[0:00]ये शायद से देश के इतिहास का पहला ऐसा करप्शन स्कैम था जहाँ सरकारी रेवेन्यू बढ़ गया. करोड़ों रुपये के मनी ट्रेल को साबित करने के लिए सीबीआई ने पेंसिल से लिखे लूज कागज के सबूत बनाए.
[0:14]नमस्कार दोस्तों, 21 मार्च 2024, रात के करीब 9 बजे. दिल्ली के चीफ मिनिस्टर अरविंद केजरीवाल के घर का दरवाजा खुलता है और बाहर 12 ईडी के ऑफिसर्स खड़े हैं. उनके पास एक सर्च वारंट है, लेकिन इतना ही नहीं, घर के बाहर रैपिड एक्शन फ़ोर्स को भी तैनात किया गया है. दिल्ली सरकार के मंत्री सीएम से मिलने की कोशिश करते हैं लेकिन उन्हें रोक दिया जाता है. पहले रेड होती है, फिर पूछताछ और फिर रात के अंधेरे में वो होता है जो इंडियन डेमोक्रेसी की हिस्ट्री में पहले कभी नहीं हुआ था.
[0:49]एक सिटिंग चीफ मिनिस्टर को गिरफ्तार कर लिया जाता है. The sitting chief minister of Delhi, Mr. Arvind Kejriwal has been arrested. अगले 10 दिन ईडी कस्टडी, उसके बाद तिहाड़ जेल. यह सब हुआ एक लिखकर पॉलिसी की वजह से. इंडिया की सबसे पावरफुल इन्वेस्टिगेटिव एजेंसीज, सीबीआई और ईडी, ज्यादातर मेनस्ट्रीम मीडिया, सभी टीवी न्यूज चैनल्स सबने कह दिया था कि यहां पर करोड़ों रुपए का भ्रष्टाचार हुआ है. लेकिन अब 2 साल बाद जब कोर्ट की जजमेंट आई तो पता चलता है कि कहानी कुछ और ही है. यह पूरा केस इस लेवल का फर्जी था कि सीबीआई के पास सबूत के तौर पर दिखाने के लिए कुछ कागज के टुकड़े थे जिन पर पेंसिल से कुछ लिखा हुआ था. एविडेंस इतना बेबुनियाद था कि कोर्ट को यह ट्रायल के लायक भी नहीं लगा. सभी आरोपियों को डिस्चार्ज कर दिया जाता है, लेकिन दिक्कत बस एक थी. इन सभी आरोपियों ने महीनों तक, सालों तक जेल में सजा काटी थी बिना किसी गुनाह के. सवाल यह है कि आखिर इतनी बड़ी साजिश कैसे रची गई कि झूठे केस में फंसा कर एक चीफ मिनिस्टर तक को जेल भेज दिया गया? इस कोर्ट की जजमेंट में ऐसी-ऐसी चीजें लिखी गई हैं जिन्हें सुनकर आप सही में चौंक जाओगे, जिनकी बात अब आपको मीडिया में कहीं नहीं सुनाई देगी. क्योंकि अगर वह इसकी बात करने लग गए तो वह खुद ही सबसे पहले एक्सपोज हो जाएंगे.
[2:09]यह कहानी असलियत में शुरू होती है 11 फरवरी 2020 को जब पहली खतरे की घंटी बजी थी. किसके लिए बजी थी यह आप जल्द ही जान जाओगे. इस दिन दिल्ली विधानसभा चुनावों के नतीजे आए थे और आम आदमी पार्टी ने 70 में से 62 सीटें जीत कर दूसरी बार सरकार बनाई थी. दिल्ली वालो गजब कर दिया आप लोगों ने. यह जीत बड़ी खास थी क्योंकि 2015 में पहली जीत को शीला दीक्षित के खिलाफ एंटी इनकंबेंसी कहकर डिसमिस किया जा सकता था. लेकिन 2020 की यह जीत इनको अपने काम की वजह से मिली थी. आम आदमी पार्टी ने दिल्ली के सरकारी स्कूल्स और हॉस्पिटल्स की काया पलट कर दी थी और इसकी तारीफ सिर्फ देश में नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में हो रही थी. यूनाइटेड नेशंस के सेक्रेटरी जनरल रहे बान की मून और कोफी आनन ने आपके मोहल्ला क्लीनिक्स की तारीफ की थी. इनके एजुकेशन मॉडल को इंटरनेशनल मीडिया में प्रेस किया जा रहा था. डंका इस लेवल का बज रहा था कि 2022 के लंदन के एजुकेशन वर्ल्ड फोरम में इन्हें प्रेजेंट किया जाता है. इनके हैप्पीनेस करिकुलम को वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम ने प्रेस किया और अमेरिका की फर्स्ट लेडी मेलानिया ट्रंप ने दिल्ली के एक सरकारी स्कूल में हैप्पीनेस क्लास को भी अटेंड किया. इनकी यह जीत एक ऐसे वक्त पर आई थी जब बीजेपी ने शाहीन बाग को मुद्दा बनाकर इलेक्शंस को हिंदू मुस्लिम में करने की कोशिश की थी. तो मित्रों, बटन दबाओ तब इतने गुस्से के साथ दबाना कि बटन यहां बाबरपुर में दबे करंट शाहीन बाग के अंदर लगे. और आपका यह जो नैरेटिव था एजुकेशन और हेल्थ केयर का, यह पूरे देश के सामने एक नया मॉडल पेश कर रहा था पॉलिटिक्स का. तो सारी दिल्ली मिलकर 2 करोड़ के 2 करोड़ वोट सारे के सारे इस बार स्कूलों के नाम पर पढ़ने चाहिए. इस बार अस्पतालों के नाम पर पढ़ने चाहिए. किसी भी देशवासी के लिए इन दोनों में से सही क्या है और गलत क्या है, वह चुनना बहुत ही आसान हो गया था. इसी कारण से 10 मार्च 2022, आम आदमी पार्टी पंजाब में भी रिकॉर्ड ब्रेकिंग मार्जिन से जीत हासिल कर लेती है. 