[0:00]साल 1877, गर्मियों का मौसम इतना गर्म और खौफनाक था कि ब्रिटिश इंडिया की मद्रास प्रेसिडेंसी में लाखों लोग भूख से मारे गए। हर सड़क पर, हर गाँव में लाशें बिछी हुई थी। इस एक अकाल में लगभग 2 करोड़ लोगों की जान गई। एक फेमिन जिसने इंडिया को लगभग खोखला कर दिया। लेकिन हैरानी की बात ये थी कि ऐसा सिर्फ इंडिया में नहीं हुआ था। ठीक उसी साल चाइना में भी एक भयानक अकाल पड़ा, जिसमें लगभग 2 से 3 करोड़ लोगों की मौत हुई। ब्राज़ील में भी फेमिन आया, लगभग 20 लाख लोग मारे गए। इजिप्त, मोरोक्को, इथोपिया, सदर्न अफ्रीका, इन सारी जगहो पर अकाल देखने को मिला। पूरी दुनिया में एक साथ अलग-अलग कॉन्टिनेंट पर लाखों लोग भूख से तड़प-तड़प कर मर रहे थे। अमेरिका के मिनेसोटा में उस साल को कहा गया द ईयर विदाउट द विंटर, 1877 मानो सर्दियों का मौसम उस साल गायब ही हो गया हो। सवाल ये कि 1877 में ऐसा हुआ क्या? इसकी रूट कॉज दोस्तों कोई अर्थक्वेक, कोई वॉर या कोई डिजीज नहीं थी। असलियत में ये एक नेचुरल फिनोमिना था जो हज़ारों किलोमीटर दूर पेरू की कोस्ट पर समुंदर के एक छोटे से हिस्से में शुरू हुआ था। इसे 17वीं सदी में पेरूवियन फिशरमैन ने प्यार से नाम दिया था एल नीनियो। यानी एक छोटा सा बच्चा, लेकिन उस साल ये नेचुरल फिनोमिना इतना एक्सट्रीम बना, इतना एक्सट्रीम बना कि ये करोड़ों लोगों की मौत का जिम्मेदार बन गया। उस साल जो हुआ उसे सुपर एल नीनियो का नाम दिया जाता है और आज 2026 में लगभग 140 सालों बाद ये वापस आ रहा है। यूरोप के सबसे बड़े वेदर फोरकास्टिंग सेंटर ईसीएमडब्ल्यूएफ के लेटेस्ट मॉडल्स कह रहे हैं कि पिछले 140 सालों का सबसे बड़ा एल नीनियो आने वाला है। कुछ एक्सपर्ट्स तो इसे मेगा एल नीनियो भी बुला रहे हैं और कहा जा रहा है कि 2026 की गर्मियां इंसानी इतिहास की सबसे खतरनाक गर्मियां होने वाली हैं।
[1:53]वीडियो शुरू करने से पहले मैं बताना चाहूंगा दोस्तों इस संडे शाम को 7:00 बजे। मैं लाइव आ रहा हूं और आपके लिए ये लास्ट चांस है। मैं 3 घंटे की लाइव वर्कशॉप ऑर्गेनाइज कर रहा हूं AI मास्टरक्लास 3.0। जो कि सभी बिगिनर्स के लिए फास्टेस्ट और सबसे अफोर्डेबल तरीका है अपने आप को AI की फील्ड में अपस्किल करने का। यहां आप सीखेंगे 30 से ज्यादा AI टूल्स को प्रैक्टिकली इस्तेमाल करना, प्रॉम्प्टिंग टेक्निक्स, सीक्रेट हैक्स। AI से सबसे रियलिस्टिक फोटोज और वीडियोस बनाना, गाने बनाना, वेबसाइट्स बनाना। और ये खास तौर पर उन लोगों के लिए है जिनका कोई टेक्निकल बैकग्राउंड नहीं है। और इसकी कॉस्ट सिर्फ 2 मूवी टिकटो जितनी। स्क्रीन पर आप देख सकते हो पिछली क्लासेस को जिन लोगों ने अटेंड किया था उनका रिव्यू कितना जबरदस्त रहा था। 