[0:00]हम इंसान आज कितने आधुनिक बन चुके हैं। हम धरती के बाहर जा सकते हैं। अंतरिक्ष में करोड़ों प्रकाश वर्ष दूर तक देख सकते हैं। हमारे पास विज्ञान है जो हमें हमारे प्रश्नों के उत्तर देता है। वैज्ञानिक डेटा के जरिए हमने हमारे अस्तित्व का भी काफी हद तक सही-सही अनुमान लगाया है। पृथ्वी जो हमारा घर है जहां हम मनुष्यों ने कई पीढ़ियां बिताई हैं। जिसने कई करोड़ सालों से जीवन को अपने अंदर आश्रय दिया है और आज भी देेता आ रहा है। वैज्ञानिकों के अनुसार पृथ्वी पर जीवों के करीब 87 लाख प्रजातियां रहती है जिसमें से केवल 15% प्रजातियों को ही हमने आज तक खोजा है। लेकिन आखिरकार यह सारे जानवर आए कहां से थे? आखिर धरती पर जीवन की शुरुआत कैसे हुई थी? इसे जानने के लिए हमें समय में पीछे जाना होगा। उस समय पर जब धरती अपनी शुरुआती अवस्था में थी। तो आइए चलते हैं आज से करीब 4.5 अरब साल पीछे। आज से करीब 4.5 अरब साल पहले चट्टान का एक बहुत ही विशाल सा गोला एक बेनाम तारे का चक्कर लगा रहा था। इसका सतह पिघले हुए लावे से बना था और इस पर जीवन का नामोनिशान तक नहीं था। इस वक्त पृथ्वी पर लगातार आसमान से छोटे-छोटे चट्टानों की बरसात हो रही थी। काफी लंबे समय तक यह प्रक्रिया चलती रही। इसके बाद चट्टान के इस विशाल से गोले ने एक ग्रह का रूप ले लिया। साथ ही इस ग्रह का अपना चांद भी बना। यह वही ग्रह है जहां आज हम सब रहते हैं। इस वक्त पर पृथ्वी का तापमान बहुत ही अधिक था। काफी लंबे समय बाद हमारे ग्रह का तापमान थोड़ा सा ठंडा हुआ और इस पर एक ठोस सतह का निर्माण हुआ। करीब 3.9 अरब साल पहले इसने फिर से आग के गोलों की बारिश का सामना किया जिसे हम कहते हैं द लेट हैवी बम्बारडमेंट। और इस वक्त धरती पर केवल छोटे चट्टान ही नहीं बल्कि इसके साथ-साथ उल्कापिंडों की भी बारिश हो रही थी। प्रतिदिन कई हजारों की संख्या में उल्कापिंड धरती पर बरस रहे थे। यह उल्कापिंड अपने साथ कुछ बहुत ही खास लेकर आए थे। इनके अंदर जमे हुए बर्फ के क्रिस्टल्स थे जिसने हमारी धरती पर समुद्रों का निर्माण किया। और साथ ही धरती के वातावरण में नाइट्रोजन गैस भी लेकर आया पर धरती अभी बेजान था। यहां जीवन के लिए परिस्थितियां अभी भी उपयुक्त नहीं बनी थी। धरती का एटमॉस्फियर अभी पूरी तरह से जहरीले गैसों से भरा हुआ था। यहां वायुमंडल में ऑक्सीजन था ही नहीं और धरती भी चारों तरफ से समुद्र से घिरा हुआ था। पर अब यहां परिस्थितियां बदलने वाली थी। करीब 3.8 अरब साल पहले हमारी धरती में एक बार फिर से उल्कापिंडों की बारिश शुरू हुई। पर अबकी बार यह पिंड अपने साथ केवल पानी ही नहीं लाए थे बल्कि यह कुछ बेहद अनमोल चीज लेकर आए थे। जो धरती को जीवन देने वाला था। यह पिंड अपने साथ खनिज यानी मिनरल्स लेकर आए थे। साथ ही इन्होंने कार्बन, प्रोटीन और अमीनो एसिड्स का भी अंतरिक्ष से समुद्र की गहराइयों तक परिवहन किया। परंतु यहां समुद्र की गहराई में तापमान बहुत ही कम था। यहां सूरज की रोशनी पहुंच ही नहीं सकती थी। लेकिन यहां समुद्र की गहराई में भी छोटे-छोटे प्राकृतिक चिमनीज थे जो पानी को गहराई में भी गर्म रख रहे थे। और यहीं पर जीवन का पहला बीज पनपा। हम यह नहीं जानते हैं कि ऐसा कैसे हुआ था लेकिन किसी प्रकार से यहीं पर उन सारे मिनरल्स और केमिकल्स ने आपस में अभिक्रिया करके जीवन का बीज बोया और यहां जन्म हुआ पहले एक कोशिकीय जीवों का। यह एक प्रकार के बैक्टीरिया थे। यह बैक्टीरिया समुद्र में बहुत ही तेजी से बढ़ने लगे। अब यह पानी पूरी तरह से इन सूक्ष्म एक कोशिकीय जीवों से भर गया था। कई करोड़ साल बाद यानी आज से करीब 3.5 अरब साल पहले समुद्र के अंदर इन बैक्टीरियाओं की संख्या इतनी बढ़ गई थी कि यह आपस में जुड़कर इस प्रकार