[0:00]क्या आपने कभी सोचा है कि 15 साल तक जिस नेता का पूरे राज्य पर एक तरफा राज रहा हो वो अचानक अपना ही गढ़ कैसे हार सकती है? साल 2026 के वेस्ट बंगाल चुनाव की कहानी बिल्कुल ऐसी ही है। यह कहानी है ममता बनर्जी की उस ऐतिहासिक हार की और बीजेपी के उस मास्टर स्ट्रोक की जिसने भारतीय राजनीति का पूरा नक्शा पलट कर रख दिया। टीएमसी की सरकार जो कभी गरीबों और आम जनता की आवाज बनकर सत्ता में आई थी, अब भ्रष्टाचार, गुंडागर्दी और सिंडिकेट राज के दलदल में फंस चुकी थी। जनता बदलाव चाहती थी, लेकिन डर का माहौल इतना था कि कोई बोल नहीं पाता था। इसी बीच, बीजेपी ने बंगाल में जीत हासिल करने के लिए एकदम पक्की और जबरदस्त प्लानिंग की। उन्होंने सिर्फ रैलियों में भाषण नहीं दिए, बल्कि आरएसएस के साथ मिलकर मजबूत प्लानिंग तैयार किया और युवाओं को तरक्की वाले बंगाल का सपना दिखाया। बात तब और बिगड़ गई जब सुप्रीम कोर्ट और इलेक्शन कमीशन को खुद दखल देना पड़ा। फर्जी वोट रोकने के लिए वोटर लिस्ट से 90 लाख नाम काटे गए और पूरे राज्य में बहुत भारी संख्या में पुलिस तैनात कर दी गई। यह कहानी उसी महा चुनाव की है जब 4 मई 2026 को नतीजे आए और पिछले 15 सालों से लगातार राज कर रही सरकार बुरी तरह से गिर गई। आइए जानते हैं कि बंगाल के इस चुनाव में इतना बड़ा बदलाव कैसे हुआ और सरकार कैसे पलट गई।
[1:27]1970 का दशक। कोलकाता की सड़कें और कॉलेज कैंपस किसी युद्ध के मैदान से कम नहीं थे। लेफ्टिस्ट थिंकिंग और स्टूडेंट पॉलिटिक्स का कॉकटेल हर युवा के दिमाग पर हावी था। इसी माहौल के बीच जोगमाया देवी कॉलेज में एक युवा लड़की ने कदम रखा। उस लड़की के पास ना तो कोई बड़ा राजनीतिक बैकग्राउंड था और ना ही किसी बड़े नेता का हाथ। उसके पास सिर्फ एक चीज थी, सिस्टम से लड़ने की एक जिद। उसने इंडियन नेशनल कांग्रेस के स्टूडेंट विंग, स्टूडेंट काउंसिल की कमान संभाली और देखते ही देखते कम्युनिस्ट बैक स्टूडेंट ऑर्गेनाइजेशंस को घुटनों पर ला दिया। यह लड़की कम्युनिस्टों का गुरूर तोड़ देगी। इसमें वो आग है जो एक दिन पूरे बंगाल की राजनीति को जलाकर राख कर देगी। यह शब्द उस वक्त के कई राजनीतिक पंडितों के थे, लेकिन असली खेल तो 1984 में शुरू हुआ। देश इंदिरा गांधी की हत्या के सदमे से गुजर रहा था। इसी जज्बाती माहौल में कांग्रेस ने 29 साल की इस युवा लड़की को जादवपुर लोकसभा सीट से मैदान में उतार दिया। सामने थे सीपीआईएम के कद्दावर नेता सोमनाथ चटर्जी, जिनकी जड़ें बंगाल की राजनीति में एक बरगद के पेड़ जैसी गहरी थी। सोमनाथ दा को हराना उस वक्त ऐसा था मानो किसी पहाड़ को हाथों से खिसकाना। लेकिन जब नतीजे आए तो पूरा नेशनल मीडिया सन्न रह गया। उस युवा लड़की ने 3,31,618 वोट पाकर सोमनाथ चटर्जी को हरा दिया था। वह लड़की और कोई नहीं, ममता बनर्जी थी। इस जीत ने ममता बनर्जी को राजनीति के नेशनल मैप पर रातों-रात सुपरस्टार बना दिया। इसके बाद वो कई बार मंत्री बनी। रेलवे से लेकर कोयला मंत्रालय तक संभाला, लेकिन दिल्ली की सत्ता के आलीशान बंगले कभी उनका अंतिम लक्ष्य नहीं थे। उनका दिमाग तो सिर्फ एक बात पर अटका था। बंगाल से लेफ्ट फ्रंट के 34 साल पुराने किले को उखाड़ फेंकना। 