[0:00]नमस्कार दोस्तों, डेनमार्क के शहर कोपेनहेगन में हर 5 मिनट की वॉक पर आपको एक साफ पब्लिक टॉयलेट मिल जाता है. वहां की सड़कों पर कोई गड्ढे नहीं है. हर कोई गाड़ी लेन में रहकर चलाता है और ना ही कोई हॉन्स का शोर है. अगर आप पैदल सड़क पर जाएंगे तो हर जगह फुटपाथ बने हुए हैं और ज़ेबरा क्रॉसिंग पर गाड़ियां आपके लिए रुक जाती है. लोगों का सिविक सेंस इस लेवल का है कि एस्केलेटर्स में खड़े होते वक्त भी लोग एक साइड पर लाइन में खड़े होते हैं. ताकि जिसे जल्दी जाना हो वह एस्केलेटर्स में भी सीढ़ियां जल्दी से ऊपर चढ़ पाए. पूरा शहर पब्लिक पार्क्स इतने साफ हैं कि कहीं पर भी आपको कूड़े का नामो-निशान नहीं दिखेगा. और यहां तक कि प्लास्टिक बॉटल्स वापस करने पर आपको पैसे भी मिलते हैं. अब इस दृश्य को जरा इंडिया से कंपेयर कीजिए.
[0:43]देश के ज्यादातर शहरों में कूड़े के पहाड़ हैं. हर गली नुक्कड़ चौराहे पर आपको कूड़ा पड़ा हुआ मिलता है. गटर में घुसकर लोग सफाई करते हुए दिखते हैं. पब्लिक टॉयलेट्स का हाल इतना बुरा है कि लोग सड़क के किनारे ही पेशाब करने लग जाते हैं. गाड़ियों के हॉन्स का शोर इतना ज्यादा है कि ज्यादातर लोगों को अपने घरों में बैठे-बैठे हॉन्स की आवाज सुनाई देती है. फुटपाथ्स और ज़ेबरा क्रॉसिंग आधी जगहों पर तो नजर ही नहीं आती. ऊपर से लोगों का बिहेवियर भी ऐसा कि हर जगह लोग लाइन काटते फिरते हैं. बिना सोचे समझे कूड़ा कहीं पर भी यूं ही फेंक देते हैं. ये ये अंकल सारा कूड़ा बाहर फेंकते हुए ट्रेन पे. ये है इंडियन रेलवे की हालत. सीनियर कर्मचारी सारा कूड़ा उठाकर बाहर फेंकते हुए. अरे चाचा वह मूत्रालाय नहीं, मंत्रालय लिखा है. यहां पेशाब करना सख्त मना है. यह दो अलग देश, दो अलग दुनिया की तरह हैं. लेकिन सवाल यहां पर यह है कि क्या डेनमार्क के लोग पैदा ही ज्यादा सिविलाइज्ड हुए थे क्या? क्या इंडियंस में जेनेटिकली ही कम सिविक सेंस है? ये लो, ये देख लो आप.
[1:49]इसका जवाब है ऑब्वियसली नहीं. असल में जो फार्मूला डेनमार्क जैसे डेवलप्ड देशों ने इस्तेमाल किया है, वह बहुत ही सिंपल है. जिसे सुनने के बाद आप भी कहोगे कि बस इतना सा. लेकिन एट द सेम टाइम यह जो सिविक सेंस का मुद्दा है यह कहीं ज्यादा और गहरा है. यकीन मानिए आज जो मैं आपको इस वीडियो में बताऊंगा वह आपका पूरा सोचने का नजरिया ही बदल देगा.
[2:10]सिविक सेंस की प्रॉब्लम दोस्तों तीन ऐसी प्रॉब्लम्स से इंटरलिंक्ड है, जिसके बारे में ज्यादा लोग बात करते नहीं है या फिर कह लीजिए करना नहीं चाहते. इनमें से पहली प्रॉब्लम है कास्टिज्म और क्लासिज्म की. हमारे देश में जातिवाद की जड़ें गहरी है. बैठिए, कौन लोग हैं यहां पे जो बसपा को वोट देना है. नीचे काहे बैठ गए? नीचे क्यों बैठ गए? अरे, आप नीचे बैठेंगे तो मैं चला जाऊंगा यहां से. आप इस पे बैठिए. नहीं, आपके सामने चौकी पर नहीं बैठ सकते हैं. भंगी जाति का ट्रेडिशनल काम रहा है सफाई करना. गांधीजी ने कहा था कि जो भंगी है वह इस समाज के लिए मां की तरह है. जिस तरह एक मां अपने बच्चे को साफ रखते हुए उसे बीमारियों से बचाती है, उसी तरह भंगी ने सफाई की और समाज को बीमारियों से बचाया. अब गांधी जी ने तो उसे मां का दर्जा दिया लेकिन लोगों ने उसे इस कदर सबसे नीचे समझा कि लोग भंगी को एक अपशब्द की तरह इस्तेमाल करते हैं. अब जैसे मेरे पास कि मेरे पे कोई स्टेप आया. और मैं लगूंगा यार इसमें तो भंगी लग रहा हूं, क्या करते हो यार सब. जरा सोचकर देखो, जिस देश में सफाईकर्मी के साथ यह रवैया हो, जहां सफाई करने को एक शर्म की चीज की तरह देखा जाता हो, उस देश में भला