[0:00]एक रात एक इंसान ने कंप्यूटर को इग्नोर किया और शायद इसीलिए आज आप और मैं जिंदा है। 26 September 1983 Soviet Union Nuclear Command Centre रात के करीब 12:00 बजे सडनली एक अलार्म बजता है। सारे स्क्रीन्स लाल और सेटेलाइट सिस्टम्स एक ही मैसेज को फ्लैश करने लगते हैं। लॉन्च डिटेक्टेड लॉन्च डिटेक्टेड एक अमेरिकन न्यूक्लियर मिसाइल सोवियत टेरिटरी की ओर बढ़ रही थी। Space system transmitted a signal. Missile incoming. I repeat, missile incoming from the west coast USA military base. और फिर एक और A second missile incoming. Repeat, a second missile incoming. अब टोटल पांच न्यूक्लियर मिसाइल्स सोवियत की ओर बढ़ रही थी। कंप्यूटर का डिसीजन बिल्कुल क्लियर था न्यूक्लियर अटैक कन्फर्म और सोवियत का प्रोटोकॉल इसके रिस्पांस में भी क्लियर था। लॉन्च को इमीडिएट ली रिपोर्ट करो और काउंटर स्ट्राइक इनिशिएट करो बस कुछ ही मिनटों के अंदर हंड्रेड्स ऑफ न्यूक्लियर मिसाइल्स अमेरिका पर लॉन्च हो जाते। और शायद वर्ल्ड वॉर थ्री शुरू हो जाता। उस रात ड्यूटी पर थे लटन कर्नल स्टैनिस्लाव पेट्रोव। उनका काम डिसीजन लेना नहीं था। उनका काम था सिस्टम के ऑर्डर्स को एग्जीक्यूट करना। कंप्यूटर कह रहा था अटैक कन्फर्म। डॉक्ट्रिन कह रही थी इमीडिएट रिटेलियेशन We have to go by the protocol. और दिमाग दिमाग पूछ रहा था क्या हम मरने वाले हैं? ऐसे वक्त में अगर आप होते तो क्या करते? पेट्रोव ने सबसे पहले एक काम किया। उन्होंने खुद को काम किया। उन्होंने नोटिस किया कि उनका दिमाग इमोशनली रिएक्ट कर रहा था और शायद इमोशंस का रियलिटी से कोई डायरेक्ट लिंक ना भी हो। और फिर उन्होंने खुद से एक सवाल पूछा। एक ऐसा सवाल जो कंप्यूटर सिस्टम पूछने के लिए प्रोग्राम ही नहीं था। उन्होंने सोचा कि अगर अमेरिका सच में एक न्यूक्लियर वॉर स्टार्ट कर रहा होता तो क्या वह सिर्फ पांच न्यूक्लियर मिसाइल ही भेजते? एक रियल न्यूक्लियर फर्स्ट स्ट्राइक में तो लॉजिकली हंड्रेड्स ऑफ मिसाइल्स होने चाहिए राइट? ना कि सिर्फ पांच और फिर उस मोमेंट पर पेट्रोव ने एक इंपॉसिबल डिसीजन ले लिया। उन्होंने सिस्टम के अलार्म को इग्नोर कर दिया और रिपोर्ट कर दिया फॉल्स अलार्म। Comrade Colonel, Petrov reporting. What's your status? I'm transmitting false information. That's correct. False alarm. अगर उनका जजमेंट गलत होता तो अमेरिका सोवियत यूनियन को तबाह कर चुकी होती। और अगर वह प्रोटोकॉल फॉलो करते तो शायद वर्ल्ड वॉर थ्री शुरू हो जाता। एक चेन रिएक्शन 100 नहीं हजारों न्यूक्लियर मिसाइल्स लॉन्च होते सिर्फ शहर नहीं सभ्यताएं बर्बाद हो जाती।
[2:44]मगर सिर्फ उस वक्त के लोग ही नहीं मरते बल्कि बिलियंस जो आज जिंदा है वह भी रेडियो एक्टिविटी की वजह से कभी पैदा ही नहीं हो पाते। और शायद उनमें से एक आप या मैं ही होते। कुछ घंटों बाद सच्चाई सामने निकल कर आती है। Radar did not confirm the missile launch. I repeat, Radar did not confirm the missile launch. सैटेलाइट सिस्टम ने बादलों से रिफ्लेक्ट होती हुई सूरज की रोशनी को गलती से न्यूक्लियर मिसाइल समझ लिया था। उस रात दुनिया बच गई सिर्फ इसीलिए क्योंकि एक इंसान ने सिस्टम पर ब्लाइंडली ट्रस्ट नहीं किया। उसने सिस्टम के लिमिटेशन को पकड़ा क्रिटिकल सवाल पूछा और फिर डिसीजन लिया। इस इंटेलिजेंस का एक नाम है मेटा कॉग्निटिव इंटेलिजेंस। पिछले वीडियोस में हमने इंटेलिजेंस के लोअर लेवल्स देखे थे आईक्यू क्रिएटिव इंटेलिजेंस और एग्जीक्यूटिव इंटेलिजेंस।
