[0:12]दिसंबर का महीना अभी शुरू ही हुआ था। ठंड अपनी चरम सीमा पर थी। इस ठंड के महीने में हीरा का परिवार ठंड से ठिठोर रहा था।
[0:24]अपने परिवार को बचाने के लिए हीरा के पास ढंग का कंबल तक नहीं था। हीरा बहुत ही गरीब था।
[0:33]और अपने परिवार के साथ बहुत गरीबी में जीवन व्यतीत कर रहा था। हीरा को कभी काम मिल जाता तो कभी नहीं। बाकी के दिन और उसका परिवार
[0:48]पानी पीकर दिन गुजारते थे।
[0:54]सुनिए जी बच्चे भूख से तड़प रहे हैं। घर में अनाज नहीं बचा है। कल तो मैंने अपने पड़ोसन से थोड़ा आटा मांग कर रोटियां बना दी थी।
[1:05]लेकिन आज तो ना चावल है ना आटा मैं बच्चों को क्या खिलाऊंगी?
[1:09]मैं क्या करूं अनु? मैं तो बहुत कोशिश करता हूं। लेकिन कभी काम मिल पाता है तो कभी नहीं। मैं सुबह ही गया था किसी ने मुझे कोई काम नहीं दिया।
[1:20]फिर भी मैं अभी जाकर देखा हूं। तुम एक काम करो। तुम आज भी पड़ोसन से कुछ आटा नहीं तो चावल मांग कर लेकर आओ और बच्चों के लिए कुछ ना कुछ बना दो।
[1:32]आपको क्या लगता है मैं कोशिश नहीं की। मैं सुबह गई थी।
[1:37]लेकिन पड़ोसन ने चार बातें सुना दी। उन्होंने मुझे कुछ भी देने से मना कर दिया।
[1:46]और ऊपर से बेज्जती हुई वह अलग। मैंने अपनी दूसरी पड़ोसन से भी मांगा।
[1:52]उसने भी मुझे देने से मना कर दिया और बहाना बना दिया कि उनके ही घर पर खाने के लिए कुछ भी नहीं है।
[2:02]जबकि अब उनके बच्चे हलवा पूरी खा रहे थे। मुझे इतना तो समझ आ गया है।
[2:08]जब अच्छा समय हो तब सब लोग अच्छे से बात करते हैं। लेकिन जैसे ही बुरा समय आता है लोग हमें देखकर घर के अंदर भागने लगते हैं।
[2:16]कोई हमारी मदद नहीं करता। मेरी सबसे अच्छी सहेली ममता ने जब मुझे किसी और से मांगते हुए देखा तो मुझे देखकर वह अपने घर में चली गई और दरवाजा बंद कर दिया।
[2:33]मुझे यह देख बहुत बुरा लगा। मुझे नहीं लगता इस बूढ़े समय में हमारी कोई सहायता करेगा। हमें अपनी सहायता खुद ही करनी होगी।
[2:43]आप जाइए और कुछ ना कुछ करके बच्चों के लिए कुछ खाने को लेकर आइए। मैं बच्चों को ऐसे तड़पते हुए नहीं देखना चाहती।
[2:53]तुम चिंता मत करो। मैं जाता हूं। और मैं कुछ ना कुछ लेकर ही आऊंगा। मैं वादा करता हूं।
[3:01]हमारे बच्चे भूखे नहीं सोएंगे। तुम मेरा इंतजार करना मैं अभी जाता हूं।
[3:15]मालिक मालिक मुझे काम की बहुत जरूरत है। मुझे कुछ काम दे दीजिए। मेरे बच्चे भूख से तड़प रहे हैं मालिक।
[3:25]कल से उन्होंने कुछ नहीं खाया। आज अगर मैं खाली हाथ घर गया तो उन्हें आज भी भूख नहीं सोना पड़ेगा।
[3:34]कृपया मुझे काम दे दीजिए मालिक। कुछ भी काम चलेगा। मैं सब करने के लिए तैयार हूं।
[3:41]ए जरा रुको। तुम्हें दिखाई नहीं दे रहा मैं कुछ जरूरी बात कर रहा हूं। चुपचाप खड़ा रहे यहां पे।
