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जब औरत ये करे तो जान लो आप उसके दिल में हो

अंतर मौन

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[0:00]ध्यान से सुनो। आज जो बात कहने वाला हूं, वो किसी किताब के किसी पन्ने पर नहीं लिखी। किसी गुरु ने नहीं सिखाई। किसी कक्षा में नहीं पढ़ाई गई।

[0:13]यह वो बात है जो सदियों से स्त्री के भीतर जीती आई है और पुरुष सदियों से उसे देखते हुए भी नहीं देख पाया।

[0:20]क्योंकि देखना और समझना दो अलग-अलग कलाएं हैं। आंखें सबके पास होती हैं, लेकिन दृष्टि बहुत कम लोगों के पास होती है।

[0:30]और जब बात स्त्री के मन की हो तो दृष्टि भी काफी नहीं होती। वहां तो महसूस करने की जरूरत होती है।

[0:38]वहां तो एक खास किस्म की संवेदनशीलता चाहिए जो आज के जमाने में बहुत दुर्लभ हो गई है।

[0:44]आज का पुरुष जल्दी में है। वो नतीजे चाहता है। वो सीधी बात चाहता है। वो चाहता है कि सामने वाला खुलकर कह दे हां या ना।

[0:54]लेकिन स्त्री की भाषा में हां और ना इतनी सरल नहीं होती। स्त्री की भाषा में एक तीसरा शब्द होता है जो ना हां होता है ना ना। वो शब्द होता है महसूस करो।

[1:08]और यही वो जगह है जहां अधिकांश पुरुष चूक जाते हैं। वो महसूस करना भूल जाते हैं।

[1:15]वो इतने व्यस्त होते हैं अपनी बात कहने में कि वह सुनना भूल जाते हैं और इतने व्यस्त होते हैं सुनने में कि देखना भूल जाते हैं।

[1:24]और इतने व्यस्त होते हैं देखने में कि महसूस करना तो जैसे उनकी दुनिया से निकल ही जाता है।

[1:31]तो आज हम उस दुनिया में जाएंगे जो दिखती नहीं, उस दुनिया में जो सुनाई नहीं देती, उस दुनिया में जहां स्त्री का दिल बोलता है बिना बोले।

[1:40]पहले एक बात समझ लो। स्त्री कभी भी किसी ऐसे पुरुष के सामने अपना दिल नहीं खोलती जिस पर उसे भरोसा ना हो।

[1:47]और भरोसा बनता नहीं, महसूस होता है। यह कोई फैसला नहीं होता। यह कोई सोचा समझा कदम नहीं होता।

[1:55]यह बस एक दिन अचानक भीतर से उठती है। एक लहर और स्त्री को खुद भी नहीं पता होता कि यह लहर कब आई, कहां से आई।

[2:05]बस इतना पता होता है कि जब वो पुरुष पास होता है तो भीतर कुछ हिलता है।

[2:11]और जब वो नहीं होता तो उसकी कमी महसूस होती है। यही आकर्षण की असली शुरुआत है।

[2:19]यह शरीर की भाषा नहीं है। यह मन की गहराई से उठती एक आवाज है जो कहती है यह पुरुष अलग है।

[2:27]लेकिन यहां एक विरोधाभास होता है। जैसे ही स्त्री को यह महसूस होता है, वो डरने लगती है।

[2:35]वो खुद को रोकने लगती है। वो अपनी भावनाओं को दबाने लगती है।

[2:39]बाहर से शांत, भीतर से उथल-पुथल, बाहर से सहज, भीतर से बेचैन और इसी बेचैनी को छुपाते छुपाते, उसका शरीर कुछ ऐसी हरकतें करने लगता है जो ना वो सोचकर करती है, ना जानबूझकर।

[2:57]यह हरकतें उसके अवचेतन से आती हैं, उसके भीतर के सच से आती है और आज हम उन्हीं हरकतों को, उन्हीं संकेतों को, उन्हीं खामोश इशारों को समझने की कोशिश करेंगे।

[3:10]पहला संकेत, बाल। यह संकेत इतना सूक्ष्म है, इतना हल्का है कि अगर तुम ध्यान से ना देखो तो बिल्कुल सामान्य लगेगा।

[3:19]लेकिन जब तुम समझ जाओगे इसके पीछे की भाषा तो यह तुम्हें कभी साधारण नहीं लगेगा।

