Thumbnail for भारत के पर्वत |Mountain Ranges of India|Indian geography|@LGLResearchAcademy  by LGL Research Academy

भारत के पर्वत |Mountain Ranges of India|Indian geography|@LGLResearchAcademy

LGL Research Academy

21m 16s3,721 words~19 min read
YouTube auto captions
Transcript source

YouTube auto captions

This transcript was extracted from YouTube's auto-generated caption track. The transcript below is server-rendered so it can be read, searched, cited, and shared without opening the original YouTube player.

Pull quotes
[0:00]राजस्थान जैसे गर्म राज्यों में भी माउंट आबू का मौसम ठंडा रहता है क्योंकि ऊंचाई के साथ तापमान गिरता है। तो आखिर इन सब का मतलब क्या है?
[0:00]आइए एक सेकंड के लिए रुकते हैं। जो श्रोता किसी एग्जाम की तैयारी कर रहे हैं उनके लिए इन नोट से एक क्विक रिवीजन कर लेते हैं। यह बहुत जरूरी है। तो भारत की सबसे पुरानी पर्वत श्रृंखला अरावली विस्तार कहां से कहां तक?
[0:00]गुजरात से लेकर दिल्ली तक। और सबसे बड़ा हिस्सा इसका सबसे बड़ा हिस्सा यानी 80% राजस्थान में है और अरावली की सबसे ऊंची चोटी कौन सी है?
[0:00]अगर करोड़ों साल पुरानी अरावली की दीवार ना होती तो क्या राजस्थान का रेगिस्तान आज पूरे उत्तर भारत को निगल चुका होता?
Use this transcript
Related transcript hubs

[0:00]एल जी एल रिसर्च एकेडमी में आपका स्वागत है। आज के इस गहन चर्चा का जो विषय है, वह है भारत का भूगोल। और विशेष रूप से हम बात करने वाले हैं यहां की विशाल, रहस्यमयी और के कुछ बहुत ही शानदार नोट्स रखे हैं, साथ ही कुछ 3D मैप्स और विजुअल गाइड्स भी हैं। हां और इन्हीं के जरिए मतलब हम भारत के पहाड़ों का एक ऐसा सफर तय करने वाले हैं जो जो किसी उबाऊ क्लासरूम लेक्चर से बिल्कुल अलग होगा। सही कहा। हम सब ने भूगोल की किताबें तो पढ़ी हैं, लेकिन आज का मकसद सिर्फ रटना नहीं है। एकदम नहीं। यह एक तरह का शॉर्टकट है, मतलब एक ऐसी चर्चा जो हम सबको भारत के इस भौगोलिक संरचना के बारे में पूरी तरह से वेल इन्फॉर्म्ड कर देगी। और भूगोल को समझने का सबसे बेहतरीन तरीका यही है जब हम इन 3D मैप्स को देखते हैं तो एक बात बिल्कुल साफ हो जाती है। वह क्या यही कि यह पहाड़ सिर्फ पत्थर के निर्जीव और ऊंचे ढेर नहीं है। असल में यह वह मास्टर आर्किटेक्ट है जो तय करते हैं कि के नदियां किस दिशा में बहेगी? हां, और मानसून की बारिश कहां होगी? एग्जैक्टली घने जंगल कहां पनपेंगे? और सदियों से इंसानी सभ्यता का विकास कैसे हुआ है? सब कुछ इन पहाड़ों के बनावट पर ही निर्भर करता है। ठीक है। आइए इसे थोड़ा विस्तार से समझते हैं। हम अक्सर अपनी बातचीत में पर्वत, पठार और पहाड़ जैसे शब्दों का इस्तेमाल करते हैं। हां बहुत आम शब्द है ये। जो लोग इन विषयों को गहराई से