82% लोगों ने कहा कि उन्होंने जितना एक्सपेक्ट किया था ये क्लास उसके अबोव एंड बियॉन्ड गई। तो जॉइन करने में देरी मत करना, लिंक नीचे डिस्क्रिप्शन में मिल जाएगा या फिर आप इस QR कोड को भी स्कैन कर सकते हो। इंडियन मेटेरियोलॉजिकल डिपार्टमेंट ने हीट वेव वार्निंग्स अभी से ही देनी शुरू कर दी है। दिल्ली में तापमान 40 डिग्री पार कर चुका है। यूपी और राजस्थान में 42 से 43 डिग्री। नागपुर, भोपाल, भुवनेश्वर जैसे शहरों में 45 डिग्री तक पहुंच गया है। और अभी तो अप्रैल ही चल रहा है। बैंगलोर में एक ये वीडियो वायरल हुआ जहां क्रैयोंस धूप में रखे-रखे पिघलने लग गए। रंग-बिरंगा सा लिक्विड बनकर ट्रे में बह रहे हैं। इस पूरे मुद्दे को बेहतर समझने के लिए हमें पहले जानना होगा कि ये एल नीनियो एग्ज़ैक्टली क्या होता है? आसान शब्दों में कहा जाए तो पैसिफिक ओशन का ईस्टर्न और सेंट्रल हिस्सा, जहां आमतौर पर ठंडा पानी होना चाहिए। वहां अचानक पानी अनयूजुअली गर्म हो जाता है। और जब ट्रिलियंस ऑफ लीटर्स ऑफ पानी एक साथ गर्म हो जाए तो इतनी हीट रिलीज होती है कि पूरे प्लेनेट के विंड, रेन और वेदर पैटर्न्स बदल जाते हैं। पैसिफिक ओशन दुनिया का सबसे बड़ा और सबसे गहरा समुंद्र है। इसके ऊपर हवाएं चलती हैं ईस्ट से वेस्ट की दिशा में। इन हवाओं को ट्रेड विंड्स कहा जाता है और ज़्यादातर टाइम ये हमेशा अमेरिका से लेकर एशिया और ऑस्ट्रेलिया की डायरेक्शन में ही फ्लो करती हैं। इससे होता क्या है कि पैसिफिक ओशन के सरफेस पर जो पानी मौजूद है, वो वेस्ट की दिशा में फ्लो करने लगता है ऑस्ट्रेलिया की तरफ। और जब ऊपर का पानी उस तरफ फ्लो करता है तो ईस्ट की दिशा में समुंद्र के नीचे का जो पानी है वो ऊपर की तरफ आने लगता है। यानी साउथ अमेरिका के पास समुंद्र के नीचे से पानी ऊपर आने लगता है। और ये वाला पानी ज़्यादा ठंडा होता है कंपेरेटिवली, ज़्यादा न्यूट्रिएंट्स होते हैं इसमें। ये नॉर्मल सिचुएशन है कि गर्म पानी ऑस्ट्रेलिया की तरफ चला गया और ठंडा पानी साउथ अमेरिका की तरफ आ गया। अब जब पानी गर्म होता है तो वो इवेपोरेट भी ज़्यादा आसानी से हो जाता है और उस इवेपोरेशन की वजह से बादलों की फॉरमेशन होती है और ज़्यादा बारिश देखने को मिलती है ऑस्ट्रेलिया के पास। लेकिन अब इमेजिन करो दोस्तों कि ये ट्रेड विंड्स कमज़ोर पड़ गई और ये हवाएं इतनी तेज़ी से नहीं बह रही। तो जो ठंडा पानी ऊपर आ रहा था साउथ अमेरिका की तरफ वो आना बंद हो जाएगा। सरफेस पर गर्म पानी कंसिस्टेंटली गर्म रहेगा और जो बारिश ऑस्ट्रेलिया की तरफ हो