[3:51]रघु, यह दो बोरिया लाल सिंह के घर 1:00 बजे से पहले पहुंच जानी चाहिए। इनमें बहुत जरूरी सामान है और लाल सिंह ने यह आज ही मांगी है।
[4:01]लेकिन मालिक अभी तो 10:00 बज रहे हैं। 3 घंटे में यह कैसे मुमकिन है? उनका गांव तो बहुत दूर है।
[4:10]मैं भी क्या करूं रघु? मेरे ध्यान से ही उतर गया। मुझे याद ही नहीं रहा कि लाल सिंह ने यह आज ही मांगा था।
[4:20]और वह भी 1:00 बजे से पहले। हमारे पास कोई रास्ता नहीं है। तुम कुछ भी करो लेकिन यह 3 घंटे में पहुंच जानी चाहिए।
[4:48]नहीं तो लाल सिंह बहुत गुस्सा करेगा और वह हमसे व्यापार करना भी छोड़ देगा। मेरा इसमें बहुत बड़ा घाटा होगा।
[4:58]यह सारी बातें हीरा सुन लेता है। और हीरा बोलता है।
[5:03]माफी चाहता हूं मालिक। मैं बीच में बोल रहा हूं। लेकिन मालिक यह काम मैं कर सकता हूं। मैं 3 घंटे के भीतर यह बोरिया देकर आ जाऊंगा।
[5:15]मुझ पर एक बार यकीन करके देखिए मालिक।
[5:18]क्या? तू सचमुच 3 घंटा में यह बोरिया वहां तक पहुंचा सकता है? अगर यह तूने कर दिखाया तो मैं तुझे दुगनी मजदूरी दूंगा।
[5:30]लेकिन अगर तूने लापरवाही की और तू वहां पर 3 घंटे के भीतर नहीं पहुंचा तो याद रखना। मुझसे बुरा कोई नहीं होगा।
[5:40]अगर तू सचमुच कर सकता है तो ही लेकर जा। वरना मैं वो किसी और आदमी को देखता हूं। मैं तेरी वजह से अपना नुकसान नहीं कर सकता।
[5:49]नहीं मालिक। मैं सच कहता हूं। मुझ पर एक बार यकीन करके देखिए। मैं यह बोरिया पहुंचा दूंगा।
[5:58]आप चिंता मत कीजिए। अच्छा ठीक है। तो यह बोरिया उठा और जल्दी से निकल और काम समय पर हो जाना चाहिए।
[6:07]हीरा वह दो बोरिया अपने सर पर लादे हुए निकल पड़ता है। चलते-चलते उन बोरियों की वजह से हीरा का सिर दुखने लगता है।
[6:19]लेकिन फिर उसे अपने भूखे बच्चों की याद आती है। और फिर चल पड़ता है।
[6:25]जब हीरा जंगल के रास्ते से जा रहा होता है तभी उसे रास्ते में एक आदमी नीचे पड़ा हुआ दिखाई देता है।
[6:35]यह बाबा कौन है और इन्हें क्या हुआ है? लगता है बेहोश है। इन्हें तो चोट भी लगी है।
[6:44]पता नहीं इनके साथ क्या हुआ है? क्या करूं? अगर इन्हें यहां ऐसे ही छोड़ दिया तो पता नहीं यह मर भी सकते हैं।
[6:54]मुझे उनकी जान बचानी होगी। लेकिन अगर मैं यह बोरिया समय पर लाल सिंह के यहां नहीं लेकर गया तो मालिक बहुत गुस्सा करेंगे।
[7:07]दुगनी मजदूरी तो छोड़ वह मुझे फूटी कौड़ी तक नहीं देंगी। ऊपर से मैंने उन्हें वादा भी किया है।
[7:14]मेरी वजह से उनका बहुत बड़ा नुकसान हो जाएगा। मैं क्या करूं? हे ऊपर वाले, मेरी मदद कर।
[7:24]एक तरफ मेरे बच्चे भूख से तड़प रहे हैं और दूसरी तरफ किसी की जान का सवाल है। मैं करूं तो क्या करूं?