पढ़ते हैं, उन्हें तो पता है। लेकिन हमारे पास जो विजुअल्स हैं ना, उन्होंने इसे बहुत ही दिलचस्प तरीके से पेश किया है। मैं भी वही देख रही थी। किताबी परिभाषा से अलग अगर सिर्फ बनावट देखें, तो पर्वत यानी माउंटेन वह हैं, जिनका आधार बहुत चौड़ा होता है और जो उनका शिखर है, वह बिल्कुल नुकीला होता है। बिल्कुल। लेकिन जो सबसे दिलचस्प विजुअल मुझे लगा वह पठार या प्लेटो का है। वह 3D मॉडल बहुत ही सटीक है। हां, वह कटा हुआ सा जो दिख रहा है। जरा कल्पना कीजिए कि किसी विशाल पर्वत की उस नुकीली चोटी को एक विशाल तलवार से काट दिया जाए। और ऊपर का हिस्सा बिल्कुल समतल या फ्लैट हो जाए। सही तो वह पठार बन जाता है। यह किसी मेज या टेबल की तरह है जो जमीन से काफी ऊपर है, लेकिन ऊपर से एकदम सपाट है। और भारत का एक बहुत बड़ा हिस्सा ऐसी पठानों से बना है ना? बिल्कुल विशेषकर दक्षिण भारत ऐसे ही विशाल पठारों से बना है जिसने वहां की पूरी जीवन शैली को आकार दिया है। और फिर आते हैं पहाड़ जिन्हें हम हिल्स कहते हैं। इन नोट्स में एक बहुत ही मजेदार एनलॉजी दी गई है, मतलब उसे पढ़ के मुझे सच में हंसी आ गई। वह बड़े भाई वाली हां इसमें लिखा है कि पर्वत बड़ा भाई है और पहाड़ छोटा भाई है। सुनने में बहुत साधारण लगता है। लेकिन यह सच है। पहाड़ असल में पर्वत का ही एक लघु रूप है। ऊंचाई काफी कम होती है, लेकिन जो पूरी संरचना है वह लगभग अपने बड़े भाई जैसी ही होती है। और इन संरचनाओं को दीज का यह बुनियादी फर्क समझना इसलिए भी जरूरी है क्योंकि इन्हीं के आधार पर भारत के मौसम का पूरा खेल चलता है। मौसम का खेल हां, जब हवाएं इन आकृतियों से टकराती है तो यही पहाड़ तय करते हैं कि किस राज्य में सूखा पड़ेगा और कहां भारी बारिश होगी। यहां पर बात सच में बहुत दिलचस्प हो जाती है क्योंकि अब हम भारत के माप पर उस जगह चलने वाले हैं जिसने इतिहास को सबसे ज्यादा करीब से देखा है। आप अरावली की बात कर रहे हैं। जी भारत की सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखला अरावली। अगर हम माप पर नजर डालें तो यह पश्चिमी भारत में एक विकर्ण या डायगनल रेखा की तरह खींची हुई दिखती है। हां, एकदम एक तिरछी लकीर की तरह। यह गुजरात के पालनपुर से शुरू होती है फिर राजस्थान और हरियाणा का सफर तय करते हुए सीधे दिल्ली तक पहुंचती है। लेकिन जो चीज सबसे ज्यादा ध्यान खींचती है वह है इसका फैलाव। बिल्कुल इस पूरी लंबी श्रृंखला का लगभग 80% हिस्सा अकेले राजस्थान राज्य में स्थित है। यहां जो बात सबसे आकर्षक है वह यह है कि अरावली कोई आम पर्वत श्रृंखला नहीं है। यहां थोड़ा रुककर इसके भूवैज्ञानिक इतिहास को समझना चाहिए। इसके इतिहास में ऐसा क्या खास है? रिसर्च बताती है कि इसकी उम्र लगभग 570 मिलियन वर्ष पूर्व की है। 