के पत्थरों जैसी संरचनाओं में बदल गए थे। जिसे कहा जाता है स्ट्रोमेटलाइट्स। यह एक-एक चट्टान अपने आप में बैक्टीरियाओं की एक पूरी बस्ती थी। यह बैक्टीरिया सूरज की रोशनी को भोजन में बदलते थे और इस प्रक्रिया को हम बेहतर रूप से जानते हैं प्रकाश संश्लेषण के नाम से। इसी प्रक्रिया में यह एक उत्पाद एक बाईप्रोडक्ट को निकालते थे, एक गैस, ऑक्सीजन। इन सूक्ष्म जीवों ने धरती पर एक सबसे अनमोल चीज का निर्माण किया जो धरती में जीवन को पनपने के लिए सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण था। और वास्तव में इसके बिना धरती पर कोई जीव जीवित नहीं रह पाता। करीब 2 अरब सालों तक पृथ्वी के वायुमंडल में ऑक्सीजन की मात्रा लगातार बढ़ती रही। आज से करीब 1.5 अरब साल पहले। धरती में अब भी किसी प्रकार का कॉम्प्लेक्स लाइफ विकसित नहीं हुआ था। और ना ही धरती पर इतने बड़े-बड़े महाद्वीप थे। धरती पर केवल छोटे-छोटे द्वीप थे जो चारों तरफ से पानी से घिरे थे। मगर अब धरती के क्रस्ट में हलचल होने लगी। इससे धरती की सतह कई सारे टेक्टोनिक प्लेट्स में टूट गई। फिर इन प्लेट्स में मूवमेंट के कारण यह सारे छोटे-छोटे द्वीप आपस में जुड़ गए और एक सुपरकॉन्टिनेंट का निर्माण किया। जिसका नाम था रोडिनिया। इस वक्त धरती का तापमान 30 डिग्री सेल्सियस था और धरती का 1 दिन 18 घंटों का था। मगर अब समय के साथ यहां परिस्थितियां बदलने वाली थी। आज से करीब 75 करोड़ साल पहले धरती की रूपरेखा बदल रही थी। धरती का सुपरकॉन्टिनेंट अब दो भागों में टूट गया और धरती के नीचे का लावा ज्वालामुखी विस्फोट के साथ धरती की सतह पर निकलने लगा। इन विस्फोट के कारण धरती में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा काफी बढ़ गई। अब धरती का आसमान इन कार्बन डाइऑक्साइड के घने बादलों से घिर चुका था। इन बादलों से लगातार अम्लीय वर्षा यानी एसिड रेन होने लगे। इससे धरती के वातावरण का अधिकतर कार्बन डाइऑक्साइड धरती के चट्टानों पर कार्बन के मोटे-मोटे परत के रूप में जमने लगे जो इस बारिश के पानी के साथ बरस रहे थे। इससे वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा में भारी कमी हो गई और अब धरती का वायुमंडल सूरज के गर्मी को रोकने के काबिल नहीं रह सका। इससे धरती का तापमान बहुत ही तेजी से कम होने लगा और धरती पर पहले हिमयुग यानी आइस एज की शुरुआत हुई। यह आइस एज अब तक का सबसे लंबा आइस एज था। लेकिन यह भी हमेशा के लिए नहीं रहने वाला था। समय के साथ-साथ वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा फिर से बढ़ने लगी और पृथ्वी का तापमान फिर से बढ़ने लगा। इससे धरती पर जमा बर्फ धीरे-धीरे पूरी तरह से गलने लगा और पृथ्वी फिर से सामान्य रूप में आने लगी। लेकिन उन सिंगल सेल बैक्टीरिया का क्या हुआ जो आइसिस के आने से पहले समुद्र में थे। आज से करीब 54 करोड़ साल पहले अब धरती का सारा बर्फ पूरी तरह से पिघल चुका था। इस वक्त समुद्र के अंदर जाने पर हमें एक बिल्कुल नई दुनिया देखने को मिलती है। ऑक्सीजन की उपलब्धता में अब वे एक कोशिकीय जीव कई अन्य रूपों में विकसित हो चुके थे। यहां चारों तरफ समुद्री पौधे ऐसे अजीब से छोटे-छोटे समुद्री जीव थे साथ ही ये दैत्याकार समुद्री दानव भी था एनोमालोकैरिस। ये सब कॉम्प्लेक्स मल्टीसेल्यूलर ऑर्गेनिज़्म के नए प्रजाति थे जो कि एक एक कोशिकीय सूक्ष्म जीव से विकसित हुए थे। यह है पिकाया। यह केवल 5 सेंटीमीटर लंबे थे लेकिन इन्होंने अपने शरीर में कुछ बेहद ही खास विकसित कर लिया था जो आगे चलकर हमारे शरीर का एक महत्वपूर्ण अंग बनने वाला था। यह पहले जीव थे जिनके पास रीढ़ की हड्डी थी और इन्हीं से विकसित होकर यह खासियत हमें भी मिलने वाली थी। आज से