[0:00]ये क्या जगन्नाथ जी कटहल चुरा के क्यों भाग रहे हैं जानने के लिए सुनिए ये कथा माधवदास जी जब पहली बार श्री जगन्नाथपुरी आए थे तो जगन्नाथ जी को देखना तो बहुत दूर की बात मंदिर को देखते ही उनको लगने लगा कि मैंने अपने जीवन के 21 साल संसार के भोग विलास में लगा दिया और अब इस जीवन का कोई भरोसा नहीं अगर कल ही मेरी मृत्यु हो गई तो और इस बात से दुखी होकर वो चले गए पूरी समुद्र तट पर और बैठ गए मृत्यु पर्यंत तक मन में बस सोच रहे हैं मेरे जीवन के 21 साल में मैंने एक बार भी महाप्रभु का दर्शन नहीं किया सब बोलने लगे अरे अब तक नहीं आए अब तो आ गए माधवदास जी बोले अगर 21 साल तीन दिन की मेरी आयु हो तो और तीन दिन बाद हमारे महाप्रभु जगन्नाथ व्याकुल हो गए महाप्रभु जगन्नाथ प्रसाद नहीं पा रहे लक्ष्मी जी सामने खड़ी होकर बोल रही है क्या हो गया स्वामी आप प्रसाद क्यों नहीं ग्रहण कर रहे आप जब तक प्रसाद नहीं पाएंगे वह महाप्रसाद बनेगा कैसे जगन्नाथ जी बोले देवी इच्छा नहीं हो रही लक्ष्मी जी बोली क्यों क्या हो गया जगन्नाथ जी बोले एक मेरा परम भक्त आया है उसने तीन दिन से कुछ नहीं पाया है तो मैं कैसे पा सकता हूं लक्ष्मी जी बोली ठीक है आप चिंता मत करो मैं प्रसाद भिजवाते हूं उसके पास आप प्रसाद पाओ जगन्नाथ जी बोले उसको प्रसाद देने कोई और नहीं मैं ही जाऊंगा लक्ष्मी जी बोली जय हो ऐसा सौभाग्य तो मुझे भी नहीं मिला जो आप उसको देने जा रहे हैं और जगन्नाथ जी अपने सोने की थाली जिसमें वो खुद प्रसाद पाते हैं उस थाली में महाप्रसाद लेके एक छोटे से बालक का भेष बना के प्रकट हो गए माधवदास जी के सामने और माधवदास जी से कहा आप ही माधवदास हैं माधवदास जी बोले हां जी मैं ही हूं क्यों क्या बात है जगन्नाथ जी बोले स्वयं महाप्रभु जगन्नाथ जी ने आपके लिए महाप्रसाद भेजा है कृपा करके इसे ग्रहण कीजिए सुनते ही मूर्छित हो गए और जब मूर्छा टूटी तो वह बालक तो गायब था पर थाली वहीं रखी थी माधवदास जी ने सोचा अगर मेरे जगन्नाथ महाप्रभु चाहते हैं कि मैं जीवित रहूं तो यही सही और माधवदास जी ने प्रसाद पा लिया उधर श्री मंदिर में हल्ला मच गया अरे महाप्रभु की सोने की थाली गायब है ढूंढो उधर जगन्नाथ जी ने गजपति राजा को स्वप्न दिया मेरा एक परम भक्त माधवदास तीन दिन अनशन पर समुद्र तट पर बैठा था उसको प्रसाद देने मैं ही अपनी सोने की थाली लेकर गया था गजपति राजा पंडा पुजारियों के साथ माधवदास जी का दर्शन करने के लिए गए तो देखा कि माधवदास जी मंदमंद मुस्कुरा रहे हैं और वो सोने की थाली उनके बगल में ही रखी हुई है गजपति बोले चलिए महाप्रभु का दर्शन करने के लिए चलिए जैसे ही माधवदास जी श्री मंदिर में प्रवेश किए ब्रह्म बेदी पे जगन्नाथ जी झूम उठे मेरा माधव आ गया मेरा माधव आ गया और इस घटना के कुछ वर्ष बाद हमारे जगन्नाथ महाप्रभु का एक दिन मन हुआ कि बहुत दिन हो गया चोरी किए हुए अब चोरी करने जाना है मुझे लेकिन अकेले चोरी करने में आनंद नहीं आएगा लेकिन अगर दाऊ दादा को बोलूंगा तो जाएंगे तो और नहीं ऊपर से डांट और देंगे क्या करूं तभी भगवान के परम भक्त श्री माधवदास जी पहुंचे भीतर दर्शन करने के लिए माधवदास जी बोले महाप्रभु आज आप इतने उदास क्यों लग रहे हैं इतने संकट कष्ट में आप क्यों हैं तो जगन्नाथ जी बोले हमारा मन नहीं लग रहा बोले क्यों नहीं लग रहा बोले हम पूरी उड़ीसा में विराजमान तो हो गए खूब बढ़िया यहां पर पाते हैं दाल, भात, महाप्रसाद लेकिन बचपन में जो हम लीला करते थे वह सब यहां नहीं कर पा रहे बोले क्या नहीं हो रहा बोले चोरी नहीं कर पा रहे हम चोरी करने का मन हो रहा है माधवदास जी बोले धीरे बोलो जगन्नाथ बोलते हैं लोग आपको क्या बोलते हैं जगन्नाथ पूरे विश्व की रक्षा करने वाले को जगन्नाथ कहते हैं नाथ मतलब रक्षक और आप यहां पर अभी चोरी करने की बात कर रहे हो ठाकुर जी बोले भले ही हमारा नाम जगन्नाथ हो पर स्वभाव कैसे छूटे स्वभाव तो वही है हमारा बहुत मन हो रहा है चोरी करने का माधवदास जी बोले तो फिर चले जाइए किसने रोका आपको कराओ चोरी ठाकुर जी बोले वो भी तो बात है अकेले आनंद नहीं आता है एक आध दो लोग हो साथ में तो सुख मिलता है माधवदास जी बोले बगल में सुभद्रा जी और बलभद्र जी है इनको ले जाओ जगन्नाथ जी बोले रहने दो फिर तो हम ऐसे ही ठीक है क्यों बोले इनको लेकर के जाऊंगा तो फिर एक तो मुझसे खुद ही नहीं संभाला जाता अपने आप को इनको क्या संभालूंगा फिर बलराम जी हमारे वैसे ही क्रोधी हैं चोरी में अगर पकड़े गए तो सीधा सर धर से अलग ही कर देंगे उसका हत्या और हो जाएगी और तो और बलराम जी तो ऐसे हैं मैंने अगर इनसे कह दिए कि चोरी करने जाना है तो पहले तो मुझे ही चार सुनाएंगे और थोड़ा भी शर्म नहीं आता इतना बड़ा हो गया है भगवान बन गया है सब तुझे आकर प्रणाम करते हैं फिर भी चोरी करना नहीं छोड़ा चार तो मुझे सुनाएंगे और फिर उसके बाद चोरी करने का मन बना भी दूंगा तो बलभद्र जी बड़े देव हैं इनको बड़े देवता माना जाता है अगर मैंने इनसे कह दी कि मुझे चोरी करनी है तो बलराम जी पूरी जगन्नाथपुरी को बुला लेंगे और सब से कहेंगे कि हमारा लाला चोरी करने आएगा व्यवस्था करो ऐसी चोरी की क्या फिर हमको सुख तो मिलेगा नहीं बेचारे वहां जहां हम चोरी करने जाएंगे सब बेचारे कहेंगे लाला चोरी कर लो आ जाओ हमारे घर आ जाओ चोरी कर लो दाऊ दादा के हल से इतना डरेंगे सब हमको सुख नहीं मिलेगा मादरदास जी बोले तो फिर अब चोर कहां से लाऊं आपके लिए किसको ले आऊं किसके साथ जाओगे चोरी करने तो जगन्नाथ जी मंद मंद मुस्काई के बोले तुम बढ़िया हो तुम चलो तुम साथ दो तो हम कर लेंगे माधवदास जी बोले वयोवृद्ध शरीर है मेरा वयोवृद्ध बूढ़े आदमी के संग क्या चोरी करोगे आप ठाकुर जी बोले वो सब हम करवा लेंगे तुम बस हां कर दो माधवदास जी बोले नियम तो बता दो हमने कभी चोरी करी नहीं हमको पता नहीं है तो जगन्नाथ जी बोले सबसे पहला नियम क्या बोले क्या फुर्ती रखनी है लेकिन फुर्ती में आवाज नहीं करनी है मतलब गति तो तेज हो