव होकर धमाका कर देते हैं. अगर किसी वजह से इन माइंस की चेन छूट जाए तो यह माइन अपनी जगह से छूटकर पानी में बहने लगती हैं और समुद्र की वेव्स धाराओं के साथ-साथ इधर-उधर बहती रहती है और वो और भी ज्यादा अनपेक बल हो जाती है कहीं भी फट सकती है. दूसरी होती है बॉटम या फिर इनफ्लुएंस माइंस. यह कांटेक्ट माइन से ज्यादा खतरनाक और एडवांस होती है यह समुद्र के बिल्कुल तल पर पड़ी रहती हैं. यह माइंस जहाज के टकराने का इंतजार नहीं करती बल्कि जहाज के आने से पैदा होने वाले सिग्नल्स जैसे कि आवाज मैग्नेटिक फील्ड या फिर पानी के दबाव को पहचान लेती है. जैसे ही कोई जहाज ऊपर से गुजरता है यह खुद बखुदा एक्टिव होकर फट जाती है. इसी वजह से इन्हें ढूंढना मुश्किल हो जाता है कुछ माइंस को रस्सी से बांधकर पानी में ऊपर भी रखा जा सकता है. कुछ तो टॉरपीडो के साथ मिलकर सीधे टारगेट की तरफ भी बढ़ सकती है. तीसरी कैटेगरी आती है स्मार्ट या रॉकेट माइंस की सबसे एडवांस और हाईटेक माइंस इन्हीं कैटेगरी में आती है चीन की ईएम 52 जैसी रॉकेट माइंस जो है वह इसी कैटेगरी में आती है. यह माइन समुद्र के तल में काफी गहराई करीब 200 मीटर तक पर रहती हैं. जैसे ही उन्हें ऊपर से गुजरते जहाज का सिग्नल मिलता है यह सीधे रॉकेट लच कर देती है. जो जहाज के निचले हिस्से माने कि हल से जाकर टकराता है और धमाका करता है. यानी यह माइंस टारगेट करके हमला करती है जब ऐसी माइन फटती है तो पानी के अंदर बहुत तेज प्रेशर बनता है. इससे जहाज का ढांचा टूट सकता है अंदर के जितने जरूरी सिस्टम्स होते हैं जैसे कि इंजन प्रोपेलर स्टीयरिंग या फिर इलेक्ट्रिकल सिस्टम है उसे भी यह तबाह कर देता है. इसके अलावा ईरान के पास लिंपिड माइंस भी होती हैं ये छोटे-छोटे विस्फोटक डिवाइस होते हैं जिन्हें गोताखोर या फिर स्मर्स जिन्हें कहते हैं वो चुपचाप जहाज के नीचे जाकर चिपका देते हैं. इनमें एक टाइमर लगा होता है कुछ समय बाद ब्लास्ट होता है ताकि इन्हें लगाने वाले लोग सेफली पहले बाहर निकल सके. इन्हें फिर भी डिटेक्ट किया जा सकता है लेकिन बाकी माइंस को ढूंढना बहुत मुश्किल है. एक दिक्कत यह है कि समुद्र के नीचे का इलाका बिल्कुल साफ नहीं है वहां ढेर सारा कचरा और पुराने जहाजों का मलबा पड़ा होता है और इसी वजह से असली माइंस को ढूंढना बहुत मुश्किल है और यह समय लेने वाला काम बन जाता है. अब आती है सबसे जरूरी बात. इनमें से ज्यादातर माइंस का मकसद जहाज को डुबोना नहीं होता बल्कि उसे उतना नुकसान पहुंचाना होता है कि वह अपना काम जारी ना रख सके. इन्हीं माइंस से बचने के लिए आजकल के बड़े ऑयल टैंकर काफी मजबूत बनाए जाते हैं इनमें डबल हल होता है एक बाहरी और एक अंदरूनी. अगर विस्फोट से बाहर की परत टूट भी जाए तो अंदर वाली परत अक्सर सुरक्षित रहती है जिससे तेल समुद्र में फैलने से बच जाता है. अब अगर खासतौर पर ईरान की बात की जाए तो उसके पास हजारों माइंस का स्टॉक है. मुरड माइन से लेकर नई एडवांस माइंस तक ईरान ने रूस, चीन और उत्तर कोरिया से भी टेक्नोलॉजी हासिल की है ईएम 52 एडवांस माइन जो है. लेकिन एक बड़ी समस्या