[0:01]بسم الله الرحمن الرحيم
[0:09]الحمد لله رب العالمين والصلاة والسلام على سيد المرسلين وخاتم النبيين سيدنا ونبينا ومولانا محمد وعلى آله وصحبه اجمعين وعلى من تبعهم باحسان ودعا بدعوتهم الى يوم الدين اما بعد
[0:43]فاعوذ بالله من الشيطان الرجيم لو كان عرضا قريبا وسفرا قاصدا لاتبعوك ولكن بعدت عليهم الشقه وسيحلفون بالله انهم لكاذبون صدق الله العظيم
[1:09]मोहतरम भाइयों बुजुर्गों, दोस्तों
[1:16]यह आयत का एक हिस्सा मैंने आपके सामने पढ़ा है। जिसमें गजवा ए तबूक का तज़किरा है। यह गजवा जिन हालात में हुआ, वो बड़े सख्त हालात थे। मदीना मुनव्वरा का वह ज़माना इंतहाई गर्मी का था। और माली एतबार से बड़ी उसरत थी, बड़ी तंगदस्ती थी। निकलना कोई आसान काम नहीं था। ये कसौटी थी, एक इम्तिहान था। अल्लाह तबारु ताला का फैसला था, अल्लाह का हुक्म था। और ये अहले ईमान को कहा गया कि उनको निकलना है। और अल्लाह का फैसला हुआ, लोग निकले। अलबत्ता, बहुत से लोग रह गए। जिनमें बुनियादी तौर पर दो किस्में थीं लोगों की। अकसरियत मुनाफिकीन की थी। और इसका ज़िक्र अल्लाह ताला खुद कुरान मजीद में फरमाता है, जो आयत मैंने आपके सामने पढ़ी है। कि अगर वो आसान होता सफर कहते हैं वो, लौ काना अर्दन करीबन व सफरन कासदन लत्तबऊक अल्लाह ताला के बारे में इरशाद फरमाता है कि अगर आसान रास्ता होता, करीब का रास्ता होता, आसान सफर होता, वो आपके साथ हो जाते। लेकिन बादत अलैह मुशका और उनके लिए जाना बड़ा दुश्वार हो गया। जो हालात थे, जो मौसम की शिद्दत थी और उसरत थी, वो बहाने तलाश करने लगे वो। अल्लाह उनके बारे में कहता है, झूठ कहते हैं वो। अल्लाह गवाही देता है कि वो मुनाफिक हैं। लेकिन एक किस्म उनमें उन लोगों की थी जो हज़रात सहाबा थे। तीन लोग थे वो। और उसका ज़िक्र भी अल्लाह ने कुरान मजीद में फरमाया है। कि अल्लाह ने उनको तौबा की तौफीक दी। और अल्लाह ने ऐसी तौबा उनकी कबूल फरमाई कि उस तौबा की कबूलियत का ज़िक्र अल्लाह ने खुद कुरान मजीद में फरमाया है। वो सच्चे थे। वो हज़रात सहाबा थे। लेकिन इस गजवे में एक बड़ा पैगाम है, वाकया कुरान मजीद में इसलिए नहीं ज़िक्र किया गया कि महज़ वो एक तारीखी वाकया था। बल्कि वो इसलिए ज़िक्र किया जा रहा है कि हमें अपने आप को उस कसौटी में कसने की ज़रूरत है। हमें खुद अपना जायजा लेने की जरूरत है। अल्लाह तबारु ताला ने जो नेअमते ईमान हमें अता फरमाई है। और ईमान के जो तकाजे रखे हैं। हम किस हद तक उस कसौटी में पूरे उतरते हैं। आज अगर गौर किया जाए तो अफसोस की बात ये है कि हम दीन को अपने मिजाज के मुताबिक करना चाहते हैं। अपने मिजाज को दीन के सांचे में ढालना नहीं चाहते। बल्कि दीन को अपने मिजाज के मुताबिक बनाना चाहते हैं। और अल्लाह तबारक ताला ये बात फरमाता है कि जो लोग कुर्बानी के रास्ते को इख्तियार नहीं करेंगे। और अपने मिजाज के मुताबिक दीन पर अमल करेंगे तो वो खतरे में हैं। गोया कि वो जो मुनाफिकीन का तज़किरा है वो कहीं न कहीं उसी सिलसिले से अपने आप को जोड़ रहे हैं। जो लोग सच्चे हैं, अहले ईमान हैं, उनका ये तरीका नहीं। वो अपने आप को दीन के सांचे में डालते हैं। और अपनी जिंदगी को दीन के मुताबिक बनाते हैं।