570 मिलियन वर्ष जरा सोचिए इस नंबर के बारे में यह उस समय की बात है जब पृथ्वी पर डायनासोर भी नहीं थे। बाप रे भूविज्ञान की भाषा में इसे एक अवशिष्ट पर्वत या रिलिक्ट माउंटेन कहा जाता है। रिलिक्ट माउंटेन मतलब जो अब सिर्फ एक अवशेष या बचा कुचा हिस्सा रह गया है। एकदम सही समझे आप करोड़ों साल पहले अरावली आज के हिमालय से भी ज्यादा विशाल और ऊंचा हुआ करता था। हिमालय से भी ऊंचा यह तो मैंने सोचा ही नहीं था। हां, लेकिन 570 मिलियन सालों तक हवा, पानी और मौसम की मार ने जिसे हम इरोजन कहते हैं, उसने इसे घिस घिस कर आज की स्थिति में ला दिया है। इसीलिए अब यह पर्वत से ज्यादा एक पहाड़ या हिल्स की तरह नजर आता है। प्राचीन प्रहरी कहा जाता है। प्रहरी मतलब रक्षक हां और आज के समय में इसकी पारिस्थितिक भूमिका बहुत बड़ी है। अगर यह अरावली राजस्थान के बीच एक दीवार बनकर खड़ी ना होती तो थार के रेगिस्तान की रेत दिल्ली तक आ जाती। पूरी दिल्ली और पश्चिमी उत्तर प्रदेश को भी एक बंजर रेगिस्तान बना चुकी होती। यह प्राचीन प्रहरी आज भी उस रेगिस्तान को आगे बढ़ने से रोक रहा है। यह जानकारी सच में नजरिया बदलने वाली है कि जो पहाड़ हमें मैप पर बस एक लकीर दिखते हैं वह असल में करोड़ों सालों की लड़ाई के बाद बचे हुए महान योद्धा हैं। बहुत सही एनालॉजी दी आपने। और जब हम इस योद्धा की सबसे ऊंची चोटी की बात करते हैं तो मैप्स हमें राजस्थान के माउंट आबू ले जाते हैं। वहां अरावली का सर्वोच्च शिखर है जिसका नाम है गुरु शिखर। गुरु शिखर हां। इसकी ऊंचाई 1722 मीटर है और यह जगह सिर्फ अपने भूगोल के लिए नहीं बल्कि अपने ऐतिहासिक दिलवाड़ा जैन मंदिरों के लिए भी दुनिया भर में जानी जाती है। यह देखना अद्भुत है कि कैसे प्राचीन सभ्यताओं ने हमेशा सबसे ऊंचे और सुरक्षित भौगोलिक स्थानों को ही अपनी आस्था का केंद्र बनाया। एकदम। यह एक स्पष्ट पैटर्न है। ऊंचे पहाड़ हमेशा से ध्यान, सुरक्षा और संस्कृति के केंद्र रहे हैं। और गुरु शिखर की वह 1722 मीटर की ऊंचाई वहां के पूरे माइक्रो क्लाइमेट को बदल देती है। वह कैसे? राजस्थान जैसे गर्म राज्यों में भी माउंट आबू का मौसम ठंडा रहता है क्योंकि ऊंचाई के साथ तापमान गिरता है। तो आखिर इन सब का मतलब क्या है? आइए एक सेकंड के लिए रुकते हैं। जो श्रोता किसी एग्जाम की तैयारी कर रहे हैं उनके लिए इन नोट से एक क्विक रिवीजन कर लेते हैं। यह बहुत जरूरी है। तो भारत की सबसे पुरानी पर्वत श्रृंखला अरावली विस्तार कहां से कहां तक? गुजरात से लेकर दिल्ली तक। और सबसे बड़ा हिस्सा इसका सबसे बड़ा हिस्सा यानी 80% राजस्थान में है और अरावली की सबसे ऊंची चोटी कौन सी है? गुरु शिखर, माउंट आबू में। जिसकी ऊंचाई 1722 मीटर है। बिल्कुल यह एकदम क्रिस्प और क्लियर है ताकि तुरंत याद हो जाए। यह समरी बहुत मददगार है और जब हम सबसे पुराने पर्वत की बात कर रहे हैं तो कंट्रास्ट के लिए सबसे युवा और ऊंचे पर्वत तंत्र का जिक्र करना भी लाजिमी