1990 का वह काला दिन कोलकाता के हाजरा क्रॉसिंग पर ममता बनर्जी पर सीपीआईएम के काडर ने जानलेवा हमला किया। उनके सिर पर बुरी तरह वार किया गया। खून से लतपत ममता की उस तस्वीर ने पूरे बंगाल के सबऑल्टरन वोटर के दिल में एक गहरी छाप छोड़ी। हम ईंट का जवाब पत्थर से देंगे। बंगाल की जनता हमारे साथ है और हम यह साबित करके रहेंगे कि हम डरने वाले नहीं हैं। अस्पताल के बेड से बोला गया उनका हर एक शब्द बंगाल के गरीबों के लिए एक नया इंकलाब बन गया। ममता समझ चुकी थी कि कांग्रेस की दिल्ली वाली लीडरशिप लेफ्ट के सामने बहुत सॉफ्ट है। इसलिए 1998 में उन्होंने एक बहुत बड़ा रिस्क लिया और अपनी खुद की पार्टी बनाई ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस टीएमसी। लेकिन टीएमसी को वह क्रिटिकल मास मिला 2006 में। बंगाल की अर्थव्यवस्था दम तोड़ रही थी। लेफ्ट सरकार के मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य ने राज्य में इंडस्ट्री लाने के लिए एक बहुत एग्रेसिव लैंड एक्विजिशन पॉलिसी शुरू की। उनका प्लान था सिंगूर में टाटा मोटर्स का नैनो प्लांट लगाना और नंदीग्राम में एक बहुत बड़ा केमिकल हब बनाना। यही वह पल था जब लेफ्ट सरकार ने अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली। ममता बनर्जी ने तुरंत इस मुद्दे को कैप्चर किया। उन्होंने खुद को किसानों की सबसे बड़ी मसीहा के रूप में खड़ा कर दिया। सिंगूर में 25 दिन की भूख हड़ताल ने पूरे राज्य के सिस्टम को पैरालाइज कर दिया। टाटा को हार मानकर अपना प्लान गुजरात शिफ्ट करना पड़ा। लेकिन असली खून खराबा तो नंदीग्राम में हुआ। पुलिस और पार्टी के लोगों की गोलियों से 14 बेगुनाह गांव वाले मारे गए। इस भयानक घटना के बाद बंगाल के पढ़े-लिखे लोग, माइनॉरिटी और गांव के वोटर लेफ्ट पार्टी से एकदम दूर हो गए। माटी हमारी मां है और अपनी मां को हम इन इंडस्ट्रियलिस्ट के हाथों कभी बिकने नहीं देंगे चाहे हमारी जान ही क्यों ना चली जाए। इसी आग के बीच टीएमसी ने एक ऐसा नारा दिया जो बंगाल की रगों में दौड़ गया। मां, माटी, मानुश। और फिर आया 2011 का वह ऐतिहासिक चुनाव। 20 मई, 2011 को ममता बनर्जी जिन्हें अब पूरा बंगाल दीदी कहने लगा था। राज्य की पहली महिला मुख्यमंत्री बनी। सत्ता में आते ही दीदी ने बंगाल के गवर्नेंस मॉडल को पूरी तरह पलट कर रख दिया। सूती साड़ी और हवाई चप्पल उनकी पहचान बन गए। उनका सीधा और इमोशनल कनेक्शन बंगाल के रूरल वोटर्स से जुड़ चुका था। उन्होंने समझ लिया था कि राज्य में कोई बड़ी इंडस्ट्री नहीं आने वाली है। कन्याश्री से लेकर स्वास्थ्य साथी तक, दर्जनों ऐसी स्कीम्स लॉन्च की गई जो सीधे सबसे गरीब और पिछड़े वर्ग को टारगेट करती थी। उन्होंने लक्ष्मी भंडार जैसी स्कीम के जरिए महिलाओं के साथ एक डायरेक्ट रिश्ता बना लिया। दीदी ने महिलाओं के रूप में एक ऐसा वोट बैंक तैयार कर लिया जो किसी भी कीमत पर उनसे टूटने वाला नहीं था। 