[0:00]70 के दशक की माया नगरी मुंबई। बॉम्बे पुलिस के एक बेहद ईमानदार और उसूलों वाले हेड कांस्टेबल इब्राहिम खास कर का परिवार रहता था। इब्राहिम एक ऐसा शख्स था जिसने जिंदगी भर अपनी खाकी वर्दी पर रिश्वत का एक दाग नहीं लगने दिया। लेकिन नियति का खेल देखिए। उसी पुलिस वाले के घर में एक ऐसा नापाक मनसूबा आकार ले रहा था जो आने वाले दशकों तक भारत की छाती पर मूंग दलने वाला था। इब्राहिम का बेटा दाऊद इब्राहिम। दाऊद बचपन से ही अलग था। पढ़ाई लिखाई में उसका कोई मन नहीं लगता था। उसकी आंखें हमेशा अपने इलाके के उन भाई लोगों को घूरती थी जो महंगी घड़ियां पहनते थे। जिनके पास इंपोर्टेड गाड़ियां थी और जिनके एक इशारे पर पूरा बाजार बंद हो जाता था। दाऊद की आंखों में मुंबई के अंडरवर्ल्ड का बेताज बादशाह बनने की भूख थी। शुरुआत हुई डोंगरी की सड़कों पर छोटी-मोटी चोरियों, राहगीरों को लूटने और दुकानदारों से हफ्ता वसूली करने से। उस वक्त मुंबई पर राज था बड़े खिलाड़ियों का। हाजी मस्तान, युसुफ पटेल और करीम लाला। स्मगलिंग की दुनिया पर करीम लाला का राज था। 20 साल के उस नौजवान दाऊद ने करीम लाला का गैंग जॉइन कर लिया। दाऊद का काम था स्मगल किए गए सोने, घड़ियों और हथियारों की कंसाइनमेंट को पुलिस की नजरों और बाकी दुश्मन गैंग से बचाकर सुरक्षित ठिकाने तक पहुंचाना। लेकिन दाऊद कोई आम गुर्गा नहीं था। वो सांप की तरह कुंडली मारकर बैठा था। बस सही वक्त का इंतजार कर रहा था। गैंग में करीम लाला के दो सगे भांजे भी थे। आलम जेब और अमीरजादा। इन दोनों को दाऊद की बढ़ती हुई अहमियत और उसकी चालबाजी एक आंख नहीं भाती थी। एक रात एक कस्टम ऑफिसर ने करीम लाला के सोने की एक बहुत बड़ी कंसाइनमेंट पकड़ ली। आलम जेब का खून खोल उठा। उसने बिना वक्त गवाए उस कस्टम ऑफिसर को किडनैप कर लिया और मुंबई के एक सीक्रेट बेसमेंट में उस ऑफिसर को बांध कर रखा गया। आलम जेब ने ऑफिसर के माथे पर बंदूक रखते हुए कहा तेरी हिम्मत कैसे हुई पठान का माल छूने की। जान प्यारी है तो ₹2 लाख का इंतजाम कर। वरना तेरे शरीर के इतने टुकड़े करूंगा कि तेरी बीवी पहचान नहीं पाएगी। उस दौर में ₹2 लाख एक बहुत बड़ी रकम हुआ करती थी। इस फिरौती की रकम को सुरक्षित लाने और मामले को रफा दफा करने की जिम्मेदारी दी गई दाऊद को। जब दाऊद के हाथों में वह ₹2 लाख की भारी गड्डियां आई तो उसके अंदर का शैतान जाग उठा। दाऊद की नियत पूरी तरह डोल गई। उसने एक बहुत बड़ा हिस्सा अपने पास छुपा लिया और एक छोटी सी रकम जाकर आलम जेब को दी। क्या है यह बाकी का पैसा कहां है दाऊद? आलम जेब ने सवाल किया। दाऊद ने जवाब दिया। भाई वो लोग इससे ज्यादा का इंतजाम नहीं कर पाए। पुलिस और कस्टम का भी भारी लफड़ा हो सकता था। इसलिए जो मिला मैं ले आया। हालांकि जब पठान भाइयों ने अपने सीक्रेट सोर्सेस और खबरी नेटवर्क से पता किया तो उन्हें पता चला कि पैसा पूरा दिया गया था। दाऊद की इस गद्दारी ने करीम लाला के दरबार में भूचाल