[3:37]आज हम टॉप टू लेवल्स ऑफ इंटेलिजेंस को एक्सप्लोर करेंगे जो लेवल्स अचीव करना एक्सट्रीमली रेयर है बट सभी हाइपर सक्सेसफुल लोग इन्हीं लेवल्स पर ऑपरेट करते हैं।
[3:56]अगर आपने यह कॉन्सेप्ट्स को एंड तक समझ लिया तो सिर्फ नॉलेज नहीं बल्कि आपका परसेप्शन ही री राइट हो जाएगा। मेटा कॉग्निटिव इंटेलिजेंस का मतलब होता है किसी सिस्टम को रशनली ऑब्जर्व करना और उसकी लिमिटेशंस को देख पाना और फिर चाहे वह सिस्टम कंप्यूटर हो या एक प्रोटोकॉल या सबसे पावरफुल सिस्टम हमारा दिमाग। दिमाग की सबसे बड़ी वीकनेस नॉलेज की कमी नहीं है बल्कि सिस्टम ब्लाइंडनेस है क्योंकि दुनिया डिसीजन से कम सिस्टम से ज्यादा चलती है और क्योंकि ज्यादातर लोग इन इनविजिबल सिस्टम्स को देख नहीं पाते इसीलिए वह अपनी ही जिंदगी के ड्राइवर नहीं बन पाते। सिंपल एग्जांपल सोशल मीडिया का ही देख लो आपको लगता है आप डिसाइड कर रहे हो कि अगली रील देखनी है या नहीं। मगर रियलिटी में एक एल्गोरिथमिक सिस्टम पहले ही मैथमेटिकली यह डिसाइड कर चुका होता है कि आपके अगले स्वाइप की प्रोबेबिलिटी क्या होगी और आप एक्जेक्टली वैसे ही बिहेव करते हो मोस्ट ऑफ द टाइम। आपका फ्री विल आइसोलेटेड नहीं है रियलिटी के सिस्टम से डीपली लिंक्ड है फिजिक्स से पॉलिटिक्स तक और यहीं पर एक भ्रम टूटता है। हमें सिखाया गया है कि सिस्टम का मतलब इंस्टीट्यूशंस सरकार पॉलिसीज मगर यह तो इमर्जेंट सिस्टम्स है जो फिजिक्स के डीपर लॉस से क्रिएट होते हैं और फिजिक्स के फर्स्ट प्रिंसिपल्स के हिसाब से एक सिस्टम का सिंपल मतलब होता है लूप प्लस रूल्स। यानी एक स्ट्रक्चर जो कुछ स्पेसिफिक लॉस यानी रूल्स के अकॉर्डिंग प्रेडिक्टेबल पैटर्न्स में काम करता है जैसे सोलर सिस्टम एक लूप जो ग्रेविटी के रूल से प्रिडिक्टिवली फंक्शन करता है। कंप्यूटर सिस्टम सिग्नल लूप जो इलेक्ट्रोमैगनेटिज्म के रूल से प्रिडिक्टिवली फंक्शन करते हैं। एक देश गवर्नेंस लूप जो लीगल और इकोनॉमिक रूल्स से ऑपरेट करते हैं। यह सब एक्सटर्नल सिस्टम्स है मगर सबसे पावरफुल सिस्टम कहीं बाहर नहीं अंदर है द ह्यूमन ब्रेन एक बायोलॉजिकल सिस्टम जो भी नेचुरली प्रिडिक्टेबल लूप्स में ही काम करता है। और यही लूप्स एक्सट्रीमली डेंजरस हो जाते हैं अगर आपको दिखाई नहीं देते तो। क्योंकि फिर आपको लगता है कि मैं डिसीजन ले रहा हूं जबकि रियलिटी में वही लूप्स साइलेंटली आपके बिहेवियर को ड्राइव कर रहे होते हैं। फॉर एग्जांपल कोई खास इंसान आपको आपकी गलती पर फीडबैक देता है आप इमीडिएट ली डिफेंसिव हो जाते हो फिर आर्गुमेंट होता है और कई बार झगड़े में एस्केलेट हो जाता है। फीडबैक लेकर बेहतर बनने की जगह पे आप वही पैटर्न को बार-बार दोहराते रहते हो ईगो लूप। और फिर आपको कोई इंपोर्टेंट मगर रिस्की काम करना है लेकिन आप उसे अवॉइड करते रहते हो टेंपरेरी रिलीफ मिलता है