2021 आते-आते बंगाल में एक नई एंट्री हो चुकी थी, भारतीय जनता पार्टी। बीजेपी ने लेफ्ट और कांग्रेस को पूरी तरह से रिप्लेस कर दिया था। उनका राष्ट्रवाद और हिंदुत्व का मॉडल टीएमसी के लिए एक बहुत बड़ा खतरा बन चुका था। लेकिन 2021 के चुनावों में टीएमसी ने एक ऐसा डिफेंसिव सिस्टम तैयार किया जिसने बीजेपी की रथ को रोक दिया। बंगाल में सिर्फ एक ही खेल होगा और वो खेल हम ही जीतेंगे। दिल्ली वाले हमें कभी भी डरा या झुका नहीं सकते। यह था उनका नारा, खेला होबे। टीएमसी ने खुद को बंगाली कल्चर के रक्षक के तौर पर प्रोजेक्ट किया। भले ही ममता बनर्जी खुद नंदीग्राम से चुनाव हार गई, लेकिन उनकी पार्टी ने बहुत बड़ी जीत दर्ज की। दीदी ने अपना तीसरा टर्म तो शुरू कर लिया, लेकिन इस तीसरे टर्म की नींव पहले दिन से ही दरकने लगी थी। इसकी सबसे बड़ी वजह बनी कोविड महामारी। जब बंगाल की जनता अस्पतालों के बाहर ऑक्सीजन और बेड के लिए तड़प रही थी, तब प्रशासन का पूरा ध्यान शमशानों की हकीकत को फाइलों में दफन करने पर था। सरकार पर गंभीर आरोप लगे कि वह अपनी पॉलिटिकल इमेज बचाने के लिए जानबूझकर कोरोना से होने वाली मौतों के असली आंकड़े छिपा रही है। अस्पतालों की खौफनाक सच्चाई दुनिया के सामने ना आए इसके लिए मरीजों और डॉक्टरों के मोबाइल फोन इस्तेमाल करने पर भी बैन लगा दिया गया। विपक्षी दल, एक्टिविस्ट या कोई भी आम नागरिक जिसने सरकार से सवाल पूछने की हिम्मत की उसे पुलिस की लाठियों और फर्जी मुकदमों का सामना करना पड़ा। अपोजिशन के नेताओं पर फेक न्यूज़ फैलाने के आरोप में तुरंत एफआईआर दर्ज की गई। इसने ममता बनर्जी के उस रक्षक वाले इमेज को तार-तार कर दिया जिसके दम पर उन्होंने बंगाल का दिल जीता था। 2021 के बाद टीएमसी के गवर्नेंस मॉडल की कमियां दिखने लगी। जो सिस्टम गांव-गांव में वेलफेयर स्कीम्स पहुंचाता था वह अब एक बहुत बड़े एक्सटॉर्शन रैकेट में बदल चुका था। पंचायत से लेकर मुनिसिपल लेवल तक हर सरकारी काम में लोकल नेताओं का कमीशन फिक्स था। बिजनेस करना नामुमकिन हो गया और अर्बन मिडिल क्लास पूरी तरह से फ्रस्ट्रेट हो चुका था। लेकिन टीएमसी की बर्बादी का सबसे बड़ा कारण बना एसएससी नौकरी घोटाला। स्टेट एजुकेशन सेक्टर में मेरिट को किनारे रखकर हजारों टीचिंग और नॉन टीचिंग जॉब्स उन लोगों को बेच दी गई जिन्होंने इसके लिए लाखों की रिश्वत दी थी। जब ईडी ने जांच शुरू की तो एजुकेशन मिनिस्टर पार्थ चटर्जी और उनके करीबियों के घरों से नोटों के पहाड़ निकले। टीएमसी ने पार्थ चटर्जी को