[3:24]जब कोई स्त्री किसी पुरुष की उपस्थिति को अपनी त्वचा पर, अपनी सांसों में, अपनी चेतना में महसूस करने लगती है तो सबसे पहले उसका हाथ उठता है और वह हाथ जाता है उसके बालों की तरफ।

[3:39]वो एक लट उठाती है, धीरे से कान के पीछे खोंस देती है या कभी उंगलियों में हल्के से लपेटती है, कभी पूरे बाल पीछे करती है, कभी माथे पर पड़ी लट को हटाती है।

[3:51]और यह सब इतनी धीमी गति से होता है जैसे वक्त खुद उस पल में थोड़ा रुक गया हो।

[3:58]यह सजने की कोशिश नहीं है। यह दर्पण के सामने खड़े होकर तैयार होना नहीं है। यह तो बस एक अनजाना अचेतन प्रतिक्रिया है जो उसके भीतर से खुद ब खुद उठती है।

[4:12]मनोविज्ञान कहता है कि जब मनुष्य किसी ऐसे व्यक्ति के पास होता है जिसकी तरफ वो आकर्षित होता है तो उसका शरीर अनजाने में खुद को संवारने की कोशिश करता है।

[4:22]यह एक प्राकृतिक प्रवृत्ति है। यह विकास की भाषा है।

[4:26]लेकिन स्त्री के संदर्भ में यह और भी गहरा होता है क्योंकि स्त्री के लिए बाल केवल बाल नहीं होते, बाल उसकी पहचान होते हैं, उसका सौंदर्य होते हैं, उसकी अभिव्यक्ति होते हैं।

[4:38]और जब वो उस पुरुष की मौजूदगी में अपने बालों को छूती है तो वो यह नहीं कह रही कि मैं तुम्हें चाहती हूं। वो कह रही है तुम्हारी नजर मुझ तक पहुंच रही है और मुझे वह नजर महसूस हो रही है।

[4:52]यह संकेत बहुत नाजुक है, बहुत कोमल। इसमें कोई घोषणा नहीं, कोई दावा नहीं, बस एक हल्की सी हलचल जो बताती है कि भीतर कुछ जाग रहा है।

[5:03]अगर कोई स्त्री तुम्हारे आसपास बार-बार ऐसा करती है एक बार नहीं बार-बार, हर बार जब तुम उसके पास आओ तो समझ लेना तुम उसकी दुनिया में दाखिल हो चुके हो बिना दरवाजा खटखटाए, बिना आज्ञा मांगे।

[5:18]बस तुम्हारी मौजूदगी ने ही एक रास्ता बना लिया है उसके भीतर। दूसरा संकेत, कपड़े।

[5:24]यह संकेत पहले से थोड़ा और स्पष्ट है, लेकिन फिर भी इसे ज्यादातर पुरुष गलत पढ़ते हैं।

[5:30]जब कोई स्त्री मन ही मन किसी पुरुष की तरफ झुकने लगती है तो उसके हाथ उसके कपड़ों पर बार-बार जाने लगते हैं।

[5:38]वो दुपट्टा ठीक करती है, फिर थोड़ा खींचती है, फिर छोड़ देती है, फिर कुर्ते का दामन सीधा करती है, फिर आस्तीन ठीक करती है।

[5:48]यह सब एक के बाद एक होता रहता है और उसे खुद भी नहीं पता होता कि वो यह क्यों कर रही है। लेकिन इसका कारण बहुत गहरा है।

[5:56]जब हम किसी ऐसे इंसान के सामने होते हैं जिसकी परवाह हमें होती है तो हम अनजाने में चाहते हैं कि हम उनकी नजरों में अच्छे लगे।

[6:05]यह दिखावा नहीं है। यह घमंड नहीं है। यह तो प्रेम का पहला संकेत है।

[6:10]स्त्री उस पुरुष की आंखों के लिए खुद को सहज बनाती है जिसे वो भीतर से चाहने लगी है।

[6:18]और यहां एक बहुत महत्वपूर्ण बात जो स्त्री तुमसे कोई लगाव नहीं रखती।

[6:22]वो तुम्हारी मौजूदगी में अपने शरीर से पूरी तरह बेपरवाह रहती है।

[6:27]उसे परवाह नहीं होती कि उसके बाल बिखरे हैं या कपड़े सीधे हैं।

[6:30]क्योंकि तुम्हारी नजर उसके लिए मायने नहीं रखती, लेकिन जो स्त्री तुम्हें अपने भीतर जगह देने लगी है, वो तुम्हारे सामने खुद को व्यवस्थित करने लगती है अनजाने में बिना किसी इरादे के।