117 में से 92 सीट्स. 2012 में बनी इस पार्टी ने सिर्फ 10 सालों के अंदर-अंदर दो राज्यों में अपनी सरकार बना ली थी और यही दूसरी खतरे की घंटी थी. पंजाब जीत के बाद आपको हिमाचल प्रदेश में भी बड़ा सपोर्ट मिलने लगता है. पार्टी कहती है कि वह हिमाचल की सभी 68 सीट्स पर चुनाव लड़ेगी. इस मिशन का इंचार्ज बनाया जाता है मोहल्ला क्लिनिक्स के आर्किटेक्ट सत्येंद्र जैन को. यह नाम याद रखना क्योंकि आगे की कहानी में बहुत रेलेवेंट होगा. अब हिमाचल तो फिर भी सेकेंडरी फोकस था. पंजाब जीत के बाद आपका प्राइमरी फोकस बनता है गुजरात. 2 अप्रैल 2022, महीने के भीतर भीतर अरविंद केजरीवाल और भगवंत मान गुजरात पहुंच जाते हैं. केजरीवाल ऐलान करते हैं कि दिल्ली और पंजाब के बाद अब गुजरात में करप्शन खत्म करने का समय आ गया है. गुजरात को जीतने के लिए आए हैं. गुजरात से भ्रष्टाचार खत्म करना है. पार्टी बड़े जोरों शोरों से अनाउंस करती है कि गुजरात की सभी सीटों पर अब वह चुनाव लड़ेगी. गुजरात को मोदी और बीजेपी का गढ़ माना जाता है. यहां सीरियसली कंटेस्ट करने का मतलब था मोदी की सो कॉल्ड इनविजिबल इमेज को सीधा टक्कर देना. यह तीसरी और आखिरी खतरे की घंटी थी, क्योंकि इसी पॉइंट के बाद से अचानक से चीजें बदलने लगी. 30 मई 2022, गुजरात की रैली के ठीक एक महीने बाद, ईडी सत्येंद्र जैन को अरेस्ट कर लेती है. यह असल में एक मनी लॉन्ड्रिंग का केस था जो सीबीआई ने फाइल किया था अगस्त 2017 में. अब टाइमिंग देखो यहां पर. केस 2017 का लेकिन अरेस्ट ठीक दो महीने बाद पंजाब जीतने के. क्योंकि यह हिमाचल में भी आपके एक्सपेंशन को लीड कर रहे थे तो सारे हिमाचल के प्लांस यहां पर बिखर जाते हैं. इसके अलावा सत्येंद्र जैन दिल्ली के हेल्थ मिनिस्टर भी थे. दिल्ली का पूरा हेल्थकेयर मॉडल जिसकी दुनिया में तारीफ हो रही थी वह इन्हीं की क्रिएशन थी. एक तीर, दो निशाने. इससे मोहल्ला क्लिनिक्स पर संकट आ गया. हेल्थ और एजुकेशन, दो पिलर्स जिन पर यह मॉडल खड़ा हुआ था, उसमें से एक ढह गया. अब नंबर था एजुकेशन मिनिस्टर का मनीष सिसोदिया. इसी पॉइंट से एक्साइज पॉलिसी का असली खेल शुरू होता है. एलजी, चीफ सेक्रेटरी, सीबीआई, एक-एक करके प्यादों ने अपना काम करना शुरू किया. 8 जुलाई 2022 को दिल्ली के चीफ सेक्रेटरी नरेश कुमार एलजी विनय कुमार सक्सेना को एक रिपोर्ट सबमिट करते हैं. इस रिपोर्ट में कहा जाता है कि दिल्ली की एक्साइज पॉलिसी 2021-22 में कई वायलेशंस हैं. एलएच किया जाता है कि मनीष सिसोदिया ने इस पॉलिसी को बनाते हुए नियमों के खिलाफ जाकर डिसीजनंस लिए. सबसे बड़ा आरोप यह था कि इससे सरकारी खजाने को 580 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ. 22 जुलाई, एलजी इसमें सीबीआई जांच करने का आदेश देते हैं. यहां पर एक इंपॉर्टेंट पॉइंट नोट करो कि ये सब सेंट्रल गवर्नमेंट के अपॉइंटटीज हैं. सेंट्रल गवर्नमेंट अपॉइंटेड चीफ सेक्रेटरी ने रिपोर्ट लिखी, सेंट्रल गवर्नमेंट अपॉइंटेड एलजी ने उसे एक्सेप्ट किया और सेंट्रल गवर्नमेंट की एजेंसी सीबीआई को प्रोब करने का ऑर्डर मिलता है. यह ऐसा ही है कि आईपीएल में एक टीम के ओनर को अंपायर बनने का मौका दे दो और फिर वो अपोनेंट टीम को आउट कर दे. सब एक ही तरफ के लोग थे रिपोर्ट लिखने वाले, अप्रूव करने वाले और इन्वेस्टिगेट करने वाले भी. जोर-जोर से बोल के लोगों को स्कीमें बता दें. 