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Hindi Speeches || Akshata Deshpande : Fearless Bhartiya Chatra Sansad Freedom Address( हिंदी भाषण )

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[0:00]आओ चलो चलकर आगाज करते हैं, जो चल रहा है उसे छोड़कर नई शुरुआत करते हैं। अरे अभिव्यक्ति आजादी की लड़ाइयां तो बहुत लड़ ली हमने। आओ राष्ट्रहित में चलकर कुछ बात करते हैं। नमस्कार, मैं अक्षता महाराज की माधव देशपांडे कुंभ, क्षेत्र, नासिक, महाराष्ट्र से मनचस्त मान्यवर एवं यहां उपस्थित युवा शक्ति का मेरी जन्मभूमि महाराष्ट्र में स्वागत करती हूं। आज मैं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लक्ष्मण रेखा का इस विषय पर अपने विचार रखने आई हूं। अभिव्यक्ति यानी विचारों का प्रकाशन, ये विचार तो हमारे याद है। ये विचार मन की लीला है परंतु इन विचारों पर मर्यादा का होना भी आवश्यक है। इन्हीं विचारों के प्रकाशन हेतु भारतीय संविधान तथा लोकतांत्रिक व्यवस्था ने अनुच्छेद 19 के तहत हमें अभिव्यक्ति स्वतंत्रता का मौलिक अधिकार दिया है। ग्लोबल स्टेट ऑफ डेमोक्रेसी इंडेसिस के अनुसार विश्व के केवल 165 देशों ने ही अपने नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता दी है। हां, हां, अगर भारतीय परिप्रेक्ष्य से बोले तो हमारे लिए केवल अधिकार नहीं। अभी तो भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति की महत्वपूर्ण विशेषता भी है। परंतु आज के इस युग में हमें यह समझना आवश्यक हो गया है क्या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता यानी सत्य से विद्रोह नहीं। जहां स्वतंत्र पूर्व भारत में हमारे पत्रकारों ने अपनी कलम की तलवारों से हमारे नागरिको को जागरूक किया। वहीं आज के समय में हमारे वही पत्रकार किसी ना किसी एक विचारधारा के हाथों की तकलीफ बन चुके हैं। केरला हाई कोर्ट के अनुसार, फ्रीडम ऑफ स्पीच इज नॉट लाइसेंस टू अब्यूज जस्टिस सिस्टम विथ योर हाफ बिग फैक्टस एंड नॉलेज अबाउट जुडिशियरी। अगर एनसीआरबी की रिपोर्ट की माने तो गत सात वर्षों में अभिव्यक्ति के नाम पर देश में हिंसा का प्रसार 500% से बढ़ गया है। मित्रों हमें रचनात्मक आलोचना और अपमान के बीच का अंतर समझना होगा। वी नीड टू अंडरस्टेड दैट फ्रीडम ऑफ स्पीच कम्स विद रिस्पांसिबिलिटी। हां आज हमारे पास अभिव्यक्ति तो है पर उसकी लक्ष्मण रेखा कहां है? क्योंकि मर्यादा से परे स्वतंत्रता भी परतंत्रता ही कहलाती है। जब हम लक्ष्मण रेखा की बात करते हैं तो हमारा ये भारतवर्ष शालीनता, सभ्यता तथा नैतिकता का प्रतीक है। इसी नैतिकता के आधार पर हम सभी भारतीयों को अपने विचारों के प्रकाशन से पूर्व परीक्षण की आवश्यकता है। आज समाज की वो धूर्त विचारधारा जो अभिव्यक्ति की लहराती पदागाह को धर्म ध्वजा बताकर उसकी आड़ में दुष्प्रचार कर रही है। ऐसे प्रवाह से न केवल हमारे भारत को अभी तो संपूर्ण विश्व को बचाने के लिए हमें स्वयं लक्ष्मण रेखा बनना होगा। हम सब इस देश के युवा हैं। ये ब्रह्मांड और चीजें सिर्फ सोच सकता है, वह हम कर सकते हैं। इसी विश्वास के साथ इसी स्वनिर्धार के साथ हमें स्वयं लक्ष्मण रेखा बनना होगा और भारत की एकता अखंडता एवं संप्रभुता का आरक्षण करना होगा। चलो आजादी मिलना तो भी थोड़ा सरल था। आजादी मिलना तो भी थोड़ा सरल था और उसे निभाना और भी कठिन है। अरे विचारों के अभिव्यक्ति तो यूं ही मिल गई हमें। विचारों के अभिव्यक्ति तो यूं ही मिल गई हमें पर उसके लक्ष्य वंदने का हम स्वयं हैं, हम स्वयं हैं, हम स्वयं हैं। जय हिंद, जय मां भारती।

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