सफाई कैसे होगी? मोलिटिक्स के हवाले से कुछ दिन पहले की यह खबर देखिए. झारखंड के धनबाद जिले में एक 46 वर्षीय दलित महिला के साथ मारपीट की गई और उसे जातिसूचक गालियां दी गई. जानते हो इसके पीछे कारण क्या था? क्योंकि इस महिला ने एक दुकानदार के लिए फ्री में सफाई करने से मना कर दिया था. सच बात यह है दोस्तों कि हमारे देश में जो सफाईकर्मी है, आज भी उनमें से ज्यादातर लोग दलित ही हैं. बात यह नहीं है कि वह दलित हैं या किस जाति के हैं. प्रॉब्लम यह है कि वह गटर में घुसकर सफाई करने को मजबूर हैं. कई बार जहरीली गैस से उनकी मृत्यु हो जाती है. क्या हमारा देश इतना गरीब है कि गटर में घुसकर किसी को सफाई करनी पड़े और मशीनें भी नहीं खरीदी जा सकती? बिल्कुल भी नहीं. हमारा देश इतना तो गरीब नहीं है बस इनडिफरेंट है. बहुत से इंडियंस जब बाहर फॉरेन डेवलप्ड कंट्रीज में जाकर सेटल होते हैं, तो वह अपने घर की सफाई खुद से करते हैं. क्योंकि सफाई करने के लिए किसी डोमेस्टिक वर्कर को बुलाना बहुत महंगा रहता है. लेकिन भारत में गरीबी इतनी ज्यादा है, बेरोजगारी इतनी ज्यादा है इसीलिए हम मजदूरी की नीलामी कर सकते हैं. बहुत कम पैसे देकर भी आप अपने घर की सफाई करवा सकते हो. मैं सवाल यहां आपसे पूछना चाहूंगा जो आपके घर में काम करने आती है क्या आप उसे इज्जत देते हो? क्या आप उसे रिस्पेक्टफुली ट्रीट करते हो? हमने ज्यादातर सोसाइटीज में अपने अपार्टमेंट्स में उनके लिए तो लिफ्ट भी अलग बना दी है. वह लोग अगर कुछ चाय पानी ले तो उनके लिए बर्तन भी अलग रखे जाते हैं. इस गलत माइंडसेट की शुरुआत असल में यहीं से ही हो जाती है. लोग सफाई करने को अपनी रिस्पांसिबिलिटी नहीं समझते. स्कूलों में, घरों में, ऑफिसेज में हमेशा कोई और ही होता है जो सफाई करने आता है. जो हमारे घरों में कूड़ा इकट्ठा करने आते हैं हम उन्हें सफाईकर्मी नहीं बल्कि कूड़े वाला कहते हैं. वैसे यह कमाल की आयरनी है कूड़ा हम फैलाते हैं लेकिन हम उन्हें कूड़े वाला कहते हैं. कौन हैं ये लोग? कहां से आते हैं ये? लोग मेंटली और फिजिकली अपनी आइडेंटिटी को सफाई करने से पूरी तरीके से डिससोसिएट कर लेते हैं. यह एक बहुत बड़ा फर्क है डेवलप्ड कंट्रीज से. चाहे कनाडा हो, जर्मनी हो, जापान हो या ऑस्ट्रेलिया हो. लोग अपना कूड़ा खुद से अलग करते हैं वहां पर. ज्यादातर लोग अपने घरों की सफाई खुद से करते हैं. लेकिन हमारे देश में कोई इंसान कूड़े के पहाड़ पर खड़ा होकर कूड़ा बिनता है और हमारे नेताओं का क्या प्लान है सफाई के लिए? अब हर 15 दिन में हमारा मंत्री जाके कूड़े के पहाड़ पर जाता है और उसको बोलता है खड़ा होकर तेरे को जाना पड़ेगा भाई. दूसरी प्रॉब्लम है यहां पर सरकारी सिस्टम की. क्या आपने साफ-सुथरे पब्लिक टॉयलेट्स देखे हैं अपने शहर में? मैं मॉल्स की बात नहीं कर रहा, पब्लिक टॉयलेट्स की बात कर रहा हूं. जो कुछ पब्लिक टॉयलेट्स हैं, उनमें आधे से ज्यादा में तो पानी तक नहीं आता. हाँ घर से पानी लाना पड़ता है. घर से पानी लाना पड़ता है. वॉशरूम में भी. ऐसा वॉशरूम है यह जिसमें तुम्हें खुद का पानी लेके आना पड़ता है और खुद ही पे भी करना पड़ता है वॉशरूम करने के लिए. सोचकर देखो फिर टॉयलेट का पॉइंट क्या बना. बदबू इतनी ज्यादा होती है कि या तो इंसान बदबू से मर जाएगा या फिर यूरिनरी ट्रैक्ट इंफेक्शन हो जाएगा उसे. यह हाल देख रहे हो यहां का? यह सबने यूरिन करी है यहां इतनी गंदी स्मेल आ रही है तो क्या सिविक सेंस होगी की यहां पर यूरिन कर रहे हैं? लेकिन आपको एक सैड रियलिटी बताऊं दिस इज एक्चुअली अ वॉशरूम जो कि लॉक्ड है. ठीक है. लोगों को