है। हमारा हिमालय हां अरावली जहां करोड़ों सालों से घिस रहा है, वहीं हिमालय अभी भी जवान है और हर साल कुछ मिलीमीटर बढ़ रहा है। उत्तर भारत का यह ताज अपने अंदर माउंट एवरेस्ट जैसी दुनिया की सबसे ऊंची चोटी समेटे हुए हैं। और दिलचस्प बात यह है कि इस सर्वोच्च चोटी को नेपाल में सागरमाथा और चीन में चुमुलुंगमा कहा जाता है। लेकिन आज हमारा फोकस मुख्य रूप से मध्य और प्रायद्वीपीय भारत के उन रहस्यमई पहाड़ों पर है जो अक्सर जो अक्सर हिमालय की भव्यता के पीछे छिप जाते हैं। सही कहा। तो चलिए हिमालय की वादियों से सीधे मध्य भारत की तरफ चलते हैं। मध्य भारत का भूगोल मुझे हमेशा एक बहुत बड़े पजल या पहेली की तरह लगता है। पजल क्यों? क्योंकि यहां विंध्याचल और सतपुड़ा जैसी श्रृंखलाएं हैं और उनके बीच में से नदियां कुछ इस तरह बहती हैं कि मानो किसी ने नाप तौलकर कोई डिजाइन बनाया हो। यह सच है विंध्याचल पर्वत श्रृंखला एक बहुत बड़ा भौगोलिक और सांस्कृतिक विभाजक है। अगर आप भारत के मैप को बीच से आधा करना चाहें, तो विंध्याचल वही प्राकृतिक रेखा है। बिल्कुल। यह उत्तर भारत को दक्षिण भारत से अलग करती है। इसका विस्तार पश्चिम में गुजरात के जोबट हिल से लेकर पूर्व में बिहार की कैमूर हिल तक है। काफी लंबा विस्तार है। और इस विशाल विभाजक की जो सबसे ऊंची चोटी है उसे सद्भावना शिखर या गुडविल पीक कहा जाता है। नाम भी कितना सुंदर है। सदियों से इस पर्वत ने उत्तर और दक्षिण के बीच एक प्राकृतिक दीवार का काम किया है। इसी वजह से दोनों तरफ की भाषा, कला और संस्कृति का विकास एक अलग ही तरह से हुआ। और विंध्याचल के ठीक नीचे आता है भूगोल का वह सबसे मजेदार हिस्सा जिसे हमारे नोट्स में VNST यानी VNST फार्मूला नाम दिया गया है। यह फार्मूला बहुत ही रोचक है। जब मैंने इसे पहली बार पढ़ा तो मुझे लगा यह कोई केमिस्ट्री का फार्मूला है, लेकिन यह तो मध्य भारत की नदियों और पहाड़ों का एक सैंडविच है। सैंडविच कैसे? इसे ऐसे विजुअलाइज करें सबसे ऊपर V यानी विंध्याचल पर्वत। उसकी ठीक नीचे N यानी नर्मदा नदी। उसके नीचे S यानी सतपुड़ा पर्वत और सबसे नीचे T यानी ताप्ती नदी। V N S T बहुत बढ़िया तरीका है याद रखने का। मतलब सतपुड़ा पर्वत नर्मदा और ताप्ती नदियों के बीच एक सैंडविच की स्टफिंग की तरह बिल्कुल फिट बैठा हुआ है। एकदम सही। लेकिन यहां नोट्स में एक तकनीकी शब्द का इस्तेमाल हुआ है कि नर्मदा नदी एक रिफ्ट वैली या भ्रंश घाटी में बहती है। अब आम नदियों से यह रिफ्ट वैली वाली नदी कैसे अलग है? यह एक बहुत ही शानदार सवाल है। आमतौर पर क्या होता है, एक नदी पहाड़ से निकलती है और हजारों लाखों सालों तक जमीन को काट काट कर अपना रास्ता खुद बनाती है। हां अपनी घाटी खुद खोदी है। लेकिन रिफ्ट वैली का मामला बिल्कुल अलग है। आप इसे ऐसे समझिए कि पृथ्वी के अंदर की हलचल की वजह से जमीन का एक बहुत