[7:33]हीरा बहुत गहरी सोच में पड़ जाता है।
[7:37]नहीं नहीं यह गलत है। मैं इन्हें छोड़कर यहां से नहीं जा सकता। इनके जान का सवाल है।
[7:47]अगर आज मैंने उनकी जान नहीं बचाई तो जिंदगी भर मुझे इस बात का गम रहेगा कि मैंने मुसीबत के समय इस बुजुर्ग को मरने के लिए छोड़ दिया।
[7:59]जबकि मैं उनकी मदद कर सकता था। यह बात मुझे जीने नहीं देगी।
[8:08]मैं और मेरा परिवार तो एक दिन भूखा रह लेगा। लेकिन अगर इनकी जान एक बार चली गई तो दोबारा किसी भी कीमत पर लौटकर नहीं आएगी।
[8:20]इस दुनिया में जान से अलावा और कोई भी चीज कीमती नहीं। मुझे इनकी मदद करनी होगी।
[8:27]हीरा वह बोरिया वही रखकर उस आदमी को वैध जी के पास लेकर जाता है। वैध जी उन्हें देखकर बहुत चौक जाते हैं।
[8:37]इनको क्या हुआ है और तुम कौन हो?
[8:40]वेद जी मैं नहीं जानता इनको क्या हुआ है। यह मुझे जंगल के रास्ते में मिले थे और मैं यहां किसी को नहीं जानता।
[8:52]मैं आपका पता पूछ पूछ कर यहां तक आया हूं। आप जल्दी से इनका इलाज कीजिए।
[8:58]वेद जी उस आदमी का इलाज करते हैं। फिर थोड़ी देर बाद बाहर आकर हीरा से कहते हैं।
[9:05]उन्हें दिल का दौरा आया था। लेकिन अब वह खतरे से बाहर है। तुम जानते हो तुमने कितना बड़ा काम किया है।
[9:14]तुम जिन्हें यहां लेकर आए हो क्या तुम्हें पता है वह कौन है?
[9:19]मुझे नहीं पता वह कौन है। मैंने तो बस इंसानियत के नाते उनकी मदद की है।
[9:27]वह चाहे कोई भी हो मुझे इससे कोई वास्ता नहीं। लेकिन मैं उन्हें ऐसे रास्ते में तड़पते हुए नहीं छोड़ना चाहता था।
[9:36]इसलिए मैं उन्हें यहां लेकर आ गया।
[9:39]तुमने बहुत नेकी का काम किया है। तुम जिन्हें यहां लेकर आए हो वह इस गांव के सबसे रईस आदमी अमर सिंह जी है।
[9:49]उनसे बड़ा रईस आसपास के 100 गांव में भी नहीं है। तुमने उनकी जान बचाकर बहुत बड़ा एहसान किया है।
[9:58]जब उन्हें पता चलेगा तो तुमसे बहुत खुश होकर तुम्हें निहाल कर देंगे।
[10:04]वेद जी मैं यहां ज्यादा देर नहीं रुक सकता। मैं एक बहुत जरूरी काम से जा रहा था।
[10:10]घर पर मेरे बच्चे भूखे हैं। मेरा इंतजार कर रहे हैं।
[10:18]मुझे जल्दी से वह काम करके घर लौटना है।
[10:22]क्या बात कर रहे हो? रुको मैं अभी तुम्हें कुछ पैसे देता हूं। तुम अपने घर पर खाने के लिए लेकर जाओ।
[10:30]नहीं वेद जी मुझे इनाम नहीं चाहिए। मेरी इनाम की कमाई नहीं लेना चाहता।
[10:38]मुझे बस मेरी मेहनत की कमाई चाहिए। अगर मैं यह इनाम आपसे ले लूंगा तो इंसानियत के नाते जो मैंने पुण्य कमाया है वह मैं बेच दूंगा।