17 अगस्त 2022, सीबीआई इस मामले में एफआईआर दर्ज करती है और मनीष सिसोदिया को आरोपी नंबर वन बनाया जाता है. कुल मिलाकर 15 लोग आरोपी बने. दो दिन बाद मनीष सिसोदिया के घर पर रेड भी मारी जाती है. अब सवाल यह कि ये एक्साइज पॉलिसी थी क्या? सिंपल शब्दों में कहा जाए तो ये एक नई स्कीम थी जो आप सरकार नवंबर 2021 में लेकर आई थी शराब की दुकानों को प्राइवेटाइज करने के लिए. पुरानी पॉलिसी में सरकार खुद से शराब बेचा करती थी. नई पॉलिसी में अब प्राइवेट कंपनीज को लाइसेंस दिए गए. इससे रिटेल लाइसेंस फीस 8 लाख रुपये से बढ़कर 75 लाख हो गई. होलसेलर्स के लाइसेंस 5 करोड़ पर ईयर में बिके और नतीजा. रेवेन्यू टारगेट था 7,041 करोड़ का. आया 8,917 करोड़. यानी कि जितना सरकार ने एक्सपेक्ट किया था इस स्कीम से कमाएगी सरकार उससे 27% ज्यादा ही पैसा कमाया. और यही सबसे बड़ी आयरन ही की बात है. आमतौर पर कोई चीज स्कैम तब होती है जब पैसा गायब होता है, लेकिन यहां पर पैसा बढ़ रहा था. यह शायद से देश के इतिहास का पहला ऐसा करप्शन स्कैम था जहाँ सरकारी रेवेन्यू बढ़ गया. कायदे से मीडिया का काम होना चाहिए था यह सब को एक्सप्लेन करना, लेकिन हमारे टीवी चैनलों ने हेडलाइंस चलानी शुरू कर दी. लिकर गेट, शराब घोटाला. न्यूज चैनल्स कहने लगे कि अगर स्कैम नहीं है तो सीबीआई इन्वेस्टिगेट क्यों कर रही है? सीबीआई बार-बार लगातार ये बता रहे हैं कि दस्तावेजों के आधार पर कार्रवाई करती है. मतलब इस चीज का लॉजिक देखो, पहले इन्वेस्टिगेट करो और फिर कहो अगर इन्वेस्टिगेट हो रहे हो तो जरूर गिल्टी होगे. यह तो ऐसा ही हो गया पुलिस आपको अरेस्ट कर ले और फिर कहे, अगर तुम इनोसेंट हो तो अरेस्ट क्यों होते हो? सबसे बड़ी गलती लोग यही करते हैं कि जो मीडिया ने कहा उसे बिना सोचे समझे मान लिया. खुद से चीजों को गहराई से समझने की कोशिश नहीं करेंगे, बस ऊपर-ऊपर से जो सरफेस लेवल इंफॉर्मेशन बताई जा रही है उसे सच मान लेंगे. लेकिन इंटरेस्टिंग बात यह है कि टेक्नोलॉजी के मामले में भी ज्यादातर लोग एक्जेक्टली यही गलती करते हैं, सरफेस पर रुक जाते हैं. चैट जीपीटी ओपन किया, दो-तीन सवाल पूछे, कुछ जेनेरिक से आंसर्स आ गए और बस सोच लिया कि एआई इतना ही है. यह ऐसा ही है कि मान लो आपको कोई बीमारी है और आप गूगल पर सिम्पटम्स सर्च करते हो और सोच लेते हो कि अब डॉक्टर की कोई जरूरत नहीं. लेकिन सरफेस और डेप्थ में जमीन आसमान का अंतर है. जिन लोगों ने एआई मास्टरक्लास को अटेंड किया, आज वह बिना एक लाइन का कोड लिखे पूरी की पूरी वर्किंग वेबसाइट्स बना रहे हैं. कोई 10 मिनट में डिटेल्ड रिसर्च रिपोर्ट्स निकाल रहा है तो कोई प्रोफेशनल प्रेजेंटेशंस बना रहा है. ऐसे काम जिनमें नॉर्मली 2 से 3 दिन लग जाते थे पहले. और यह तो सिर्फ छोटे से उदाहरण है. एआई मास्टरक्लास में मैं पर्सनली लाइव आकर आपको 3 घंटे में 25 से ज्यादा एआई टूल्स सिखाता हूं. यह मास्टर क्लास खासतौर पर नॉन टेक्निकल लोगों के लिए बनाई गई है स्टूडेंट्स, प्रोफेशनल्स, क्रिएटर्स, बिजनेस ओनर्स. अब तक एक लाख से ज्यादा लोग इसे अटेंड कर चुके हैं और पिछले सेशन में 82% लोगों ने कहा था कि जितना उन्होंने एक्सपेक्ट किया था उससे अबव एंड बियोंड उन्होंने इस क्लास से सीखा है. स्क्रीन पर आप रिव्यूज देख सकते हो और एक्जेक्टली अगर इस डेट और टाइम पर आप अटेंड करने नहीं आ सकते तो अगले 7 दिन तक आप रिकॉर्डिंग भी देख पाओगे. जॉइन करने का लिंक नीचे डिस्क्रिप्शन और पिन कमेंट में मिल जाएगा जल्दी से जाकर कर सकते हो. इसके बाद आता है हमारी कहानी में सबसे बड़ा ट्विस्ट. पॉलिसी के इंप्लीमेंट होने से सिर्फ दो दिन पहले, एलजी अपनी मर्जी से रूल्स बदल देते हैं. इसकी वजह से 300-400 दुकानों पर रोक लगा दी गई, रेवेन्यू का बड़ा नुकसान हुआ. जिन वेंडर्स ने लाइसेंस लिए थे वो भी घाटे में आ गए और उन्होंने अपने लाइसेंसेज सरेंडर करने शुरू कर दिए. सीबीआई रेड और एलजी की इस इंटरफेरेंस की वजह से एक डोमिनो इफेक्ट शुरू हो गया. प्राइवेट कंपनीस पर प्रेशर पड़ने लगा और आखिरकार 1 सितंबर 2022 को आम आदमी पार्टी की सरकार खुद ही इस पॉलिसी को वापस ले लेती है. इससे मीडिया को एक और बहाना मिल जाता है. अगर पॉलिसी में कुछ गलत नहीं