[6:43]और यह संकेत सिर्फ यह नहीं बताता कि उसे तुम आकर्षक लगते हो। यह संकेत बताता है कि उसे तुम्हारी परवाह है।

[6:49]और परवाह आकर्षण से कहीं ज्यादा गहरी चीज होती है। आकर्षण क्षणिक हो सकता है परवाह नहीं।

[6:56]परवाह वो बीज है जिससे रिश्ते का पेड़ जन्म लेता है।

[6:59]तो अगली बार जब तुम देखो कि कोई स्त्री तुम्हारे पास बैठकर बार-बार खुद को ठीक कर रही है तो मुस्कुराओ।

[7:06]क्योंकि वो तुम्हें बिना शब्दों के कुछ बता रही है। तीसरा संकेत, नजर।

[7:12]यह तीसरा संकेत सबसे खामोश है, सबसे नाजुक और शायद सबसे सुंदर भी।

[7:19]जब कोई स्त्री किसी पुरुष से बातें करते हुए उसकी आंखों से उसके होठों पर नजर ले जाए और यह एक बार नहीं बल्कि बार-बार हो तो यह जिज्ञासा नहीं है।

[7:30]यह अनजान नहीं है। यह एक कल्पना है जो उसके मन में चल रही है।

[7:35]स्त्री कभी किसी ऐसे पुरुष के होठों को इस तरह नहीं देखती जिसके साथ वह भीतर कुछ महसूस ना कर रही हो।

[7:40]यह नजर बहुत हल्की होती है, झिझक भरी होती है। अगर तुम सीधे देखो तो शायद पकड़ में ना आए।

[7:47]लेकिन अगर ध्यान से देखो तो नजर आ जाती है। और इसके साथ कुछ और भी होता है।

[7:53]कभी उसकी नजर तुम्हारी कलाई पर रुकती है, कभी तुम्हारी उंगलियों पर, कभी तुम्हारे गले पर, कभी तुम्हारे कंधों पर।

[8:04]यह बेमतलब नहीं है। स्त्री वहीं देखती है जहां वो भविष्य में तुम्हारी उपस्थिति को महसूस करना चाहती है।

[8:10]यह उसके मन की एक अनकही इच्छा है जो उसकी नजरों में झलक जाती है। लेकिन वो पहला कदम नहीं उठाती।

[8:17]स्त्री का स्वभाव है वो माहौल बनाती है। वो संकेत देती है। वो रोशनी जलाती है और फिर इंतजार करती है।

[8:26]वो इंतजार करती है कि पुरुष उस रोशनी को देखे, उस रोशनी की तरफ चले और अगर पुरुष नहीं देखता तो वो रोशनी धीरे-धीरे बुझने लगती है।

[8:35]इसलिए जब कोई स्त्री तुम्हें इस तरह देखे तो यह पल बहुत कीमती है। इस पल को खो मत देना।

[8:44]अब यहां एक बहुत जरूरी बात, नजर के संकेत को समझने के बाद ज्यादातर पुरुष एक गलती करते हैं।

[8:52]वो उत्साहित हो जाते हैं, जल्दी करने लगते हैं। सोचते हैं अब बात करनी चाहिए, अब कदम उठाना चाहिए और यहीं सब कुछ टूट जाता है।

[9:02]क्योंकि जल्दी आकर्षण की सबसे बड़ी दुश्मन है। जब तुम जल्दी करते हो तो स्त्री को महसूस होता है कि तुम उसे नहीं अपनी जरूरत को पूरा करना चाहते हो।

[9:13]और कोई भी स्त्री किसी की जरूरत बनना नहीं चाहती, वो चाहती है कि कोई उसे चुने जानबूझकर, धीरे-धीरे, पूरे होश में।

[9:21]तो जब तुम वो नजर देखो ठहरो, शांत रहो, मुस्कुराओ और बातें करते रहो बाकी सब अपने आप होगा। चौथा संकेत लय।

[9:32]यह चौथा संकेत सबसे गहरा है, सबसे अदृश्य और जो इसे पढ़ सके वो सच में समझ गया कि स्त्री का दिल कैसे बोलता है।