[10:50]और मैं अपना पुण्य बेचना नहीं चाहता। मुझे इसकी कीमत नहीं चाहिए।
[10:59]उनकी जान बचाने के बदले मैं आपसे पैसे लूं। बिल्कुल भी नहीं। मुझे कुछ नहीं चाहिए। मुझे अब निकलना होगा। मैं जाता हूं।
[11:10]ऐसा कहकर हीरा वहां से निकल आता है। तभी रास्ते में उसे सेठ मिल जाता है।
[11:19]उल्लू के पट्टे कमबख्त कहां मर गया था? मैंने तुझे क्या बोला था? तूने मेरा बहुत बड़ा नुकसान किया है।
[11:30]सेठ लाल सिंह बहुत गुस्से में था। तेरी वजह से मेरा बहुत बड़ा नुकसान हुआ है। तुझे तो मैं फूटी कौड़ी तक नहीं दूंगा।
[11:40]गलती मेरी ही है जो मैंने तुझ पर भरोसा किया। तू भरोसे लायक है ही नहीं।
[11:47]अगर तू समय पर मेरा काम कर देता तो मैं तुझे और भी काम दे सकता था। लेकिन नहीं।
[11:55]शायद तू इस लायक ही नहीं। मैं तुझे माफ नहीं करूंगा।
[12:40]मेरे लिए सबसे ज्यादा जरूरी मेरा काम है और जो लोग मेरे काम को ईमानदारी से नहीं करते ऐसे लोगों को मैं लात मारता हूं। चल निकल यहां से।
[12:51]ऐसा मत कीजिए मालिक। मुझे माफ कर दीजिए। दरअसल रास्ते में एक आदमी बेहोशी के हालात में पड़ा हुआ था।
[13:08]मैं उसे लेकर वेद जी के पास गया था। अगर मैं यह बोरिया पहुंचा देता तो उस आदमी की जान चली जाती।
[13:20]मालिक इन बोरियों से ज्यादा कीमती उस आदमी की जान थी। तेरी इतनी हिम्मत तुम मुझसे जवान लड़ता है।
[13:28]अगर वह आदमी मर जाता तो क्या? आज ना कल तो उसे भी मरना ही है। लेकिन तूने उस आदमी के लिए मेरा इतना बड़ा नुकसान करवाया।
[13:35]मैं तुझे माफ नहीं करूंगा। मेरे लिए सबसे ज्यादा जरूरी मेरा काम है।
[13:42]और जो लोग मेरे काम को ईमानदारी से नहीं करते ऐसे लोगों को मैं लात मारता हूं। चल निकल यहां से। तुझे कुछ नहीं मिलेगा। हीरा उदास होकर घर चला जाता है। घर के अंदर जाने की उसकी हिम्मत नहीं होती।
[13:50]हीरा अपने घर के बाहर ही बैठे रोता रहता है। तभी उसे घर के अंदर से अपनी पत्नी की आवाज आती है।
[14:02]जो बच्चों से कह रही होती है। थोड़ी देर और बेटा तुम्हारे पिताजी आते ही होंगे और तुम्हारे पिताजी तुम्हारे लिए बहुत अच्छा-अच्छा खाना लाने गए हैं।
[14:13]आज तुम्हें भूखा नहीं सोना पड़ेगा। तुम्हें पेट भर कर खाना मिलेगा। बस थोड़ी देर और इंतजार कर लो।
[14:22]यह सारी बातें सुन हीरा के दिल को बहुत ठेस पहुंचती है। उसके घर के अंदर जाने की हिम्मत ही नहीं होती।
[14:33]वह घर के बाहर ही बेटा होता है। तभी थोड़ी देर बाद जब उसे बच्चों की आवाज आनी बंद हो जाती है तो वह घर के अंदर जाता है उसे देख उसकी पत्नी रहते हैं।
[14:47]क्या हुआ जी आज भी कुछ नहीं मिला?