[5:14]अपना वो अपना निजाम नहीं देखते। अपनी आदतें, अपने यहां की रुसूम और उससे आगे बढ़कर मैं अर्ज करता हूं कि अपना अपनी तरतीब दीन की, यहां तक कहा जा सकता है कि अपनी दीन की जो तरतीब है वो तरतीब भी हमारी शरीयत के मुताबिक होनी चाहिए। अल्लाह तबारकु ताला जो हमसे चाहता है, उसके मुताबिक हमें अपनी जिंदगी बनाने की कोशिश करनी चाहिए। ये जो मिजाज हमारा है, कि हमारी तरतीब पर दीन आ जाए, ये इंतहाई खतरनाक है। हमारी तरतीब पर दीन ना आए, बल्कि हम दीन की तरतीब पर आ जाए। है ये असल बात है। और अगर आप गौर करें तो दुनिया में जो कुछ इंतशार और बिगाड़ है उसका सबसे बड़ा सबब यही है कि हम दीन को अपनी तरतीब पर लाना चाहते हैं। हम अपने आप को दीन की तरतीब पर ले जाना नहीं चाहते। अब वो कुछ भी हो, इदारे हो कोई तहरीक हो, कोई निजाम हो। हम उसको असल करार देते हैं और फिर हम दीन को उसके मुताबिक बनाना चाहते हैं। ये बिल्कुल दीन से हटी हुई बात है। अल्लाह क्या चाहता है? हमें दीन के तकाजे को समझने की ज़रूरत है। और हम क्या करते हैं? हम ये करते हैं कि अपनी तरतीब और अपने निजाम को दीन की तरतीब और दीन का निजाम समझते हैं। और बाकी उससे हटकर कुछ भी हो चाहे वह ऐन दीन का तकाजा हो, हम उसको दीन का तकाजा नहीं समझते। अपनी तरतीब और अपने निजाम को असल करार देते हैं। ये जो हमारा तरीका है, ये गैर शरी तरीका है। गैर पसंदिदा है अल्लाह के यहां। अल्लाह तो ये चाहता है कि हम अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के रास्ते पर 100% आ जाएं। और अपनी जिंदगी को हुजूर के का बताया हुआ जो तरीका है और जो निजाम है, हम उसके मुताबिक बना लें। ये अगर हमारा मिजाज है, ये अल्लाह के यहां पसंदिदा है। अब इसके लिए कुर्बानी की ज़रूरत है। जो गजवा ए तबूक का किस्सा है। अल्लाह का हुक्म है, गर्मी है, शिद्दत है, उसरत है लेकिन निकलना है। अल्लाह के हुक्म से निकलना है, एक गजवे के लिए, एक जिहाद के लिए निकलना है। अब वो उस वक्त के हालात में कोई आसान काम नहीं था। हज़रात ए काब इब्ने मालिक रदी अल्लाहु ताला अन्हु ने जो नक्शा खींचा है कि फल पक रहे हैं, इंतहाई मौसम की शिद्दत का जमाना और वो ज़माने में आज तो ऐसी है, आप आराम से बैठे हैं यहां। वो ज़माने की ऐसी क्या था? दरख्त के साए में बैठ गए, हवा खा रहे हैं, वही ऐसी है। तो वो फरमाते हैं कि वहां बड़ा अच्छा लग रहा है, दरख्त के साए में बैठे हैं, फल तैयार हो रहे हैं। और तंगी का ज़माना है, आमदनी का मौका है। अब इसको सब छोड़ छाड़ कर निकल जाना कोई आसान काम नहीं। लेकिन अल्लाह तबारक ताला का फैसला, अल्लाह का हुक्म है, निकलना है। ये है दीन का तकाजा। दीन के तकाजे पर हमें चलना है। गोया कि अपनी तरतीब और अपने निजाम को हमें दीन की तरतीब के मुताबिक बनाना है। ये नहीं मुनासिब है कि हम अपनी तरतीब को दीन की तरतीब करार दें। और उसमें अगर कहीं कमी बेशी नजर आए तो हम कहें कि ये दीन की तरतीब के खिलाफ है। चाहे दीन की जो असल तरतीब है, उसके खिलाफ हो रहा हो