था तो वापस क्यों ली? जवाब बड़ा ऑब्वियस था पॉलिसी इसलिए वापस ली क्योंकि एलजी और सीबीआई ने मिलकर इसे चलाना इंपॉसिबल बना दिया था. लेकिन जनता तक यह बात कम्युनिकेट कौन करेगा. साल के बीच में यह पॉलिसी हटाने के बावजूद उस साल दिल्ली सरकार का एक्साइज रेवेन्यू किसी भी साल में सबसे ज्यादा होता है. इस एक्स्ट्रा रेवेन्यू को एजुकेशन और हेल्थ केयर पर खर्च करके और भी बड़ी रेवोल्यूशन लाई जा सकती थी. लेकिन ऐसा करने का मतलब था कि साहब अपने पैर पर ही कुल्हाड़ी मारते. इसीलिए इसके बाद एक-एक करके अरेस्ट होने शुरू हुए. 27 सितंबर 2022, सीबीआई विजय नायर को अरेस्ट करती है. विजय नायर आप के कम्युनिकेशंस हेड थे. एक बार फिर से पार्टी के गुजरात में इलेक्शंस लड़ने के लिए कम्युनिकेशंस हेड एक बहुत ही क्रिटिकल फिगर था. कहते हैं राजा की जान तोते में होती है. गुजरात मोदी के लिए वह तोता था. इन सब अरेस्ट्स के बावजूद अगले महीने जब गुजरात में इलेक्शंस होती हैं तो आम आदमी पार्टी को 13% वोट्स फिर भी मिल जाते हैं. 5 सीट्स पार्टी फिर भी जीत जाती है. इस 13% वोट शेयर ने मानो राजा के पसीने निकाल दिए थे, क्योंकि इसके बाद से यह साजिश रुकती नहीं है. बल्कि और बड़ी होती चली जाती है. 26 फरवरी 2023, सीबीआई मनीष सिसोदिया को अरेस्ट कर लेती है और यहां पर अपनी डबल अरेस्ट स्ट्रेटेजी अपनाती है. पहला सीबीआई का अरेस्ट, दूसरा ईडी का अरेस्ट. 9 मार्च को ईडी उन्हें पीएमएलए केस में अरेस्ट करती है. यहां इस पीएमएलए को समझना जरूरी है क्योंकि यह इस पूरी साजिश का ब्रह्मास्त्र है. पीएमएलए का फुल फॉर्म होता है प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट. इसे ओरिजनली बनाया गया था ड्रग ट्रैफिकिंग और टेररिज्म फाइनेंसिंग से लड़ने के लिए. लेकिन लेटली इसका इस्तेमाल सिर्फ और सिर्फ अपोजिशन पॉलीटिशियंस को अरेस्ट करने के लिए किया गया है. इस कानून की सबसे खतरनाक बात यह है कि इसमें बेल मिलना लगभग इंपॉसिबल है. नॉर्मल क्रिमिनल लॉ की प्रिंसिपल है कि इनोसेंट अंटिल प्रूवन गिल्टी. लेकिन पीएमएलए में यह उलट जाता है. इसका सेक्शन 45 कहता है कि बेल तभी मिलेगी जब जज सेटिस्फाइड हो कि एक्यूज्ड गिल्टी नहीं है. यहां का पैटर्न बड़ा क्लियर था. पहले करप्शन केस में सीबीआई से अरेस्ट करवाओ और उसमें बेल मिलने से पहले ही पीएमएलए केस में ईडी से अरेस्ट करवा लो. लेकिन इस सब के बावजूद राजा साहब के लिए दिक्कत यहां पर यह हो रही थी कि इतने अरेस्ट के बाद भी कोई यहां पर पलट नहीं रहा था. आमतौर पर अभी तक यह देखा गया था कि जब भी किसी अपोजिशन लीडर पर करप्शन का केस हो तो वो पलटकर बीजेपी जॉइन कर लेता. लेकिन इस केस में ना सत्येंद्र जैन, ना मनीष सिसोदिया और ना ही विजय नायर ने बीजेपी जॉइन करी. इसलिए अब इकलौता तरीका इन्हें दिल्ली में इलेक्शन हराने का था कि पूरी दिल्ली की गवर्नेंस को ही थप कर दिया जाए. कोई भी काम मत होने दो, हर एक अच्छे काम पर रोक लगा दो. इसलिए 19 मई 2023, मोदी सरकार एक नया ऑर्डिनेंस लेकर आती है गवर्नमेंट ऑफ एनसीटी ऑफ दिल्ली अमेंडमेंट ऑर्डिनेंस. इसमें लिखा जाता है कि अब दिल्ली के सारे सिविल सर्वेंट्स पर एलजी का कंट्रोल होगा, दिल्ली की चुनी हुई सरकार का नहीं. इसका मतलब था कि सीएम केजरीवाल अपने खुद के ऑफिसर्स को हटा भी नहीं सकते थे. अगर कोई ऑफिसर काम ना करे तो केजरीवाल कुछ नहीं कर सकते थे. एक सीएम होने के बावजूद अपने खुद के पियॉन को भी हटाने का अधिकार नहीं था उनके पास. इसके बाद से केजरीवाल की सरकार के हाथ पूरी तरीके से बांध दिए गए थे. यहां पर एक इंटरेस्टिंग बात देखी कि 2025 में जब बीजेपी ने दिल्ली के चुनाव जीत लिए तब से एलजी का नाम कैसे न्यूज से पूरी तरीके से गायब हो गया है. लेकिन जब तक आप की सरकार दिल्ली में थी, एलजी हर रोज हेडलाइंस में आते थे. 