मजबूरी में यहां यूरिन करनी पड़ती है एंड सोचो फीमेल का भी लॉक्ड है तो वो कहां जाएंगी भाई. लोग यह तो कहते हैं कि सिविक सेंस नहीं है लोग ओपन में पेशाब करते हैं लेकिन जरा सोचकर देखो जो स्ट्रीट वेंडर्स पूरे दिन घर से बाहर निकले हुए हैं वो कहीं ना कहीं तो यूरीनेट करेंगे ही ना. या तो आप इन लोगों को मॉल्स में जाकर साफ-सुथरे पब्लिक टॉयलेट्स का एक्सेस दो या फिर इनकी रेडी के लिए मार्केट में जगह दे दो. उन मार्केट्स में कॉमन टॉयलेट्स लगा दो लेकिन ऐसा भी नहीं है. इनके पर्सपेक्टिव से सोचकर देखो जब कोई ऑप्शन ही नहीं बचेगा तो ऑब्वियसली यह सड़क के किनारे ही पेशाब करेंगे. सिमिलरली क्या सड़क के किनारे फुटपाथ्स हैं? क्या सब जगह ज़ेबरा क्रॉसिंगस बनी हुई हैं? नहीं बनी. क्या सड़कों पर लेन मार्किंग्स और साइंस अच्छे से लगाए जाते हैं जिससे कि लोगों को पता हो कि कहां पर क्या टर्न लेना है? नहीं. उल्टा हमारे देश में ऐसे फ्लाइओवर्स बनते हैं जहां पर अचानक से 90 डिग्री का टर्न आ जाता है या फिर यह फ्लाइओवर देखो जो फोर लेन से अचानक से टू लेन बन गया. इस सब इंफ्रास्ट्रक्चर के बीच आप कैसे लोगों से उम्मीद कर सकते हो कि वह लेन में गाड़ियां चलाएंगे?
[7:03]हैरानी की बात यह है कि हमारे देश में उल्टी गंगा बह रही है. लोग अपना अधिकार नहीं मांग रहे. आपस में ही एक दूसरे को ब्लेम करने पर लगे हुए हैं.
[7:30]मोदी जी, लोग इतने बेशर्म है, ये जानबूझकर मरते हैं बार-बार मरते हैं आपको बदनाम करने के लिए.
[7:43]मोदी जी, सिविक सेंस नहीं है इन लोगों में. सिविक सेंस नहीं है, ये जनता डिजर्व नहीं करती आपको. मोदी जी, गलती तो जनता की है ना. आप इस जनता को हिंद महासागर में फिकवा दो और अच्छी सी नई जनता ऑर्डर करते हैं अमेजॉन पे या फ्लिपकार्ट पे. उम्मीद है आपको यह समझ आ गया होगा कि यह वीडियो एक सटायर था. ऑफ कोर्स कहीं से नई जनता तो नहीं ला सकते. जो इस देश के लोग हैं उन्हीं को ही सिखाना पड़ेगा. लेकिन कौन सिखाएगा? कैसे आएगी सिविक सेंस? जो कुछ इनफ्लुएंसर्स कंटेंट क्रिएटर्स इस पर बात करते हैं वह अपने एंड से कर रहे हैं जितना हो सकता है. लेकिन आप या मैं जबरदस्ती तो नहीं सिखा सकते ना किसी को. हम कोई पुलिस वाले तो नहीं है ना, ना ही हम कोई सरकार हैं जो नया कानून बना सकते हैं. ना ही हम किसी पर जुर्माना लगा सकते हैं कुछ गलत करने का. तो ऑब्वियस सी बात है यह काम सरकार को ही करना होगा. चाहे स्कूल करिकुलम में सिविक सेंस का पार्ट पढ़ाया जाए या फिर गंदगी फैलाने के लिए लोगों पर जुर्माना लगाया जाए. लेकिन गंदगी फैलाने के लिए भी आप फाइन तो तब लगाओगे ना जब पहले कहीं पर सफाई हो कहीं पर सिस्टम तो हो. मतलब सोचकर देखो जो इंसान बदबूदार बस्ती में रहता है जिसकी गली के कोने-कोने पर कूड़े के ढेर लगे हैं, गली में कीचड़ फैला है, गंदा पानी भरा हुआ है, मच्छर हैं. जिसके बच्चे के लिए सरकारी स्कूल में साफ टॉयलेट नहीं है. इसमें कितना स्मेल आता होगा आपको पता चल ही गया होगा. जिसने आज तक सफाई देखी ही नहीं उसको क्या सिविक सेंस का पार्ट पढ़ाओगे आप? एक बार उसकी जगह पर सफाई हो तभी तो उसे कहोगे कि गंदा मत करो. पहले डस्टबिन लगाए जाए तभी तो उसे कहोगे कि कूड़ा डस्टबिन में ही डालना है. पब्लिक टॉयलेट बनाए जाए जहां सफाई हो, पानी हो, साबुन हो तभी तो उसे कहोगे कि टॉयलेट का इस्तेमाल करना है, उसके बाद फ्लश किया जाता है. सड़क किनारे फुटपाथ लगे हो, साइकिलिंग के लिए लेन हो, जगह-जगह पर सुंदर फूल लगे हुए हो तभी तो कहोगे कि फूल मत तोड़ना. लेकिन अगर इसी गंदी बस्ती में रहने वाला यह आदमी किसी साफ-सुथरी