[9:42]जब कोई स्त्री किसी पुरुष से सच में जुड़ने लगती है भीतर से, आत्मा से तो वो उसकी लय पकड़ लेती है।

[9:50]तुम जैसे बैठते हो वो वैसे बैठने लगती है। तुम जब हाथ हिलाते हो बात करते हुए वो भी वैसे ही हाथ हिलाने लगती है।

[9:58]तुम हंसते हो, वो उसी रफ्तार से हंसती है। तुम्हारी आवाज धीमी होती है, उसकी आवाज भी धीमी हो जाती है।

[10:05]तुम झुक कर बात करते हो, वो भी हल्के से झुक जाती है। यह सब अनजाने में होता है।

[10:11]वो ये नहीं सोचती चलो अब मैं इस पुरुष की नकल उतारती हूं, नहीं। यह तो उसके शरीर और मन का एक स्वाभाविक प्रतिसाद है।

[10:20]यह उसकी आत्मा का वो संदेश है जो कह रही है मैं तुम्हारे साथ हूं, मैं तुम्हारी तरंग में हूं।

[10:26]मनोविज्ञान इसे मिररिंग कहता है, लेकिन इस शब्द में वह गहराई नहीं है जो इस अनुभव में है।

[10:32]मिररिंग एक वैज्ञानिक शब्द है लेकिन जो होता है वो विज्ञान से परे है।

[10:37]जब दो इंसानों के बीच सच्चा जुड़ाव होता है तो उनकी लय एक हो जाती है।

[10:44]उनकी सांसें एक ताल में चलने लगती हैं, उनके हाव-भाव एक दूसरे से मिलने लगते हैं।

[10:49]यह प्रेम की भाषा है। यह आत्मा की भाषा है और जब स्त्री किसी पुरुष की लय पकड़ ले समझ लेना, वो केवल उसके साथ बैठी नहीं है, वो उसके पास घर ढूंढ रही है।

[11:00]अब यहां रुकते हैं और एक बड़ा सवाल पूछते हैं। यह चार संकेत पहचान लेने के बाद तुम्हें क्या करना चाहिए?

[11:08]यही वह सवाल है जिसका जवाब सबसे जरूरी है और यही वो जवाब है जो ज्यादातर पुरुष नहीं जानते।

[11:17]जो पुरुष इन संकेतों को पहचान लेता है वो अक्सर एक गलती करता है। वो सोचता है अब मेरी बारी है, अब मुझे कुछ करना है, कुछ बोलना है, कुछ दिखाना है और वो शुरू हो जाता है।

[11:31]बातें करता है, इंप्रेस करने की कोशिश करता है, मजाक करता है, तारीफ करता है और इस सब में वो एक चीज खो देता है अपना ठहराव।

[11:41]स्त्री का सबसे बड़ा आकर्षण ताकत नहीं है, दिखावा नहीं है, पैसा नहीं है, शोहरत नहीं है।

[11:49]स्त्री का सबसे बड़ा आकर्षण है स्थिरता। वो पुरुष जो अपने भीतर से ठहरा हुआ है, जो डरा हुआ नहीं है, जो बेचैन नहीं है, जो कुछ साबित नहीं करना चाहता, जो बस है पूरी तरह बिना किसी लालच के, बिना किसी जल्दी के।

[12:08]ऐसा पुरुष स्त्री को एक अजीब सी शांति देता है, एक अजीब सा विश्वास और स्त्री उसी के पास रुकती है जहां उसे शांति मिले, जहां उसे विश्वास मिले।

[12:17]यह बात बहुत सीधी लगती है, लेकिन इसे जीना बहुत मुश्किल है। क्योंकि जब हम किसी को चाहते हैं तो हम बेचैन हो जाते हैं।

[12:26]हम उसे खो देने के डर में जीने लगते हैं और वही डर, वही बेचैनी, वही जल्दी सब कुछ बर्बाद कर देती है।

[12:35]एक बात और स्त्री उस पुरुष से नहीं डरती जो ताकतवर है। स्त्री उस पुरुष से डरती है जो बेचैन है।

[12:42]क्योंकि बेचैनी एक छुपा हुआ दबाव होती है और दबाव चाहे कितना भी मीठे लहजे में आए, आकर्षण को धीरे-धीरे खत्म कर देता है।

[12:54]जब एक पुरुष किसी स्त्री को बार-बार संदेश करता है, बार-बार ध्यान खींचने की कोशिश करता है, बार-बार यह साबित करने की कोशिश करता है कि वो कितना अच्छा है, तो स्त्री को एक अनजाना भारीपन महसूस होने लगता है।