रही थी वो बारिश पैसिफिक ओशन में बीच में कहीं भी हो जाएगी। इसी फिनोमिना को एल नीनियो कहा जाता है, जो कि एक साइकिल की तरह होते रहता है। लेकिन ये कोई इतनी रेगुलर साइकिल नहीं है कभी ये हर 2 साल बाद आता है कभी हर 5 साल बाद तो कभी 7 साल बाद। लेकिन जब ये होता है तो ये 6 से 12 महीने तक चलता है और इस ड्यूरेशन में पूरी दुनिया भर के वेदर पैटर्न्स बदल जाते हैं। ऑस्ट्रेलिया का रीजन बहुत ड्राई हो जाता है बारिश की कमी, बुशफायर्स देखने को मिलती हैं। यही ड्राई कंडीशन साउथ ईस्ट एशिया और इंडिया में भी कैरी ओवर होती है जहां कमजोर मॉनसून और ज़्यादा हीट वेव्स देखने को मिलती हैं। तो एक साधारण एल नीनियो वैसे ही इंडिया के लिए बुरी खबर है लेकिन इस साल स्पेशली इंडिया के लिए बहुत बुरी खबर हो सकती है। अमेरिका की नेशनल ओशनिक एंड एटमॉस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन ने अप्रैल 2026 में अपनी लेटेस्ट एडवाइजरी जारी करी जिसमें उन्होंने बताया कि मई से जुलाई 2026 के बीच में एक एल नीनियो के फॉर्म होने का 61% चांस है। और ये टाइमिंग सबसे खतरनाक चीज है क्योंकि एल नीनियो अपनी पीक पर पहुंचेगा जब इंडिया का मॉनसून सीजन अपनी पीक पर पहुंच रहा होगा। यानी ठीक उसी वक्त जब हमें बारिश की सबसे ज़्यादा जरूरत होती है हमारी फसलें मॉनसून पर डिपेंडेंट होती है उसी वक्त एल नीनियो सब बर्बाद कर सकता है।
[5:49]दूसरी दिक्कत है इस एल नीनियो की इंटेंसिटी। NOAA के अनुसार ये एक बहुत स्ट्रॉन्ग एल नीनियो बन सकता है जिसमें पैसिफिक ओशन का टेंपरेचर 2 डिग्री तक बढ़ सकता है। यानी कि एक सुपर एल नीनियो। अब सुनने में शायद आपको लगे कि 2 ही डिग्री की तो बात है यहां पर लेकिन समुंद्र के अरबों लीटर्स पानी का 2 डिग्री से ज़्यादा गर्म होना एक बहुत बड़ा फर्क पैदा करता है। इसे आप 2015-16 के रेफरेंस में समझ सकते हो। पिछली बार एक सुपर एल नीनियो 2015 में आया था। उस साल मराठवाड़ा में 40% कम बारिश हुई। पूरे इंडिया में 14% कम बारिश और रिकॉर्ड ब्रेकिंग हीट वेव्स देखी गई। आज़ाद भारत के इतिहास में वो वन ऑफ द डेडलिएस्ट हीट वेव्स थी। पूरे देश भर में 2500 से ज़्यादा लोग मारे गए। पाकिस्तान में भी 2000 से ज़्यादा लोग मारे गए इस हीट वेव की वजह से। लेकिन इस साल का एल नीनियो 2015 वाले से भी बड़ा हो सकता है। न्यू यॉर्क स्टेट यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर पॉल राऊंडी के मुताबिक ये पिछले 140 साल में सबसे बड़ा एल नीनियो हो सकता है। तीसरी बड़ी दिक्कत है क्लाइमेट चेंज जिसकी वजह से धरती का एवरेज बेसलाइन टेंपरेचर पहले से ही बढ़ चुका है। 