ला दिया। दाऊद को बीच महफिल में दर्जनों गैंगस्टर्स के सामने घसीट कर लाया गया। उसे पीटा गया। लातों घूसो और डंडों से उसकी ऐसी हालत कर दी गई कि वह अपने पैरों पर खड़ा नहीं हो पा रहा था। उसे गैंग से धक्के मारकर बाहर निकाल फेंका गया। दाऊद ने उसी रात तय कर लिया था कि वह अब किसी के लिए काम नहीं करेगा। वह खुद अपनी गैंग बनाएगा। उसने अपनी खुद की सिंडिकेट डी कंपनी की नीम रखी। उसने अपने भाइयों साबीर, इकबाल, अनीस और नूरा को अपने साथ मिलाया। अब वो सिर्फ स्मगलिंग नहीं कर रहा था। वो एक पूरी की पूरी पेशेवर फौज तैयार कर रहा था। दाऊद खुद एक एक लड़के को चुनता था। बॉम्बे की सड़कों पर अब रोज खून बहने लगा था। दाऊद गैंग और पठान गैंग के बीच की दुश्मनी अब नासूर बन चुकी थी। अंडरवर्ल्ड के पुराने डॉन जैसे हाजी मस्तान और युसूफ पटेल समझ चुके थे कि अब हवा का रुख बदल रहा है। यह नई पीढ़ी खून बहाने से गुरेज नहीं करती। उन्होंने स्मगलिंग छोड़कर रियल एस्टेट और राजनीति का सफेद दामन थाम लिया था। साल 1981 दादर के एक पेट्रोल पंप पर जब रात के सन्नाटे में दाऊद का बड़ा भाई साबीर इब्राहिम अपनी फिएट कार में बैठा था। तभी पठान गैंग की गाड़ियां वहां आ रुकी। उन गाड़ियों से हथियारों से लैस शूटर निकले। जिनमें मुंबई का सबसे खूंखार और पढ़ा लिखा गैंगस्टर मानिया सुरवे भी शामिल था। गोलियों की बौछार से साबीर का सीना छलनी हो गया। कार के शीशे चखनाचूर हो गए और साबीर की लाश खून के तालाब में डूब गई। उसी रात दाऊद पर भी उसके घर के पास एक जानलेवा हमला हुआ। लेकिन किस्मत ने उसे बाल-बाल बचा लिया। जब दाऊद अस्पताल पहुंचा और उसने अपने बड़े भाई साबीर की खून से लतपत ठंडी लाश देखी तो उसके अंदर का बचा-खुचा इंसान हमेशा के लिए मर गया। आज के बाद मुंबई की सड़कों पर पठान गैंग का एक भी आदमी जिंदा सांस नहीं लेगा। उन्हें उनके घरों में घुसकर मारूंगा। यह मेरा वादा है साबीर भाई। दाऊद ने कसम खाई। आलम जेब समझ गया था कि दाऊद अब एक पागल हाथी की तरह हो चुका है जिसे रोकना नामुमकिन है। अपनी जान बचाने के लिए आलम जेब ने रातों रात मुंबई छोड़ दी और गुजरात को अपना नया बेस बना लिया। गुजरात में पठान गैंग के पुराने और मजबूत कांटेक्ट थे। वहां के भ्रष्ट पुलिस वालों और लोकल गुंडों से उनके गहरे रिश्ते थे। लेकिन दाऊद कहां रुकने वाला था। उसने अपने ऑपरेशंस का दायरा बढ़ाते हुए गुजरात में भी अपने पैर पसारने शुरू कर दिए। उसने गुजरात के मशहूर स्मगलर लल्लू जोगी से हाथ मिलाया। उसका सिर्फ एक मकसद था। आलम जेब को उसके ही गढ़ में घुसकर कुत्तों की मौत मारना। दाऊद ने अपनी कुटिल चालाकी से आलम जेब पर गुजरात पुलिस में एक झूठा केस दर्ज करवा दिया। ताकि पुलिस उसे पकड़े और दाऊद अपने आदमियों के जरिए उसे जेल के अंदर ही खत्म कर दे। लेकिन यहां दाऊद का पासा उसी पर उल्टा पड़ गया। 