महंगी सोसाइटी में जाएगा जहां इसे फूल दिखेंगे तो ऑब्वियसली यह उन फूलों को तोड़ना चाहेगा. क्योंकि इसके लिए यह पहला एक्सपोजर है सुंदरता का. मैं फूल तोड़ने को जस्टिफाई नहीं कर रहा हूं. मैं बस कह रहा हूं कि एक बार उसके पर्सपेक्टिव से सोचकर देखो. जिस इंसान ने कभी साफ-सुथरी सुंदर चीजें देखी ही नहीं अपनी जिंदगी में उसका बिहेवियर कैसा होगा? बात यह है दोस्तों कि लोगों के यहां पर एक हर्ड मेंटालिटी होती है. एक भेड़चाल वाला रवैया जहां गंदगी है, सब गंदगी फैला रहे हैं तो उन्हें भी अपनी कार की खिड़की खोलकर सड़क पर रैपर फेंकने में कोई हिचक नहीं होती. लेकिन जिस जगह पर सफाई हो, जहां उन्हें लगे कि मैंने गंदा किया तो सबकी नजर मुझ पर होगी तो फिर वही इंसान चिप्स का रैपर फेंकने से घबराता है. इसका उदाहरण आपको इंडियन शहरों में भी देखने को मिलता है जैसे कि दिल्ली मेट्रो को देख लीजिए या एयरपोर्ट पर या मॉल्स में देख लीजिए. कुछ एक ढीठ लोगों को छोड़ दिया जाए तो ज्यादातर लोग एक्चुअली में इन जगहों पर गंदगी नहीं फैलाते हैं. उन्हें घबराहट होती है कि लोग उनके बारे में क्या सोचेंगे वह सबके नोटिस में नहीं आना चाहते. और ऐसा सिर्फ इसलिए क्योंकि इन जगहों पर पहले से ही साफ-सफाई है. एक सिस्टम सेट है. इसलिए जब तक सरकार यहां पहला कदम नहीं उठाती कुछ भी अचीव करना बहुत-बहुत मुश्किल है. और अनफॉर्चुनेटली दोस्तों हालत इतनी खराब है कि यह तो सरकार के मैनिफेस्टो में भी नहीं होता कि आपके इलाके में सफाई करेंगे. और इवन जो गरीब लोग हैं ₹10 में जोमैटो ब्लिंकट की डिलीवरी करते हैं, मुफ्त अनाज के लिए मजबूर हैं. उनके सपनों में भी यह नहीं होता कि सफाई होगी, गली में पेड़ लगेंगे, फूल होंगे, डस्टबिन होंगे. तो यह बात बड़ी क्लियर है कि अगर सिस्टम सही हो, सही टूल्स हो तो रिजल्ट्स अपने आप आते हैं. इवन इफ लोगों की सिविक सेंस खराब भी हो. इस चीज को आप और बेहतर समझोगे जब आगे वीडियो में मैं आपको डेनमार्क का एग्जांपल डिटेल में समझाऊंगा तो. लेकिन यही बात दोस्तों AI पर भी लागू होती है. ज्यादातर लोग बस चैट जीपीटी से दो-तीन सवाल पूछकर सोचते हैं कि यही AI है. लेकिन अगर सही सिस्टम मिल जाए तो AI से आप बिना एक लाइन का कोड लिखे पूरी की पूरी वर्किंग वेबसाइट बना सकते हो. कोई टेक्निकल बैकग्राउंड नहीं चाहिए. इसी तरीके से बिना डिजाइन की नॉलेज रखे आप पूरी की पूरी पावर पॉइंट प्रेजेंटेशंस बनवा सकते हो रिपोर्ट्स बनवा सकते हो. और यह तो सिर्फ छोटे से उदाहरण है ऐसे ही सिस्टम्स और 25 से ज्यादा AI टूल्स मैं पर्सनली लाइव आकर आपको सिखाता हूं अपनी AI मास्टरक्लास में. यह तीन घंटे की लाइव वर्कशॉप नॉन टेक्निकल लोगों के लिए है. स्टूडेंट्स, प्रोफेशनल्स, क्रिएटर्स और बिजनेस ओनर्स. कॉस्ट सिर्फ दो मूवी टिकटों जितनी है और 50000 से ज्यादा लोग अभी तक इसे अटेंड कर चुके हैं. रिव्यूज आप स्क्रीन पर देख सकते हो और अगला सेशन इस संडे को होने जा रहा है. लेकिन अगर आप लाइव नहीं आ पाते किसी और कारण की वजह से तो 7 दिन तक आप इसकी रिकॉर्डिंग भी देख सकते हो. जॉइन करने का लिंक आपको नीचे डिस्क्रिप्शन में मिल जाएगा या फिर आप इस क्यूआर कोड को भी स्कैन कर सकते हो. अब बात करते हैं यहां पर सिविक सेंस के पीछे की तीसरी प्रॉब्लम के बारे में जो कि है एंपैथी. जो अमीर लोग हैं उन्हें इन बस्तियों से क्या? वह ऊपर-ऊपर से सफाई की बात करते हैं लेकिन कूड़ा कैसे कम किया जाए, वेस्ट डिस्पोजल मैकेनिज्म्स अच्छे हो, कंपोस्ट पिट्स बनाई जाए, बेहतर अर्बन प्लानिंग हो. वह डिटेल में यह सब बात करने को तैयार नहीं है. वह