2026 में ये लगभग 1.4 डिग्री सेल्सियस ऊपर है प्री-इंडस्ट्रियल एवरेज से। यहीं पर असली खौफनाक ट्विस्ट आता है। जैसा मैंने आपको बताया एल नीनियो एक साधारण वेदर इवेंट था जो पिछले हजारों सालों से होते आ रहा है। क्लाइमेट चेंज के होने से पहले जब एल नीनियो आता था तो टेंपरेचर 1.4-1.5 डिग्री सेल्सियस बढ़ जाता था। लेकिन आज ये बेसलाइन ऑलरेडी 1.4 डिग्री सेल्सियस पर है। अब एल नीनियो आकर इसमें और 1.5 डिग्री ऐड करेगा नेट रिज़ल्ट 2.9 डिग्री सेल्सियस। इतनी बड़ी टेंपरेचर अनोमली इंसानी इतिहास में कभी नहीं देखी गई है। इमेजिन करो आप एक कमरे में बैठे हो जहां का तापमान पहले से ही 40 डिग्री सेल्सियस है और कोई आकर एक हीटर भी ऑन कर देता है। बस यही है आज का क्लाइमेट चेंज और सुपर एल नीनियो का मिक्सचर। अब 2026 में जो एल नीनियो आएगा उसका इंडिया पर 4 लेयर्स में असर देखने को मिलेगा। पहली लेयर है मॉनसून सीजन की। इंडियन मेटेरियोलॉजिकल डिपार्टमेंट ने पहली बार 2015 के बाद से बिलो नॉर्मल मॉनसून प्रिडिक्ट किया है। नॉर्मल बारिश का सिर्फ 92% रहने का अनुमान है। नॉर्थ-ईस्ट इंडिया, नॉर्थ-वेस्ट इंडिया और साउथ पेनिनसुला के कुछ हिस्सों को छोड़कर बाकी पूरे देश में बारिश की कमी रहेगी। दूसरी लेयर है एग्रीकल्चर। दिक्कत ये है कि इंडिया का लगभग 51% एग्रीकल्चर पूरी तरीके से मॉनसून पर डिपेंडेंट है। तीसरी लेयर है हीट वेव्स। सुपर एल नीनियो की वजह से इंटेंस हीट वेव्स की प्रोबेबिलिटी बढ़ जाती है। फोरकास्ट कहता है कि ईस्ट, सेंट्रल और नॉर्थ-वेस्ट इंडिया और साउथ-ईस्ट पेनिनसुला में इस साल नॉर्मल से ज़्यादा हीट वेव डेज़ होंगे। 2024 इंडिया के इतिहास का अभी तक का सबसे गर्म साल रहा है और साइंटिस्ट प्रिडिक्ट कर रहे हैं कि 2026, 2024 के भी हीट रिकॉर्ड को तोड़ देगा। चौथी लेयर इसका असर सीधा आपके घर पर देखने को मिलेगा। बिलो नॉर्मल मॉनसून का मतलब है कम फूड प्रोडक्शन और कम फूड प्रोडक्शन का मतलब है हायर फूड प्राइज़ेस। डेटा बताता है कि एक एवरेज एल नीनियो ईयर में ग्लोबल नॉन-फ्यूल प्राइज़ेस 5% तक बढ़ जाते हैं। एक सुपर एल नीनियो ईयर में इससे भी ज़्यादा बुरी हालत होती है। फूड के केस में 9% तक की इन्फ्लेशन देखने को मिलती है और अब इंडिया की इन्फ्लेशन पहले से ही हायर है। एक तरफ ईरान में वॉर का प्रेशर और अब खराब मॉनसून की वजह से हालत और बिगड़ सकती है। और इसका सबसे बुरा असर उन लोगों पर पड़ेगा जो AC अफोर्ड नहीं कर सकते और जिनके पास ग्रोसरीज का बफर नहीं होता। ये समझने के लिए कि 2026 कितना बुरा हो सकता है हमें 2024 को देखना पड़ेगा। 