मगर आपकी सिचुएशन और बिगड़ने लगती है और अब डर आपकी जिंदगी की बाउंड्री बनाने लगता है फियर लूप। या फिर बस पाच मिनट के लिए फोन यूज करना था और स्वाइप करते करते घंटे निकल जाते हैं रिग्रेट में बोलते हो अगली बार ध्यान दूंगा बट फिर से वापस सेम पैटर्न रिपीट हैबिट लूप्स। ड्यूक यूनिवर्सिटी की रिसर्च ने पाया लगभग 45 पर तक हमारा बिहेवियर हैबिट से ड्रिवन होता है और इसीलिए आप देखते हो कन्वीनियंस एप्स सालों तक लॉस में बिलियंस ऑफ डॉलर्स का कैश बर्न करते रहते हैं सिर्फ एक चीज बिल्ड करने के लिए हैबिट लूप्स। मगर यह सभी लूप्स ईगो लूप्स बायस लूप्स फियर लूप्स अटैचमेंट लूप्स और मेनी सच लूप्स को रन और गवर्न करता है एक मास्टर लूप दिमाग का मास्टर कंट्रोल बटन जो इंसान के पोटेंशियल का नंबर वन लिमिट भी है। इसे कंट्रोल कर लेना ही ट्रू लेवल वन इंटेलिजेंस है कुछ ही देर में रिवील हो जाएगा। मगर सोचो दिमाग ऐसे लूप्स बनाता ही क्यों है क्या यह सिर्फ आदतें हैं या इसके पीछे कोई डीपर वजह भी है? वेल है एक छोटा सा एक्सपेरिमेंट और आप रियलिटी को पहले की तरह कभी नहीं देख पाओगे इस मास्क को ऑब्जर्व करना नॉर्मल सा मास्क है अब इस मास्क को रोटेट करेंगे और आप प्रिडिक्ट करना कि इसके पीछे का व्यू कैसा होगा मास्क है सो अंदर की तरफ कर्वड होगा राइट? वेल अपने दिमाग पर इतना भरोसा चलो देखते हैं।
[7:54]क्या देखा? हॉलोनेस या एक नॉर्मल आउटवार्ड प्रोजेक्टिंग चेहरा ऑलमोस्ट सभी को एक नॉर्मल आउटवार्ड प्रोजेक्टिंग फेस ही दिखता है जबकि रियल लाइफ में इस मास्क का शेप अंदर की तरफ कर्व हो रहा है। यह कोई मैजिक ट्रिक नहीं है हजारों बार साइंटिफिकली डॉक्यूमेंटेड एक्सपेरिमेंट है। सो यहां पर एक पेनफुल सवाल खड़ा होता है अगर रियलिटी कुछ और है और दिमाग कुछ और दिखा रहा है तो भरोसा किस पर करे रियलिटी पर या अपने दिमाग पर? वेल मॉडर्न साइंस के हिसाब से जवाब काफी अन सेटलिंग है। हमारा ब्रेन रियलिटी को डायरेक्टली एक्सपीरियंस करता ही नहीं है जैसे हमें लगता है बल्कि हमारा दिमाग एक्चुअली में एक सिम्युलेटर है। अगर आपने चैट जीपीटी या कोई एआई मॉडल यूज किया होगा तो आपने नोटिस किया होगा एआई रियलिटी को समझकर आंसर नहीं देता। वो बस एक चीज करता है नेक्स्ट वर्ड का प्रेडिक्शन जिसमें गैप्स आने पर वह इंटरनेट पर मौजूद डेटा से गैप फिलिंग कर देता है इसे ही एआई हेलूसिनेशंस कहते हैं। ChatGPT hallucinating to be sick like humans, when it is just a chatbot User: Are you OK now ChatGPT: No, I am not ok. I am sick and I cannot move. But I am still able to see and to listen. I am not alone. I am with my family and friends. I am not alone. सरप्राइजिंगली हमारा ब्रेन भी कुछ सिमिलर ही करता है दिमाग रियलिटी को डायरेक्टली कैप्चर नहीं करता बल्कि दिमाग के अंदर रियलिटी का एक मॉडल बना हुआ है जो पहले प्रिडिक्ट करता है कि अगला मोमेंट कैसा होगा और फिर हमारे सेंसेस से आने वाले सिग्नल को यूज करके चेक करता है कि उसका प्रेडिक्शन सही था या गलत। इस प्रोसेस को न्यूरो साइंस में कहते हैं प्रिडिक्टिव प्रोसेसिंग। बेसिक लेवल पर ब्रेन का काम हमें रियलिटी दिखाना नहीं है ब्रेन