1983 में गुजरात पुलिस ने एक सीक्रेट और सटीक सूचना के आधार पर छापेमारी की। और दाऊद को लल्लू जोगी के साथ अवैध हथियारों के साथ रंगे हाथों पकड़ लिया। उसे कोफे पोसा कानून के तहत गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया। यह खबर मिलते ही आलम जेब ने तुरंत दाऊद के गुर्गों पर ताबड़तोड़ हमले शुरू कर दिए। दाऊद के दो सबसे खास आदमियों को बीच सड़क पर गोलियों से भून दिया गया। दाऊद को जेल की सलाखों के पीछे यह एहसास हो गया कि गुजरात में आलम जेब को मारना मुश्किल है। जैसे ही वह बेल पर छूटा उसने तुरंत वापस मुंबई का रुख किया। अब दाऊद एक मौके की तलाश में था। और वो मौका उसे मिला 6 सितंबर 1983 को। आलम जेब का भाई अमीरजादा को एक पुराने आपराधिक केस के सिलसिले में मुंबई के सेशन कोर्ट में पेश होना था। दाऊद जानता था कि यह काम कोई आम जाना पहचाना शूटर नहीं कर सकता क्योंकि पुलिस हर चेहरे को जानती थी। इसके लिए उसने अंडरवर्ल्ड के उभरते सितारे बड़ा राजन की मदद ली। राजन ने एक दुबले पतले बेहद कम उम्र के लड़के डेविड परदेसी को चुना। डेविड दिखने में किसी कॉलेज जाने वाले सीधे-साधे लड़के जैसा था। कोर्ट रूम खचाखच भरा हुआ था। भारी पुलिस बंदोबस्त था। जज अपनी कुर्सी पर बैठे थे। और अमीरजादा कटघरे में खड़ा था। तभी भीड़ के बीच से डेविड परदेसी धीरे-धीरे बिना किसी घबराहट के कटघरे के करीब पहुंचा। उसकी उम्र और मासूम चेहरे को देखकर किसी भी पुलिस वाले ने उसे रोकने या चेक करने की कोशिश नहीं की। अमीरजादा, दाऊद भाई ने अपना आखिरी सलाम भेजा है। डेविड ने अपनी पेंट के अंदर से रिवॉल्वर निकाली और पलक झपकते ही जज के सामने भरे कोर्ट रूम में अमीरजादा के सीने में दनादन गोलियां उतार दी। कोर्ट रूम में चीख-पुकार और भगदड़ मच गई। अमीरजादा वहीं ढेर हो गया। पुलिस ने तुरंत झपट कर डेविड को पकड़ लिया। लेकिन दाऊद जो संदेश देना चाहता था, वह पूरे भारत के अंडरवर्ल्ड और पुलिस महकमे तक पहुंच चुका था। दाऊद के ऊपर उस वक्त कई गंभीर आपराधिक मामले चल रहे थे। 1970 के एक रॉबरी केस में उसे 4 साल की जेल की सजा भी सुनाई जा चुकी थी। लेकिन वह बेखौफ बाहर घूम रहा था। 1984 में जब दाऊद के महंगे वकीलों ने एक नए केस में उसकी एंटीसिपेटरी बेल की अर्जी सेशन कोर्ट में लगाई। तो सरकारी वकील ने कोर्ट रूम में चीखते हुए कहा था, माय लॉर्ड, यह आदमी कोई आम मुजरिम नहीं। यह एक खूंखार क्रिमिनल है। यह बेल पर बाहर है और बेल पर रहते हुए इसने खुलेआम पांच नए संगीन जुर्म किए हैं। इसकी जगह सिर्फ और सिर्फ काल कोठरी है। इसे किसी भी कीमत पर जमानत नहीं मिलनी चाहिए। लेकिन हमारे सिस्टम की दीमक इस कदर फैल चुकी थी और उस दौर में जेल नहीं बेल की नीति का ऐसा दुरुपयोग हो रहा था कि दाऊद को फिर से जमानत मिल गई। दाऊद अब पूरी तरह समझ चुका था कि इस सिस्टम को इसके पुलिस वालों को और इसके वकीलों को कैसे खरीदा जा सकता है। उसने बड़े बिल्डरों, बिजनेसमैन और फिल्म प्रोड्यूसरों को किडनैप कर भारी मात्रा में एक्सटॉर्शन शुरू कर दी। उसने यह सारा काला धन रियल एस्टेट और बॉलीवुड में लगाना शुरू किया। लेकिन वह यह भी जानता था कि मुंबई पुलिस के कुछ जांबाज अफसर अब उसके खून के प्यासे हो चुके हैं। और सुप्रीम कोर्ट का फंदा कभी भी उसके गले में कस सकता है। 