2024 इंडिया का 1901 के बाद से सबसे गर्म साल था और 1901 इसलिए क्योंकि उस साल से रिकॉर्डिंग शुरू हुई थी। टेंपरेचर 2024 में चुरू, राजस्थान में 50.5 डिग्री सेल्सियस, गंगानगर, राजस्थान में 49.4 और दिल्ली एनसीआर में 49.1 डिग्री तक पहुंच गया था। अकेले मई 2024 में ही हीट वेव डेज़ 125% बढ़ गए। और यहीं पर एक और बात आती है जो टीवी और न्यूज़ चैनल्स अक्सर मिस कर जाते हैं। आमतौर पर लोगों को लगता है कि हीट वेव से दिन में खतरा है लेकिन हीट वेव सिर्फ दिन में नहीं मारती। सबसे खतरनाक होता है रात को बॉडी का कूल ना होना। इसकी वजह से हमारी बॉडी रिकवर नहीं कर पाती और हीट स्ट्रोक का रिस्क मल्टीप्लाई हो जाता है। ये बात कितनी सीरियस है ये समझने के लिए दिल्ली के 2024 के नंबर्स को देखिए। 2024 में दिल्ली का डे टाइम टेंपरेचर सिर्फ 1.8 डिग्री सेल्सियस बढ़ा, लेकिन रात का टेंपरेचर 4.4 डिग्रीज़ बढ़ा। दिल्ली में मई-जून 2024 में 24 रातें ऐसी थी जब टेंपरेचर 30 डिग्री से ऊपर ही रहा जो कि 2001 से लेकर 2010 की एवरेज का डबल था। ऐसा होने के पीछे एक लोकल रीजन भी है जिसे अर्बन हीट आइलैंड इफेक्ट कहा जाता है। शहरों में हम पेड़ों को काटते जा रहे हैं और ओपन स्पेसेज़ की जगह कंक्रीट खड़ा हो रहा है। कंक्रीट दिन में हीट एब्ज़ॉर्ब करता है और रात को धीरे-धीरे पूरी हीट वापस छोड़ता है। इसके अलावा इसी गर्मी में एक पैराडॉक्स भी देखने को मिलता है। लोग अक्सर अपने घरों को ठंडा करने के लिए AC चलाते हैं। उससे घर तो ठंडा हो जाता है लेकिन उसी AC से पीछे से एग्जॉस्ट हीट निकलती है। जिससे आसपास का एरिया पूरा गर्म हो जाता है और इसे भुगत वो लोग रहे हैं जो AC अफोर्ड नहीं कर सकते। इंडिया में 38 करोड़ वर्कर्स हीट एक्सपोज्ड सेक्टर्स में काम करते हैं। रिक्शा चलाते हैं, कंस्ट्रक्शन साइट्स पर पत्थर ढोते हैं, सड़कों पर सामान बेचते हैं, डिलीवरी करते हैं। ये अधिकांश इनफॉर्मल हैं, इनके पास ना कोई पेड लीव है, ना हेल्थ इंश्योरेंस है, ना कोई लीगल प्रोटेक्शन है। यही लोग इस बढ़ती गर्मी का पूरा बोझ उठाते हैं। दिल्ली के लगभग 400 वर्कर्स पर हुई एक स्टडी के हिसाब से सिर्फ 1 डिग्री टेंपरेचर राइज से इनकी अर्निंग्स 14% गिर जाती हैं। और हीट वेव के दिनों में तो ये 40% तक गिर जाती है। इसके पीछे का कारण है दवा, पानी और बर्फ का खर्चा। नेशनल लेवल पर अनुमान है कि 2024 में हीट वेव की वजह से इंडिया ने 194 अरब डॉलर्स खो दिए। और इसका नुकसान सरकारी कर्मचारियों तक को भी उठाना पड़ता है। 