बड़ा हिस्सा सचमुच दो टुकड़ों में फट गया। जमीन ही फट गई। हां, और बीच की जमीन नीचे धस गई जिससे एक बहुत गहरी दरार या खाई बन गई। इसी दरार को रिफ्ट वैली कहते हैं। तो नर्मदा नदी ने यह घाटी खुद नहीं खोदी। नहीं। उसे यह बनी बनाई गहरी खाई मिल गई और वह उसी में बहने लगी। यही वजह है कि नर्मदा बहुत तेज बहती है और इसका ढलान भी आम नदियों से काफी अलग होता है। वाह मतलब जमीन फटी और नदी ने उसे अपना घर बना लिया। प्रकृति के काम करने का तरीका भी कमाल है। बहुत ही कमाल है। और इसी नर्मदा के ठीक नीचे जो सतपुड़ा पर्वत है इन 3D मॉडल्स में उसे भी तीन अलग-अलग हिस्सों में डीकोड किया गया है। हां, सतपुड़ा का विस्तार मध्य प्रदेश से लेकर छत्तीसगढ़ तक फैला है। इसके पश्चिमी हिस्से को राजपीपला पहाड़ी कहते हैं। बीच के हिस्से को महादेव पहाड़ी कहा जाता है। और जो एकदम पूर्वी हिस्सा है उसे मैकाल श्रेणी कहते हैं। और इन तीनों हिस्सों की अपनी-अपनी पहचान है जैसे सतपुड़ा पर्वत की जो ओवरऑल सबसे ऊंची चोटी है वो महादेव पहाड़ी वाले हिस्से में है। उसका क्या नाम है? उसका नाम है धूपगढ़ जिसकी ऊंचाई 1350 मीटर है। धूपगढ़ 1350 मीटर। लेकिन परीक्षाओं के लिहाज से और हमारी पारिस्थितिकी के लिहाज से जो सबसे महत्वपूर्ण चोटी है वह पूर्वी हिस्से यानी मैकाल श्रेणी में है। अच्छा मैकाल श्रेणी में हां उसका नाम है अमरकंटक। इसकी ऊंचाई लगभग 1036 से 1055 मीटर के बीच मापी जाती है। अरे और अमरकंटक ही तो वो जगह है जहां से हमारी इसी नर्मदा नदी का उद्गम होता है। बिल्कुल मतलब नदी जिस पहाड़ से पैदा हो रही है उसी के समानांतर अपनी भ्रंश घाटी में बहते हुए आगे बढ़ रही है। क्या गजब का तालमेल है? यही तो भूगोल की सुंदरता है। अब इस मध्य भारत के सैंडविच से थोड़ा और पश्चिम और दक्षिण की तरफ चलते हैं जहां भारत के पश्चिमी रत्न और दक्षिण के विशाल शिखर हमारा इंतजार कर रहे हैं। पश्चिमी रत्नों में सबसे पहले नजर जाती है गुजरात की गिर पहाड़ियों पर। गिर के जंगल हां यह सिर्फ भूगोल का विषय नहीं है बल्कि दुनिया के सबसे सफल संरक्षण या कंजर्वेशन की कहानी भी है। यह गिर पहाड़ियां पूरी दुनिया में एशियाई शेरों का यानी एशियाटिक लायंस का इकलौता घर है। पूरी पृथ्वी पर इकलौता हां पूरी पृथ्वी पर और कहीं भी यह शेर प्राकृतिक रूप से नहीं पाए जाते। इन पहाड़ियों का सूखा और पज्जड़ वाला जंगल इन शेरों के लिए एक परफेक्ट घर का काम करता है। और गुजरात से थोड़ा नीचे महाराष्ट्र की तरफ आए तो हमें अजंता पर्वत श्रेणी दिखाई देती है। अजंता की गुफाएं बिल्कुल भूगोल और इतिहास के संगम का इससे बेहतरीन उदाहरण शायद ही कोई हो। इसी पर्वत श्रेणी के पत्थरों को काटकर यूनेस्को द्वारा मान्यता प्राप्त अजंता और एलोरा की गुफाएं बनाई गई थी। सच में कैसे भूगोल एक कैनवस बन जाता है और सदियों तक मानव इतिहास और उसकी बेजोड़ कला को अपने सीने में सुरक्षित रखता है। यह उसका जीता जागता सबूत है। और महाराष्ट्र से ही शुरुआत होती है भारत के उस भौगोलिक फीचर की जो भारत के पूरे मौसम तंत्र को चलाता है। पश्चिमी घाट हां जब हम भारत के प्रायद्वीपीय हिस्से को देखते हैं जो नीचे से V आकार का है तो उसके दोनों किनारों पर पहाड़ों की लंबी दीवारें हैं। पश्चिम में पश्चिमी घाट हैं और पूर्व में पूर्वी घाट हैं। हमारे पास जो मैप है उसमें इन दोनों घाटों के बीच का अंतर बहुत ही बारीकी से दिखाया गया है। पश्चिमी घाट जिसे सह्याद्री पर्वत भी कहते हैं, वह एक बिल्कुल लगातार या कंटीन्यूअस दीवार की तरह है। उसमें बीच-बीच में बहुत कम दरारें हैं। हां लेकिन दूसरी तरफ जो पूर्वी घाट है जिसे महेंद्रगिरि पर्वत भी कहा जाता है, वह बहुत ही कटा छटा या ब्रोकेन है मतलब टुकड़ों में बटा हुआ है। यह अंतर क्यों है? एक दीवार लगातार है और दूसरी टूटी हुई। इसके पीछे लाखों सालों का एक बहुत बड़ा हाइड्रोलॉजिकल खेल है। जो दक्कन का पठार है उसका ढलान पश्चिम से पूर्व की तरफ है। मतलब भारत का बीच का हिस्सा पूर्व की दिशा में थोड़ा सा झुका हुआ है। एग्जैक्टली एग्जैक्टली इस वजह से गोदावरी, कृष्णा और कावेरी जैसी विशाल नदियां पश्चिम से निकलकर पूर्व की ओर बहती हैं। अच्छा और लाखों सालों से यह नदियां बंगाल की खाड़ी में गिरने से पहले पूर्वी घाट के पहाड़ों से होकर गुजरी हैं। पानी की ताकत ने धीरे-धीरे इन पहाड़ों को काट दिया और अपने लिए बड़े-बड़े रास्ते बना लिए। तो इसी वजह से पूर्वी घाट कटा छटा या ब्रोकेन नजर आता है, जबकि पश्चिमी घाट एक लगातार दीवार की तरह खड़ा है। बिल्कुल और इसी लगातार खड़ी दीवार का नतीजा है भारत का मानसून। वह कैसे? क्योंकि जब अरब सागर से उठने वाले मानसून के बादल आते हैं तो यह पश्चिमी घाट उन्हें रोक लेता है, जिससे भारत के पश्चिमी तट पर मूसलाधार बारिश होती है। यह सब कितना आपस में जुड़ा हुआ है। भूगोल सच में एक मास्टर आर्किटेक्ट है। लेकिन कहानी में एक और ट्विस्ट आता है जब हम मैप के एकदम दक्षिण में पहुंचते हैं। एक मिलन स्थल हां एक ऐसा बंदू आता है जहां यह पश्चिमी घाट और पूर्वी घाट आपस में टकरा जाते हैं। अगर हम इसे व्यापक संदर्भ से जोड़कर देखें तो उस मिलन स्थल को क्या कहते हैं? उस जगह को नीलगिरि पर्वत श्रेणी कहा जाता है। नीलगिरि जिसका शाब्दिक अर्थ है नीले पहाड़। नीले पहाड़। यह क्षेत्र अपनी सुंदरता और चाय के बागानों के लिए मशहूर है। इन नोट्स के मुताबिक नीलगिरि पर्वत श्रेणी की सबसे ऊंची चोटी का नाम डोडाबेट्टा है। इसकी ऊंचाई 2637 मीटर है। और यहां एक कैच है। इतनी ऊंचाई होने के बावजूद और नीलगिरि का नाम इतना मशहूर होने के बावजूद डोडाबेट्टा दक्षिण भारत की सबसे ऊंची चोटी नहीं है। सही कहा आपने। यह दक्षिण भारत की दूसरी सबसे ऊंची चोटी है। यह एक ऐसा फैक्ट है जहां