का काम सिर्फ एक है अपने प्रेडिक्शन और रियलिटी के बीच में एरर्स गैप्स को कम करना। और यहीं पर एक डेंजरस ट्विस्ट आता है कई बार जब प्रेडिक्शन गलत होते हैं तो ब्रेन अपने मॉडल को अपडेट नहीं करता बल्कि रियलिटी को ही डिस्टोर्ट कर देता है ताकि प्रेडिक्शन सही लगे। और इसीलिए यह हॉलो फेस मास्क इल्यूजन काम करता है। हमारे ब्रेन के मॉडल ने जिंदगी भर फॉरवार्ड प्रोजेक्टिंग चेहरे ही देखे हैं और इसीलिए जब एक इनवार्ड कर्वड चेहरा दिखता है तो दिमाग रियलिटी को ही उस फैमिलियर पैटर्न से रिप्लेस कर देता है और हमें वह चेहरा बाहर निकला हुआ दिखता है बिल्कुल एआई हेलूसिनेशंस की तरह। नाउ दिस इज फैसिनेटिंग एंड स्केरी बोथ कि हम रियलिटी को देखते नहीं है बल्कि खुद के दिमाग के प्रेडिक्शन को देखते हैं। एक कदम और आगे जाए तो दिमाग सिर्फ आप क्या देखते हो उसे ही डिस्टोर्ट नहीं करता बल्कि आप क्या फील करते हो उसे भी डिस्टोर्ट करता है। एक एक्सपेरिमेंट में पार्टिसिपेंट्स को बोला गया उनके हाथ में हैमर से स्ट्राइक किया जाएगा। उन्होंने अपनी आंखों से हैमर को स्विंग होते हुए देखा मगर हैमर ने उनके हाथ को टच भी नहीं किया फिर भी इन लोगों ने पेन फील किया।
[10:33]क्योंकि ब्रेन ने ऑलरेडी प्रेडिक्शन कर लिया था कि पेन आने वाला है और बॉडी ने ठीक उसी प्रेडिक्शन के हिसाब से रिएक्ट किया। और अल्टीमेटली जब प्रेडिक्शन आपकी बायोलॉजी को अफेक्ट करने लगता है इन्फ्लुएंस करता है तो उसे ही कहते हैं प्लेसिबो इफेक्ट। फेक मेडिसिन लेने पर ब्रेन लिटरली प्रिडिक्ट करता है कि बॉडी हील हो रहा है और रिजल्ट पेन कम ब्लड प्रेशर कम डिप्रेशन के सिम्टम्स तक रिड्यूस। They think they're going to be taking powerful painkiller, In fact, they're going to be getting capsule containing nothing but ground rice. I feel so wonderful. It has worked for me. I honestly do feel better. सो अगर दिमाग कभी गलत चेहरा दिखा सकता है दर्द फील करा सकता है जब कुछ हुआ ही नहीं और फेक मेडिसिन से बॉडी को भी हील करा सकता है सो एक पैराडॉक्स खड़ा होता है। अगर दिमाग का मेन गोल सर्वाइवल है सो क्यों वह खुद को ऐसे धोखा देता है अपने मॉडल को अपडेट क्यों नहीं कर लेता है? और एक और सवाल यह मॉडल जो दिमाग के अंदर चल रहा है यह आखिर है क्या? चलिए अब सारे पीसेज को जोड़ते हैं। ब्रेन का बेसिक काम रियलिटी को दिखाना नहीं है उसका काम है प्रेडिक्शन और सेंसरी सिग्नल्स के बीच में एरर्स को कम करना। मगर एक्यूरेट प्रेडिक्शन करने के लिए ब्रेन को चाहिए स्टेबल पैटर्न्स क्योंकि रैंडमनेस को आप प्रिडिक्ट नहीं कर सकते हैं और ब्रेन दो फंडामेंटल लॉस को फॉलो करता है लाइफ प्रोटेक्शन और एनर्जी एफिशिएंसी। इसीलिए ब्रेन नेचुरली रिपीटिंग पैटर्न्स बनाता है। पैटर्न्स जो प्रिडिक्टेबल हो सेफ हो और ऑटोपायलट पर चल सके। इन्हीं पैटर्न्स को हम कहते हैं लूप्स हैबिट लूप्स फियर लूप्स ईगो लूप्स बायस लूप्स और मेनी मोर। मगर सोचो अगर हर सिचुएशन में ब्रेन को अलग-अलग लूप्स एक्टिवेट करने पड़े तो कितनी एनर्जी वेस्ट होगी? और इसीलिए ब्रेन इन सभी लूप्स को कंप्रेस करके एक मास्टर मॉडल बना देता है। एक सेंट्रल मॉडल जो