पार्टी से निकालकर डैमेज कंट्रोल की कोशिश की, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। अप्रैल 2024 में कलकत्ता हाई कोर्ट ने 23,123 टीचर्स और नॉन टीचिंग स्टाफ की नौकरियां पूरी तरह रद्द कर दी। सरकार सुप्रीम कोर्ट भागी, लेकिन अप्रैल 2025 में चीफ जस्टिस संजीव खन्ना की बेंच ने भी हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा और 25,753 नौकरियां खत्म कर दी। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि इस पूरे सिलेक्शन प्रोसेस में इतना बड़ा फ्रॉड हुआ है कि इसकी इंटीग्रिटी ही खत्म हो चुकी है। ममता बनर्जी ने इस फैसले को गलत तो बताया लेकिन लोगों का उन पर से भरोसा पूरी तरह खत्म हो चुका था। जब एक के बाद एक घोटाले सामने आने लगे और नेता गिरफ्तार होने लगे तो टीएमसी ने बचाव के लिए अपना पुराना हथियार निकाला। उन्होंने पूरे देश में यह नैरेटिव सेट करना शुरू कर दिया कि ईडी और सीबीआई की यह रेड सेंट्रल गवर्नमेंट का राजनीतिक बदला है। उनका यह डिफेंस शायद जनता के बीच थोड़ा काम कर भी जाता। लेकिन तभी सरकार से एक बहुत बड़ी चूक हो गई। जब ईडी की टीम अपना काम करने पहुंची तो बंगाल पुलिस ने कानून का साथ देने के बजाय जांच एजेंसियों का रास्ता रोक लिया और उनके काम में सीधी रुकावट डाली। जब यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो अदालत का गुस्सा सातवें आसमान पर था। कोर्ट ने ममता सरकार और स्टेट पुलिस को कड़ी फटकार लगाते हुए साफ कहा कि प्रशासन का यह अड़ियल रवैया डेमोक्रेसी को खतरे में डाल रहा है। अगर नौकरी घोटाले ने नौजवानों का भरोसा तोड़ा तो आरजेकर की भयानक घटना ने टीएमसी के सबसे बड़े वोट बैंक यानी महिला वोटर्स को हमेशा के लिए खत्म कर दिया। संदेश खाली गांव के इलाके में टीएमसी के लोकल गुंडों पर महिलाओं के साथ लगातार अत्याचार करने और उनकी जमीनें छीनने के बहुत ही गंभीर आरोप लगे। हद तो तब हो गई जब पुलिस कई हफ्तों तक मुख्य अपराधी को पकड़ ही नहीं पाई। इस घटना से यह एकदम साफ हो गया कि दीदी के राज में महिलाओं को सुरक्षा मिलने की बात सिर्फ एक धोखा है। लेकिन पूरे बंगाल की रूह तब कांप गई जब कोलकाता के सरकारी आरजेकर मेडिकल कॉलेज में ड्यूटी पर मौजूद एक महिला ट्रेनी डॉक्टर का रेप और मर्डर हुआ। इस घटना ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया। शुरू में सरकार ने इस पूरे मामले को बहुत हल्के में लिया और अस्पताल के ताकतवर लोगों को बचाने की कोशिश की। इससे जनता का गुस्सा फूट पड़ा और सड़कों पर एक बहुत बड़ा आंदोलन खड़ा हो गया। इसी गुस्से को भुनाने के लिए बीजेपी ने एक बहुत ही इमोशनल मास्टर स्ट्रोक खेला। उन्होंने पानीहाटी सीट से आरजेकर की पीड़िता की मां को अपना उम्मीदवार बना दिया। जैसे-जैसे 2026 के चुनाव नजदीक आए, इलेक्शन कमीशन ऑफ इंडिया ईसीआई ने एक ऐसा कदम उठाया जिसने पूरे बंगाल में