करीब 46 करोड़ साल पहले। अब धरती कुछ हद तक जानी पहचानी हो गई थी। धरती का सुपरकॉन्टिनेंट अब और भी कई भागों में टूट गया था। परंतु अब भी यहां जमीन पर रहने वाले जीव नहीं आए थे और धरती की सतह पर पेड़ पौधे भी नहीं उगे थे। पर ऐसा क्यों था? दरअसल ऐसा सूरज से आने वाले हानिकारक अल्ट्रावॉयलेट किरणों की वजह से हो रहा था। पर अब धरती के वायुमंडल में एक नए परत का निर्माण हो रहा था जिसे आज हम कहते हैं ओजोन लेयर। वायुमंडल के ऑक्सीजन सूरज के अल्ट्रावॉयलेट किरणों को सोखकर ओजोन गैस में बदलने लगे थे। इसने धरती के चारों ओर एक चादर का निर्माण किया जो हमें सूरज की अल्ट्रावॉयलेट रेडिएशन से आज भी बचाता है। इसके कारण अब धरती की सतह पर नन्हे शैवाल पल फूल सके और यही धरती के पहले लैंड प्लांट्स बने। समुद्र में रहने वाली यह मछली टिक्टैलिक जिसने पहली बार समुद्र से बाहर आने का निर्णय लिया। इसने अपने फिंस का इस्तेमाल पैरों के रूप में किया और समय के साथ यह जमीन पर ज्यादा देर तक रहने लगा। जिससे इसके अंग काफी विकसित हो गए। करीब 1.5 करोड़ साल के विकास क्रम के बाद ये जानवर अब पूरी तरह से जमीन में रहने लायक बन चुके थे और इन्हें कहा जाता था टेट्रापॉड्स। आज से करीब 36 करोड़ साल पहले ये टेट्रापॉड्स पूरी तरह से विकसित हो गए थे और अब यह पूरी तरह जमीन पर रहने वाले जीव बन गए। यही वह जीव थे जो आगे चलकर डायनासॉर्स, बर्ड्स, मैमल्स और अंत में इंसानों में विकसित होने वाले थे। यहां से एक नए प्रजाति की शुरुआत हुई। लेकिन अब धरती का बुरा वक्त आने वाला था। समय के साथ जीवों की विकास प्रक्रिया जारी रही लेकिन साथ ही धरती का वातावरण भी बहुत तेजी से बदल रहा था। एक बार फिर से ज्वालामुखी विस्फोट के कारण धरती का तापमान बहुत ही बढ़ गया। इससे धरती पर बहुत बड़ा अकाल पड़ गया। इस अकाल में लगभग सारे पेड़ सूख गए और धरती पर जीवों की कुल 95% आबादी साफ हो गई। इस अकाल में कुछ जीव ही जिंदा बच पाएं जिन्होंने जिंदा रहने के लिए कुछ भी खाना शुरू कर दिया और गर्मी से बचने के लिए जमीन के अंदर रहने लगे। पर समय के साथ-साथ फिर से परिस्थितियों में सुधार आया। धरती का वातावरण फिर से सामान्य हो गया। आज से करीब 20 करोड़ साल पहले अब धरती की रूपरेखा काफी हद तक बदल गई थी। ज्वालामुखी विस्फोट से नए भूभागों का निर्माण हुआ जिन्होंने आपस में मिलकर एक सुपरकॉन्टिनेंट का निर्माण किया जिसका नाम था पेंजिया। अब धरती अंतरिक्ष से काफी हद तक आज के जैसी दिखाई देती थी। इतने बड़े अकाल के गुजरने के बाद धरती वापस से सामान्य हो गई। सतह पर फिर से नए पेड़ पौधे उगने लगे और धरती पर जो 5% जीव बच पाए थे, वे अब विकसित हो चुके थे। और एक बिल्कुल नए प्रजाति का जन्म हुआ था जो आने वाले समय में धरती पर अपना शासन चलाने वाला था। वे थे डायनासॉर्स। डायनासॉर्स असल में उन्हीं 5% रेंगने वाले जीवों से विकसित हुए थे जो उस अकाल में खुद को किसी प्रकार से बचा पाए थे। डायनासॉर्स के भी कई प्रजातियां थी। कुछ शाकाहारी थे तो कुछ मांसाहारी। कुछ डायनासॉर्स बहुत ही शांत स्वभाव के थे तो कुछ बहुत ही हिंसक। डायनासॉर्स ने भी काफी लंबे समय तक धरती पर राज किया। करीब 11 करोड़ साल तक ये धरती पर फल फूल रहे थे। पर इसके बाद क्या हुआ? सारे डायनासॉर्स कहां विलुप्त हो गए और इंसान कहां से आए? यह हम जानेंगे अगले एपिसोड में। तो आज के लिए बस इतना ही अगर आपको दूसरा 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पृथ्वी में जीवन की शुरुवात कैसे हुई थी ? जानकर हैरान हो जाओगे | How life Began on Earth ?
अंतरिक्ष TV by Kaushik Bhattacharjee
11m 18s1,970 words~10 min read
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