तो हमें ख्याल ना रहे। हमें अपनी जिंदगी का जायजा लेने की जरूरत है। तो इसमें देखिए, अगर गौर करें हम तो बड़ी ना हमवालियां हमारी जिंदगी में नजर आती हैं। और उसमें हमने दीन को खानों में बांट दिया है। कहीं आप देखेंगे, अकइद दुरुस्त हैं, तो वहां बड़ी आमाल के अंदर कोताहीयां हैं। और कहीं इबादात में अल्हम्दुलिल्लाह बड़ी लोगों के अंदर जहां फशानी है, कुर्बानी है। मस्जिदें भी आबाद नजर आ रही हैं। लेकिन वहां आप देखिए, तो मामलात की खराबियां हैं। कहीं सारा जोर मामलात पर है। बहुत अच्छी बात है। लेकिन इबादात का कोई एहतमाम नहीं। उसकी अहमियत ही नहीं मिजाज में। ये सारी चीजें वो हैं कि जो अपनी तरफ से हमने इख्तियार कर ली हैं। और अफसोस की बात ये है कि इसमें हर तबका ये कहता है कि हम जो कह रहे हैं वही बात सही है। गोया कि हम जिस चीज की अहमियत बता रहे हैं वो चीज अहम है। मामलात की अहमियत बहुत ज्यादा है। तो बस अब सारा जोर मामलात पर हुआ, आ गया। अब ये ख्याल नहीं है कि भई नमाजें भी तो फर्ज हैं। और भी तो वाजिबात हैं। जो अल्लाह के हुकूक से ताल्लुक रखते हैं। अगर अल्लाह का ही हक अदा न किया जाए, सिर्फ बंदों का हक अदा किया जाए, क्या अल्लाह अल्लाह से राजी होगा? अल्लाह तबारक ताला का हक अदा ना किया जाए, तो क्या अल्लाह तबारक ताला की खुशनूदी हासिल होगी? तो ये जो इस वक्त ना हमवारी है, ये एक हमारा बहुत बड़ा मसला है। एक तरफ आप देखिए कि माशा अल्लाह मस्जिदें आबाद हैं। आप जाइए तो लगेगा माशा अल्लाह सब तहज्जुद गुजार हैं। और नमाज़ों का बड़ा एहतमाम, इबादतों का बड़ा एहतमाम। लेकिन फिर दूसरी तरफ देखिए, तो वहां फिर बड़ी ना हमवालियां, आपको खंदके नजर आएंगी। विरासत की तकसीम का मसला आएगा। अब सारी दीनदारी खत्म। विरासत को अब बिल्कुल अपनी मनमानी तरीके पे तकसीम करेंगे। एक तरफ बड़े दीनदार, तहज्जुद गुजार, कोई एक वक्त की नमाज नहीं छूटती, तकबीर ऊला फौत नहीं होती। लेकिन जब तकसीम ए विरासत का मसला सामने आया, अब जिसको जो मिल गया वो सोचता है कि हम ही को मिल जाए। अगर बड़ा भाई है, और उसके कब्ज़े में है, कागजात उसके पास है, सोचता है कि छोटे भाइयों को हम थोड़ा दे देंगे, अमीन हो तो किया ना। बहन को कौन हक देगा, अब वो तो शादी हो गई। अरे उसको जहेज़ तो दे दिया। अब उसके बाद क्या बचा? ऐसी हमारे अंदर इस सिलसिले में इफराद और तफरीत है कि ना यहां दीन पर अमल ना वहां दीन पर अमल। आप से किसने कहा था जहेज़ देने के लिए? जहेज़ आपने दिया, कोई बहुत शरीयत के मुताबिक काम किया। हां कुछ आपको देना है दीजिए, कोई रोकता नहीं, ये हराम नहीं। लेकिन उसमें इफराद और तफरीत से काम लेना, गुलो करना खास तौर से। और फिर उसके बाद ये समझना कि हमने विरासत में हक दे दिया बहन का। तो इंतहाई गैर शरी बात है। शरीयत के मुताबिक जो बहन का हक है, जो कुरान मजीद में बयान किया जा चुका। अगर खुदा न ख्वास्ता हम वो नहीं देते, और हम अव्वल औख पूरा एहतमाम करते हैं। अजान सुनकर मस्जिद में आते हैं। तकबीर ऊला नहीं छूटती, तहज्जुद नहीं छूटती, इशराक नहीं छूटती। लेकिन बहन का हक नहीं देते, तो गोया अपने