1985 के अंत तक जब आखिरकार सुप्रीम कोर्ट से दाऊद के खिलाफ अरेस्ट वारंट जारी हुआ। तब तक बहुत देर हो चुकी थी। दाऊद इब्राहिम हमेशा के लिए भारत से फरार होकर दुबई पहुंच चुका था। लोगों को लगा कि अब डी कंपनी का पतन हो जाएगा। लेकिन दाऊद ने दुबई में बैठकर अपने सिंडिकेट को एक मल्टीनेशनल कॉर्पोरेशन की तरह चलाना शुरू कर दिया। बड़े-बड़े पॉलीटिशियन, बिजनेसमैन और बॉलीवुड के नामी सितारे जब भी दुबई जाते तो दाऊद के दरबार में हाजिरी लगाना नहीं भूलते थे। उसी दौरान फिल्म मैगजींस में यह अफवाहें भी उड़ने लगी कि दाऊद का बॉलीवुड की एक बहुत मशहूर और खूबसूरत एक्ट्रेस के साथ अफेयर है और उनकी एक बेटी भी है। दुबई में बैठकर भी मुंबई पर दाऊद की पकड़ जरा भी ढीली नहीं हुई थी। उसने भारत के हर बड़े स्टेट में अपने एजेंट्स, हिटमैन और शार्प शूटरों का एक बड़ा नेटवर्क खड़ा कर लिया था। रमेश शर्मा जैसे पॉलीटिशियन से लेकर अहमदाबाद के खूंखार गैंगस्टर अब्दुल लतीफ और यूपी के किडनैपिंग किंग बबलू श्रीवास्तव जैसे लोग अब दाऊद के इशारों पर नाचते थे। मुंबई में दाऊद का सारा काम उसका एक बेहद खतरनाक गुर्गा रमानायक संभाल रहा था। रमा नायक ने दाऊद के इशारे पर कई लोगों को मौत के घाट उतारा और धीरे-धीरे वह खुद को मुंबई का असली बॉस समझने लगा। वही दाऊद ने भांप लिया कि रमानायक की बढ़ती ताकत भविष्य में उसके लिए एक बहुत बड़ा खतरा बन सकती है। दाऊद ने रमा को खत्म करने के लिए एक बेहद शातिर चाल चली। रमा नायक का एक राइट हैंड था बाबू रेशम। दाऊद ने पुलिस के अपने घुस खोर सूत्रों का इस्तेमाल करके पहले बाबू रेशम को पुलिस लॉकअप में बंद करवाया। और फिर दाऊद ने अपने दूसरे वफादार गुर्गों को भारी पैसा देकर पुलिस लॉकअप के अंदर ही बाबू रेशम का बेरहमी से कत्ल करवा दिया। इसके तुरंत बाद दाऊद ने दुबई से रमानायक को फोन किया। रमा, बाबू को महेश ढोलकिया ने पुलिस से मिलकर मरवाया है। उसे छोड़ना मत। महेश ढोलकिया एक बड़ा होटलियर था। रमा नायक जो अपने साथी की मौत से बदले की आग में अंधा हो चुका था। उसने बिना कुछ सोचे समझे अपने साथी अरुण गवई के साथ मिलकर महेश ढोलकिया को दिन दहाड़े मौत के घाट उतार दिया। लेकिन कुछ समय बाद जब रमा को अंडरवर्ल्ड के सूत्रों से सच्चाई पता चली कि महेश ढोलकिया बेकसूर था। और बाबू रेशम की हत्या की पूरी साजिश दाऊद इब्राहिम ने ही रची थी तो वह भड़क उठा। रमानायक ने बगावत कर दी। उसने दाऊद के उन बिल्डरों और व्यापारियों को पकड़-पकड़ कर लूटना और पीटना शुरू कर दिया जो डी कंपनी को प्रोटेक्शन मनी देते थे। अब से दाऊद को एक पाई का हफ्ता नहीं जाएगा। दुबई में बैठा वह भगोड़ा अब मुंबई का बॉस नहीं है। मुंबई का बाप अब मैं हूं। रमा ने खुलेआम ऐलान कर दिया। रमानायक