लोग अपने एक बबल के अंदर रहकर खुश हैं. करोड़ों रुपए के फ्लैट्स खरीद लेंगे. अपार्टमेंट के अंदर स्विमिंग पूल होगा, लॉन टेनिस ग्राउंड, जिम सब कुछ होगा लेकिन उसके आसपास की ये जो बस्तियां हैं वह गंदगी से भरी हुई होंगी, कूड़े के पहाड़ होंगे. बहुत से शहरों की ड्रोन इमेजेस में हम अमीर और गरीब के बीच का फर्क साफ देख सकते हैं. एक दीवार साफ दिखाई देती है. इस दीवार के इस साइड रहने वाले अमीर इंसानों ने कभी यह सपना नहीं देखा कि पूरा शहर ही सुंदर हो. फ्यूडल माइंडसेट लोगों के दिमाग के अंदर तक घुसा हुआ है. इनमें कोई कम्युनिटी की फीलिंग नहीं है. सोचकर देखो जो अंबानी, अडानी जैसे बिलियनेयर्स हैं उनके पास इतना पैसा है कि वह पूरे शहर को नहीं तो कम से कम एक शहर के बहुत बड़े हिस्से को पूरी तरीके से साफ-सुथरा बना सकते हैं. लेकिन वह उस पर पैसा खर्च नहीं करेंगे. वह बनाएंगे इस गंदगी के बीच में अपना एक बड़ा ऊंचा सा महल. अपने महल के अंदर सारी लग्जरी चीजें डाल लेंगे लेकिन उन्हें इससे कोई दिक्कत नहीं होगी कि बाहर खिड़की से जो दिख रहा है गंदगी और कूड़ा सब चलता है. लोगों के अंदर यह कम्युनिटी की फीलिंग डालने के लिए कोई भगवान बुद्ध आकर अवतार नहीं लेने वाले हैं. उनका मैसेज मैं ही आपको बता देता हूं. दूसरों के प्रति एंपैथी रखनी होगी. आपको यह सोचना होगा कि मेरा गंदा किया हुआ किसी और को साफ करना पड़ेगा. इसलिए मैं गंदा ना करूं. और यह चीज घर से बाहर निकलने के बाद तो बाद में सोचोगे. यह माइंडसेट आपका घर के अंदर भी होना चाहिए. जहां-जहां आप गंदगी फैलाते हो घर के अंदर, बिखरा हुआ सामान, झूठे बर्तन, बाथरूम में जमा हुआ कैल्शियम. खुद इसकी जिम्मेदारी उठाओ और सोचो इसके बारे में. होटल से चेकआउट करते समय अपनी खाली पानी की बोतल, खाली पैकेट्स खुद से ट्रैश कैन में डाल देने चाहिए. रेस्टोरेंट्स में खाना खाने के बाद अपने हाथों से ही सब बर्तनों को टेबल के एक कोने में इकट्ठा करके रख दो जिससे कि वेटर के लिए आसानी हो उन्हें ले जाने में. अगली बार बिल्डिंग से बाहर निकलते वक्त अपने पीछे वाले के लिए दरवाजा पकड़कर रखो. जिस दिन यह छोटे-छोटे चेंजेस आपके बिहेवियर में आ गए उस दिन आपकी एंपैथी जाग उठेगी. दूसरों के लिए आपको कंसर्न फील होगा और उसी को सिविक सेंस कहते हैं. लेकिन अक्सर ऐसे वीडियोस पर लोग कमेंट करते हैं कि यह वीडियो जिन लोगों को देखनी चाहिए वह इसे देख नहीं रहे हैं. तो उन लोगों के लिए जैसा मैंने कहा सरकार को ही यह काम करना होगा. स्कूल करिकुलम में सिविक सेंस का पार्ट पढ़ाकर क्लास में यह समझाकर कि जातिवाद एक मानसिक बीमारी है. सफाई करना शर्म की बात नहीं है, गर्व की बात है. यह सिखाया जाना चाहिए कि सफाईकर्मी का सम्मान करो अपना कूड़ा किस तरह से अलग करना है. पब्लिक प्लेस में वीडियो देख रहे हो तो ईयरफोन्स लगाओ ताकि दूसरे डिस्टर्ब ना हो. यह सब क्लास में पढ़ाना होगा. दूसरी बात है पूरा सिस्टम बनाना होगा और फाइनली उस सिस्टम को मेंटेन करने के लिए रूल्स बनाने होंगे. ढीठ लोग हर देश में होते हैं, डेवलप्ड देशों में भी होते हैं लेकिन फर्क यह है कि वहां पर सिस्टम ऐसा बना हुआ है कि उन लोगों को सजा मिले और बाकी सब लोगों के लिए कोई डिस्टर्बेंस ना हो. यहां पर कोई बहुत कड़ी सजा देने की जरूरत नहीं है बल्कि सजा मिलने की संभावना बहुत ज्यादा करने की जरूरत है. भले ही आप सिर्फ ₹500 का फाइन रखो या सिर्फ एक दिन की जेल रखो. लेकिन इसकी हाई प्रोबेबिलिटी होनी चाहिए कि अगर किसी ने कहीं पर गंदगी फैलाई तो आप बच नहीं पाओगे आपको यह फाइन भरना पड़ेगा, एक दिन जेल में जाना