[0:00]राजू की फैमिली नए घर में शिफ्ट हुई है, जहां पहले से एक पुराना सोलर पैनल लगा है। फ्री का सोलर पैनल। हम इसे खुद के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं। पापा एक बैटरी ले आए और पैनल से कनेक्ट कर दी। कुछ दिन बाद जब मोहल्ले की बिजली गई। अरे पैनल वाली बैटरी तो फुल चार्ज हो गई होगी। उसे यूज करते हैं। लेकिन यह क्या? बैटरी थोड़ी देर चलने के बाद ही खत्म हो गई। लगता है पैनल ही खराब है। फालतू में बैटरी खरीद ली। राजू ने पैनल चेक करने के लिए अगले दिन दोपहर में पैनल के सर्किट से जुड़े बल्ब को ऑन किया। अरे लाइट तो जल रही है, मतलब पैनल सही है, तो गड़बड़ कहां है? राजू पैनल चेक करने लगा, लेकिन रात हो गई पर दिक्कत समझ नहीं आई। वह हार मान वापस जा ही रहा था कि उसका हाथ पैनल पर पड़ा। आए यह तो गरम हो रहा है, पर बिना धूप के कैसे? कहीं बैटरी से करंट वापस पैनल में तो नहीं आ रहा? यही हो रहा है। करंट हाई पोटेंशियल से लो पोटेंशियल की तरफ फ्लो करता है। दिन में पैनल पर लाइट पड़ती है तो उसके अक्रॉस पोटेंशियल क्रिएट होता है, जिससे करंट बैटरी में जाता है। लेकिन रात में इसका पोटेंशियल जीरो हो जाता है और बैटरी का ज्यादा। इसलिए करंट बैटरी से पैनल में जा रहा है। तो क्या रात में सोलर पैनल डिस्कनेक्ट कर दूं? उससे अच्छा डायोड इस्तेमाल करो। डायोड एक ऐसी सेमीकंडक्टर डिवाइस है जो कि एक पोलैरिटी का पोटेंशियल अप्लाई करने पर कंडक्टर की तरह काम करता है। लेकिन दूसरी तरफ से इंसुलेटर। डायोड दो अलग-अलग टाइप के सेमीकंडक्टर से बना होता है। पी टाइप जिसमें मिसिंग इलेक्ट्रॉन्स के होल्स जिनको पॉजिटिव चार्ज की तरह भी देख सकते हैं, करंट कंडक्ट करते हैं। और एन टाइप जिसमें एक्स्ट्रा इलेक्ट्रॉन्स करंट कंडक्ट करते हैं। एक बात ध्यान देने वाली है। यहां होल्स और इलेक्ट्रॉन्स दोनों सिर्फ चार्ज कैरियर्स हैं। दोनों के दोनों सेमीकंडक्टर्स अपने आप में न्यूट्रल हैं। अगर इन दोनों सेमीकंडक्टर्स को अलग-अलग इस्तेमाल करें तो इनकी कंडक्टिविटी बहुत कम होगी। और वोल्टेज की डायरेक्शन बदलने का करंट के मैग्निट पर कोई असर नहीं होगा। लेकिन अगर इन दोनों को एक साथ जोड़ दें तो बड़ी अनोखी चीज होती है। एक डायरेक्शन में तो करंट बहुत ज्यादा बढ़ जाता है पर दूसरी डायरेक्शन में फ्लो ही नहीं करता। ऐसा इसलिए क्योंकि होल्स और इलेक्ट्रॉन्स एक सेमीकंडक्टर से दूसरे में मूव करने लगते हैं। और तब तक मूव करते रहते हैं जब तक कि इन दोनों में इतना चार्ज डेवलप ना हो जाए कि उसकी इलेक्ट्रिक फील्ड बाकी के बचे इलेक्ट्रॉन्स और होल्स को पास होने से रोक दे। पर अगर डायोड के अक्रॉस एक एक्सटर्नल इलेक्ट्रिक फील्ड अप्लाई की जाए जो इस इलेक्ट्रिक फील्ड के अपोजिट है तो इलेक्ट्रॉन्स और होल्स उसे पार कर लेते हैं और करंट फ्लो करने लगता है। ऐसा डायोड के पी टाइप वाली साइड को हाई पोटेंशियल और एन टाइप वाली साइड को लो पोटेंशियल से जोड़ के किया जाता है। इसे फॉरवर्ड बायस बोलते हैं। लेकिन अगर यह पोलैरिटी चेंज कर दी जाए तो एक्सटर्नल इलेक्ट्रिक फील्ड डायोड की इस इलेक्ट्रिक फील्ड की सेम डायरेक्शन में होगी। और अब इलेक्ट्रॉन्स को पहले से भी ज्यादा स्ट्रांग इलेक्ट्रिक फील्ड को अपोज करना पड़ेगा जिससे वह मूव नहीं करेंगे और करंट फ्लो नहीं होगा। इसे रिवर्स बायस बोलते हैं। समझा, डायोड को इस सर्किट में ऐसे लगाना है कि वह तभी फॉरवर्ड बायस हो जब सोलर पैनल का वोल्टेज ज्यादा है और बैटरी का वोल्टेज ज्यादा होने पर वह रिवर्स बायस हो जाए। हां, सोलर पैनल के सर्किट में इसे ब्लॉकिंग डायोड बोलते हैं। अगले दिन राजू ने डायोड लगाया और सर्किट ठीक काम करने लगा। अरे वाह, यह तुमने किया? हां, डायोड का इस्तेमाल करके। यह डायोड तो बड़े काम की चीज है। लेकिन यह पी और एन टाइप सेमीकंडक्टर बनते कैसे हैं? इसके लिए तो एक और कहानी सुनानी पड़ेगी।

Diode का कमाल | Working of Diode #storywise #physics
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