आप को जहन्नम का ईंधन बनाना चाहते हैं। सिर्फ नमाज़ों से हमारी नजात तो नहीं होगी। नजात किस चीज में है? नजात हमारी अल्लाह और उसके रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने हमें जो जिंदगी का मुकम्मल रास्ता बताया है, उसमें नजात है। अब तन्हा इसमें नजात नहीं है कि हमने तहज्जुद भी पढ़ ली, इशराग भी पढ़ ली। अब उसके बाद जो विरासत का मसला आया, तो अब भूल गए कि अल्लाह का हुक्म क्या है? अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का इरशाद क्या है? शादी-बियाह का मौका आया। अभी तो हमारी जरूरत है, इसमें तो हम आजाद हैं। जिस तरह चाहे शादी करें, जो चाहे रसमें करें, ये इस्लाम आखिरी हद तक हो रहा है। जहां अहले सूरत हैं, मालदार लोग हैं, वो कहते हैं कि हमारे पास दौलत है तो हम जो चाहे करें। भई दौलत तुम्हारे पास कहां से आई? दौलत तुम्हें किसने दी? अल्लाह ताला फरमाता है, व आतूहु मिम मालिल्लाहि लजी आताकुम। ये अल्लाह के बंदे हैं, जरूरतमंद हैं। इनको अल्लाह के माल में से दो जो अल्लाह ने तुम्हें दिया है। तुम्हारी दौलत कहां से आई? तुम्हारी अक्ल कहां से आई? कहते हैं मिट्टी पर हाथ रख दें तो सोना बन जाए। ये मिट्टी को सोना किसने बनाया? हमने बनाया? कितने लोग मग़ज़मारी करते हैं, कुछ खाक हासिल नहीं होता। कितने लोग हैं जो जरा सी कोशिश करते हैं, ना जाने कहां से वारि न्यारे हो जाते हैं? कौन करता है? अल्लाह करता है। तो हमें सोचना चाहिए इस सिलसिले में कि हमें अपनी दौलत का इस्तेमाल कहां करना है? तीन तीन तरह से सवाल होगा दौलत का। कहां से आई और कैसे रखी गई और कहां खर्च की गई। आपने रख लिया दौलत को। आपने सही तरीके पर कमाया। आपने सही तरीके पर खर्च किया। लेकिन सही तरीके पर नहीं रखा। सही तरीके पर नहीं रखा, इसका क्या मतलब है? साल गुजर गया, जकात नहीं दी। तो आपने गोया कि जो उसको रखा, वो सही तरीके पर नहीं रखा। आपने उसको गलत तरीके पर रखा। वहां भी गिरफ्त होगी। आपने सही कमाया और सही खर्च किया। दो साल पहले कमाया और दो साल के बाद बहुत अच्छे कामों में लगाया। यहां तक मैं कहता हूं, पूरा का पूरा माल आपने दीन के कामों में लगा दिया। लेकिन दो साल गुजर गए, आपको ये ख्याल नहीं आया कि हमें एक साल गुजरने के बाद जकात देनी है? तो ये आपने गोया कि जो उसको रखा और सही तरीके पर नहीं रखा। ये सारे सवालात अल्लाह के यहां। तो हमें जो दौलत का हम खर्च करते हैं, उसके बारे में तो है ही, सवाल होगा। अब गलत तरीके पर मिस्नाफ कर रहे हैं। और ख्याल नहीं होता कि क्या जरूरतें हैं लोगों की? हमारे पड़ोस में कोई है, जरूरतमंद है? किसी के लिए किसी के पास इलाज के पैसे नहीं। किसी के पास खाने के पैसे नहीं। पड़ोसी है, हमारा हक बनता है। अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इस कदर पड़ोसी के बारे में ताकीद फरमाई कि खुद हुज़ूर फरमाते हैं कि हजरत जिब्रील अलैहिस्सलाम बराबर ताकीद करते रहे पड़ोसी के बारे में। हत्ता ज़नन्ना अन्नई सईयुर्रिसु यहां तक कि हमें ख्याल होने लगा कि शहर अब पड़ोसी को वारिस बनाया जाएगा। पड़ोसी को वारिस