4 अक्टूबर 2023, ईडी आपके राज्यसभा एमपी संजय सिंह को भी अरेस्ट कर लेती है. फिर से वही लिकर स्कैम का बहाना दिया जाता है. इस पॉइंट तक पार्टी की सारी टॉप लीडरशिप जेल में थी. शायद देश के इतिहास में आज तक कभी नहीं हुआ था कि किसी भी पॉलिटिकल पार्टी की सारी टॉप लीडरशिप जेल में हो. यहां भी वही सेम लिकर स्कैम का बहाना दिया जाता है. बस सीएम खुद बचे थे और 21 मार्च 2024 को वो कसर भी पूरी हो जाती है. अरविन्द केजरीवाल. अरविन्द केजरीवाल अरेस्टेड. इन कनेक्शन विद दी एलेजेड लिकर स्कैम केस. ईडी अरविंद केजरीवाल को शराब घोटाले का किंगपिन कहकर अरेस्ट कर लेती है. यह अरेस्ट लोकसभा इलेक्शन से ठीक दो महीने पहले होता है. अगर आपको याद हो दोस्तों इस पर मैंने तब भी वीडियो बनाया था. तब भी बताया था कि यह केस कितना फर्जी है इस बात को एक बच्चा भी समझ सकता है. 13 सितंबर 2024, सुप्रीम कोर्ट ने केजरीवाल को फाइनली बेल दी, लेकिन कंडीशनस लगाई कि केजरीवाल ऑफिस नहीं जा सकते, फाइलें साइन नहीं कर सकते और ऑफिशियल डिसीजनंस नहीं ले सकते. यह दिल्ली की गवर्नेंस के लिए फाइनल ब्लो थी. पहले एलजी फिर मोदी की ऑर्डिनेंस और अब यह सुप्रीम कोर्ट की कंडीशंस. चीफ मिनिस्टर की पोजीशन अब सही मायनों में सिर्फ नाम नाम की रह गई थी. 100% पावर्स को अब छीना जा चुका था. इसलिए 17 सितंबर 2024, अरविंद केजरीवाल चीफ मिनिस्टर की पोजीशन से रिजाइन कर देते हैं. कहते हैं, और जब तक जनता अपना फैसला ना सुना दे कि केजरीवाल ईमानदार है तब तक मैं सीएम की कुर्सी के ऊपर नहीं बैठूंगा. इस वक्त तक दिल्ली की आने वाली इलेक्शंस में सिर्फ 4 महीने रह गए थे. इन 4 महीनों में उनकी पार्टी के लोगों को रिजाइन करके बीजेपी जॉइन करने के लिए प्रेशराइज किया जाता है. कम से कम 13 सीटिंग एमएलएज, तीन फॉर्मर एमएलएज और 10 से ज्यादा काउंसलर्स बीजेपी को जॉइन करते हैं. इस बार बीजेपी की पूरी कैंपेन इसी शराब घोटाले पर आधारित होती है. हर होर्डिंग पर हर टीवी ऐड में हर रैली में इसी एलेजेड स्कैम का इस्तेमाल किया जाता है. दूसरी तरफ आम आदमी पार्टी के पास कोई काम नहीं था दिखाने को क्योंकि पिछले तीन सालों से उनकी टॉप लीडरशिप जेल में बंद थी. बची कुछ ही कसर जीएनसीटीडी एक्ट ने पूरी कर दी थी चुनी गई सरकार से सारी पावर्स छीन कर. 8 फरवरी 2025, दिल्ली विधानसभा चुनावों के नतीजे आते हैं. बीजेपी को 48 सीटें मिलती है और आप को सिर्फ 22. कुछ इस तरीके से 27 साल बाद दिल्ली में बीजेपी पावर में आ जाती है. लेकिन इसके बावजूद बीजेपी और आप के वोट शेयर में सिर्फ 2% का अंतर था. बीजेपी को मिले 45.81% वोट्स और आपको 43.55%. यह अपने आप में एक चमत्कार था कि सालों की नेगेटिव मीडिया कवरेज के बाद, पूरी टॉप लीडरशिप को जेल भेजने के बावजूद, सारी गवर्नेंस खत्म करने के बावजूद, वोट शेयर डिफरेंस सिर्फ 2% का था. 2022 में जिस प्लान की शुरुआत हुई थी वो अब पूरा हो चुका था. और इसी से ही मिलता है दिल्ली वालों को एक नया तोहफा, एक नई चीफ मिनिस्टर, रेखा गुप्ता. अब जब तक 70 साल से वह कर रहे थे ईवीएम हैक तो कुछ नहीं हो रहा था. हमने कर लिया तो बुरा लग गया. यह सही है मामला. मुझे नहीं पता ये जाकर फाइल पर कहता है अंगूठा लगा दो मैं वहीं लगाता हूं. और एक यूआई एक ऐसा आपका टेंपरेचर है आपको जो किसी भी इंस्ट्रूमेंट से पता चलता है. यहां से हम फास्ट फॉरवर्ड करते हैं ठीक एक साल बाद 27 फरवरी 2026, कोर्ट इस मामले में अपना फैसला सुनाता है. यह जजमेंट इंडियन लीगल हिस्ट्री में एक वाटरशेड मूवमेंट बन जाता है. कोर्ट कहता है कि पूरा यह एक्साइज पॉलिसी का केस इतना भी स्ट्रांग नहीं था कि इसमें प्राइम ऑफ एसी सस्पिशन हो. पहली नजर में कोई शक पैदा हो, ग्रेव सस्पिशन होना तो बहुत दूर की बात है. कोर्ट की जजमेंट की एग्जैक्ट लाइन मैं आपको पढ़कर सुनाना चाहूंगा. एक्साइज पॉलिसी का जो केस सीबीआई ने पेश करने की कोशिश की, वह अदालती जांच में पूरी तरह टिकने में नाकाम रहा है और पूरे का पूरा केस बेबुनियाद साबित हो चुका है. असल में बात क्या है दोस्तों, यह पूरा केस अप्रूववर्स