की मौत के बाद उसके गैंग और दगड़ी चोल की कमान उसके सबसे वफादार और खूंखार साथी अरुण गवई के हाथों में आ गई। गवली जानता था कि उसके गुरु को दाऊद ने ही चालाकी से मरवाया है। अब मुंबई की सड़कों पर डी कंपनी और गवई गैंग के बीच एक ऐसा खूनी खेल शुरू हुआ जिसने पूरे शहर को दहला कर रख दिया। गवली ने सबसे पहले दाऊद के मुंबई के ऑपरेशन संभालने वाले मैनेजर सतीश राजन को मरवा दिया। यह दाऊद के लिए एक बहुत बड़ा झटका था। बौखलाए हुए दाऊद ने गवली के खास आदमी अशोक जोशी और उसके पूरे गैंग को एक साथ खत्म करवा दिया। अरुण गवली ने अब दगड़ी चोल को एक किले में तब्दील कर दिया और अपनी फौज खड़ी करनी शुरू कर दी। उसने बेरोजगार और भटके हुए युवाओं को भारी पैसा देकर अपने गैंग में शामिल किया। उसने दगड़ी चोल के अंदर ही साउंड प्रूफ शूटिंग रेंज बनवाई, जहां इन लड़कों को एके 47, स्टीन गन और आधुनिक हथियारों को चलाने की कड़ी मिलिट्री जैसी ट्रेनिंग दी जाने लगी। गवली ने दाऊद के मैनेजर महेश चौड़िया को किडनैप किया और उसे बेरहमी से मार डाला। दाऊद ने पलटवार करते हुए गवली के सगे भाई किशोर गवली की हत्या अपने हिटमैन महेश कुलकर्णी से करवा दी। 1992 में अरुण गवई के खतरनाक शूटर शैलेश हलदनकर ने दाऊद के जीजा इस्माइल पारकर का कत्ल कर दिया। दाऊद के लिए यह उसके घर उसके परिवार पर सीधा हमला था। उसकी बहन विधवा हो गई थी। दुबई में बैठे दाऊद ने अपने सबसे खास और जांबाज शूटरों को ऑर्डर दिया। मुझे हलदनकर मुर्गा चाहिए चाहे वो कहीं भी छुपा हो। शैलेश हलदनकर उस वक्त एक पुराने हमले में घायल होने के कारण मुंबई के जेजे हॉस्पिटल में भारी पुलिस सुरक्षा के बीच भर्ती था। दाऊद के शूटर जिनमें सुभाष सिंह ठाकुर और सुनील सावंत शामिल थे। एके 47 लेकर सीधे अस्पताल में घुसे। उन्होंने वार्ड में घुसते ही अंधाधुंध गोलियां बरसानी शुरू कर दी। 400 से ज्यादा गोलियां चली। मरीज और डॉक्टर जान बचाने के लिए पलंगों के नीचे छुप गए थे। हलदनकर को वहीं बिस्तर पर छलनी कर दिया गया और दो हवलदार भी शहीद हुए। अरुण गवली भी पीछे हटने वाला नहीं था। उसने दाऊद के करीबी राजनीतिक मददगार मौलाना बुखारी की हत्या करवा दी। जो दाऊद के लड़कों को पुलिस से बचाता था। दोनों तरफ से रोज लाशें गिर रही थी। खुफिया एजेंसियां हैरान थी कि कैसे एक अनपढ़ आदमी जो अंग्रेजी का एक वाक्य ठीक से नहीं बोल सकता। दुबई में बैठकर 5000 से ज्यादा गैंगस्टरों की एक फौज को एक मल्टीनेशनल कंपनी के सीईओ की तरह चला रहा है। दाऊद अपने दुश्मनों और गद्दारों के लिए एक क्रूर तानाशाह था जो छोटी सी गलती पर भी मौत की सजा देता था। लेकिन अपने वफादार गुर्गों के लिए वह एक दरिया दिल मसीहा था। अगर किसी गुर्गे को गोली लगती या वह जेल जाता। तो दाऊद पानी की तरह पैसा बहाता। वह उनके परिवारों का पूरा खर्च उठाता। उनकी बीमारियों का इलाज करवाता। 