बनाया जाएगा। वारिस नहीं बनाया गया है लेकिन उसका हक बताया गया। अब हम अपने बारे में सोचें। ये ना हमवारी यही नजर आती है। एक तरफ बहुत दीनदारी है, और एक तरफ बड़ी ना हमवारी। मैं देखता हूं, दो भाई हैं। एक करोड़पति और एक रिक्शा चला रहा है। अब जो रिक्शा चला रहा है बेचारा उसकी परवाह नहीं होती, उसकी जो करोड़पति है। अजीब लतीफ़ा है, सबको देंगे उसको नहीं देंगे। हमने देखा है इसको। मैंने कहा भई अल्लाह के बंदे, तुम्हारा भाई कितना गरीब है, तुम्हें इसका ख्याल नहीं होता, अरे वो अपने किए की भुगत भुग भुग भुगता भूगेगा। अपने किए का भुगतान भुगतेगा जो भुगतेगा। भई तुम जो कर रहे हो उसके बाद तुम्हारा हशर क्या होगा? तुम उसका हक नहीं समझते। तो ये इस तरह की चीजें हैं, हमें इस पर गौर करने की जरूरत है। कि अपनी जिंदगी को हमें तवाजुंन के साथ कायम करना है। अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने जो इरशाद फरमाए हैं, उन इरशादात का हमें ध्यान रखना है। तो ये एक तवाजुन है। इस तवाजुन से हम मुकम्मल दीन पर अमल करने वाले शुमार किए जाएंगे। अब जाहिर है कि इस पर अमल करने में क्या होगा? कुर्बानी देनी पड़ेगी। गजवा ए तबूक में हुक्म हुआ कि निकलो। मामूली कुर्बानी नहीं थी, बहुत बड़ी कुर्बानी थी। आज हमें, हम से मुतालबा है, कुर्बानियों का मुतालबा है। कुर्बानियां छोटी भी होती हैं, बड़ी भी होती हैं। मौजूदा जो हालात हैं, इन हालात में हमें बड़ी-बड़ी कुर्बानियां भी देनी पड़ती हैं। और अल्लाह ताला तो कुरान मजीद में फरमाता है, वलनब्लुवनकुम बिशई मिनल खौफि वल जुअ व नकसिन मिनल अमवाल वल अनफुसी व समरात। व बशिरि साबिरीन। हम तो आजमाएंगे तुम्हें, मालों को कम करके, जानों को कम करके, और तरह-तरह की आजमाइशें होंगी। लेकिन अल्लाह क्या फरमाता है? वो बशिरि साबिरीन। सब्र करने वालों को बशारत दे दीजिए। असल ये है, कुव्वते बर्दाश्त पैदा हो। हमारे सामने जो हालात हैं, हम कभी तो मायूस हो जाते हैं आखिरी हद तक। और उसके बाद गाफिल हो जाते हैं। दोनों बातें अजीब हैं, मुतजात किस्म की। हालात हमारे सामने ऐसे थे कि हम कमर कस लेते। और तय कर लेते कि हम अपने ईमान की हिफाज़त करनी है। हमारे ईमान पर डाके डाके डाले जा रहे हैं। हमारी बच्चियां शिकार की जा रही हैं। हमारे नौजवानों के अंदर शुक्क को शुभहात पैदा किए जा रहे हैं। तो हमारी क्या जिम्मेदारी है? कम से कम हम उनकी तालीम और तरबियत का सही इंतजाम करते हैं। और उसके लिए जो जरूरी असबाब हैं उनको इख्तियार करते हैं। हमें इसकी फिक्र नहीं होती। तो मेरे भाइयों, कहने का मकसद ये है कि इन तमाम जो दीन के खाने हैं और पूरा एक अल्लाह हमें निजाम हमें अता फरमाया। एक पूरा ढांचा अल्लाह ने हमको दिया। उसको हमें समझने की जरूरत है। जब तक हम मुकम्मल दीन पर अमल नहीं करेंगे, हम दीनदार नहीं समझे जाएंगे। दुनिया में समझे जाएं तो समझे जाएं। लोग कहें माशा अल्लाह बड़े दीनदार। टोपी भी है, दाढ़ी भी है। नमाज़ों का एहतमाम भी है। अल्लाह ताला बहुत मुबारक करे, यकीनन ये मज़ाहिर ए दीन हैं। और इनकी बड़ी अहमियत है। अगर ये नहीं है