2024 की लोकसभा इलेक्शंस में अकेले उत्तर प्रदेश में 33 पोलिंग ऑफिसर्स हीट स्ट्रोक से मारे गए। इस सब में सरकार की जिम्मेदारी होनी चाहिए कि वो कदम उठाए लोगों को हीट वेव से बचाने के लिए। लेकिन लोगों की जान बचाना तो छोड़िए सरकार उनकी डेथ्स को काउंट भी नहीं करना चाहती। तीन अलग-अलग गवर्नमेंट एजेंसीज़, एनसीआरबी, एनडीएमए और IMD ने 2000 से लेकर 2020 तक बिल्कुल अलग-अलग नंबर्स दिए। एनसीआरबी ने कहा 20 हज़ार से ज़्यादा डेथ्स हीट वेव्स की वजह से हुई। IMD ने कहा सिर्फ 10 हज़ार के अराउंड हुई। कारण है कि डेथ सर्टिफिकेट्स पर डॉक्टर्स मौत का कारण लिखते हैं कार्डिएक अरेस्ट, ऑर्गन फेलियर, डिहाइड्रेशन लेकिन गर्मी को ट्रिगर के रूप में कभी एकनॉलेज नहीं किया जाता। एक्चुअल नंबर इससे कहीं ज़्यादा बड़ा है। एक डिटेल्ड एनालिसिस ने एस्टीमेट किया कि इंडिया में हर साल गर्मियों में लगभग डेढ़ लाख लोग हीट वेव से मरते हैं। और हालत इतनी खराब है कि दुनिया भर में हीट वेव से मरने वाला हर 5 में से एक इंसान इंडियन होता है। इंडिया में 12 तरीके के नेचुरल डिजास्टर्स को ऑफिशियली नोटिफाई किया गया है। इसमें कोल्ड वेव है लेकिन हीट वेव नहीं है। क्यों नहीं है? क्योंकि अगर हीट वेव को नोटिफाइड डिजास्टर बना दिया गया तो नेशनल डिजास्टर रिस्पांस फंड से हर कन्फर्मड हीट रिलेटेड डेथ के लिए सरकार को 4 लाख रुपये की कंपनसेशन देनी पड़ेगी। सरकार ये पैसे नहीं खर्च करना चाहती तो उसे लगता है कि डेथ्स को काउंट ही नहीं करते। 25 जुलाई 2024 को मोदी सरकार ने संसद में साफ कह दिया था कि उसका हीट वेव को नोटिफाइड डिजास्टर में इंक्लूड करने का कोई प्लान नहीं है। सवाल ये उठता है कि क्या इसका कोई सस्ता और सिंपल सोल्यूशन है जो एक्चुअली काम कर सकता है? बिल्कुल है। एक ऐसा सोल्यूशन जिसके बारे में पता चला है कि पेडेस्ट्रियन लेवल पर वो 12 डिग्री सेल्सियस तक टेंपरेचर कम कर सकता है। सोच कर देखो 12 डिग्री सेल्सियस कितना बड़ा नंबर है। अगर टेंपरेचर 47 पर है तो ये सीधा 35 पर ले आएगा। ये एक सिंपल सा सोल्यूशन जो कि है पेड़ लगाना। 182 स्टडीज की मेटा एनालिसिस ने इस चीज को कन्फर्म किया है। ज़्यादा पेड़ लगाने से कंक्रीट भी कम रहेगा जिससे रात का टेंपरेचर भी इतना ज्यादा नहीं बढ़ेगा और ये हीट वेव डेथ्स अपने आप कम हो जाएंगी। तो सवाल ये है कि क्या इंडिया में पेड़ लगाए जा रहे हैं? अनफॉर्चूनेटली दोस्तों बिल्कुल नहीं। इनफैक्ट इसका उल्टा ही किया जा रहा है। अकेले 2024 में ही 18 हज़ार 200 हेक्टेयर प्राइमरी फॉरेस्ट्स काट दिए गए। मुंबई में मैंगरूव्स काटे जा रहे हैं।