यहां पर यह है कि ईरान के पास माइंस बिछाने के लिए पर्याप्त साधन नहीं है. ट्रंप की एक बात तो सच है ईरान हैज नो नेवी सैंक्शन के कारण उनके पास सिर्फ तीन किलो क्लास की सबमरीन है इसलिए ईरान इस्तेमाल करता है छोटी नावों का मछली पकड़ने वाली या फिर स्पीड बोट्स का इस्तेमाल. जिससे माइंस बिछाई जाती है. ईरान की आईआरजीसी नेवी ने कई सालों से इसे लेकर एक पूरी स्ट्रेटेजी तैयार की है. इसमें माइंस के साथ-साथ मिसाइल ड्रोन छोटी सबमरीन सबको मिलकर काम करना होता है और इनमें से हर एक चीज अपने आप में खतरा है लेकिन जब ये सब एक साथ इस्तेमाल होती है तो हालात और खतरनाक हो जाते हैं. इसी वजह से अमेरिकी अधिकारियों ने इसे डेथ वैली तक कहा है यानी एक ऐसा इलाका जहां हवा और समुद्र दोनों तरफ से लगातार खतरा बना रहता है और वहां घुसकर माइंस हटाना उतना ही मुश्किल हो जाता है. इन माइंस को अब अमेरिका हटाएगा कैसे अमेरिका को यह नहीं पता कि यह माइंस बिछी कहां है. माइंस हटाना कितना मुश्किल है इसे आप एक जंग के एग्जांपल से समझिए. 1991 में जब इराक ने कुवैत के पास हजारों माइंस बिछाई तो उन्हें हटाने में कई देशों की नौ सेनाओं को महीनों लग गए. अमेरिका और उसके एलाइज को 907 माइंस को साफ करने में पूरे 51 दिन लग गए थे और वह भी तब हुआ था जब अमेरिका के पास इराक द्वारा बिछाई गई माइंस के नक्शे भी मौजूद थे. माइंस को हटाना एक लंबा प्रोसेस है. इसे डिटेक्ट क्लासिफाई आइडेंटिफिकेशन कहा जाता है. सबसे पहले सोनार की मदद से बड़े समुद्री इलाके में सर्च किया जाता है जो असल में आवाज का इस्तेमाल करता है. जिसे समुद्र के नीचे जो भी चीज थोड़ी अलग दिखती है उसे कांटेक्ट के तौर पर पकड़ा जाता है चाहे वह माइन हो या फिर कोई बेकार मलबा. इसके बाद कंप्यूटर एल्गोरिथम जो है वो इन सभी कांटेक्ट्स को छानता है. बताने की कोशिश करता है कि कौन सी चीज माइन लग रही है और कौन सी नहीं. आखिरी स्टेप में गोताखोर या फिर जिसे स्विमर बोलते हैं वह कैमरा सिस्टम में जाकर पहचान करते हैं कि वह सच में माइन है या फिर नहीं. इसके अलावा नेवी के पास पानी के अंदर चलने वाले ड्रोन्स भी होते हैं. जैसे एमके 18 किंगफिश जो खासतौर पर माइंस ढूंढने के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं. हालांकि इसमें एक और बड़ी दिक्कत है. इतना हाई क्वालिटी सोनार डेटा इकट्ठा करना और उसे सही तरीके से लेबल करना उतना ही ज्यादा महंगा और मुश्किल होता है. ऐसे में अमेरिका इसे कैसे खोजेगा. अमेरिका का मकसद यह नहीं है कि पूरे स्टेट ऑफ हर्मस को एकदम से पूरी तरह माइन से साफ कर दिया जाए. मकसद यह है अमेरिका का कि एक छोटा सा हिस्सा इतना सेफ बना दिया जाए कि जहाज वहां से आ जा सके ट्रांजिट हो पाए और फिर धीरे-धीरे उस रास्ते को कॉरिडोर को और चौड़ा किया जाए. अमेरिकी सेना के यूनाइटेड स्टेट्स सेंट्रल कमांड के कमांडर ने 11 अप्रैल को यह कहा है कि उन्होंने एक नया सुरक्षित रास्ता बनाना शुरू कर दिया है जिसे जल्दी ही शिपिंग इंडस्ट्री के साथ शेयर किया जाएगा ताकि व्यापार दोबारा शुरू हो सके. इस ऑपरेशन में खास रोल