तो फिर आगे तो अल्लाह ही हाफिज है। लेकिन सिर्फ सब कुछ यही नहीं है। उसके साथ जरूरी है कि हमारे अखलाक दुरुस्त हो। हमारे मामलात दुरुस्त हो। हमारे अकाइद दुरुस्त हो। और इसमें चाहे हमें कुर्बानी देनी पड़े, हम कुर्बानी देने के लिए तैयार हैं। अब खुदा न ख्वास्ता अगर दुनिया की मोहब्बत हमारे दिल में बैठ गई, तो ज़ाहिर है कि ये चीज ऐसी है कि अल्लाह को कहां पसंद है ये? कुरान मजीद में भी अगर आप गौर कीजिए, और अहादीस में आप गौर कीजिए, तो साफ ये लगता है कि अल्लाह ने ये दुनिया तो इम्तिहान के लिए दी है। अल्लाह ने दुनिया ऐश और इशरत के लिए नहीं दी है। अल्लाह ने ये दुनिया इम्तिहान के लिए दी है। और कीमत अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने बयान फरमाई दुनिया की। कि अगर दुनिया की कीमत मच्छर के पर के बराबर भी होती, तो अल्लाह तबारकु ताला अपने बाकियों को एक घूट पानी भी ना देता। फला यगरुरका तकल्लुबुल् लजीन कफरू फिल बिलाद। मताउन करीबन सुम्मा मावाहुम जहन्नम। अल्लाह के बाकियों का ये दौर दौरा, और ये उनका कर्रो फर तुम्हें धोखे में ना डाले। ये क्या है दुनिया का मामूली सा सामान है। मताउन कलील कहा। और फरमाया, सुम्मा मावाहुम जहन्नम। उसके बाद उनका ठिकाना तो जहन्नम है। अब हमें धोखा यहीं से होता है कि फला ताकत वाला, फला हुकूमत वाला, फला दौलत वाला। दुनिया में उसका कर्रो फर, दुनिया में उनकी हुकूमत, उनके सारे असबाब उनके पास जो चाहें करें। अरे अल्लाह ने वो चीजें रखी ही उनके लिए। हमारे लिए तो अल्लाह ने आख़िरत की कामयाबियां रखी हैं। लेकिन शर्त ये है कि हम दुनिया को सही तरीके पर बरतें और दुनिया की हकीकत को समझें। एक जगह कुरान मजीद में ये बात फरमाई गई कि अगर ये डर ना होता कि सब के सब लोग काफिर हो जाएंगे। तो हम काफिरों के घरों की सीढ़ियों को, छतों को सोने-चांदी का बना देते। अल्लाह फरमाता है कुरान मजीद में कि काफिरों के जो घरों की सीढ़ियां हैं और छतें हैं, हम उनको सोना-चांदी का बना देते। और फिर फरमाया, कि ये तो मामूली चीजें हैं, बे हकीकत चीजें हैं। और अल्लाह तबारक ताला ने ऐसा इसलिए नहीं किया कि अगर ऐसा होता तो आज ही हमारी हालत खराब हो रही है। उस वक्त क्या होता? आज ईमान के सौदे किए जा रहे हैं, उस वक्त क्या होता? सारे के सारे काफिर ही हो जाते। अल्लाह तबारक ताला ने कुरान मजीद में दर्जनों जगह दुनिया की हकीकत बयान फरमाई। लेकिन साथ-साथ उसको खैर फरमाया। फइन्नहु लहूब्बिल् खैरि ल शदीद। कि वो खैर को बहुत ज्यादा चाहने वाला है। यहां खैर से मुराद माल है। माल को बहुत ज्यादा चाहने वाला। उसकी इस उसके खमीर में, उसकी सरिश्त में दुनिया की मोहब्बत शामिल है। उसको अल्लाह ने खैर भी फरमाया। और खैर क्यों फरमाया? ये हुसूले खैर का बहुत बड़ा जरिया है। आदमी इसको खैर के लिए इस्तेमाल कर ले तो खैर है। और अगर खुदा न ख्वास्ता दिल में मोहब्बत बैठ जाए उसकी तो फिर शरी शरी है। ये बात बुजुर्ग बाद बुजुर्गों ने कही कि दुनिया जहां रखी जानी चाहिए अगर वहां रखी जाए तो उसमें हर्ज नहीं। गलत जगह आ जाए तो हर्ज है। जगह उसकी क्या