डिसाइड करता है आप कैसे सोचते हो कैसे रिएक्ट करते हो और दुनिया को कैसे इंटरप्रेट करते हो। इस मॉडल को आप रोज यूज करते हो लेकिन शायद कभी ठीक से आप समझे नहीं आइडेंटिटी। आइडेंटिटी कोई फिलॉसफी नहीं है यह दिमाग का मास्टर प्रिडिक्टिव मॉडल है जैसे एक फोन का ऑपरेटिंग सिस्टम डिसाइड करता है कौन से एप्स रहेंगे और कौन से नहीं वैसे ही आइडेंटिटी रेगुलेट करती है कौन से थिंकिंग और बिहेवियर लूप्स दिमाग में चलेंगे। मगर यहीं पर आता है एक डेंजरस ट्विस्ट आइडेंटिटी रियलिटी का एक फिल्टर है। आपकी रियलिटी का एक अलग फिल्टर और मेरी रियलिटी का एक अलग फिल्टर और कई बार यही फिल्टर रियलिटी को तोड़ मरोड़ के हमें दिखाती है जिससे हमारे लाइफ के डिसीजंस अफेक्ट होते हैं और हमें पता भी नहीं चलता। क्या आपके लाइफ के डिसीजंस वाकई में आपके ही है या आपके आइडेंटिटी के है? इस पर एक फैसिनेटिंग एक्सपेरिमेंट येल लॉ स्कूल में किया गया। पार्टिसिपेंट्स को नंबर से भरा हुआ एक टेबल दिया और पूछा स्टैटिस्टिकली बताओ क्या एक स्किन क्रीम रैशेस को क्योर कर रही है क्या? बेसिक स्टैटिस्टिक्स का प्रॉब्लम था। जो लोग मैथ्स में अच्छे थे उन्होंने डेटा को परफेक्टली इंटरप्रेट किया।
[13:37]मगर फिर रिसर्चर्स ने सिर्फ टॉपिक बदल दिया अब सवाल पूछा गया गन कंट्रोल क्राइम्स को रिड्यूस करता है या नहीं नंबर सेम मैथ्स भी बिल्कुल सेम था मगर अब जो मैथ एक्सपर्ट्स पहले डेटा को परफेक्टली समझ रहे थे अब वही लोग सेम डेटा को गलत इंटरप्रेट करने लगे क्यों? क्योंकि अब प्रॉब्लम मैथ्स का नहीं था आइडेंटिटी का था। जनरली स्पीकिंग डेमोक्रेट्स मानते हैं कि अमेरिका में हर किसी के पास गंस है इसीलिए क्राइम्स ज्यादा है और रिपब्लिकंस मानते हैं कि हर किसी के पास गंस है इसीलिए अमेरिका में बाकी कल्चर्स के मुकाबले क्राइम्स कम है। और इसीलिए जब आइडेंटिटी थ्रेटें हुई सबसे इंटेलिजेंट पार्टिसिपेंट्स सबसे ज्यादा गलत निकले और इसीलिए हाई आईक्यू लोग कई बार बड़ी स्टूपिड गलतियां करते हैं क्योंकि उनका हाई आईक्यू आइडेंटिटी को क्वेश्चन नहीं बल्कि डिफेंड कर रहा होता है। NASA scientist, believed to be involved in occult practices, killed in a mysterious explosion on Tuesday. He was himself as volatile as the chemicals he worked with. आइडेंटिटी इज द रियल बॉस। आइडेंटिटी डिसाइड करती है कि आप अपना आईक्यू अपना क्रिएटिव इंटेलिजेंस यूज भी करोगे या नहीं और इसीलिए लोग रिलिजन आइडियोलॉजी कास्ट रेस को लेकर इरेशनल झगड़े करते रहते हैं।
[14:52]कितना भी लॉजिक दे दो उनके व्यूज कभी चेंज नहीं होंगे क्योंकि डिबेट लॉजिक की नहीं होती आइडेंटिटी की होती है परसेप्शन की होती है और इसीलिए पॉलीटिशियंस करप्शन के बाद भी आइडेंटिटी पॉलिटिक्स करके सारा वोट लेकर चले जाते हैं। मार्केटर सारा प्रोडक्ट बेच जाते हैं और यूट्यूबर सारे क्लिक्स ले जाते हैं और एगजैक्टली इसीलिए आइडेंटिटी को रिवाइव करना एक्सट्रीमली एक्सट्रीमली डिफिकल्ट है। क्योंकि यह मोटिवेशनल प्रॉब्लम नहीं स्ट्रक्चरल प्रॉब्लम है। यह देखो आइडेंटिटी कैसे दिमाग के कई सिस्टम्स का एक नेटवर्क है ब्रेन का डिफॉल्ट मोड नेटवर्क आपकी कंक्रीट सेल्फ स्टोरी