पड़ेगा. ऐसा करने से सिविक सेंस की आदत अपने आप आ जाएगी. धीरे-धीरे लोगों के अंदर दूसरों के लिए कंसर्न भी होगा और कम्युनिटी की फीलिंग भी जागेगी. डेनमार्क के लोगों में कम्युनिटी की फीलिंग है. इसे कहा जाता है सैमफंड्स सिंड. मतलब सोशल माइंडेडनेस सोसायटी के इंटरेस्ट को खुद से ऊपर रखना. डेनमार्क में ये फीलिंग कोरोना काल में भी देखी गई थी. इंडिया में कुछ लोग बात करते हैं कि सिविक सेंस लाने के लिए डंडे मारे जाएं, फाइन लगाया जाए, जेल भेजा जाए लेकिन इन सब से 100 गुना ज्यादा इंपैक्टफुल चीज है एंपैथी. लोगों के अंदर एक दूसरे के प्रति एंपैथी की फीलिंग जगाना. डेनमार्क में लोग एक दूसरे के प्रति कंसर्न रखते हैं. शेयर्ड स्पेसेस में नियम फॉलो करते हैं, पब्लिक हाइजीन मेंटेन करते हैं. दूसरों के प्रति रिस्पेक्टफुली व्यवहार करते हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि उनके अंदर सोशल अवेयरनेस है और यही काफी है सिविक सेंस लाने के लिए. एक्चुअली एक और कारण भी है कि वहां जातिवाद नहीं है. कोई गरीब इंसान हो, सफाईकर्मी हो, होटल में हाउसकीपिंग स्टाफ हो उसे इंसान की निगाह से देखा जाता है. वहां सफाई के काम को इज्जत दी जाती है. इंडिया में अभी लोग कूड़े को सूखे कूड़े और गीले कूड़े में ही सॉर्ट करने में बड़े कंफ्यूज्ड हैं. लेकिन डेनमार्क में 10 अलग-अलग कैटेगरी में सॉर्ट किया जाता है कूड़े को. ग्लास के लिए अलग डस्टबिन, मेटल के लिए अलग, प्लास्टिक के लिए अलग, पेपर अलग, फूड एंड ड्रिंक कार्टन्स अलग, कार्डबोर्ड अलग, टेक्सटाइल्स अलग, फूड वेस्ट अलग, हजार्डस वेस्ट अलग और रेसिडुअल वेस्ट अलग. लोग किसी का इंतजार नहीं करते कि कोई कूड़ेवाला आएगा और मेरे कूड़े को 10 अलग-अलग तरीके से सॉर्ट करेगा. नहीं. लोग अपने घर पर ही 10 अलग-अलग तरीके से कूड़े को सॉर्ट करने के लिए डस्टबिन्स लगाते हैं. अपने घर पर ही 10 अलग-अलग कंपार्टमेंट्स बनाए गए हैं. और बात यहां खत्म नहीं होती. सिर्फ जो सबसे ज्यादा जनरेट किया जाने वाला कूड़ा है उसे उठाने के लिए कोई आता है आपके घर पर. लेकिन जो हजार्डस वेस्ट है, टेक्सटाइल्स है, इलेक्ट्रॉनिक वेस्ट है इन्हें कलेक्ट करके खुद आपको एक रिसाइकलिंग सेंटर में ले जाना पड़ता है. एक शहर के अंदर यूजुअली तीन से चार जगहों पर रिसाइकलिंग सेंटर्स बने होते हैं कलेक्ट करने के लिए. लोगों को खुद जाना पड़ता है उन रिसाइकलिंग सेंटर्स में कूड़ा डिपॉजिट करने के लिए. सोचकर देखो अगर यह चीज इंडिया में होती तो ज्यादातर लोग आलसीपन में आकर हजार्डस वेस्ट को नॉर्मल कूड़े में डाल देते हैं जो कि अभी करते भी हैं. लेकिन डेनमार्क में लोग खुद से इतना कष्ट उठाते हैं रिसाइकलिंग सेंटर में जाने के लिए क्योंकि वह जानते हैं अगर यह हजार्डस वेस्ट हमारे पर्यावरण में गया हमारे शहर में फैला तो उन्हें ही इसी का नुकसान होगा. और बात यह सिर्फ डेनमार्क की नहीं है जर्मनी, स्विट्जरलैंड, न्यूजीलैंड ज्यादातर डेवलप्ड कंट्रीज में ऐसा ही होता है. स्विट्जरलैंड में ट्रैश डिस्पोजल की एक कॉस्ट है. आप अपने घर का कूड़ा केवल म्युनिसिपल बैग्स में ही डिस्पोज कर सकते हैं और आपको यह म्युनिसिपल बैग्स खरीदने पड़ते हैं. जबकि दूसरी तरफ आपको रिसाइकलिंग की सुविधा फ्री में दी जाती है ताकि लोगों को इनकरेज किया जा सके. रिसाइकलिंग में सबसे बड़ा चैलेंज होता है प्लास्टिक बॉटल्स और एल्यूमीनियम कैंस. इंडिया में प्लास्टिक की समस्या इतनी बड़ी है कि चाहे लद्दाख की पेंगोंग लेक हो या चंडीगढ़ की सुखना लेक. चाहे केरला हो या मणिपुर हो प्लास्टिक वेस्ट की समस्या सब जगह देखी गई है.