पैनिक बटन दबा दिया। इस कदम का नाम था स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन एसआईआर। संविधान के आर्टिकल 324 के तहत ईसीआई ने वोटर लिस्ट सही करने के लिए घर-घर जाकर चेकिंग शुरू कर दी। मकसद था मरे हुए, शिफ्ट हो चुके और गैर नागरिक वोटर्स को लिस्ट से हटाना। लेकिन इसका रिजल्ट बहुत ही शॉकिंग था। बंगाल से करीब 90 लाख वोटर्स के नाम काट दिए गए। राज्य के कुल वोटर्स की संख्या 7.66 करोड़ से घटकर 6.77 करोड़ रह गया। यह 12% की गिरावट थी। टीएमसी ने इसे सर्जिकल स्ट्राइक बताया और आरोप लगाया कि यह एक सोची समझी साजिश है ताकि माइनॉरिटी वोटर्स को बाहर किया जा सके। वहीं बीजेपी ने इसे नेशनल सिक्योरिटी का मुद्दा बनाते हुए घुसपैठियों की सफाई बताया। यह माहौल बिल्कुल आसाम के एनआरसी जैसा हो गया था। हालात इतने बिगड़ गए कि सुप्रीम कोर्ट को खुद दखल देना पड़ा। राज्य सरकार और ईसीआई के बीच बिल्कुल भी भरोसा नहीं बचा था। इसे देखते हुए कोर्ट ने 150 जिला जजों और सात रिटायर्ड हाई कोर्ट जजों को सीधा वोटर लिस्ट बनाने और चेक करने का काम सौंपा। वोटर लिस्ट से 90 लाख नाम कट जाने की वजह से टीएमसी के वोट बैंक को बहुत भारी नुकसान पहुंचा। मुर्शिदाबाद और मालदा जैसे इलाकों में डिलीट हुए वोट्स की संख्या टीएमसी की पुरानी जीत के मार्जिन से भी ज्यादा थी। और इसी वक्त टीएमसी को दूसरा बड़ा झटका लगा, आम जनता उन्नयन पार्टी एजेयूपी के रूप में। टीएमसी से निकाले गए नेता हुमायूं कबीर ने इस पार्टी को बनाया। हम किसी के गुलाम नहीं हैं। इस बार हम तय करेंगे कि बंगाल की कुर्सी पर कौन बैठेगा और हम अपना हक छीन कर लेंगे। कबीर की इस नई पार्टी ने मुर्शिदाबाद और मालदा में मुस्लिम वोटों का एक बहुत बड़ा हिस्सा काट लिया जो 90 से 95% वोट 2021 में एकतरफा टीएमसी को मिला था। वह अब बट चुका था। रेजि नगर और नौदा जैसी सीटों पर एजेयूपी ने जीत दर्ज की और इस वोट बंटवारे ने बीजेपी के लिए नॉर्थ दिनाजपुर और मालदा में जीत का रेड कारपेट बिछा दिया। वहीं दोस्तों, अगर आप भी मेरे जैसे 2D एनिमेशन वीडियो बनाना सीखना चाहते हो, वह भी एआई की मदद से, तो मैंने आपके लिए एक कंप्लीट कोर्स बनाया है। जिसमें मैंने स्टेप बाय स्टेप सिखाया है कैसे कोई वीडियो वायरल होता है, कैसे सही टॉपिक चुना जाता है, कैसे मेरे जैसे एंगेजिंग स्क्रिप्ट्स लिखी जाती है, कैसे एआई की मदद से 2D एनिमेशंस बनाए जाते हैं, कैसे एआई से वॉइस ओवर जनरेट करते हैं और कैसे एक क्लिक में वायरल थंबनेल्स तैयार किए जाते हैं। अभी इस कोर्स पर 50% का लिमिटेड ऑफर चल रहा है। यह ऑफर सिर्फ पहले 100 यूज़र्स के लिए। तो देर मत कीजिए। डिस्क्रिप्शन में दिए गए लिंक पर क्लिक करें और आज ही जॉइन करें। 