पर जैसे हम चलते हैं तो हमारे पैरों की आवाज आती हाथों की आवाज आती कपड़ों की आवाज आती वैसे आवाज नहीं आनी चाहिए फुर्ती भी हो और आवाज ना हो पहला नियम और दूसरी बात पलकें नहीं झपकने नेत्र खोल के रखने हैं कान खोल के रखने हैं ध्यान रखना कहीं से कोई आ नहीं जाए बोले अच्छा और कोई नियम बोले ये दो तुम निभा लेना बाकी मैं संभाल लूंगा चलो माधवदास जी बोले कहां जाएंगे चोरी करने जगन्नाथ जी बोले ये जो राजा है जगन्नाथपुरी के इनके बगीचा में खूब सुंदर सुंदर कटहल होते हैं और देखो ये हमारे लिए भोग लगाने भेजते नहीं है हमको कटहल खाने का मन कर रहा है कटहल की चोरी करके आएंगे माधवदास जी बोले इतना सब कुछ करने की क्या आवश्यकता है हम राजा जी को पत्र भेज देते हैं वो कटहल भिजवा देंगे कल कटहल ही कटहल पाना आप अरे माधवदास फिर तुम वही बात कर रहे हो तुम कटहल मंगाओ चलो कह दो राजा से कल एक कटहल भेजो कटहल आया बोले अब उसकी सब्जी बनाओ सब्जी बनाओ अब हमने पा ली अब तुम पाओ पा लिया बोले अब स्वाद मिल गया बोले हां अब तुम चोरी वाली कटहल का स्वाद देखना इससे दुगना होगा अब ये जो सुख मिला है ये फीका लगेगा उसके आगे इसलिए अब चोरी करने चलो माधवदास जी बोले ठीक है मैं रात में सिंह द्वार पर मिलूंगा सिंह द्वार पर नहीं दक्षिण द्वार पर मिलना दक्षिण द्वार पर माधवदास जी बाहर प्रतीक्षा कर रहे हैं रात्रि में ठाकुर जी आए चुपचाप छोटे से लाला बन गए बड़े-बड़े नेत्र हैं काले ठाकुर जी और सुंदर एक पोशाक धारण करके आए माधवदास जी ने अपने कंधे पर बिठा लिया उनको और श्री जगन्नाथ जी जा रहे हैं चोरी करने राजा के बगीचा में पहुंचे जगन्नाथ जी बोले देखो सामने कटहल का पेड़ है वहां चलो पहुंच गए बगीचा में अंदर अंदर जाकर के जगन्नाथ जी उतर गए नीचे ठाकुर जी बोले अब ऊपर चढ़ना पड़ेगा ऊपर से कटहल तोड़नी पड़ेगी तो माधवदास जी बोले कौन से पेड़ पर चढ़ना है अरे धीरे बोलो कोई सुन लेगा हम तुमसे पहले ही बोले धीरे बोलना क्या चिल्ला रहे हो जैसे ही माधवदास बोले कौन से पेड़ पर चढ़ना है तो बगीचे का मालिक उठ गया बोले मैं बताता हूं कौन से पेड़ पर चढ़ना रुको डंडा लेकर के आए कहां हो तुम अब जगन्नाथ जी माधवदास जी को छुपा रहे हैं बोले कि इतना तेज क्यों बोलते हो पहले ही कहा था आवाज नहीं करनी देखो वो आ रहा है ढूंढ रहा है हमको कुछ देर बाद बगीचा का मालिक घूम के चला गया वो उसको नहीं मिले माधवदास जी बोले अब क्या करना है बोले देखो पेड़ के ऊपर हम दोनों में से कोई एक चढ़ेगा और नीचे दूसरा ऐसे करके लपकेगा गिरेगा तो धम आवाज होगी फिर से आ जाएगा माली तो माधवदास जी बोले आप आप तो लाला हो इतना भारी आपका शरीर है आप खुद ही धम से नहीं गिर जाओ मैं चढ़ता हूं ऊपर ठाकुर जी बोले तुम चढ़ो हम पीतांबरी करके खड़े हैं हम ले लेंगे गोद में ऊपर चढ़ गए माधवदास जी और कटहल लेकर के माधवदास जी ऊपर से चिल्ला के पूछे कौन सा दूं ये वाला कि वो वाला ठाकुर जी बोले तू खड़े रहे ऊपर ही इतने में ही बगीचा वाला