[17:59]लेकिन यह समस्या आपको ज्यादातर यूरोपियन देशों में नहीं मिलेगी. क्योंकि डेनमार्क और जर्मनी जैसे देशों में प्लास्टिक बॉटल्स के लिए एक पैंट सिस्टम होता है. आपने वेंडिंग मशीन देखी होंगी जहां पर आप पैसे डालते हो और बॉटल्स निकलती हैं. यहां पर रिवर्स वेंडिंग मशीन्स लगी होती है. जहां पर आप खाली बॉटल डालो और बदले में आपको कुछ पैसे मिलते हैं. एक्चुअली में जब भी आप कुछ प्लास्टिक की बोतल में खरीदते हो तो आपको कुछ एक्स्ट्रा पैसे हमेशा देने पड़ते हैं जो एक डिपॉजिट की तरह होते हैं. बाद में जब आप खाली बॉटल लाकर वापस लौटाते हुए इन रिवर्स वेंडिंग मशीन्स में तब आपको वह पैसे अपना डिपॉजिट वापस मिल जाता है. यह पूरा सिस्टम जुर्माना आधारित नहीं है बल्कि इनाम आधारित है. इससे हर कोई मोटिवेट होता है कि वह प्लास्टिक की बॉटल्स को कहीं भी फेकेगा नहीं क्योंकि उनमें पैसे हैं उन्हें वापस लौटाने पर पैसे मिलेंगे आपको. डेनमार्क का बॉर्न होम आइलैंड तो पूरी तरीके से वेस्ट फ्री बनाने की कोशिश की जा रही है. यानी कि सब कुछ जो उस आइलैंड में प्रोड्यूस हो रहा है उसे रीयूज या रीसायकल किया जाएगा. इनका एम है कि साल 2032 तक यह दुनिया की पहली वेस्ट फ्री कम्युनिटी बन जाएगी. एक्जेक्टली यह चीज यह कैसे अचीव करेंगे बड़ी इंटरेस्टिंग कहानी है इसकी कभी और बात करेंगे. लेकिन यह एटीट्यूड डेनमार्क में हर चीज में देखने को मिलता है. डेनमार्क की राजधानी कोपेनहेगन में साइकिलिंग बहुत कॉमन है. यह दुनिया की वन ऑफ द मोस्ट बायसाइकिल फ्रेंडली सिटीज है. 64% कम्यूटर्स यहां सिर्फ साइकिल से ट्रेवल करते हैं. साथ ही इन्होंने सस्टेनेबल फाइव मिनट नेबरहुड्स बनाए हैं जहां पर सिर्फ पब्लिक ट्रांसपोर्ट और साइकिल की मदद से आप अपने वर्कप्लेस पर जा सकते हो, स्कूल में जा सकते हो, शॉपिंग करने जा सकते हो. सब कुछ आपके 5 मिनट के रेडियस के अंदर-अंदर मौजूद है. इससे लोगों का घूमना-फिरना ज्यादा होता है, लोग ज्यादा हेल्दी रहते हैं और गाड़ियां बहुत कम यूज होती हैं. डेनमार्क में CO2 एमिशन्स को कट डाउन करने के लिए क्लाइमेट फ्रेंडली एस्फाल्ट का भी इस्तेमाल किया जा रहा है. सड़कों के किनारे पेड़ लगाए जाते हैं जिससे छांव मिले और टेंपरेचर को कंट्रोल रखा जा सके. ज्यादातर डेवलप्ड देशों में पेडेस्ट्रियन फर्स्ट की नीति है. यानी कोई भी पैदल यात्री सड़क पार करने निकला है तो गाड़ियों को उसके सामने रुकना ही होगा चाहे कोई ट्रैफिक लाइट हो या ना हो. इसके अलावा कोई भी हॉर्न नहीं बजाएगा. इनफैक्ट ये हॉर्न वाली चीज तो इतनी इंटरेस्टिंग है कि इंडिया दुनिया की वन ऑफ द ओनली कंट्रीज हैं जहां लोग हॉर्न हमेशा बजाते रहते हैं बेवजह.
[20:09]दूसरे देशों में हॉर्न बजाना इतना रेयर है कि आपको महीने में मुश्किल से एक-दो बार कभी हॉर्न की आवाज सुनाई देगी. इससे सड़क पर बहुत शांति रहती है.