[13:08]वह भारीपन प्रेम नहीं है, वह जुड़ाव नहीं है, वो एक जिम्मेदारी बन जाता है और कोई भी स्त्री ऐसी जिम्मेदारी नहीं उठाना चाहती जो उसने मांगी ना हो।

[13:20]इसलिए ठहरो, शांत रहो, अपने भीतर टिके रहो। अब एक बहुत गहरी बात।

[13:27]जब स्त्री तुम्हारी बातों से नहीं तुम्हारी चुप्पी से जुड़ने लगे, तब समझना कि कुछ बहुत खास हो रहा है।

[13:35]जब तुम्हारी चुप्पी उसे भारी नहीं लगती बल्कि सुकून देती है, तब समझना कि वो तुम्हें केवल सुनने के लिए नहीं, महसूस करने के लिए पास आ रही है।

[13:46]जब तुम बोल नहीं रहे और वो फिर भी तुम्हारे पास बैठी है, तब समझना कि उसे तुम्हारे शब्दों की नहीं तुम्हारी उपस्थिति की जरूरत है।

[13:56]यही असली जुड़ाव है जहां शब्द जरूरी नहीं रहते, जहां साबित करने की जरूरत नहीं रहती, जहां बस एक ठहराव होता है और उस ठहराव में दो इंसान एक दूसरे को पा लेते हैं।

[14:10]अब हम थोड़ा और गहरे जाते हैं। स्त्री के मन में जब आकर्षण जन्म लेता है तो उसके साथ एक अजीब सी लड़ाई भी शुरू होती है।

[14:17]वो खुद से लड़ती है। वो सोचती है क्या यह सच है? क्या मैं सच में यह महसूस कर रही हूं? क्या यह पुरुष सच में वैसा है जैसा मुझे लग रहा है?

[14:27]वो परखती है, वो देखती है, वो इंतजार करती है और इसी इंतजार में वो कभी-कभी दूर भागती भी है।

[14:35]अचानक ठंडी हो जाती है। जो पहले खुलकर हंसती थी, वो मुस्कुराना बंद कर देती है।

[14:42]जो पहले बातें करती थी, वो चुप हो जाती है और पुरुष सोचता है कुछ गलत हो गया।

[14:49]लेकिन असलियत कुछ और होती है। यह दूरी नापसंद की नहीं है, यह दूरी एक परीक्षा है।

[14:56]स्त्री देखना चाहती है कि जब वो दूर जाए तो पुरुष क्या करता है? वो बेचैन हो जाता है।

[15:04]वो मनाने लगता है, वो घबरा जाता है या वो शांत रहता है, अपनी जगह पर टिका रहता है, अपनी दुनिया में मगन रहता है।

[15:13]जो पुरुष उस वक्त शांत रहता है, वो पास होता है। जो पुरुष उस वक्त बेचैन हो जाता है, वो दूर होता है।

[15:23]यह क्रूर नहीं है, यह स्त्री की प्रकृति है। वो यह जानना चाहती है कि जो पुरुष उसके पास आ रहा है, वो अपने भीतर से मजबूत है या उसे किसी की जरूरत है अपनी कमजोरी छुपाने के लिए।

[15:37]और यहां एक और सच, स्त्री इशारा देकर थक जाती है।

[15:41]अगर वो बार-बार संकेत देती रही और पुरुष ने नहीं देखा तो एक दिन वो चुप हो जाती है।

[15:47]यह चुप्पी गुस्से की नहीं है, यह चुप्पी थकान की है और इस थकान के बाद स्त्री का मन उस पुरुष से धीरे-धीरे दूर होने लगता है।

[15:57]वो दूसरी तरफ देखने लगती है, वो दूसरी दुनिया में जाने लगती है और फिर एक दिन जब पुरुष को एहसास होता है कि वो क्या खो रहा है तब बहुत देर हो चुकी होती है।

[16:08]इसलिए देखना सीखो, महसूस करना सीखो। अब एक आखिरी सच जो सबसे जरूरी है।

[16:16]स्त्री को जीतने की कोशिश मत करो। यह सुनने में अजीब लगता है, लेकिन यह सबसे गहरा सच है।