है? अलमारी में रख दो, बैंक में है, ठीक है। दिल में मत रखो। अगर दिल में आ गई दुनिया तो फिर शरी शरी है। अगर दिल में नहीं है, और आदमी ने कहीं रख दी जहां रखनी चाहिए, हक के साथ रखी, हक के साथ कमाया। और हक के साथ खर्च किया, इसमें कोई हर्ज नहीं। खैर ही खैर। अल्लाह के रास्ते में सदका किया। जरूरतमंदों के काम आ गए। अभी अल्लाह ने उसको खैर का जरिया बना दिया। और ये अल्लाह के जो बड़े नेक बंदे हैं, ऐसा नहीं है कि सब गरीब ही थे। हजरत साद इब्ने अबी वक़ास रदी अल्लाहु ताला अन्हो और बड़े-बड़े सहाबा, हजरत काब इब्ने मालिक रदी अल्लाहु ताला अन्हो और बड़े बहुत से सहाबा, बड़े मालदार थे। बाद बड़े-बड़े औलिया अल्लाह के वाकयात हैं कि उनके बड़े-बड़े कारोबार, जहाजों पर सामान आता था। एक किस्सा कहीं हमने पढ़ा कि एक बड़े बुजुर्ग थे। अब बड़े-बड़े जहाजों पर उनका सामान आता था। तो एक मर्तबा वो मजलिस में बैठे थे, किसी ने आकर कहा, हजरत फला जो आपका जहाज आ रहा था, वो गर्क हो गया। और उस पर लाखों का, उस जमाने के एतबार से लाखों का सामान, बड़ा जहाज। उन्होंने सर झुकाया, फरमाया, अल्हम्दुलिल्लाह। अब लोगों को बड़ा ताज्जुब हुआ, कि इन्न लिल्लाह पढ़ने का वक्त है या अल्हम्दुलिल्लाह पढ़ने का वक्त। थोड़ी देर गुज़री, एक सहाब आए। वो कहा, हजरत नहीं, खबर गलत थी, वो गर्क नहीं हुआ। उन्होंने फिर सर झुकाया, कहा, अल्हम्दुलिल्लाह। अब बाज़ जो ताल्लुक के करीब के लोग थे, वो हजरत समझ बात आई ही नहीं। उधर भी अल्हम्दुलिल्लाह, इधर भी अल्हम्दुलिल्लाह। फरमाया कि मियां, मैंने जहाज के ना गर्क होने पर अल्हम्दुलिल्लाह कहा, और ना उसके बच जाने पर अल्हम्दुलिल्लाह कहा। मैंने तो सर झुका के अपने दिल को देखा कि दिल की कैफियत क्या है। जहाज डूब गया कहीं ऐसा तो नहीं हुआ कि मेरे दिल की कश्ती भी डूब गई हो। मैंने महसूस किया कि अल्हम्दुलिल्लाह मेरे ऊपर कोई असर नहीं पड़ा। मैंने अपने दिल की सलामती पर अल्हम्दुलिल्लाह कहा। और जब खबर आई कि जहाज बच गया फिर मैंने देखा कि ज्यादा खुशी ज़रूरत से ज्यादा तो नहीं हो गई। दिल इतरा तो नहीं गया? तो मैंने देखा, दिल पहले जैसा था, अब भी वैसा ही है। तो मैंने उस वक्त भी कहा, अल्हम्दुलिल्लाह। ये है असल बात समझने की, दौलत बुरी चीज नहीं, लेकिन सही तौर पर कमाना, सही तौर पर रखना, सही तौर पर खर्च करना, और दिल ना लगाना, ये असल बात है। दिल ना लगाना, उसको वहां रखा जाए जहां रखा जाना चाहिए। तो इसका नतीजा ये होता है कि उसको अल्लाह तबारकु ताला खैर का जरिया फरमा देते हैं। तो हमें अपना जायजा लेना चाहिए कि हमारी जिंदगी शरीयत के मुताबिक है या नहीं? ऐसा तो नहीं है कि बाज़ हिस्सों में तो हम बहुत बुलंदी पर हैं, और बाज़ हिस्सों में जिंदगी के इंतहाई पस्ती पर हैं। तो वहां तो अल्लाह के यहां पकड़ हो जाएगी। अल्लाह के यहां गिरफ्त बड़ी सख्त है। तो अपनी पूरी जिंदगी को हमें देखने की जरूरत है। कारोबार आदमी करें, सही तरीके पर करें। हुकूक अदा करें, जकात हिसाब लगा कर दे। ये नहीं कि हमने तो 10 करोड़ दे दिए, अब इससे ज्यादा क्या देंगे? अरे भई देखो तुम्हारी