पर टिका हुआ था. अप्रूवर कौन होता है, यह वह आरोपी होता है जो इन्वेस्टिगेटिव एजेंसी का गवाह बन जाता है. बदले में उसे कुछ रियायतें मिलती हैं. इस केस का सबसे बड़ा अप्रूवर था सरथ चंद्रा रेड्डी. इसकी कहानी बड़ी इंटरेस्टिंग है क्योंकि एक केस में यह अप्रूवर है यानी कि सरकारी गवाह है और दूसरे केस में यह खुद आरोपी है. पीएमएलए केस में जैसा मैंने बताया था वैसे तो बेल मिलना लगभग इंपॉसिबल है, लेकिन इसे बैक पेन के लिए बेल मिल गई. सिर्फ इसने कहा मुझे कमर का दर्द है और इसे बेल दे दी गई. और सबसे इंटरेस्टिंग बात पता है क्या है. इस पूरे केस में जो मनी ट्रेल निकला वो एक ही निकला. आम आदमी पार्टी की तरफ नहीं बल्कि बीजेपी की तरफ. इस सरथ चंद्रा रेड्डी ने इलेक्टोरल बॉन्ड्स के जरिए बीजेपी को पैसे डोनेट किए थे. इसकी कंपनी अरबिंदो फार्मा ने 5 करोड़ रुपए इसकी अरेस्ट के 5 दिन बाद दिए और 25 करोड़ रुपए इसके इस केस में अप्रूवर बनने के दो महीने बाद दिए. अब क्रोनोलॉजी समझ लीजिए. यहां पर एक बच्चा भी समझ सकता है क्या हो रहा है. इस बंदे को अरेस्ट किया इसने कुछ पैसे बीजेपी को डोनेट किए और कुछ टाइम बाद जब इसे अप्रूवर बना दिया गया केस में तो इसने और पांच गुना पैसे बीजेपी को डोनेट किए. यानी जो इंसान आम आदमी पार्टी को किकबैक देने का आरोपी है उसका एक्चुअल मनी ट्रेल बीजेपी की तरफ जाता है. अब दूसरे बंदे की कहानी देखो, मगुंता रेड्डी. इसने खुद एडमिट किया कि यह केजरीवाल से मिला लिकर बिजनेस के लिए सपोर्ट एंड गाइडेंस मांगी और अपने बेटे राघव को अपफ्रंट मनी देने का काम सौंपा. और प्रॉसिक्यूशन ने मगुंता की बात को कंफर्म करने के लिए उसके बेटे राघव को ही गवाह बना दिया. कोर्ट ने अपनी जजमेंट में लिखा कि ये कैसे पॉसिबल हो सकता है. कानून के हिसाब से एक आरोपी दूसरे आरोपी को कंफर्म नहीं कर सकता है. अब आते हैं केस के सबसे मजेदार हिस्से पर. प्रॉसिक्यूशन का कहना था कि 44.54 करोड़ रुपए का काला धन दिल्ली से गोवा भेजा गया हवाला चैनल्स के जरिए और यह पैसा एक्साइज पॉलिसी स्कैम का प्रोसीड्स ऑफ क्राइम था. अब इसका सबूत क्या था. पेंसिल से लिखे हुए कागज के टुकड़े. टोटल 10 में से छह लोगों ने प्लेन व्हाइट पेपर सबूत के तौर पर दिए जिनमें पेंसिल से कुछ लिखा हुआ था और बाकी चार के पास तो कोई रिकॉर्ड ही नहीं था. यानी करोड़ों रुपए के मनी ट्रेल को साबित करने के लिए सीबीआई ने पेंसिल से लिखे लूज कागज के सबूत बनाए. जाहिर सी बात है कोर्ट ने इन डॉक्यूमेंट्स को सबूत मानने से ही इंकार कर दिया. इसके अलावा सीबीआई ने आरोप लगाया था कि मनीष सिसोदिया ने जनवरी 2021 को एक अहम कैबिनेट नोट गायब कर दिया. इसमें एक्साइज पॉलिसी के खिलाफ लीगल ओपिनियंस लिखे थे. लेकिन जानते हो क्या, सीबीआई ने इन लीगल ओपिनियंस को क्लीयरली प्रेजेंट करने की बजाय इन्हें 14000 से ज्यादा ईमेल के डंप में दबा दिया. जज ने इसे साफ तौर पर सप्रेशन बाय ऑब्स्क्योरिटी कहा. जानबूझकर सीबीआई ने चीजों को छुपाने की कोशिश की. जब कोर्ट ने सीबीआई के अपने ही रिकॉर्ड्स को खंगाला तो पता चला कि वो लीगल ओपिनियंस तो मनीष सिसोदिया को क्लीन चिट देते हैं. यानी समझने की कोशिश करो यहां पर क्या हो रहा था. जो एविडेंस आरोपियों के पक्ष में जा रहा था, सीबीआई ने उसे 14000 से ज्यादा ईमेल के ढेर में दबाकर रखा. मनीष सिसोदिया के बारे में कोर्ट ने कहा कि उन्होंने पॉलिसी बनाते वक्त सारे कांस्टीट्यूशनल चैनल्स को फॉलो किया था और किसी भी तरह से कोई मैनिपुलेशन नहीं की. कोर्ट ने यह तक कहा कि रिकॉर्ड्स दिखाते हैं, ये पॉलिसी एलजी से डिस्कस हुई थी, उनके सजेशनस भी इसमें शामिल किए गए. काउंसिल ऑफ मिनिस्टर्स ने इसे अप्रूव किया. एलजी सेक्रेटेरिएट ने इसकी स्क्रूटनी की तो फिर कंस्पिरेसी का आरोप सिर्फ डिप्टी सीएम पर क्यों लगाया गया? अगर यहां पर स्कैम हुआ था तो इसमें एलजी भी स्कैम के आरोपी बनने चाहिए थे. क्योंकि एलजी ने ही तो इस पॉलिसी