[14:50]मेरा नसीब ही खराब है अनु। काम तो मिला था लेकिन पैसे नहीं मिले।
[15:00]और हीरा अनु को सारी बातें बताता है। मैं कितना बदनसीब बाप हूं जो अपने बच्चों को पेट भर खाना खाना तक नहीं दे सकता।
[15:10]आज मेरे बच्चे भूखे सो रहे हैं। लानत है मुझ पर। भगवान मेरे जैसा पिता किसी को ना दे।
[15:19]पता नहीं अनु मुझे उसे वक्त क्या हो गया था? मैंने अपने बच्चों के बारे में ना सोचकर उस आदमी के बारे में सोचा।
[15:30]अगर मैं उस वक्त उसे आदमी के बारे में ना सोचता तो आज मेरे बच्चे यूं भूखे सो रहे होते। हे ईश्वर यह तेरी कैसी परीक्षा है जो आज मुझे तड़प तड़प कर मार रही है।
[15:43]आप सब्र रखें सब ठीक हो जाएगा। ईश्वर सब देख रहा है। आपको उस पुण्य का हिसाब जरूर होगा।
[15:54]यहां कोई भी किया गया पुण्य जाया नहीं जाता। सबका हिसाब होता है। आपने अपने बच्चों के बारे में ना सोचकर उसे अनजान आदमी की मदद की है।
[16:05]देख लेना ईश्वर एक दिन हमारी मदद जरूर करेगा।
[16:11]इसी उम्मीद से दोनों रात में पानी पीकर भूखे ही सो जाते हैं। अगली सुबह जब सेठ अमर सिंह को होश आता है
[16:23]तब वेद जी उन्हें सारी बातें बताते हैं तो अमर सिंह बोलता है।
[16:28]क्या बात कर रहे हो वेद जी आपने उस आदमी को रोका क्यों नहीं। हम उसका धन्यवाद करते।
[16:38]उसने हमारी जान बचाई है उसने हम पर बहुत बड़ा एहसान किया है।
[16:44]नहीं तो शायद मैं आज जिंदा भी नहीं रहता। सेठ जी मैंने उसे रोकने की बहुत कोशिश की लेकिन वह बहुत मुसीबत में था।
[16:56]वह कह रहा था कि उसके बच्चे भूखे उसका इंतजार कर रहे हैं। सेठ जी उसके हालात बहुत खराब थे। मुझे लगता है उसे पैसों की बहुत जरूरत थी।
[17:10]मैं तो उस वक्त होश में नहीं था। तुमने उसकी मदद क्यों नहीं? तुम उसे कुछ पैसे दे देते। बदले में तुम्हें कई गुना पैसे दे देता।
[17:21]सेठ जी मैंने उसकी मदद करनी चाही थी। मैं उसे पैसे भी दे रहा था लेकिन वह बहुत खुददार निकला।
[17:33]उसने वह पैसे लेने से इंकार कर दिया। मैंने ऐसा आदमी तो अपने जीवन में कभी नहीं देखा। कोई इतना भी ईमानदार और खुददार हो सकता है।
[17:42]हम अब भी के अब भी उसके गांव जाकर उसे इनाम देना चाहेंगे। सेठ जी अभी आपको आराम की जरूरत है।
[17:51]आप कहीं मत जाइए। नहीं वेद जी। हम जब तक उसे आदमी से मिल नहीं लेते हमारा मन नहीं मानेगा।
[18:00]हम उसे जल्द से जल्द मिलना चाहते हैं और जैसा कि तुम बता रहे हो वह बहुत कष्ट में है।
[18:09]उसने हमारी जान बचाई है। हम उसे किसी बात का कोई कष्ट नहीं होने देंगे। हम अभी उसके पास जाते हैं।
[18:17]ऐसा कहकर सेठ जी हीरा के घर पहुंच जाते हैं। घर में हीरा और उसकी पत्नी दोनों निराश होकर बैठे होते हैं।
[18:29]तभी बाहर से आवाज आती है। हीरा और उसकी पत्नी बाहर जाते हैं। अमर सिंह अपने आदमी के साथ होता है।
[18:38]और उसके आदमी के हाथों में सोने के सिक्कों से भरी पोटली होती है। हीरा सेठ जी को देख बहुत चौक जाता है। और बोलता है।
[18:49]अरे सेठ जी आप आपकी तबीयत कैसी है? आप ठीक तो हो ना?