लिटोरल कॉम्बैट शिप्स का है. यह शिप्स समुद्र के किनारे वाले इलाकों में काम करने और माइंस हटाने के एक्सपर्ट हैं. इनके साथ इस्तेमाल होते हैं एमएच 60 रोमियो जैसे हेलीकॉप्टर्स. इनमें होता है एयरबोन लेजर माइंड डिटेक्शन सिस्टम. एक ऐसा हाईटेक सिस्टम जो एक तरह की उड़ती हुई स्कैनिंग मशीन है इसमें लेजर की मदद से समुद्र के पानी के अंदर रोशनी जैसी चीजें जो है वह तेज करें में डाली जाती है. जब यह हेलीकॉप्टर समुद्र के ऊपर उड़ता है तो यह लेजर पानी में जाकर नीचे तक स्कैन करता है और यह देखता है कि नीचे कोई माइन मौजूद है या फिर नहीं. पानी से टकराकर जो सिग्नल इससे वापस मिलता है उससे कंप्यूटर यह अंदाजा लगाता है कि नीचे माइन है या फिर नहीं. फिर पानी के अंदर चलने वाले ड्रोन जो टॉरपीडो जैसे दिखते हैं उन जगहों पर जाते हैं और उन्हें करीब से देखते हैं कि वहां पर माइंस की मौजूदगी है या फिर नहीं. जब माइंस की पहचान हो जाती है तो उन्हें खत्म करने के भी कई तरीके हैं जैसे जहाज से गोली चलाकर खास केबल से उन्हें सुरक्षित तरीके से फोड़ा जाता है. ऐसे साउंड डिवाइस है जो जहाज की आवाज की नकल करते हैं और माइंस को खुद फटने पर मजबूर कर देते हैं. लेकिन सबसे बड़ी चुनौती यह है कि यह सब हो पाता है शांति के समय में तब नहीं जब दो देशों के बीच में जंग चल रही हो. यानी माइंस हटाने वाली टीम पर हर समय नए हमलों का खतरा बना रहता है यह भी पॉसिबल है कि और नई माइंस बिछाई जा रही हो. अमेरिकन नेवी ने अपने कई जहाज और सैनिक मिडिल ईस्ट की तरफ भेजने शुरू कर दिए हैं और दो माइंस हटाने वाले जहाज यूएसएस चीफ और यूएसएस पाइनर सिंगापुर से निकलकर वेस्ट एशिया की ओर बढ़ रहे हैं लेकिन अमेरिकन नेवी के सामने एक और समस्या है. ईरान के पास 6000 से ज्यादा माइंस हैं क्या उसे टैकल करने के लिए अमेरिका के पास इतने जहाज हैं. फॉरेन पॉलिसी रिसर्च इंस्टिट्यूट में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिकन नेवी ने समय से पहले अपने कई पुराने माइन क्लियर करने वाले जहाज बंद कर दिए हैं. इसके अलावा जो हेलीकॉप्टर्स माइंस हटाने में इस्तेमाल होते हैं जैसे कि एमए 53 ई सी ड्रैगन उन्हें भी अगस्त में हटा दिया गया है. यानी जो मेन सिस्टम था वह तो कम हो गया है अब जो नई स्ट्रेटेजी है उसमें छोटे वर शिप्स का इस्तेमाल किया जा रहा है. समस्या यह है कि इस समय हर्मस में सिर्फ एक ही ऐसा जहाज उपलब्ध है यूएस कैनबरा. अमेरिका के पास फ्लीट की कमी है लेकिन ईरान ने इसे पॉलिटिकल मूव की तरह इस्टैब्लिश कर दिया है. ईरान ने माइंस की मदद से अमेरिकी सेना में वो डर पैदा कर दिया है जो उन्हें ना तो आगे बढ़ने दे रहा है ना ही पीछे. फिलहाल अमेरिकन माइंस को हटाने के लिए जहाज वेस्ट एशिया की ओर भेज रहा है माइंस कब हटें कब शिपिंग कंपनी अपने जहाज भेजेंगी और कैसे इन्हें अमेरिका हटाएगा यह आने वाले समय में साफ हो पाएगा. आज के फौजी के एपिसोड में बस इतना ही इस एपिसोड को रिकॉर्ड किया हमारे साथी अयान ने आप देखते रहिए खबरगांव शुक्रिया.

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