को अप्रूव किया था. कोर्ट ने कहा कि एक ही कागजात से एक को बरी और दूसरे को मुजरिम नहीं बना सकते. पेज नंबर 194 पर क्लीयरली लिखा है. बाय द वे एक कोर्ट जजमेंट को अगर आप पूरा देखना चाहो नीचे डिस्क्रिप्शन में डाल रखी है मैंने. अरविंद केजरीवाल के बारे में सीबीआई का कहना था कि वह इस स्कैम के किंगपिन है क्योंकि वह सबसे ऊपर बैठे हैं. कोर्ट ने नोट किया कि केजरीवाल का नाम पूरे केस में पहली चार्जशीट में कहीं नहीं था. दूसरी चार्जशीट में कहीं नहीं था, तीसरी में भी नहीं था. उनका नाम सिर्फ चौथी सप्लीमेंट्री चार्जशीट में ऐड किया गया. और फिर आप कह रहे हो कि वह किंगपिन है. उन्हें फंसाने के लिए सबसे बड़ा सबूत सीबीआई के पास था सिर्फ एक अप्रूवर का बयान, मगुंता रेड्डी का बयान. कोर्ट ने कहा कि जिस बातचीत का हवाला दिया जा रहा है वह 10 से 12 लोगों के सामने हुई थी. लेकिन हैरानी की बात यह है कि उनमें से किसी की भी गवाही नहीं ली गई. कोर्ट के हिसाब से केजरीवाल ना तो दिल्ली में किसी कंस्पिरेसी मीटिंग में गए ना हैदराबाद में. जिस दौर में कथित साजिश रची जा रही थी उस दौरान केजरीवाल ना तो सिसोदिया से मिले ना ही किसी और को एक्यूज्ड से. यानी जिस इंसान को सीबीआई ने किंगपिन बताया उसका किसी भी आरोपी से किसी भी जगह पर किसी भी मीटिंग में मिलना तक साबित नहीं हो पाया. कोर्ट ने कहा कि सीबीआई ने पहले कंक्लूजन तय कर लिया और फिर उस कंक्लूजन को फिट करने के लिए फैक्ट्स को अरेंज किया. यह कोई इन्वेस्टिगेशन नहीं थी. यह एक प्री कंसीव्ड नैरेटिव था जिसमें बस लोगों को फिट कर दिया गया. कोर्ट ने इसे सीधे तौर पर कोरियोग्राफ्ड एक्सरसाइज कहा और सीबीआई के इन्वेस्टिगेटिंग ऑफिसर के खिलाफ डिपार्मेंटल इंक्वायरी का भी आदेश दिया. अब आप समझ सकते हो दोस्तों किस लेवल का खेल यहां पर खेला गया है. इस सो कॉल्ड शराब घोटाले के नाम पर सीबीआई ने 4 साल तक इन्वेस्टिगेशन की. रिसोर्सेस खर्च किए, ऑफिसर्स लगाए, रेड्स की, स्टेटमेंट्स ली, चार्जशीट्स फाइल करी गई. दिल्ली की पूरी गवर्नेंस को खत्म कर दिया गया. जिस अच्छे काम की दुनिया में तारीफ हो रही थी जिससे लोगों का भला हो रहा था. करोड़ों लोगों को फायदा पहुंच रहा था एजुकेशन और हेल्थ केयर उसे पूरी तरीके से खत्म कर दिया गया. इस सब के बीच मेनस्ट्रीम मीडिया जर्नलिस्ट और यूट्यूबर का फर्ज बनता था कि वह सच जनता के सामने रखे. लेकिन इनमें से ज्यादातर ने क्या किया. इन्होंने सीबीआई की चार्जशीट को फैक्ट्स के तौर पर पेश कर दिया. एविडेंस देयर, सो दे सजेस्ट फोन रिकॉर्ड्स एंड स्टेटमेंट्स कमिंग इन अलोंग विद मनी ट्रेल एंड दैट मनी हैज एक्सचेंज मेनी हैंड्स. जबकि सच बात यह है दोस्तों कि इन इन्वेस्टिगेटिव एजेंसीज की चार्जशीट में जो लिखा गया है उसका सच से दूर-दूर तक कुछ लेना नहीं है. ये जो चाहे वो लिख सकते हैं अपने चार्जशीट में, चाहे तो ये कल को लिख देंगे कि सूरज दक्षिण से निकलता है. लेकिन जब तक ये चीजें कोर्ट में साबित नहीं होंगी तब तक ये सिर्फ और सिर्फ एजेंसी का ओपिनियन रहेगा. ये चीज आपको भी यहां एज अ व्यूअर समझनी होगी दोस्तों. जब भी यह मीडिया वाले कोई मीडिया ट्रायल करते हैं यह हमेशा इन चार्जशीट्स पर रिलाई करते हैं. एनडीटीवी के साथ भी एग्जैक्टली यही हुआ था. एजेंसीज ने सालों तक केसेस चलाए, रेड्स की, रॉयल्स को हर तरफ से घेरा. हर जगह मीडिया वालों ने खबरें चलाई कि यहां पर करोड़ों रुपए का घोटाला किया है प्रणय रॉय ने. लेकिन जब चैनल अडानी को बिक गया बाद में सीबीआई ने खुद ही क्लोजर रिपोर्ट फाइल करके कहा कि कोई क्रिमिनल कंस्पिरेसी नहीं मिली. एक सत्ता का भूखा राजा अपनी सत्ता को बचाने के लिए किस कदर नीचे गिर सकता है, यह दो केसेस उसके सबसे बढ़िया उदाहरण है. और कहानी यहां खत्म नहीं होती. जो-जो इंसान इस अनपढ़ राजा के सामने एक बेसिक स्पाइन दिखाता है उससे इसे बहुत तकलीफ होती है. जैसे कि उस ट्रायल कोर्ट जज को देख लीजिए जिसने