[20:20]इंडिया में हम नॉर्मली देखते हैं कि किसी इलाके को सो कॉल्ड विकास करने के लिए रेजिडेंशियल एरियाज बनाने के लिए वहां से प्रकृति को पूरी तरीके से हटा दिया जाता है. और फिर बिल्डिंग बनाकर उसके बीच ग्रास लोन वाले पार्क्स बनाए जाते हैं. लेकिन डेनमार्क में यह देखिए हमें क्लाइमेट पार्क्स देखने को मिलते हैं जहां नेचर को उसके नेचुरल फॉर्म में रहने दिया जाता है. यह सारी चीजें एक तरीके से होलिस्टिक सॉल्यूशन का काम करती हैं जिनके बारे में लोग तभी सोचते हैं जब लोगों के अंदर एंपैथी होती है अपनी कम्युनिटी को लेकर, अपने आसपास के लोगों को लेकर. और यहां एक तरीके से एक पॉजिटिव फीडबैक लूप भी बन जाता है. जब सफाई होती है, एनवायरमेंट अच्छा है, साफ हवा है, क्लाइमेट चेंज को रोकने की कोशिश की जा रही है, कहीं पे नॉइज पोलूशन को कम करने की कोशिश की जा रही है तो अपने आप लोगों के अंदर कम्युनिटी की फीलिंग और भी ज्यादा बढ़ती रहती है. सिंगापुर में रेस्ट रूम एसोसिएशन ऑफ सिंगापुर है जो पब्लिक टॉयलेट्स को एग्जामिन करती है उन्हें तीन, चार या पांच स्टार्स देती है. जो टॉयलेट अच्छा स्कोर करें उसे हैप्पी टॉयलेट का लोगो मिलता है और आरएएस अपनी वेबसाइट पर उन्हें प्रमोट भी करती है. ऐसे ही जापान में सिविक सेंस स्कूल में सिखाई जाती है. बच्चे अपने क्लासरूम, कॉरिडोर और टॉयलेट्स को खुद साफ करते हैं. इसके लिए उन्हें लंच के बाद या स्कूल के आखिर में 15 से 20 मिनट दिए जाते हैं. इसे ओसोजी कहा जाता है. यह चीज वैसे बुद्धिज्म और शिटोजिम की फिलोसोफी से प्रेरित है जहां साफ-सफाई, आपसी सद्भाव और शेयर्ड स्पेसेस के लिए रिस्पेक्ट को इनकरेज किया जाता है. ठीक इसी तरीके से जर्मनी, स्वीडन, चेक रिपब्लिक, नेदरलैंड्स जैसे यूरोपियन देशों के स्कूल्स में भी बच्चों को रिसाइकलिंग और वेस्ट मैनेजमेंट प्रैक्टिसेज बचपन से ही सिखाई जाती है. इसी तरह सही से लाइन में लगना इंग्लैंड के खून में दौड़ता है. सिटीजनशिप टेस्ट में आपसे बकायदा लाइन में लगने को लेकर सवाल पूछे जा सकते हैं. कनाडा के लोग बहुत नीट और ऑर्डरली क्यू बनाने के लिए जाने जाते हैं. रशिया और यूएई जैसे कई देशों में हम एस्केलेटर एटीकेट देख सकते हैं. एक साइड खड़े होने के लिए और दूसरी साइड एस्केलेटर पर चलने वाले लोगों के लिए. सिस्टम इस सब के लिए भी बनाया जा सकता है जैसे कि फास्टनर वाले क्यू मैनेजर आपने एयरपोर्ट्स पर देखे होंगे. यही चीज रेलवे स्टेशन पर क्यों नहीं की जाती? किसी भंडारे में किसी मंदिर की लाइन में ये सब क्यों नहीं होता? क्यों हम सोचते हैं कि इन गरीब लोगों को तो चढ़ने दो एक दूसरे के ऊपर? क्यों हम वहां स्टैम्पीट होने देते हैं?
[22:38]म्यूनिसिपैलिटीज और पुलिस इसे अपने क्लीयरेंस प्रोसीजर्स का हिस्सा बना सकती है कि एंट्रेंस और एग्जिट प्लान दिखाओ. सिटिंग प्लान दिखाओ, क्राउड मैनेजमेंट के मैकेनिज्म्स, क्यू मैनेजर्स ये सब दिखाओ. तो देख रहे हो ना दोस्तों यहां पर पूरी तस्वीर आप. साफ-सुथरी सड़कें जिसमें कोई गड्ढे ना हो, ज़ेबरा क्रॉसिंग, पेवमेंट्स, ग्रीनरी, ट्रीज, फ्लावर्स, साफ हवा, शोर शराबा ना हो. सब जगह टॉयलेट्स और डस्टबिन्स हो खुद का कूड़ा अपने आप से अलग करना, रिसाइकलिंग पर जोर देना. क्या यह सब इंडिया में नहीं हो सकता? बिल्कुल हो सकता है. होने को कुछ भी हो सकता है अगर नेताओं की सही इंटेंशन हो तो. बस इस तरीके से सिस्टम्स बनाने की जरूरत है और फिर उनको मेंटेन करने की जरूरत है और इसके लिए लोगों को एंप्लॉय किया जा सकता है. मैं देश के सभी मुख्यमंत्रियों से रिक्वेस्ट करता हूं कि इस दिशा में आगे कदम बढ़ाएं. अपनी जगह को सुंदर करें, हमारे देश को सुंदर बनाएं. इससे देश के टूरिज्म को भी बढ़ावा मिलेगा और लोग भी ज्यादा खुश रहेंगे. हमें यह सब करने की बहुत अर्जेंट जरूरत है. अफ्रीका के ऐसे देश जो एक समय पर इंडिया से कितने पीछे हुआ करते थे वह भी इंडिया से ज्यादा साफ-सुथरे बन चुके हैं. ऐसा ही एक देश है रवांडा का जिसे अफ्रीका का सबसे साफ देश माना जाता है. जानना चाहते हो उन्होंने इतनी साफ-सफाई इतनी सिविक सेंस कैसे अचीव करें? मैंने इस ग्राउंड रिपोर्ट वाले वीडियो में बताया है. यहां क्लिक करके देख सकते हो. और यहां क्लिक करके आप AI मास्टरक्लास को ज्वाइन कर सकते हो इसका लिंक नीचे डिस्क्रिप्शन में भी मिल जाएगा. बहुत-बहुत धन्यवाद.