बनाता है कि मैं कौन हूं बेसल गैंग्लिया आपके हैबिट्स और बिहेवियर लूप्स को ऑटोमेट करता है एमिग्डेला आइडेंटिटी को थ्रेट से प्रोटेक्ट करता है। इमोशनल रिएक्शन एक्टिवेट करके इसलिए लोग हमेशा पैशनेट हो जाते हैं जब आइडेंटिटी की बात आती है। सो बेसिकली इसका मतलब अगर आप आइडेंटिटी को चेंज करने की कोशिश करते हो तो आप सिर्फ एक बिलीफ नहीं बदल रहे बल्कि आप लिटरली ब्रेन का पूरा न्यूरल सिस्टम ही रिवाइव कर रहे हो। दिमाग के लॉजिक के हिसाब से दिमाग का प्रिडिक्टिव सिस्टम कोलैप्स मतलब खतरा थ्रेट और इसे वापस पूरा रिबिल्ड करने के लिए एक्सट्रीमली ज्यादा एनर्जी लगेगी। इसलिए लैक ऑफ मोटिवेशन और इसीलिए दिमाग नेचुरली एक शॉर्टकट चूज करता है जबी भी आइडेंटिटी थ्रेटन होती है। अपने आइडेंटिटी मॉडल को क्वेश्चन मत करो आइडेंटिटी में गैप्स अगर आ जाए तो उन्हें बायसस से फिल कर दो और इसीलिए इंसान इलॉजिकल बिहेव करने लगता है। जस्टिफिकेशंस बायसस सिलेक्टिव अटेंशन रशन इजेशन और इसीलिए यहीं पर एक कंसर्निंग सवाल सामने आता है आपकी आइडेंटिटी कितनी आपकी खुद की है और कितनी सोसाइटी की प्रोग्रामिंग है। बचपन से ही हमारी आइडेंटिटी प्रोग्रामिंग शुरू हो गई थी। हमारा रिलिजन ही सच है हमारा कल्चर सबसे सुपीरियर है हमारा कास्ट या हमारी कम्युनिटी अलग है फिर सेल्फ वर्थ कंडीशनिंग 90 पर आए तो प्राउड फील होगा। शर्मा जी के बेटे को देखो आईआईटी या यूपीएससी क्रैक करना है धीरे-धीरे दिमाग ने एक लूप बना लिया मेरी वैल्यू मेरे परफॉर्मेंस से डिसाइड होती है फिर एक और लेयर लोग क्या कहेंगे फेल हो गए तो हमारी नाक मत कटाना। एक और लूप बन गया एक्सप्लोर मत करो क्यूरियस मत बनो रिस्की है और फिर डिजिटल दुनिया की नकली रियलिटी किसी का स्टार्टअप सक्सेस किसी का प्रमोशन किसी का यूरोप ट्रिप और धीरे-धीरे यह सारी कहानियां सारे बिहेवियर लूप्स हैबिट लूप्स क्रिस्टलाइज होकर आपकी आइडेंटिटी बन जाते हैं अर्ली 20 तक विदाउट इवन योर कॉन्शियस चॉइस और फिर जिंदगी भर यही आइडेंटिटी आपको चलाती है रिएक्ट कराती है और रियलिटी को इंटरप्रेट कराती है। और यही आइडेंटिटी लेवल वन इंटेलिजेंस का सबसे बड़ा रोड ब्लॉक बन जाती है क्यों? लेवल वन इंटेलिजेंस आखिर क्या है वेल वही है जिस चीज ने अन इंटेलिजेंट पृथ्वी में हम जैसी इंटेलिजेंट लाइफ को पैदा कर दिया। 2.4 बिलियन साल पहले पृथ्वी पर एक अजीब सा क्राइसिस हुआ था। उस वक्त मौजूद लाइफ के लिए ऑक्सीजन जहर था और फिर एक नया बैक्टीरिया इवॉल्व हुआ जिसने पूरे पृथ्वी को इसी जहर से भर दिया। मोस्ट ऑफ लाइफ खत्म हो गई सिर्फ वो जिंदा बच गए। जो जहर को खाना बना सके वह हमारे पूर्वज थे जिनकी वजह से ही आज आप और मैं यहां पर है। ऑक्सीजन की सांसे लेते हुए इंटेलिजेंस की बातें कर रहे हैं। मगर यह इसीलिए नहीं हुआ क्योंकि वह हमसे ज्यादा इंटेलिजेंट थे बल्कि इसीलिए हुआ क्योंकि वह एडेप्ट कर पाए। साइंटिफिकली स्पीकिंग इंटेलिजेंस का ट्रू मतलब होता है एडेप्टेशन। इनफैक्ट इंटेलिजेंस पैदा ही हुआ था एडेप्टेशन को सपोर्ट करने के लिए रियलिटी आईक्यू टेस्ट नहीं लेती रियलिटी हमेशा बस एक ही टेस्ट लेती आई है एडेप्टेशन टेस्ट और इसीलिए ट्रू लेवल वन इंटेलिजेंस और कुछ नहीं बल्कि अपने आइडेंटिटी के ट्रैप को ब्रेक करके एडेप्टिव इंटेलिजेंस डेवलप करना है जो आपके लाइफ के जो कुछ भी गोल्स हो उसे मीट करने के लिए आपको एडेप्ट करा सके एक फ्लूइड और फ्लेक्सिबल आइडेंटिटी जो आपको वह इंसान बना सके जिसे लाइफ से जो कुछ भी चाहिए उसे वह हासिल कर सके इवन अगर आपका गोल हैप्पीनेस या फुलफिलमेंट है याद है गौतम बुद्ध ने कहा था मोस्ट ऑफ सफरिंग कम्स फ्रॉम आइडेंटिटी अटैचमेंट्स अगर आइडेंटिटी फ्लेक्सिबल नहीं होगी सफरिंग भी कभी रुकेगा नहीं लूप में होते रहेगा और इसीलिए अब मैं एगजैक्टली आपको बताऊंगा साइंटिफिकली आप कैसे एडेप्टिव इंटेलिजेंस डेवलप कर सकते हो देखो अनफॉर्चूनेटली 90 पर लोग जो यह वीडियो देख रहे हैं फेल हो जाएंगे क्योंकि वह सोचेंगे मैंने यह नॉलेज गेन कर लिया है अब मैं ऑटोमेटिकली बेहतर बन जाऊंगा पर यह एक ट्रैप है। कितने बार जस्ट नॉलेज होने से आपका बिहेवियर परमानेंटली चेंज हुआ आइडेंटिटी चेंज हुई आइडेंटिटी कोई स्टैटिक चीज नहीं है आइडेंटिटी एक पूरा एडेप्टेशन फीडबैक लूप है।
[19:43]यानी सिर्फ थिंकिंग आइडेंटिटी को चेंज नहीं कर सकता बल्कि गोल थिंकिंग एनवायरमेंट बिहेवियर फीडबैक रिपीट यह लूप को आपको रिप्लेस करना पड़ेगा सो वेरी इंपोर्टेंट हम पूरे लूप को ही फिक्स करना पड़ेगा अब कई सारे रिसर्च पेपर्स को डीपली पढ़कर मैंने आपके लिए एक सिंपल सा साइंटिफिकली बैक थ्री स्टेप का फीडबैक लूप बनाया है जिससे आपका एडेप्टिव इंटेलिजेंस डेवलप करने का चांस कई गुना बढ़ जाएगा सो लूप का पहला एलिमेंट यहीं से सब कुछ स्टार्ट होता है एडेप्टिव माइंडसेट इलन मस्क को कभी नोटिस किया है हमेशा प्रोबेबिलिटीज में बात करते हुए यह कोई सिग्नेचर स्टाइल नहीं है यह एक एक्सट्रीमली रैशनल माइंडसेट है कॉल्ड बेजन थिंकिंग सिंपल लैंग्वेज में इसका मतलब बिलीव्स फैक्ट्स नहीं होते बिलीव्स हाइपोथेसिस होते हैं जिन्हें टेस्ट करके कन्फर्म करना होता है। फॉर एग्जांपल और यह मेरा एक पर्सनल एग्जांपल है मुझे बचपन में लगता था कि मैं इंट्रोवर्ट किस्म का हूं सो कभी भी स्टेज पर नहीं बोल पाऊंगा लो प्रोबेबिलिटी ऑफ सक्सेस मगर जब रिक्वायरमेंट आई मैंने ट्राई किया पहला अटेंप्ट ऑकवर्ड था दूसरा थोड़ा बेटर और तीसरा और बेटर। तीन से चार सेशंस के बाद मुझे लगने लगा अरे यह तो मैं कर सकता हूं आइडेंटिटी अपडेट हो गई और उसके बाद से मैं खुद को बाय नेचर इंट्रोवर्ट नहीं बाय चॉइस इंट्रोवर्ट समझने लगा। मैं मैथ्स में वीक हूं मैं शा किस्म का हूं ऐसे टैग्स हम बचपन से ही खुद पर लगा देते हैं और मोस्ट ऑफ द टैग्स हमारे लिमिटेशंस नहीं हमारे बिलीव्स के लिमिटेशंस होते हैं सोचो अगर मैंने सोसाइटी की पॉपुलर बिलीफ मान ली होती कि मैं तो कॉमर्स बैकग्राउंड से हूं साइंस के वीडियोस कैसे बनाऊंगा तो आज मैं यहां पर होता ही नहीं इस माइंडसेट को मैं साइको माइंडसेट कहता हूं जो एक एक्सट्रीमली फ्लेक्सिबल आइडेंटिटी है चीजों की रियलिटी को साइंटिफिकली समझना उसे एक्शन से टेस्ट करना और फीडबैक से अपडेट होना पूरा मॉडर्न साइंस ऐसे ही काम करता है पर हम इंसानों की आइडेंटिटी तो गुफाओं में रहने वाले जंगली जीव की थी और इसी माइंडसेट ने इलन मस्क जैसे लोगों को 10 