[13:58]दिल्ली में DDA ने सुप्रीम कोर्ट के 1996 के ऑर्डर को नज़रअंदाज़ करते हुए रिज फॉरेस्ट काट दिया। महाराष्ट्र के गड़चिरौली में माइनिंग प्लांट के लिए 1.23 लाख पेड़ काटे जाएंगे जिसकी मंजूरी मोदी सरकार ने दी है। नासिक में 100-100 साल पुराने बेनियन ट्रीज़ काटे जा रहे हैं।
[14:23]हज़ार से ज़्यादा पेड़ काटे जा रहे हैं किसके लिए? सिर्फ कुंभ मेले के लिए। हसदेव में पूरा का पूरा जंगल खत्म कर दिया गया एक माइन बनाने के लिए।
[14:46]पिछले एक साल में गुड़गांव में 12 हज़ार 500 से ज़्यादा पेड़ काटे गए। देश में ऑलमोस्ट सभी शहरों का यही हाल है और जब पूछा जाता है कि इतने क्यों काट रहे हो तो बहाना दिया जाता है अरे ये तो डेवलपमेंट के लिए किया जा रहा है। और देखो एक काटा जा रहा है तो वहां 10 और पेड़ लगाए भी जा रहे हैं। लेकिन सच्चाई जानते हो क्या है? एक्चुअली में कितने पेड़ लगाए जा रहे हैं? 2015 से 2019 के बीच हर एक स्क्वायर किलोमीटर नए पेड़ों पर 18 स्क्वायर किलोमीटर पुराने पेड़ काट दिए गए। ये रेट है दोस्तों देश में डिफॉरेस्टेशन का और जो नए पेड़ लगाए गए उनमें से भी 50% आइसोलेटेड पैचेज़ में लगाए गए जिनका कोई इकोलॉजिकल बेनिफिट नहीं है। ये मैं नहीं कह रहा ये आईआईटी बॉम्बे की स्टडी दिखाती है। अब ये सब सुनकर एक नेचुरल रिएक्शन आपके मन में आएगा यार समझ लिया ये सारी बहुत भयानक चीजें हो रही हैं। लेकिन सवाल ये है कि मैं अकेला आदमी यहां पर क्या कर सकता हूं? मैं अकेला एल नीनियो को तो रोक नहीं सकता ना ही मैं क्लाइमेट चेंज को अकेला रोक सकता हूं। तो सवाल ये है कि एक अकेला आदमी यहां पर क्या कर सकता है? कुछ चीजें हैं दोस्तों जो जरूर आपके हाथ में है। नासिक के इन एक्टिविस्ट से इंस्पिरेशन लीजिए और एक-एक पेड़ को, एक-एक पेड़ को अपने शहर में, अपने मोहल्ले में कटने से बचाइए। ये सबसे जरूरी चीज है। नए पेड़ लगाने भी इंपोर्टेंट हैं लेकिन सबसे जरूरी चीज है पुराने पेड़ों को बचाना। क्योंकि जब आप नई सैप्लिंग्स लगाते हो उनमें से 90% तो यूं ही मर जाती हैं। एक्चुअली में सालों तक उन नई सैप्लिंग्स का ख्याल रखना, उस पेड़ को बड़े होते हुए देखना इसमें बहुत लंबा समय लगता है और चांस सक्सेस का काफी कम होता है। तो नए पेड़ भी लगाइए, जरूर लगाइए लेकिन पुराने पेड़ों को बचाना मत भूलिए। इसके अलावा गर्मियों के दिन में 12:00 से 4:00 बजे के बीच बाहर जाने का प्लान मत बनाइए। अपनी बॉडी को हाइड्रेटेड रखिए। ORS का पैकेट अपने पास रखिए ये सिर्फ 10 से 12 रुपये में आता है और हीट स्ट्रोक का फर्स्ट लाइन ऑफ डिफेंस है। इसके अलावा अपने आसपास के लोगों को देखिए जो सिक्योरिटी गार्ड सोसाइटी के अंदर खड़ा होता है, जो डिलीवरी बॉय आपके घर आता है, जो कंस्ट्रक्शन वर्कर बाहर धूप में काम करता है, जो स्ट्रीट वेंडर बाहर खड़ा है। इन सबको ठंडा पानी ऑफर कीजिए और अगर हो सके तो आराम करने के लिए कोई ठंडी जगह भी ऑफर कर सकते हैं। क्योंकि यही लोग सबसे ज़्यादा रिस्क पर होते हैं हीट स्ट्रोक से मारे जाने की। तीसरा क्लाइमेट चेंज को तो हम अकेले रोक नहीं सकते लेकिन हम सब कलेक्टिवली अपना छोटा सा कॉन्ट्रीब्यूशन जरूर दे सकते हैं।
[17:07]आपके घर में जो बिजली आती है उसका एक बड़ा पोर्शन कोयले से आता है। इंडिया की इलेक्ट्रिसिटी में अभी भी 70% कॉन्ट्रिब्यूशन कोयले का है जिसके जलने से ना सिर्फ एयर पोल्यूशन फैलता है बल्कि क्लाइमेट चेंज पर भी एक बहुत बड़ा असर पड़ता है। आप ग्रिड पर डिपेंडेंट होना बंद कीजिए, अपने घर पर सोलर पैनल्स लगाइए। अगर घर पर छत नहीं है तो अपने फ्लैट्स में बालकनीज़ पर सोलर पैनल्स लगा सकते हैं। रीसेंट टाइम्स में सोलर पैनल्स का प्राइज बहुत ज़्यादा नीचे गिर गया है। एक्चुअली में ये आपके पैसे भी बचाएगा। सीरिया जैसे देशों को देखिए जहां वॉर ने सब कुछ खत्म कर दिया था लेकिन अनइंटेंशनली अब वहां पर सोलर रेवोल्यूशन देखने को मिल रही है क्योंकि सोलर इतना सस्ता हो गया है। मेरा खुद का घर अब ऑलमोस्ट पूरा सोलर एनर्जी पर चलता है सिर्फ छत पर लगाए गए पैनल्स की मदद से। आप भी ऐसा कर सकते हैं और करना चाहिए। क्योंकि जो एल नीनियो इस साल आ रहा है वो आखिरी नहीं होगा ये अगले 3-4 साल बाद फिर आएगा फिर उसके 3-4 साल बाद फिर से आएगा। और हर बार ये एक नई गर्म बेसलाइन पर हिट करेगा। अगर हमने अपने कार्बन एमिशन नहीं घटाए, जंगलों को नहीं बचाया और रिन्यूएबल एनर्जी में इन्वेस्ट नहीं किया तो एक दिन ऐसा आएगा जब हर साल एक एल नीनियो ईयर जैसा फील होगा। सबसे शॉकिंग बात ये है कि 2026 में जो बच्चे पैदा हो रहे हैं उनके लिए एक नॉर्मल समर का कॉन्सेप्ट ही अलग होगा। वो कभी जान ही नहीं पाएंगे कि जो गर्मियां हमने अपने बचपन में देखी 30 से 35 डिग्री वाली वो होती कैसी है। उनके लिए गर्मियों का मतलब हमेशा 45 डिग्री सेल्सियस होगा हमेशा से। इसलिए एक्शन लीजिए, ये छोटे-छोटे कदम उठाइए। अपना ख्याल रखिए और अपने आसपास वालों का भी ख्याल रखिए। बहुत-बहुत धन्यवाद। AI मास्टरक्लास को जॉइन करना मत भूलना इसी संडे को होने जा रही है। जॉइन करने का लिंक यहां मिल जाएगा यहां क्लिक कर सकते हो और अगर ये वीडियो पसंद आया और क्लाइमेट चेंज के बारे में समझना चाहते हो कि बाकी देश इससे कैसे फाइट कर रहे हैं तो ये वाली कहानी बहुत इंटरेस्टिंग है एक ऐसे देश की जो डूबने जा रहा है राइजिंग सी लेवल्स की वजह से यहां क्लिक करके देख सकते हो। PRODUCED BY TEAM DR