तुम्हारी आमदनी क्या है? तुम्हारे माल की कीमत क्या है? अरबो-खरबों में कीमत है तुमने 1 करोड़ दे दिया, क्या जकात अदा हो जाएगी? हिसाब लगाओ। और हिसाब लगा के जो 2.5% बनता है, साल गुजर गया, हिसाब लगाकर जकात दो। और जकात देने के बाद ये मत समझो कि तुमने जकात देकर एहसान किया। तुम सोचो कि तुमने जकात दी, अल्लाह का फजल हुआ तुम्हारे साथ। अल्लाह का शुक्र करो। उस पर अल्लाह का शुक्र अदा करो कि अल्लाह तबारकु ताला ने एक बड़ी जिम्मेदारी थी जो अदा करने की तौफीक अता फरमाई। जब अपनी इस तरह हम जिंदगी को देखेंगे और कुर्बानियों के साथ आगे बढ़ेंगे। हालात पेश आते हैं, मुल्क के जो हालात हैं, वो हमारे सामने हैं। तो हालात तो इससे ज्यादा सख्त पेश आ चुके हैं। हिंदुस्तान में भी अगर आप गौर करें, सन 1947 में जब मुल्क तकसीम हुआ। हमारे जो बूढ़े हज़रात हैं, और जिन्होंने वो ज़माना शुऊर के साथ देखा है, वो खूब जानते हैं। हमारे हजरत मौलाना मोहम्मद राबे साहब रहमतुल्लाही अलैहि, अल्लाह उनके दर्जे बुलंद फरमाएं। उनसे हमने दर्जनों मर्तबा ये बात सुनी। हालात का बिगाड़ होता था, फरमाते थे, मियां क्यों घबराते हो? इससे ज्यादा हालात बिगड़ चुके हैं। लेकिन अल्लाह ने दीन की इस मुल्क में हिफाज़त फरमाई। लेकिन हमारी जो जिम्मेदारी है, हमें अपनी जिम्मेदारी को अदा करने की जरूरत है। ईमान और अखलाक पर मेहनत की जाए। अपने ईमान को मजबूत किया जाए। आने वाली नस्लों के ईमान की फिक्र की जाए। उसके लिए सही इंतजाम किया जाए। मकातिब का इंतजाम किया जाए। इस्लामिक स्कूलों का इंतजाम किया जाए। नौजवानों की तरबियत का इंतजाम किया जाए। बड़ी बच्चियां और खवातीन बाद मर्तबा जो जॉब पर जाती हैं कभी-कभी और उसका नतीजा बड़ा अजीब होता है। उनके दीन और ईमान का बाकायदा इंतजाम किया जाए। कम से कम हफ्तेवारी निजाम हो, काउंसलिंग सेंटर हो, जहां वो बच्चियां और खवातीन आएं और उनकी तरबियत का और तालीम का नज्म हो, दीन पर एतमाद उनका बहाल किया जाए। और मैं तो समझता हूं अगर आप गौर करें तो दुनिया का जो फसाद है इस वक्त सबसे बड़ा, वो क्यों है? वो दुनिया की मोहब्बत के नतीजे में है। और दुनिया की मोहब्बत के नतीजे में, हम भूल जाते हैं कि हमें किस तरह अपनी जिंदगी को सवारने की जरूरत है। बस अगर इंशा अल्लाह हमने इसकी कोशिश की, अपनी पूरी जिंदगी का जायजा लेकर उसको सवारने की कोशिश की, तो हम इंशा अल्लाह कामयाब हो जाएंगे। गजवा ए तबूक में जो हज़रात निकले और कुर्बानियों के साथ निकले, अल्लाह तबारकु ताला ने उनको क्या मकाम अता फरमाया। हमें यही कोशिश करनी है चाहे हमें कुर्बानी देनी पड़े, लेकिन इंशा अल्लाह, हमें दीन के तकाजों को समझ कर अपने आप को उस पर लगाना है। और चाहे उसमें कैसी ही हमें कुर्बानी देनी पड़े, हमें कुर्बानी देनी है। नतीजा इंशा अल्लाह फिर हमारे साथ होगा और अल्लाह हम से राजी होगा। अल्लाह तबारक ताला हम सबको तौफीक अता फरमाए और अपनी जिंदगी को हमें बनाने की तौफीक अता फरमाए। और पूरी जो हमारी जिंदगी है, वह शरीयत के मुताबिक हो जाए। वाखिरु दावना अनिल हम्दुलिल्लाहि रब्बिल आलमीन।