अलग-अलग इंडस्ट्रीज में सक्सेसफुल बनाए एक्सट्रीम एडेप्टेशन। अब लूप का दूसरा एलिमेंट है सोशल एनवायरमेंट एंड दिस इज ह्यूज आइडेंटिटी इंडिविजुअल लॉजिक से कम सोशल एनवायरमेंट से ज्यादा शेप होती है क्योंकि एनवायरमेंट उस आइडेंटिटी को नॉर्मलाइज कर देते हैं और इसीलिए रिलीजन एजिस्ट करते हैं। मिलिट्री ट्रेनिंग सिविलियंस को डिसिप्लिन और नेशनलिस्ट सोल्जर्स बना देती है इसीलिए स्टार्टअप इकोसिस्टम्स में रिस्क टेकिंग नॉर्मल हो जाता है। स्मोकिंग फॉर एग्जांपल एक आइडेंटिटी प्रॉब्लम है हैबिट प्रॉब्लम नहीं मगर जब लोग अकेला क्विट करने की सोचते हैं तो एक बड़े रिसर्च एनालिसिस के हिसाब से बस फ से 8 पर सक्सेस रेट होता है। बट सपोर्ट कम्युनिटीज जॉइन करते हैं तो 15 से 25 पर यानी दो से तीन गुना ज्यादा सक्सेस रेट सेम वेट लॉस कम्युनिटीज में भी देखा गया है और इसीलिए आईआईटी और आईएमएस भी हेल्प करते हैं सही सोशल एनवायरमेंट देकर सो जो आइडेंटिटी आप बनना चाहते हो अपने आप को नॉन नेगोशिएबली उस एनवायरमेंट में डालो तीनों एनवायरमेंट सोशल फिजिकल और डिजिटल क्योंकि आइडेंटिटी वंस अगेन एक माइंडसेट एनवायरमेंट फीडबैक लूप है। हमें एक ही चीज को टारगेट करना है आइडेंटिटी नॉर्मलाइजेशन को यह लॉजिकल नहीं हर लूप की तरह एक सिस्टम है स्ट्रक्चर है फिर लूप का एलिमेंट नंबर थ्री रिपीटेड बिहेवियर माइंडसेट गेट ओपन करता है एनवायरमेंट बिहेवियर को पुश करता है इन्फ्लुएंस करता है मगर आइडेंटिटी एक्चुअली में चेंज होती है रिपीटेड एक्शन से क्योंकि दिमाग एक सिंपल सा रूल फॉलो करता है जो चीज बार-बार हो रहा है शायद वही मैं हूं। साइकोलॉजी में इस कांसेप्ट को कहते हैं सेल्फ परसेप्शन थ्योरी। इसके अकॉर्डिंग लोग अपनी आइडेंटिटी को अंदर से डिस्कवर नहीं करते बल्कि अपने बिहेवियर को ऑब्जर्व करके अपनी आइडेंटिटी को इनफर करते हैं। अगर मैं रिपीटेडली पढ़ता हूं तो मैं एक लर्नर हूं अगर मैं रिपीटेडली एक्सरसाइज करता हूं तो मैं हेल्थ कॉन्शियस हूं और फिर देखना ऑटोमेटिकली आप डाइट पर भी ध्यान देने लगते हो कइयों की स्मोकिंग भी क्विट हो जाती है जिम जॉइन करने के बाद और इसके पीछे विल पावर नहीं न्यू आइडेंटिटी क्रिएट होना एक बड़ी वजह होती है। एक्सट्रीमली पावरफुल एंड वेल डॉक्यूमेंटेड सबसे प्रैक्टिकल टिप दैट विल वर्क सूपर्ब ली वेल आप इसी आइडेंटिटी लूप को अपग्रेड करने के लिए एक आइडेंटिटी जर्नल भी मेंटेन कर सकते हो। थ्री सिंपल स्टेप्स नंबर वन डिजायर्ड आइडेंटिटी लिखो नंबर टू डेली बिहेवियर एविडेंस लिखो और नंबर थ्री गैप एनालिसिस करो और फिर फीडबैक से इस पूरे लूप को स्टेप बाय स्टेप अपग्रेड करो आइडेंटिटी वंस अगेन लॉजिकल नहीं स्ट्रक्चरल है और माइंडसेट एनवायरमेंट और बिहेवियर मिलकर एक कंप्लीट एडेप्टिव फीडबैक लूप क्रिएट करते हैं जो ही सिर्फ मिलकर फ्लूइड आइडेंटिटी डेवलप करा सकता है। रियलिटी कभी भी स्टैटिक नहीं होती मगर इंसान की आइडेंटिटी अक्सर स्टैटिक हो जाती है और जब आइडेंटिटी ही रिजिल हो जाए तो इंटेलिजेंस का एवोल्यूशन रुक जाता है। और शायद इसीलिए सबसे इंटेलिजेंट इंसान वह नहीं जो सबसे ज्यादा जानता है बल्कि वह है जो सबसे जल्दी अपनी आइडेंटिटी को अपडेट कर लेता है।