[18:57]सेठ जी हीरा को देखकर उसे गले लगा लेते हैं। और फिर बोलते हैं।
[19:02]मैं ठीक हूं बेटे यह जिंदगी तुम्हारी ही देन है। अगर तुम मेरी मदद नहीं करते तो शायद मैं मैं आज मैं जिंदा नहीं रहता।
[19:13]तुम्हारा यह एहसान मैं जिंदगी भर नहीं चुका सकता। बेटा मैं तुम्हें कुछ देना चाहता हूं। इसे स्वीकार करो बेटा।
[19:24]नहीं सेठ जी मैंने यह सब पैसों के लिए नहीं किया है। मैंने तो इंसानियत के नाते आपकी जान बचाई है।
[19:35]मैं इसे पैसों में नहीं तोल सकता। जान बहुत कीमती होती है सेठ जी। पैसे लेकर मैं इस बात का सौदा नहीं कर सकता। मुझे यह पैसे नहीं चाहिए।
[19:47]वाह बेटे सचमुच मैंने तुम्हारे जितना ईमानदार आदमी आज तक नहीं देखा। तुम बोलो बेटा। तुम्हें क्या चाहिए? हम तुम्हारे लिए सब करने के लिए तैयार है।
[20:01]सेठ जी अगर आप कुछ करना ही चाहते हैं तो मुझे काम दे दीजिए। मुझे काम की बहुत जरूरत है।
[20:11]इस काम से मैं अपने परिवार का पालन पोषण करना चाहूंगा। लेकिन यह इनाम की कमाई मुझे नहीं चाहिए। मुझे मेरे मेहनत के पैसे चाहिए। बस आप मुझे काम दे दीजिए। आपका बहुत एहसान रहेगा।
[20:27]एहसान तो तुमने मुझ पर किया है। वह भी इतना बड़ा कि मैं काम देखकर भी नहीं चुका सकता।
[20:36]फिर भी तुम्हारी इच्छा है तो तुम आज से ही मेरे यहां काम करोगे।
[20:43]और हां अब तो तुम तुम्हारे परिवार के लिए उसे कुछ तो पैसे ले लो ताकि तुम्हारा परिवार भूखा ना रहे। उसके बदले में तुम मेरे यहां काम तो कर ही रहे हो।
[20:54]ठीक है मालिक। आपका बहुत-बहुत धन्यवाद।
[20:57]हीरा और अनु बहुत खुश हो जाते हैं। सेठ जी के जाने के बाद अनु हीरा से कहती है।
[21:04]देखा आपने। मैंने उस दिन आपसे कहा था ना कि इस पुण्य का आपको एक दिन बहुत बड़ा फल मिलेगा।
[21:13]आप कितने दिनों से काम की तलाश में थे लेकिन कोई आपको काम नहीं दे रहा था। लेकिन इन सेठ जी ने तो घर पर आकर आपको काम दिया है।
[21:24]कितनी बड़ी बात है। हां अनु तुम बिल्कुल सच कह रही हो। सेठ जी ने मुझ पर भरोसा कर मुझे काम दिया है।
[21:34]मैं पूरी निष्ठा और ईमानदारी से सेठ जी के यहां काम करूंगा। उन्हें कभी कोई शिकायत का मौका नहीं दूंगा।
[22:59]फिर हीरा अपने परिवार सहित अमर सिंह के साथ रहने लगता है और उसका सारा कारोबार संभालने लगता है।