2026 के इस ऐतिहासिक चुनाव में बीजेपी सिर्फ टीएमसी की गलतियों के सहारे नहीं बैठी थी। वह जानती थी कि बंगाल का किला फतेह करना है तो हवा-हवाई बातों से काम नहीं चलेगा। इसीलिए आरएसएस की मदद से उन्होंने जमीनी स्तर पर एक बहुत ही सटीक और डीप प्लानिंग की। सबसे पहले उन्होंने पूरे राज्य के 44000 पोलिंग बूथों का सर्वे किया और उन्हें तीन हिस्सों में बांट दिया। कहां पार्टी मजबूत है, कहां कमजोर है और कहां थोड़ी ज्यादा मेहनत से काम बन सकता है। लेकिन इस पूरी प्लानिंग का सबसे बड़ा मास्टर स्ट्रोक और गेम चेंजर था पन्ना प्रमुख सिस्टम। इसे एकदम आसान भाषा में समझें तो वोटर लिस्ट के हर एक पन्ने पर करीब 30 से 60 वोटर्स के नाम होते हैं। बीजेपी ने वोटर लिस्ट के हर एक पन्ने की जिम्मेदारी अपने एक भरोसेमंद वर्कर को सौंप दी। इस एक फैसले ने पूरा गेम पलट दिया। पहले टीएमसी के लोकल क्लब और गुंडे गांव-मोहल्लों में दादागिरी करते थे और लोगों को डरा-धमका कर वोट लेते थे। लेकिन पन्ना प्रमुख सिस्टम की वजह से हर 15 से 20 घरों के बीच बीजेपी का अपना एक आदमी खड़ा हो गया। वह लगातार उन परिवारों के टच में था और उनकी सुरक्षा का भरोसा दे रहा था। इससे जनता का डर खत्म हो गया और टीएमसी का जमीनी नेटवर्क बुरी तरह से टूट गया। वहीं प्रधानमंत्री मोदी, अमित शाह और योगी आदित्यनाथ की तिकड़ी ने पूरे राज्य में रैलियों का तूफान ला दिया। इसके साथ ही बीजेपी ने अपना मेनिफेस्टो भरोसा शोपोथ लॉन्च किया। टीएमसी की लक्ष्मी भंडार योजना को टक्कर देने के लिए बीजेपी ने महिलाओं को और ज्यादा पैसे देने का वादा किया। इसके साथ ही सरकारी कर्मचारियों की सैलरी बढ़ाने के लिए सेवंथ पे कमीशन लागू करने का भी पक्का वादा किया। प्रधानमंत्री मोदी और अमित शाह ने बंगाल के लोगों के सामने एक एस्पिरेशनल बंगाल यानी विकास करने वाले और तेजी से आगे बढ़ते हुए बंगाल का विजन रखा। उन्होंने जनता से सीधा वादा किया कि अगर वह सत्ता में आए तो बंद पड़ी फैक्ट्रियों को फिर से चालू करेंगे, नई इंडस्ट्रीज लाएंगे और इतने रोजगार पैदा करेंगे कि बंगाल के नौजवानों को नौकरी की तलाश में दूसरे राज्यों में दर-दर नहीं भटकना पड़ेगा। इसके साथ-साथ बीजेपी ने अपने पुराने और सबसे मजबूत हथियार यानी अपनी हिंदुत्व की विचारधारा को भी बिल्कुल नहीं छोड़ा। अपने कोर वोटर्स को जोड़े रखने के लिए उन्होंने डंके की चोट पर ऐलान किया कि वो राज्य में यूसीसी और सीए हर हाल में लागू करेंगे। सीए के वादे ने खासकर मतुआ समुदाय जैसे शरणार्थियों को पूरा भरोसा दिलाया कि उन्हें पक्की नागरिकता मिलेगी। लेकिन उनका सबसे बड़ा हथियार था दुर्गा स्क्वाड। महिलाओं की सुरक्षा के लिए एक स्पेशल फोर्स बनाने का वादा। 23 और 29 अप्रैल 2026, इलेक्शन कमीशन ने बंगाल को एक किले में तब्दील कर दिया था। 