बोले मैं बताता हूं कौन सा ठाकुर जी तो वहां से भाग गए अब ऊपर से माधवदास जी कटहल गिरा रहे हैं नीचे धम अरे ये धम आवाज आ रही है आप लपक नहीं रहे क्या नीचे माली बोला मैं लपकूंगा आ जा नीचे माधवदास जी नीचे उतर करके आए बेचारे ठाकुर जी तो भाग गए वहां से माधवदास जी जैसे ही निकल कर के नीचे आए हाथ पांव बांध दिए बोले रुक जाओ तुमको बताते हैं सुबह होने दो माधवदास जी इधर-उधर देख रहे हैं किसको ढूंढ रहे हो बोले एक और आए थे साथ में उनको ढूंढ रहा हूं हमें तो कोई नहीं दिखा वो तो अंतर्ध्यान हो गए होंगे सीधे मंदिर में जाकर खड़े हो गए दूसरे दिन सुबह हुई राजा को खबर मिली कि हमारे बगीचा में कोई चोर घुसे थे रात को सुबह-सुबह राजा बगीचा घूमने आता था तो जैसे ही बगीचा में आया तो देखा माधवदास जी पेड़ से लटके पड़े हैं राजा उनको गुरु मानता था तुरंत आकर के अरे गुरुदेव गुरुदेव गुरुदेव ये कैसी लीला जल्दी खोलो जल्दी खोलो माली बोला इनको नहीं खोलना ये रात में कटहल चुरा रहे थे यहां से अरे हमारे गुरुजी है खोलो इनको तुरंत खोला माधवदास जी के नेत्र सजल है राजा बोला गुरुदेव ये कैसा कौतुक आप मुझे बोल देते मैं भिजवा देता माधवदास जी बोले हमारा शरीर देखकर के तुमको लगता है कि हम कटहल खाते होंगे हमारे अंग में कहीं भी आपको ऐसे लक्षण दिखते हैं हमारी जीवा इतनी चटोड़ी होगी कि हमको कटहल की इच्छा हो तो बोले हमारे जगन्नाथपुरी में सबसे चटोरे कौन है बोले कौन है बोले सबसे ज्यादा चटोरे एक ही है महाप्रभु जगन्नाथ उनकी इच्छा हो रही थी कि भैया बहुत दिन हो गए हमने चोरी नहीं करी तो चोरी करने के लिए आपके बगीचे में आए थे कटहल की चुराई करने के लिए हमको ऊपर चढ़ाया सब बात बताई और बोले वो तो भाग गए इसने हमको पकड़ लिया राजा के नेत्र सजल हो गए कितना बड़ा भाग्यशाली हूं महाप्रभु जगन्नाथ मेरे बगीचे पर चोरी करने आए और उसी दिन पूरा बगीचा महाप्रभु जगन्नाथ जी के ही नाम कर दिया बोले अब महाप्रभु जी का ही है ये बगीचा अब ये हमारा नहीं है अब यहां जो भी सामग्री सब महाप्रभु जी की है माधवदास बेचारे स्नान ध्यान करके निकले समुद्र प्रणाम करने जाते रोज भोर में जैसे ही समुद्र प्रणाम करने गए सोई दूर देखा कालिया ठाकुर चलते हुए आ रहे हैं माधवदास जी बोले बहुत बढ़िया भाग गए थे रात को बोले हम तो नहीं भागे तुम चिल्ला क्यों रहे थे माधवदास जी बोले तुम्हारी इच्छा तो पूरी हो गई चोरी करनी है चोरी करनी है एक कटहल हाथ नहीं पड़ा आपके बोले अब क्या करें बोले चिंता मत करो आप तो भाग गए थे पर हम देखो रात में पिटे बंधे पूरा बगीचा आपके नाम करवा के आ गए लो अब जाओ खूब प्रेम से कटहल पाओ ठाकुर जी बोले माधव मन की मन में ही रह गए बोले चोरी हुई नहीं बोले तुम्हारे हाथ जोड़े अब तुम खुद ही देख लेना कब करनी है जय जगन्नाथ

When the Lord Brought Prasad Himself — The True Story.
Sango Jaga
13m 35s2,168 words~11 min read
Auto-Generated
Watch on YouTube
Share
MORE TRANSCRIPTS