अक्सर लोग गलती कर देते हैं। तो अगर डोडाबेट्टा दूसरी सबसे ऊंची चोटी है तो सर्वोच्च चोटी कौन सी है? इसके लिए हमें नीलगिरि से थोड़ा और दक्षिण में जाना होगा। वहां एक और पर्वत श्रृंखला है जिसका नाम है अन्नामलाई पर्वत। अन्नामलाई पर्वत। और इस पर्वत पर जो चोटी स्थित है उसका नाम है अन्नामुडी या अनामुडी। और इस अन्नामुडी की ऊंचाई कितनी है? इसकी ऊंचाई है 2695 मीटर जो इसे पूरे दक्षिण भारत का सर्वोच्च शिखर बनाती है। 2695 मीटर हां अगर हम इस 2695 मीटर की कल्पना करें तो यह दुनिया की सबसे ऊंची इमारत बुर्ज खलीफा की ऊंचाई से भी लगभग तीन गुना ज्यादा है। तीन गुना ज्यादा। हां जरा सोचिए बुर्ज खलीफा जैसी तीन इमारतें एक के ऊपर एक रख दी जाएं उतनी ऊंचाई की यह चोटी सीधे दक्षिण भारत के जंगलों के बीच से आसमान की तरफ उठ रही है। यह तुलना इसके विशाल आकार को बहुत अच्छे से समझाती है। और अन्नामलाई के ठीक नीचे केरल में एक और दिलचस्प पहाड़ी श्रृंखला है जिसे इलायची की पहाड़ियां या कारडम हिल्स कहा जाता है। नाम सुनकर ही मसालों की खुशबू आने लगती है। बिल्कुल। भारत जो सदियों से मसालों के व्यापार का केंद्र रहा है जिसने दुनिया भर के व्यापारियों को भारत की ओर खींचा उन मसालों का बहुत बड़ा हिस्सा खासकर बेहतरीन इलायची आपकी इकॉनमी और वैश्विक व्यापार को भी दिशा दी है। यह तो मुख्य भूमि की बात हो गई, लेकिन हमारे विजुअल गाइड्स हमें भारत की समुद्री सीमाओं के भीतर भी ले जाते हैं। जो द्वीप समूह है वहां भी इन पहाड़ों का अपना एक अलग ही जलवा है। हां हमारे द्वीप भी भौगोलिक रूप से बहुत समृद्ध है। जैसे अंडमान और निकोबार द्वीप समूह जो बंगाल की खाड़ी में है उसकी सबसे ऊंची चोटी का नाम सैंडल पीक है। सैंडल पीक इसकी ऊंचाई 737 मीटर है। और दूसरी तरफ अरब सागर में स्थित लक्षद्वीप समूह की सर्वोच्च चोटी का नाम नारचो है। समुद्र के बीचोंबीच खड़ी यह चोटियां भारत के विशाल भौगोलिक पहुंच का एहसास कराती हैं। एकदम मुख्य भूमि और द्वीपों से होते हुए अब हमें भारत के उस हिस्से की ओर चलना चाहिए जो भौगोलिक रूप से बहुत ही समृद्ध है, लेकिन अक्सर चर्चाओं में पीछे रह जाता है। आप पूर्वोत्तर या नॉर्थ ईस्ट की बात कर रहे हैं। हां भारत का पूर्वोत्तर यह एक क्षेत्र तो पूरी तरह से पहाड़ों का ही एक अभेद दुर्ग है। मेघालय में जो पहाड़ियां हैं मैप्स में उन्हें याद रखने का एक बहुत ही शानदार और विजुअल तरीका बताया गया है। वह क्या है? अगर आप पश्चिम से शुरू करके पूर्व की तरफ बढ़े यानी वेस्ट टू ईस्ट तो यह एक क्रम में है। सबसे पहले गारो फिर खासी और उसके बाद जयंतियां। यह क्रम याद रखना सच में बहुत आसान है। गारो खासी जयंतियां। इसके अलावा पूर्वोत्तर के अन्य राज्यों में भी पहाड़ियों के नाम बहुत ही स्पष्ट हैं। जैसे अरुणाचल प्रदेश में डाफला और मिशमी की पहाड़ियां हैं। और नागालैंड