[16:23]जब तुम किसी स्त्री को जीतने की कोशिश करते हो तो तुम एक खेल खेलने लगते हो और जब कोई रिश्ता खेल बन जाए तो वो रिश्ता नहीं रहता।

[16:33]इसकी जगह खुद में ठहरो, अपनी जिंदगी जियो, अपने सपनों की तरफ चलते रहो, अपने भीतर की आवाज सुनो, अपने आप को इतना पूरा बनाओ कि तुम्हें किसी की स्वीकृति की जरूरत ना हो।

[16:44]जब एक पुरुष अपने भीतर टिका होता है तो उसके इर्द-गिर्द एक ऊर्जा होती है, एक शांति होती है, एक आत्मविश्वास होता है जो दिखावे का नहीं भीतर से आता है।

[17:00]और स्त्री उस ऊर्जा को महसूस करती है दूर से भी, वो उस पुरुष की तरफ खींचती है बिना जाने, बिना समझे।

[17:09]और फिर वो पास आती है अपनी मर्जी से, अपने मन से, बिना किसी दबाव के और यही सबसे सुंदर क्षण होता है।

[17:17]जब स्त्री अपनी मर्जी से किसी पुरुष के पास आती है तो वो आना किसी जीत से कीमती होता है।

[17:23]वो आना किसी तोहफे से बड़ा होता है। क्योंकि उसने चुना है अपनी आजादी से, अपने दिल से और जो रिश्ता इस तरह शुरू होता है, वो रिश्ता बहुत मजबूत होता है, बहुत गहरा, बहुत सच्चा।

[17:40]उस रिश्ते में कोई दबाव नहीं होता, कोई डर नहीं होता, कोई खेल नहीं होता।

[17:46]बस दो इंसान होते हैं जो एक दूसरे को देखते हैं, समझते हैं और अपनी-अपनी जिंदगी में एक दूसरे को जगह देते हैं।

[17:55]तो आज की बात का सार यह है, स्त्री के चार संकेत बाल, कपड़े, नजर और लय यह चारों तुम्हें एक ही बात बताते हैं।

[18:04]वो बात यह है कि भीतर कुछ जाग रहा है, भीतर कुछ हिल रहा है, भीतर कुछ कह रहा है। यह पुरुष खास है।

[18:12]लेकिन इन संकेतों को पहचान लेना काफी नहीं है। इन संकेतों के बाद तुम्हें जो करना है वो है, ठहरना, शांत रहना, अपने भीतर से मजबूत रहना।

[18:24]क्योंकि स्त्री वो नहीं चाहती जो उसके पीछे भागे। स्त्री वो चाहती है जो अपनी जगह पर खड़ा रहे और उसे महसूस कराए कि यहां आना सुरक्षित है।

[18:36]यहां डर नहीं है, यहां जल्दी नहीं है। यहां दबाव नहीं है। यहां बस एक इंसान है पूरा ठहरा हुआ, शांत।

[18:47]और जब स्त्री को ऐसा कोई मिलता है तो वो रुकती है पूरी तरह अपनी मर्जी से। याद रखना, जो खोने से डरता है वही सबसे पहले खो देता है।

[18:58]और जो अपने भीतर टिका होता है, वही चुना जाता है। स्त्री को पाने की कोशिश मत करना खुद को पा लो।

[19:06]क्योंकि जिस दिन तुम खुद को पा लोगे उसी दिन स्त्री तुम्हें पा लेगी और वहीं से एक कहानी जन्म लेगी।

[19:12]ऐसी कहानी जो शोर में नहीं, सन्नाटे में जीती है। ऐसी कहानी जो शब्दों में नहीं, महसूस में होती है।

[19:21]ऐसी कहानी जो किताबों में नहीं दिलों में लिखी जाती है।

[19:25]अगर यह बात कहीं भीतर तक छू गई हो तो रुको एक पल के लिए और खुद से पूछो क्या मैं सच में ठहरा हुआ हूं?

[19:33]क्या मैं सच में अपने भीतर से शांत हूं या मैं भी उसी भीड़ में हूं जो जल्दी में है, बेचैन है साबित करने की दौड़ में है।

[19:39]अगर जवाब ईमानदार हो तो वो जवाब ही तुम्हारी अगली राह दिखाएगा और उसी राह पर चलते चलते एक दिन तुम वो इंसान बन जाओगे जिसे स्त्री बिना कहे चुन लेती है।

[19:53]बिना किसी घोषणा के, बस महसूस करके।

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