केजरीवाल को बेल दी. उनका ट्रांसफर कर दिया गया. सिर्फ यही नहीं इसके तुरंत बाद एक सर्कुलर जारी किया गया जिसमें सभी वेकेशन जजेस को कहा गया कि वह कोई फाइनल ऑर्डर्स नहीं दे सकते, सिर्फ रेगुलर बेंच को के लिए नोटिस दे सकते हैं. इसी तरह जस्टिस मुरलीधर ने 2020 दिल्ली राइट्स के दौरान दिल्ली पुलिस को बीजेपी लीडर्स के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का आदेश दिया. और रिस्पांस में क्या किया. मोदी सरकार ने उनका ही ट्रांसफर कर दिया. ऐसे ही हुआ संभल के सीजीएम जज विभांशु सुधीर के साथ. संभल हिंसा में पुलिस वालों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का आदेश दिया और एक हफ्ते के अंदर उनका ट्रांसफर कर दिया गया. पैटर्न साफ दिखता है. अब देखना इन जज के साथ क्या होगा जिन्होंने इस एक्साइज पॉलिसी का ऑर्डर दिया. कुछ समय बाद आपको खुद ही पता चल जाएगा. इस राजा का मैसेज बड़ा क्लियर है अगर आप सरकार के खिलाफ फैसला दोगे तो आपको इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी. और यह सिर्फ जजेस की बात नहीं है. यह हर वह ऑफिसर हर वह ब्यूरोक्रेट जो हिम्मत दिखाता है, उसका यह ट्रांसफर कर देते हैं उठा कर. इस फैसले के बाद अरविंद केजरीवाल कोर्ट से बाहर आकर मीडिया से बात करते हुए रो पड़े. उन्होंने कहा मोदी जी और अमित शाह ने मिलकर इंडिपेंडेंट इंडिया की सबसे बड़ी कंस्पिरेसी रची है. मोदी जी ने और अमित शाह जी ने मिलकर यह आजाद भारत का सबसे बड़ा राजनीतिक षड्यंत्र रचा है. आम आदमी पार्टी को खत्म करने के लिए आम आदमी पार्टी के सबसे बड़े पांच नेताओं को जेल में डाल दिया गया. यहां तक कि सिटिंग चीफ मिनिस्टर जो आज तक भारत के इतिहास में कभी नहीं हुआ, सिटिंग चीफ मिनिस्टर को उसके घर से घसीट कर जेल में डाला गया और 6 महीने तक जेल में रखा गया. यह सिर्फ दिल्ली या आम आदमी पार्टी की कहानी नहीं है दोस्तों. ये एक टेंपलेट है, पहले एजेंसीस भेजो, फिर मीडिया ट्रायल करो, फिर साल दर साल जेल में सड़ाओ, जब तक कोर्ट फैसला दे तब तक इलेक्शन निकल चुका हो, सरकार जा चुकी हो और चैनल बिक चुका हो. कोर्ट ने सारा ब्लेम उस सीबीआई इन्वेस्टिगेटिंग ऑफिसर पर डाला है जिसने इस पूरे केस को लीड किया. लेकिन सवाल यह है कि क्या उसने ये सब अपनी मर्जी से किया? क्या किसी भी एक ऑफिसर में इतनी हिम्मत है कि वो एक सिटिंग चीफ मिनिस्टर को एक झूठे केस में अरेस्ट करवा ले और पीछे ही पड़ जाए. बिल्कुल नहीं. इसलिए यह कहानी दोस्तों दिल्ली या आम आदमी पार्टी की नहीं है. यह कहानी है एक ऐसे राजा की जो सत्ता की भूख में इतना अंधा हो गया कि उसने अपनी सत्ता को बचाने के लिए करोड़ों लोगों की जिंदगियां तबाह करना चुना. और ये अभी खत्म नहीं हुई है. हाई कोर्ट ने लोअर कोर्ट के जज के रिमार्क्स पर स्टे भी लगा दिया है. लेकिन इस पूरी कहानी से हमें एक बहुत बड़ी सीख मिलती है तानाशाही के खिलाफ खड़े होने के लिए. इस देश में सही मायनों में कुछ बदलाव लाने के लिए बस एक इंसान चाहिए होता है जिसकी रीढ़ की हड्डी सीधी हो सिर्फ एक. यह वीडियो उन सभी लोगों के लिए सैल्यूट है जो इस सिस्टम में रहकर भी हिम्मत दिखाते हैं. हर वो ऑफिसर जो प्रेशर के बावजूद सही काम करता है. हर वो जज जो अपनी पोस्ट से ज्यादा देश को प्यार करता है. यह कहने में आसान लगता है लेकिन ऐसी बहादुरी की अक्सर कीमत चुकानी पड़ती है. ट्रांसफर, डिमोशन या फिर किसी और तरीके से मार्जिनलाइज होना. लेकिन एक बात पक्की है जिस दिन सिस्टम के अंदर मेजॉरिटी लोग इस तरीके से हमेशा सही का साथ देने लग गए. उस दिन यह देश अपने आप डेवलप हो जाएगा. उस दिन देश अपने आप ऊपर जाएगा. बहुत-बहुत धन्यवाद. जय हिंद. एआई मास्टरक्लास को जॉइन करना मत भूलना. लिमिटेड टाइम है यहां क्लिक करके भी आप कर सकते हो. और यहां क्लिक करके अब वो वाला वीडियो देखो जब केजरीवाल को अरेस्ट किया गया था. तब मैंने क्या कहा था. वो बातें अब कितनी सच साबित हुई है.