की पहाड़ियों का नाम उन्हीं के नाम पर नागा पहाड़ियां है। और मिजोरम में मिजो पहाड़ियां हैं। नाम इतने सीधे हैं कि कोई भी इन्हें आसानी से याद रख सकता है। लेकिन इनका महत्व सिर्फ नामों तक सीमित नहीं है। बिल्कुल नहीं। यह पहाड़ियां वहां की जनजातियों के लिए उनका घर रही हैं। उनकी संस्कृति और दुनिया से उन्हें जोड़ने या अलग करने का मुख्य माध्यम रही है। सच में हमने आज अरावली के 570 मिलियन साल के सफर से लेकर मध्य भारत के रिफ्ट वैली अजंता की गुफाओं पश्चिमी घाट के मानसूनी जादू और पूर्वोत्तर के इस अभेद दुर्ग तक बहुत कुछ डीकोड किया। लेकिन इन सबके बाद रिसर्च के नजरिए से इससे एक बहुत ही महत्वपूर्ण सवाल खड़ा होता है जिस पर श्रोताओं को विचार करना चाहिए। वह क्या? जरा सोचने वाली बात है अगर यह पर्वत श्रृंखलाएं अपनी जगह पर ना होती तो क्या होता? क्या होता? अगर करोड़ों साल पुरानी अरावली की दीवार ना होती तो क्या राजस्थान का रेगिस्तान आज पूरे उत्तर भारत को निगल चुका होता? यह तो डरावना है। और अगर उत्तर और दक्षिण को बांटने वाला विंध्याचल ना होता तो क्या भारत का इतिहास वैसा ही होता जैसा आज हम पढ़ते हैं? शायद बिल्कुल अलग होता। अगर पश्चिमी घाट की वह लगातार ऊंची दीवार ना होती तो मानसून के वह बादल बिना बरसे ही आगे निकल जाते और क्या भारत की कृषि या वह घने जंगल कभी पनप पाते जहां आज गिर के शेर घूमते हैं या जहां मसालों के बागान लहराते हैं?

[20:04]यह सच में रोंगटे खड़े कर देने वाला विचार है। हम हमेशा सोचते हैं कि इंसान ने इतिहास बनाया है, लेकिन असल में भूगोल ने वह मंच तैयार किया जिस पर इंसान अपना इतिहास लिख पाया। एकदम सही। अगर वह पूर्वी घाट ब्रोकेन ना होते तो दक्षिण की विशाल नदियों का रास्ता कुछ और ही होता। सही कहा। पहाड़ों ने ही असल में भारत की नियति लिखी है। यह सिर्फ पत्थर के ढांचे नहीं है। यह भारत के साइलेंट आर्किटेक्ट हैं। अगली बार जब भी कोई इन पहाड़ों की तरफ देखे तो उसे सिर्फ एक ऊंचा हिस्सा ना समझे। बल्कि उसके पीछे छिपे इस लाखों साल के भूवैज्ञानिक सफर को देखें। हां नदियों के रास्तों और उस पहाड़ पर टिकी हुई पूरी की पूरी पारिस्थितिकी और जिंदगी को जरूर याद करें। भूगोल को देखने का यह नजरिया सच में दिमाग के कई दरवाजे खोल देता है। नोट्स 3D मैप्स और एनालॉजीज ने आज के इस डीप डाइव को बहुत ही शानदार बना दिया है। मुझे भी इस चर्चा में बहुत मजा आया। मुझे पूरा यकीन है कि इस विस्तृत चर्चा से सभी लोगों को बहुत कुछ नया, दिलचस्प और आहा मूवमेंट देने वाला सीखने को मिला होगा। जानकारी से भरे इस सफर में हमारे साथ जुड़ने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद। लास्ट में चैनल को सब्सक्राइब करना ना भूलें।

Need another transcript?

Paste any YouTube URL to get a clean transcript in seconds.

Get a Transcript