2.4 लाख सीआरपीएफ के जवान चप्पे-चप्पे पर तैनात थे। इतनी भारी और कड़ी पुलिस फोर्स देखकर टीएमसी के वह सभी लोकल गुंडे अपने घरों में दुबक कर बैठ गए जो पहले लोगों को डरा-धमका कर वोट लूट लिया करते थे। जब आम जनता ने देखा कि चारों तरफ पुलिस है और अब डरने की कोई बात नहीं है तो वो बिना किसी खौफ के अपना वोट डालने घरों से बाहर आ गए। इसी निडर माहौल का नतीजा यह हुआ कि राज्य में 92.47% वोटिंग हुई। भारत के आजाद होने के बाद से आज तक बंगाल में कभी इतने ज्यादा लोगों ने एक साथ वोट नहीं डाला था। 4 मई 2026 को जब वोटों की गिनती शुरू हुई तो नतीजे देखकर पूरे देश में हड़कंप मच गया। 2021 के चुनाव में सिर्फ 77 सीटें जीतने वाली बीजेपी ने इस बार सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए। उन्होंने 45.84% वोट हासिल किए और 206 सीटों के भारी बहुमत के साथ सत्ता पर कब्जा कर लिया। वहीं दूसरी तरफ पिछले 15 सालों से लगातार बंगाल पर राज करने वाली टीएमसी बुरी तरह हार गई और सिर्फ 81 सीटों पर सिमट कर रह गई। टीएमसी के लिए सबसे बड़ा झटका यह था कि शहरों और उसके आसपास के वह इलाके जिन्हें हमेशा से टीएमसी का सबसे मजबूत इलाका माना जाता था वहां भी जनता ने उन्हें नकार दिया। इन इलाकों में भारी संख्या में बीजेपी ने जीत दर्ज की और इस तरह बंगाल में 15 साल पुरानी सरकार का पूरी तरह से अंत हो गया। लेकिन इस चुनाव का सबसे बड़ा क्लाइमेक्स अभी बाकी था। भवानीपुर सीट जहां से ममता बनर्जी पिछले चुनाव में 59000 वोटों से जीती थी। वहां उन्हें एक बहुत ही अपमानजनक हार का सामना करना पड़ा। उनके पुराने साथी शुभेंदु अधिकारी ने नंदीग्राम के बाद अब उन्हें उनके ही इलाके भवानीपुर में भी 15105 वोटों से हरा दिया। टीएमसी सरकार के ज्यादातर बड़े मंत्री यह चुनाव हार गए थे। ममता बनर्जी ने अपनी हार के बाद आरोप लगाया कि ईवीएम को हैक किया गया है और इलेक्शन कमीशन ने उनके खिलाफ साजिश रची है। उन्होंने तुरंत मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने से साफ इंकार कर दिया। लेकिन सच्चाई सबको साफ दिख रही थी कि वह बुरी तरह हार चुकी हैं। 2026 के इन चुनावों में केरल में कांग्रेस ने लेफ्ट पार्टियों का सूपड़ा साफ कर दिया था और तमिलनाडु में एक्टर विजय की पार्टी ने वहां की पुरानी राजनीति की जड़ें हिला दी थी। लेकिन इन सब के बावजूद बंगाल में बीजेपी की यह भारी जीत 2026 की सबसे बड़ी और ऐतिहासिक राजनीतिक कामयाबी थी। 2026 के इन चुनाव नतीजों में सिर्फ सरकार नहीं बदली थी, बल्कि यह उस सरकार का अंत था जो आम और गरीब लोगों की आवाज बनकर आई थी। बाद में गुंडागर्दी और भ्रष्टाचार के दलदल में फंस गई। जिन युवाओं और महिलाओं के भरोसे टीएमसी गद्दी पर बैठी थी उन्हीं लोगों ने उसे सत्ता से बाहर कर दिया। दूसरी तरफ बीजेपी की पन्ना प्रमुख वाली शानदार प्लानिंग और महिलाओं के लिए बनाए गए दुर्गा स्क्वाड ने ऐसा जाल बिछाया जिसे ममता बनर्जी कभी काट नहीं सकी। आज बंगाल की राजनीति पूरी तरह बदल गई है और यह भारत के इतिहास का एक ऐसा पन्ना बन गया है जिसे सदियों तक याद रखा जाएगा।