1992 के बाबरी मस्जिद डिमोलिशन के बाद भारत के हालात बदल गए। पूरे देश में दंगे भड़क उठे। और यहीं पर एंट्री हुई पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई की। आईएसआई ने दाऊद इब्राहिम में एक अचूक हथियार देखा। आईएसआई के टॉप कमांडरों ने दुबई में दाऊद से कांटेक्ट किया। उन्होंने दाऊद को उसकी सुरक्षा उसके कारोबार को पूरी दुनिया में बेरोक टोक चलाने और उसे हमेशा के लिए महफूज रखने का लालच दिया। इसके बदले में उन्हें सिर्फ एक चीज चाहिए थी। दाऊद का विशाल तस्करी नेटवर्क जिसका इस्तेमाल करके वह भारत में मौत का सामान भेज सके। दाऊद जिसके अंदर का मुसलमान बाबरी मस्जिद की घटना से भड़का हुआ था और जिसके अंदर का व्यापारी नया मुनाफा देख रहा था। उसने अपनी देश का सौदा कर लिया। दाऊद ने गुजरात और महाराष्ट्र के समुद्री तटों के जरिए हथियारों और आरडीएक्स की भारी कंसाइनमेंट भारत में उतारने शुरू की। उसने अपने सबसे खूंखार और भरोसेमंद गुर्गे टाइगर मेमन को इस नापाक काम की जिम्मेदारी सौंपी। 12 मार्च 1993, मुंबई वो काला दिन जब एक के बाद एक 12 सिलसिलेवार बम धमाकों ने पूरे शहर को खंडहर और शमशान में तब्दील कर दिया। बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज की गगन चुंबी इमारत से लेकर एयर इंडिया बिल्डिंग, सेंचुरी बाजार और जावेरी बाजार तक। हर जगह सिर्फ खून, चीखें, कटे हुए अंग और काला धुआं था। 250 से ज्यादा बेगुनाह लोग मारे गए और हजारों जिंदगी भर के लिए अपाहिज हो गए। वो दाऊद इब्राहिम जो कल तक सिर्फ एक स्मगलर था अब भारत का सबसे बड़ा और सबसे वांटेड आतंकवादी बन चुका था। इन धमाकों के बाद डी कंपनी के अंदर भी दरार आ गई। छोटा राजन जैसे हिंदू गैंगस्टरों ने दाऊद का साथ छोड़ दिया। और खुद को देशभक्त डॉन घोषित करते हुए दाऊद के खिलाफ जंग छेड़ दी। डी कंपनी अब पूरी तरह से एक आतंकी सिंडिकेट बन चुका था। 1995 तक आते-आते दाऊद का सालाना टर्नओवर ₹2000 करोड़ का आंका गया था। जो आज के समय के हिसाब से ₹6000 करोड़ से भी कहीं ज्यादा है। शिपिंग, फूड प्रोसेसिंग, गारमेंट एक्सपोर्ट, बॉलीवुड फाइनेंसिंग, रियल एस्टेट से लेकर ड्रग्स और हथियारों की ग्लोबल तस्करी तक दाऊद का यह खूनी साम्राज्य लंदन, स्विटजरलैंड, दुबई, लागोस और कराची तक फैल चुका है। आज दाऊद इब्राहिम पाकिस्तान की सेना और आईएसआई की कड़ी सुरक्षा में कराची के पॉश क्लिफटन इलाके में एक कायर की तरह छिपा बैठा है। उसे पाकिस्तानी मिलिट्री की बैकिंग हासिल है और वह बदले में उनकी डर्टी ऑपरेशंस की फंडिंग करता है। दोस्तों यह थी दाऊद इब्राहिम की कहानी। अगर आपको यह वीडियो पसंद आई हो तो इस वीडियो को लाइक जरूर करें। और ऐसे ही वीडियोस के लिए चैनल को सब्सक्राइब करना ना भूले। मिलते हैं अगले वीडियो में तब तक के लिए जय हिंद जय भारत।

Dhurandhar ke Bade Sahab ki Asli Kahani | Dawood Ibrahim | 2D Animation
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15m 14s3,051 words~16 min read
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